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आठ अरब से अधिक आबादी वाली इस दुनिया के किसी न किसी कोने में हमेशा ऐसा कुछ न कुछ होता रहता है, जिस पर घंटों बहस की जा सकती है. हर कूटनीतिक और राजनीतिक मेल-मिलाप में नफा-नुकसान का विश्लेषण किया जा सकता है . हमारे देश में भी हर गली-चौहारे ऐसी ही बहस चल रही है…पूछा जा रहा है कि भ्रष्टाचार केस में कौन फंसा रहा है और किसे फंसाया जा रहा है? कहीं न्यायपालिका की सीमा तय करने की बात हो रही है. कहीं योगी आदित्यनाथ के स्टाइल की तो कहीं पश्चिम बंगाल में चुनावी टक्कर की . लेकिन, सियासी शोर के बीच अक्सर आम आदमी से जुड़े मुद्दे पीछे छूट जाते हैं . ऐसा ही एक मुद्दा है – देश के लाखों परिवारों से जुड़ा. स्कूल के बाद कॉलेज में पढ़ाई का, 12वीं बोर्ड पास करने के बाद प्रोफेशनल कोर्सेज में एडमिशन का . इंजीनियरिंग, मेडिकल, लॉ जैसे कोर्सेज में पढ़ाई के लिए मोटी फीस के इंतजाम का…12वीं बोर्ड की परीक्षा दे रहे छात्र-छात्राओं के सामने तीन तरह का प्रेशर है. एक, बोर्ड परीक्षा में अधिक से अधिक नंबर हासिल करने का … दूसरा, प्रोफेशनल कोर्सेज में दाखिले के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं में अच्छी रैंक हासिल करने का … तीसरी, प्रोफेशनल कोर्सेज में पढ़ाई के लिए लाखों रुपये की फीस के इंतजाम का . छात्र-छात्राओं के एक वर्ग के जेहन में ये सवाल भी घूम रहा है कि जब स्कूल में एक जैसी पढ़ाई – तो फिर Competitive Exam में जाति के आधार पर अलग-अलग कटऑफ क्यों? एक ही कोर्स में किसी का 70 परसेंटाइल..किसी का 80 परसेंटाइल पर एडमिशन हो जाता है . लेकिन, उसी कोर्स में कोई 90 परसेंटाइल हासिल करने के बाद भी एडमिशन क्यों नहीं पाता? क्या ऐसी व्यवस्था छात्र-छात्राओं के मन में भेदभाव नहीं पैदा करेगी? आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में एक और सवाल छात्रों को परेशान कर रहा है कि क्या गारंटी है कि प्रोफेशनल कोर्स के दौरान – जो कुछ सीखेंगे वो पासआउट होने के बाद जॉब मार्केट में किसी काम की रहेगी या नहीं ? आज देश के हर परिवार से जुड़े कुछ ऐसे ही सुलगते सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे.

क्या आपको पता है कि इस साल कितने छात्र-छात्राएं 12वीं बोर्ड की परीक्षा दे रहे हैं ? आंकड़ों के मुताबिक, इस साल 12वीं बोर्ड के लिए CBSE में साढ़े अठारह लाख से अधिक छात्रों ने रजिस्ट्रेशन कराया है . यूपी बोर्ड से 24.79 लाख छात्र परीक्षा दे रहे हैं. महाराष्ट्र बोर्ड से 15 लाख तो बिहार बोर्ड से 13 लाख से अधिक छात्र-छात्राएं 12वीं बोर्ड की परीक्षा दे रहे हैं . करियर के लिहाज से 12वीं बोर्ड के नतीजे कितने अहम होते हैं – ये किसी को बताने या समझाने की जरूरत नहीं है. ऐसे में 12बोर्ड की परीक्षा देने वाले बच्चे-बच्चियों का टेंशन में आना स्वाभाविक है . उनके मम्मी-पापा भी टेंशन में हैं. जिस घर से लड़का या लड़की 12वीं बोर्ड की परीक्षा दे रहा है – वहां परिवार के भीतर और बाहर से यही पूछा जा रहा है कि बेटा पेपर कैसा जा रहा है ? आगे का क्या प्लान है? इंजीनियरिंग, मेडिकल, लॉ या फिर मैनेजमेंट… ज्यादातर लोगों की सुईं ऐसे ही तीन-चार बड़े प्रोफेशन के ईद-गिर्द घूमती दिखती है. बच्चा इसलिए टेंशन में है – बोर्ड में अच्छे नंबर आएंगे या नहीं ? अगर अच्छे नंबर आ गए और प्रोफेशनल कोर्सेज की Entrance Exam Crack नहीं हुई तो क्या होगा..ऐसे में सबसे पहले समझते हैं कि हमारे देश में नामी कॉलेज और यूनिवर्सिटी में दाखिला कितना मुश्किल है ? इंजीनियरिंग में दाखिले के लिए कंपटीशन कितना कड़ा और बड़ा है?

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ऐसे में हर पेपर के लिए अपनी क्षमता के हिसाब से तैयारी और अधिक से अधिक नंबर लाने का टारगेट तय है . छात्र जानते हैं कि उनके करियर के लिए 12वीं बोर्ड के नतीजे कितने अहम हैं.वैसे तो 10वीं बोर्ड के बाद करियर को लेकर तस्वीर कुछ हद तक साफ होने लगती है-जब कोई छात्र आगे की पढ़ाई के लिए साइंस चुनता है… कोई कॉमर्स तो कोई ह्यूमैनिटीज . आज की तारीख में ज्यादातर बच्चे 12वीं के बाद प्रोफेशनल कोर्सेज में दाखिला चाहते हैं-जिससे उनका करियर बन सके . पासआउट होते ही कैंपस प्लेसमेंट हो जाए.. करियर की शुरुआत ही भारी-भरकम पैकेज से हो .

ऐसा ही एक करियर है इंजीनियरिंग का . हर साल लाखों की तादाद में IITs में एडमिशन का सपना लिए छात्र JEE Main और JEE Advance में बैठते हैं…लेकिन, सीटें हैं गिनती की . दिसंबर 2025 में हुई JEE Main के पहले सेशन में 13 लाख से अधिक बच्चे बैठे…अप्रैल में होने वाले सेशन टू में भी करीब इतने ही छात्रों के परीक्षा में बैठने के चांस हैं . JEE Main में हाई कटऑफ वाले चुनिंदा बच्चों को JEE Advance में बैठने का मौका मिलेगा . इस साल IITs में 18,160 सीटें हैं . NITs में 24,525 सीटें हैं . IIITs में 9940 सीटें हैं . GFTIs में 10228 सीटें हैं . जरा सोचिए 62, 853 सीटों के लिए 13 लाख से अधिक छात्रों की दावेदारी है… IITs समेत दूसरे नामी सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों में एडमिशन के लिए मारामारी इसलिए बहुत अधिक है- क्योंकि वहां फीस थोड़ी कम लगती है. साथ ही पढ़ाई खत्म होने से पहले लाखों रुपये के पैकेज का प्लेसमेंट तय माना जाता है..हालांकि, पिछले कुछ वर्षों का ट्रेंड बता रहा है कि IITs और NITs की डिग्री के बाद भी कैंपस प्लेसमेंट की गारंटी नहीं है .

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सिर्फ सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज ही नहीं नामी प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेजों में भी एडमिशन के लिए प्रतिस्पर्धा कम नहीं है . मसलन बिट्स पिलानी, वीआईटी वेल्लोर, SRM Institute of Science and Technology, Chennai, Thapar Institute of Engineering and Technology, Patiala, Manipal Institute of Technology (MIT), Manipal, Lovely Professional University (LPU), Phagwara जैसे प्राइवेट संस्थानों में छात्र इंजीनियरिंग की डिग्री के लिए दाखिला ले रहे हैं . इस उम्मीद के साथ की एक बार एडमिशन हो गया, तो कैंपस प्लेसमेंट तो तय हैं . वकालत में करियर देखने वाले लड़के-लड़कियां 12वीं के बाद छात्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज में दाखिला के लिए दौड़ लगाते हैं…जिनमें करीब 4 हजार सीटें हैं . ऐसे में टॉप लॉ यूनिवर्सिटी में दाखिला के लिए CLAT में बहुत अच्छी रैंकिंग जरूरी शर्त है. टॉप 3 NLU में दाखिला के लिए सामान्य श्रेणी के छात्रों 120 नंबर में से 90+ जरूरी है. इस साल CLAT में शामिल होने के मामले में लड़कियों की संख्या लड़कों की तुलना में अधिक रही.

टॉप केंद्रीय विश्वविद्यालयों में भी एडमिशन एवरेस्ट की चढ़ाई जैसा ही बनता जा रहा है . ऐसे में दिल्ली-मुंबई जैसे बड़े शहरों में रहने वाले अपर मिडिल क्लास परिवारों के बच्चे मनपसंद या
बेहतरीन संस्थानों में एडमिशन नहीं मिलने पर विदेशों का रुख तेजी से कर रहे हैं . वकालत में करियर देखने वाले लड़के-लड़कियों की ख्वाहिश होती है– Common Law Admission Test यानी CLAT में अच्छी रैंकिंग हासिल करना . देशभर में खड़ी नामी LAW UNIVERSITIES में करीब 4000 सीटें हैं…जिसके लिए 88 हजार से ज्यादा छात्र रेस में थे . इसी तरह इंजीनियरिंग में दाखिले के लिए दिसंबर में हुई JEE Main में 13 लाख से अधिक बच्चे शामिल हुए…JEE MAIN के नतीजों के आधार पर JEE ADVANCE के लिए कटऑफ तैयार होती है…JEE ADVANCE की रैंकिंग के आधार पर तय होता है कि किसका दाखिला देश की टॉप IITs में होगा? देश की 23 IITs में करीब 18 हजार सीटें हैं…ऐसे में हिसाब लगाइए कि IIT में एडमिशन कितना मुश्किल है. भारत में मेडिकल की पढ़ाई को सबसे सुरक्षित करियर माना जाता है. इस साल मेडिकल में दाखिले के लिए होने वाली National Eligibility cum Entrance Test यानी NEET-UG के लिए रजिस्ट्रेशन अभी जारी है . ऐसे में मेडिकल में दाखिल की दौड़ को समझने के लिए पिछले साल के आंकड़ों को देखना-समझना होगा…देश के 780 मेडिकल कॉलेजों की 1 लाख 18 हजार सीटों के लिए 20.8 लाख छात्रों ने परीक्षा दी . करीब 55 हजार सीटें सरकारी मेडिकल कॉलेजों की हैं. बाकी सीटें प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की हैं…जहां डॉक्टर बनने के लिए इतनी भारी-भरकम फीस चुकानी पड़ती है…जितने में एक मिडिल क्लास परिवार की पूरी जिंदगी निकल जाती है. ऐसे में अगर कोई बच्चा बैंक से लोन लेकर प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेता है–तो उसकी जिंदगी का बड़ा हिस्सा डॉक्टर बनने के लिए लिया गया कर्ज चुकाने में निकल जाएगा ?

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उम्मीद है कि इस साल देशभर से 20 से 23 लाख के बीच छात्र MBBS में दाखिले के लिए होनेवाली NEET परीक्षा में शामिल हो सकते हैं. साल 2026 में MBBS के लिए करीब 1 लाख 29 हजार सीटें हैं…अगर 20 लाख छात्र भी MBBS की परीक्षा में शामिल होते हैं तो हर एक सीट के लिए 15 से अधिक दावेदार होंगे . इसमें सरकारी मेडिकल कॉलेजों के लिए सीटों की संख्या 63,683 है.मतलब… हर सरकारी मेडिकल कॉलेज की सीट के लिए 31 से अधिक दावेदार हैं . अब थोड़ा और आगे बढ़ते हैं– डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले ज्यादातर छात्रों की ख्वाहिश होती है कि उसका दाखिला AIIMS में हो … AIIMS में MBBS के लिए इस साल करीब 2200 सीटें हैं मतलब 886 छात्रों में से एक छात्र का ही सपना पूरा हो पाएगा .

सरकारी मेडिकल कॉलेज और प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की फीस में जमीन आसमान का अंतर है … इसलिए, छात्र पूरी ताकत झोंक देते हैं – मेडिकल में दाखिला की गेटवे NEET-UG परीक्षा में अच्छी रैंकिंग के लिए . देश के नामी सरकारी मेडिकल कॉलेजों की सालाना फीस इतनी कम है- जितना बड़े शहरों के अच्छे स्कूलों की एक क्वार्टर की ट्यूशन फीस होती है .
देश के कुछ नामी प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों से MBBS डिग्री हासिल तक का खर्चा एक से डेढ़ करोड़ के बीच बैठता है . ज्यादातर प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की सालाना ट्यूशन फीस 5 लाख रुपये से लेकर 25 लाख रुपये के बीच है . इसके साथ ही होस्टल में रहने, खाने-पीने, किताब और दूसरे खर्चे अलग . ऐसे में जो बच्चे सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाखिले की दौड़ में पिछड़ जाते हैं – वो प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए जद्दोजहद करते हैं…डॉक्टरी की डिग्री के लिए बैंक लोन की ओर देखते हैं.

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ऐसे में मेडिकल की डिग्री हाथ में आते-आते युवा डॉक्टरों के ऊपर भारी-भरकम एजुकेशन लोन और EMI चुकाने की टेंशन बढ़ जाती है . ऐसे में युवा डॉक्टरों के सामने बड़ी चुनौती ये है कि क्या पासआउट होने के बाद इतनी सैलरी मिलेगी-जिससे एजुकेशन लोन की EMI भर सकें और अपना खर्चा चला सकें . मान लीजिए एक बच्चे ने प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में एडमिशन के लिए 60 से 70 लाख रुपये का बैंक से लोन लिया … तो हिसाब लगाइए कि उसकी शुरुआती कमाई कितनी होगी और उसे चुकाने में कितने वर्ष लगेंगे? इंजीनियरिंग की पढ़ाई में सरकारी और प्राइवेट कॉलेज की फीस में मेडिकल की तरह फर्क नहीं है. नामी प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेजों से डिग्री लेने का खर्चा 15 से 25 लाख के बीच सामान्य बात है . मतलब, बेटा-बेटी को इंजीनियर बनाने के लिए हर साल करीब 5 लाख रुपये का इंतजाम करना होगा? जरा सोचिए… क्या हमारे देश के मिडिल क्लास परिवारों की इतनी बचत होती है कि महंगी पढ़ाई का खर्चा उठा सकें ? ऐसे में मिडिल क्लास परिवारों के ज्यादातर बच्चे प्रोफेशनल कोर्स के लिए बैंकों से एजुकेशन लोन की ओर देख रहे हैं . लेकिन, इस बात की भी गारंटी नहीं कि अगर एडमिशन हो गया है–तो बैंक से एजुकेशन लोन आसानी से मिल जाए? ऐसे में पढ़ाई, कंपटीशन, कमाई और कर्ज मुक्त होने का प्रेशर कई गुना बढ़ गया है .

प्रोफेशनल डिग्री के लिए एजुकेशन लोन के लिए आवेदन करने वालों का आंकड़ा लगातार तेजी से बढ़ रहा है…एक स्टडी के मुताबिक, एजुकेशन लोन की रफ्तार सालाना 15% है. जनवरी 2024 तक एजुकेशन लोन करीब 1.17 लाख करोड़ के निशान पर था…देश में जिस रफ्तार से प्राइवेट संस्थानों में मेडिकल, इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की पढ़ाई दिनों-दिन महंगी होती जा रही है…वैसे में मिडिल क्लास परिवारों में एजुकेशन लोन के रास्ते ही महंगी पढ़ाई के खिड़की दरवाजे खुले दिखते हैं . अब सवाल उठता है कि अगर एक बच्चा 20 से 30 लाख रुपये खर्च कर इंजीनियरिंग की डिग्री लेता है…इसके लिए अगर 15 लाख रुपये अगर बैंक से कर्ज लेता है..तो क्या होगा? इस बात की क्या गारंटी है कि इंजीनियरिंग की डिग्री के बाद नौकरी मिल ही जाएगी … AI के दौर में नौकरियों के स्वरूप में भारी बदलाव की भविष्यवाणी की जा रही है…ऐसे में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान सिखा गया हुनर पासआउट होने के बाद काम लायर रहेगा भी या नहीं…ये एक यक्ष प्रश्न है?

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प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की फीस बहुत ज्यादा है . डॉक्टरी की डिग्री के लिए प्राइवेट कॉलेजों में एक करोड़ से भी ज्यादा खर्च करने पड़ते हैं. ऐसे में अगर कोई बच्चा मेडिकल की पढ़ाई से लिए 60 से 70 लाख रुपये का एजुकेशन लोन लेता है- तो उसकी जिंदगी का बेहतरीन समय कर्ज चुकाने में बीत जाएगा? इस बात की गारंटी नहीं कि उसकी शुरुआती तनख्वाह लाख रुपये या उससे अधिक हो…ऐसे में वो कितना कमाएगा, उसमें से क्या खाएगा…क्या बचाएगा और कितना कर्ज चुकाएगा ? लगातार महंगी होती पढ़ाई युवाओं को एक नए तरह का तनाव दे रही है ?

इस बात की भी गारंटी नहीं है कि अच्छे संस्थान में एडमिशन के बाद बैंक से एजुकेशन लोन मिल ही जाए . ऐसे में दलील ये दी जा रही है कि एजुकेशन लोन के सिस्टम में अभी और सुधार की जरुरत है . क्योंकि, गरीब परिवारों के मेधावी छात्रों के लिए एजुकेशन लोन हासिल करने की राह में कई चुनौतियां हैं . साथ ही एजुकेशन लोन को चुकाने का मैकेनिज्म भी आय के हिसाब से तय किया जाना चाहिए . एक सच्चाई ये भी है कि आज की तारीख में हायर एजुकेशन के लिए लोन लेनेवाले छात्रों की संख्या करीब 4 फीसदी है . बाकी अपनी पढ़ाई का इंतजाम परिवार की बचत या पुश्तैनी कमाई से करते हैं . एक अनुमान के मुताबिक, भारत में पढ़ाई पर खर्च सालाना 10 से 12% की रफ्तार से बढ़ रहा है . इस हिसाब से 6 से 7 साल में पढ़ाई का खर्चा डबल हो जाता है…आज जिस पढ़ाई के लिए 10 लाख रूपये खर्च करने पड़ रहे हैं-उसके लिए 15 साल बाद 40 लाख रूपये या उसके अधिक खर्च करने पड़ सकते हैं .

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ऐसे में सवाल उठता है कि जिस रफ्तार से पढ़ाई पर खर्चा बढ़ रहा है – क्या उसी रफ्तार से तनख्वाह भी बढ़ रही है या बढ़ेगी ? आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है … सवाल ये भी है कि क्या हमारे Educational Institutions के क्लासरूम भी उसी रफ्तार से बदल रहे हैं? क्या 15-20 लाख रुपये खर्च कर लड़के-लड़कियां जो डिग्री हासिल कर रहे हैं…उस Skill के सहारे नौकरी मिल पाएगी या Skill Outdated हो चुकी होगी . ऐसे सवालों पर गंभीरता से मंथन करने की जरूरत है . स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों को एक और बात दाखिले की दौड़ के साथ परेशान करने लगती है. भले ही खुलकर न बोलें..लेकिन, एडमिशन में आरक्षण का सिस्टम छात्रों के मन में भेदभाव पैदा कर रहा है? किसी को खुश होने का मौका दे रहा है तो किसी को मायूस? वो सोचते हैं कि ये कैसी व्यवस्था कf स्कूल में साथ पढ़े…साथ खेले…साथ बोर्ड का एग्जाम दिया…साथ में एडमिशन के लिए कंपटीशन में बैठे . लेकिन, एक 50 परसेंटाइल पाकर भी कटऑफ में आ जाता है…दूसरा 90 परसेंटाइल के बाद भी कट ऑफ से बाहर रहता है. एक का कम पर्सेंटाइल के बाद भी टॉप IIT में एडमिशन हो जाता है और दूसरा उतने पर्सेंटाइल पर NIT में दाखिला के लिए भी तरसता है? क्या कॉलेज-यूनिवर्सिटी और प्रोफेशनल डिग्री वाले सरकारी संस्थानों के एडमिशन में जाति के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था सामाजिक ताने-बाने में भेदभाव का बीच नहीं बो रही है?

एक स्टडी के मुताबिक, हमारे देश में सालाना करीब 15 लाख युवा B.Tech की डिग्री लिए जॉब मार्केट में निकलते हैं,जिसमें से बहुत कम को नौकरी मिल पाती है . इसकी दो बड़ी वजह है -पहली,बाजार में नौकरियां कम और दावेदार अधिक हैं. दूसरी Skill Gap…आलम ये है कि बड़ी टेक नौकरियों में 100 में से 3 इंजीनियरिंग ग्रेजुएट जगह बना पाते हैं. इसकी एक वजह ये भी मानी जा रही है कि आरक्षण की वजह से कम योग्य छात्रों का भी टॉप संस्थानों में एडमिशन हो जाता है .

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उच्च शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण सिस्टम से फर्क को पिछले साल इंजीनियरिंग के लिए होने वाली JEE Advance के कटऑफ से भी समझा जा सकता है . सामान्य कैटगरी के लिए 93.10 परसेंटाइल का कटऑफ था . EWS के लिए 80.38 परसेंटाइल, OBC के लिए 79.43 परसेंटाइल, SC के लिए 61.15 परसेंटाइल, ST के लिए 47.90 परसेंटाइल. इसी तरह की स्थिति मेडिकल में दाखिले की भी है. कानून की पढ़ाई के लिए National Law Universities में एडमिशन के लिए इस साल हुई CLAT में 88 हजार से अधिक छात्र शामिल हुए…देश की टॉप Law University में शुमार NLU बेंगलुरु में CLAT रैंकिंग का कटऑफ कुछ इस तरह सामने आया .

सामान्य कैटगरी के लिए 1 से 101 रैकिंग तक OBC के लिए 128 से 1081 तक रैकिंग, SC के लिए 384 से 3072 तक रैकिंग, ST के लिए 357 से 5000 तक रैकिंग का कटऑफ रखा गया. ऐसे में जाति के आधार पर आरक्षण के सिस्टम के बीच से एक ऐसी राह निकलती है – जिसमें किसी का कम नंबर के बाद भी टॉप कॉलेज में एडमिशन हो जाता है…तो कोई अधिक नंबर के बाद भी किनारे लग जाता है? ऐसी व्यवस्था छात्र-छात्राओं के मन में कई तरह के सवाल करती है…सवाल ये भी उठता है कि आखिर ऐसी व्यवस्था से किसका भला होगा रहा है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य रखा है. ये तभी संभव है – जब देश की Youth Force को Skilled बनाया जाए…World Class इंजीनियर, डॉक्टर और मैनेजर तैयार किया जाए . लेकिन, देश के सरकारी इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट में रिजर्वेशन सिस्टम की वजह से टैलेंड बच्चे दाखिले की दौड़ में पिछड़ जाते हैं और औसत बच्चों को जगह मिल जाती है. ऐसे में हमारे एजुकेशन सिस्टम के भीतर से गुजर रही फॉल्ट लाइनों को पहचाने और दुरुस्त करने का समय आ चुका है . पहली फॉल्ट लाइन ये है कि स्कूलों में पढ़ाई का स्तर इस तरह का होना चाहिए – जिससे प्रोफेशनल कोर्सेज में दाखिले की दौड़ के लिए कोचिंग की जरूरत न पड़े . स्कूल की पढ़ाई और प्रोफेशनल कोर्स के कंपटीशन में अंतर को पाटना होगा. दूसरा, इंजीनियरिंग कॉलेजों में पढ़ाई का स्तर तेजी से बदलती तकनीक के हिसाब से डायनामिक बनाने की जरूरत है. तीसरा, मेडिकल यानी MBBS की सीटें बढ़ाने की जरूरत है साथ ही प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में फीस की सीमा तय करना जरूरी है. चौथा, प्रोफेशनल कोर्स के एडमिशन में जाति के आधार पर आरक्षण का सिस्टम खत्म करने की जरूरत है. पांचवां, एजुकेशन लोन को सस्ता और आसान बनाने की जरूरत है..जिससे बिना गारंटी टैलेंटेड बच्चों के सपनों को उड़ान मिल सके. हमें सोचना चाहिए कि जब देश की सरहद की सुरक्षा का सवाल आता है–तो सेना को जाति के आधार पर आरक्षण सिस्टम में अलग रखा जाता है. ऐसे में मजबूत भारत के निर्माण के लिए Workforce तैयार करने वाले उच्च शिक्षा के आधुनिक मंदिरों के एडमिशन सिस्टम को जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था से मुक्त करने की जरूरत है . विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए जाति के आधार पर एडमिशन में भेदभाव के सिस्टम से आजादी जरूरी है .

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First published on: Feb 28, 2026 09:33 PM

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Anurradha Prasad

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Akarsh Shukla

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