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Ayodhya history: рдЕрдпреЛрдзреНрдпрд╛ рдлрд┐рд░ рдЪрд░реНрдЪрд╛ рдореЗрдВ рд╣реИ .рдмрд╣реБрдд рдЪрд░реНрдЪрд╛ рдореЗрдВтАжрд╢рд╛рдпрдж рд╣рдореЗрд╢рд╛ рдЪрд░реНрдЪрд╛ рдореЗрдВ рдмрдиреЗ рд░рд╣рдирд╛ рдЕрдпреЛрдзреНрдпрд╛ рдХреА рдирд┐рдпрддрд┐ рд╣реИ .рддреНрд░реЗрддрд╛рдпреБрдЧ рдореЗрдВ рдЬрдм рд╢реНрд░реАрд░рд╛рдо рдХрд╛ рд╡рдирд╡рд╛рд╕ рд╣реБрдЖ рддрдм рднреА рдЕрдпреЛрдзреНрдпрд╛ рдЪрд░реНрдЪрд╛ рдореЗрдВ рд░рд╣реА , рдЬрдм рд╢реНрд░реАрд░рд╛рдо рдЕрдпреЛрдзреНрдпрд╛ рдХреЗ рд░рд╛рдЬрд╛ рдмрдиреЗ, рддрдм рднреА рд╡рд╣рд╛рдВ рд╕реЗ рдирд┐рдХрд▓реЗ рдЖрджрд░реНрд╢ рд╢рд╛рд╕рди рд╕реВрддреНрд░ рдХреА рдкреВрд░реА рджреБрдирд┐рдпрд╛ рдореЗрдВ рдЪрд░реНрдЪрд╛ рд╣реБрдИ , рд╢реНрд░реАрд░рд╛рдо рдФрд░ рд░рд╛рдорд░рд╛рдЬреНрдп рдореЗрдВ рджреБрдирд┐рдпрд╛ рдиреЗ рдЕрдкрдирд╛ рдХрд▓реНрдпрд╛рдг рджреЗрдЦрд╛ .рд╕рд░рдпреВ рдХрд┐рдирд╛рд░реЗ рдмрд╕реА рдЕрдпреЛрдзреНрдпрд╛ рд╣рдЬрд╛рд░реЛрдВ рд╕рд╛рд▓ рд╕реЗ рд╕рдмрдХреЛ рдЕрдкрдиреА рдУрд░ рд╕рдореНрдореЛрд╣рд┐рдд рдХрд░рддреА рд░рд╣реА рд╣реИ .рдпреЗ рд╕рд┐рд░реНрдл рдПрдХ рдкреНрд░рд╛рдЪреАрди рдирдЧрд░ рдпрд╛ рд╢рд╣рд░ рднрд░ рдирд╣реАрдВ рд╣реИ .рдкрдврд╝реЗрдВ, рддреНрд░реЗрддрд╛рдпреБрдЧ рд╕реЗ рдореБрдЧрд▓ рдХрд╛рд▓ рддрдХ рдЕрдпреЛрдзреНрдпрд╛ рдХреЗ рдЙрддрд╛рд░-рдЪрдврд╝рд╛рд╡ рдХреА рдкреВрд░реА рдХрд╣рд╛рдиреА.рдЬрд╛рдиреЗрдВ рдЕрдерд░реНрд╡рд╡реЗрдж рд╕реЗ рд▓реЗрдХрд░ рд╕рдореНрд░рд╛рдЯ рд╡рд┐рдХреНрд░рдорд╛рджрд┐рддреНрдп рдФрд░ рдмрд╛рдмрд░ рдХреЗ рджреМрд░ рддрдХ рд╕рд░рдпреВ рдХрд┐рдирд╛рд░реЗ рдмрд╕реА рдЗрд╕ рдкрд╛рд╡рди рдирдЧрд░реА рдХрд╛ рдРрддрд┐рд╣рд╛рд╕рд┐рдХ рд╡ рд╕рд╛рдВрд╕реНрдХреГрддрд┐рдХ рд╕рдлрд░рдирд╛рдорд╛ред

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Ayodhya history Part one : सदियों से अयोध्या हर परिभाषा से ऊपर की चीज रही है .भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का बीज केंद्र की तरह रही है .चाहे हिंदू धर्म हो,बौद्ध धर्म हो,जैन धर्म हो या सिख धर्म,सबका अयोध्या से गहरा नाता है .श्री राम की अयोध्या को सिर्फ मंदिर, विवाद, बवाल और राजनीतिक मृगतृष्णा वाले क्षेत्र या तीर्थ के तौर पर देखना भर ठीक नहीं है .अयोध्या की मिट्टी ने समाज के मर्यादित और अनुशासित करने का रास्ता दिखाया है – तो कई बार उन्माद की पराकाष्ठा भी देखी है.हिंसा और प्रतिशोध दोनों देखा है – तो श्रीराम का भव्य मंदिर बनते भी .लेकिन, अयोध्या का विवादों से नाता नहीं छूटा .ऐसे में ये समझना भी जरूरी है कि आखिर अयोध्या है क्या ? इसका इतिहास कितना प्राचीन है ?

सरयू की लहरों ने अयोध्या में बदलाव के कितने रंग देखे हैं ? ऐसे में मैंने आपको अयोध्या के हर मिजाज से परिचित कराने का फैसला किया है.मैं आपको बताऊंगी कि कभी दुनिया की सत्ता केंद्र रही अयोध्या कैसे एक तीर्थस्थल में सिमट कर रह गयी , राजनीति का इतना बड़ा केंद्र होने के बावजूद अयोध्या सदियों तक एक छोटे शहर जैसी क्यों रही?

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त्रेतायुग से मुगल काल तक

अयोध्या की कहानी कहां से शुरू की जाए,ये भी एक बहुत मुश्किल काम है .अयोध्या की जड़ें कितनी गहरी हैं और इस नगरी की शुरुआत कहां से होती है? प्राचीन ग्रंथों में अयोध्या का जगह-जगह जिक्र मिलता है.त्रेतायुग के मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और उनके पिता दशरथ के दौर से भी बहुत पुराना माना जाता है- अयोध्या का इतिहास.मान्यता के मुताबिक, अयोध्या की स्थापना प्रथम पुरुष मनु ने की, जिनके पुत्र हुए इक्ष्वाकु.सूर्यवंश में कई प्रतापी राजा हुए, इसी वंश के 63वें शासक थे श्रीराम के पिता दशरथ.1500 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व तक वेदों की रचना हुई, अथर्ववेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया है और इसकी भव्यता की तुलना स्वर्ग से की गई है .अथर्ववेद में अयोध्या को 8 चक्रों और नौ द्वारों वाली नगरी बताया गया है,वहीं, स्कंदपुराण के मुताबिक अयोध्या भगवान विष्णु के चक्र पर विराजमान है।

सरयू की लहरों ने अयोध्या का प्राचीन वैभव भी देखा

अयोध्या के हर बदलाव की गवाह रही है – सरयू की कल-कल बहती धारा,सरयू की लहरों ने अयोध्या का प्राचीन वैभव भी देखा है,उस रामराज्य को भी देखा है, जिसे साकार करने का सपना दुनिया का हर सभ्य समाज देखता है .अयोध्या के नाम पर राजनीति की प्रचंड धारा देखी , तो भव्य-दिव्य राम मंदिर
का निर्माण भी .इतिहास के हर कालखंड में अयोध्या चर्चा में रही – मानव सभ्यता के हर मोड़ पर लोगों ने आदर्श सामाजिक व्यवस्था का फलफला अयोध्या के जर्रें-जर्रें से सीखा..अयोध्या ने लोगों को मर्यादित होना सिखाया..अधिकार और कर्तव्य का मंत्र पढ़ाया .अब सवाल उठता है कि अयोध्या आखिर कितना प्राचीन नगर है, जिसकी मिट्टी पर श्रीराम पैदा हुए .अयोध्या की कहानी कहां से शुरू होती है ।

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मान्यता के मुताबिक, विवस्वान यानी सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु ने अयोध्या की स्थापना की .वैवस्वत मनु के 10 पुत्र थे- इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध थे,जिसमें सबसे ज्यादा प्रतापी इक्ष्वाकु हुए, इक्ष्वाकु कुल का सबसे ज्यादा विस्तार हुआ और ये सूर्यवंशी कहलाए .इसी वंश में श्रीराम पैदा हुए, सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी अयोध्या थी,जिसके वैभव की तुलना स्वर्ग से की गयी है ।

अथर्ववेद ने अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया

अंतिम वेद अथर्ववेद ने अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है,इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई,अयोध्या को पवित्र सप्तपुरी कहा गया..जिसमें अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांची, उज्जैन और द्वारका है .ज़ाहिर है अथर्ववेद के समय अयोध्या अस्तित्व में थी , इसी तरह वाल्मीकि रामायण के बालकांड में भी अयोध्या का वर्णन है .वाल्मीकि रामायण के मुताबिक, अयोध्या 12 योजन लंबी और 3 योजन चौड़ी थी मतलब 96 मील में फैली हुई थी ।

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श्रीराम के पिता दशरथ इक्ष्वाकु वंश के 63वें राजा थे, वाल्मीकि रामायण के मुताबिक, राजा दशरथ ने अपनी अयोध्या को देव-लोक की राजधानी अमरावती की तरह सजाया था.अयोध्या में कोई गरीब था ही नहीं,बल्कि, कम धन वाले भी नहीं थे .चारों ओर खुशहाली और संपन्नता थी,आपसी सौहार्द और एक-दूसरे के प्रति सम्मान ने अयोध्या पुरी को धरती पर अलौकिक बना दिया था।

वेद और रामायण के काफ़ी बाद पुराण लिखे गए, पुराणों में भी अयोध्या का ज़िक्र है, स्कंदपुराण के मुताबिक अयोध्या शब्द ‘अ’ कार ब्रह्मा, ‘य’ कार विष्णु है तथा ‘ध’ कार रुद्र का स्वरूप है .जो भगवान विष्णु के चक्र पर विराजमान है यानी अयोध्या का अस्तित्व सनातन काल से है .इस बात से कोई इनकार नहीं है कि प्राचीन काल में अयोध्या नाम का शहर था ,जिसके राजा श्रीराम थे , कुछ विद्वानों प्राचीन भारतीय ग्रंथों के आधार पर अयोध्या की स्थापना का काल ईसा पूर्व 2200 के आसपास माना है।

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श्री राम के बैकुंठ धाम जाने के बाद अयोध्या साम्राज्य का क्या हुआ?

वाल्मीकि रामायण में श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ का जिक्र मिलता है.उनके सूर्यवंश की पताका चारों ओर फहरा रही थी.लेकिन, श्री राम के बैकुंठ धाम जाने के बाद अयोध्या साम्राज्य का क्या हुआ? इसे लेकर कई मान्यताएं हैं .एक मान्यता के मुताबिक, श्रीराम ने अयोध्या साम्राज्य को 8 हिस्सों में बांट दिया और अपने पुत्र लव को उत्तर कौशलपुरी का राजा बनाया..कुश को दक्षिण कौशल नगरी का.अपने भाइयों के पुत्रों के भी एक-एक क्षेत्र सौंप दिया.रामायण और महाभारत काल में भी अयोध्या का अस्तित्व था , ईसा पूर्व 322 से 185 तक यानी मौर्य काल तक अयोध्या का महत्व कायम रहा.

त्रेतायुग के बाद द्वापर युग शुरू होता है,जिसमें श्रीकृष्ण पैदा हुए,जो भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं.ये वो दौर था – जिसमें भारत के नक्शे पर कई छोटे-बड़े राजवंशों का शासन था .इसी दौर में पांडवों और कौरवों के बीच कुरुक्षेत्र में 18 दिनों का भीषण युद्ध चला , उस दौर में भारत के नक्शे पर दिख रहे राज्यों ने अपने हिसाब से पाला चुन रखा था.कहा जाता है कि महाभारत के बाद अयोध्या एक तरह से उजड़ गयी..लेकिन, श्रीराम जन्मभूमि का अस्तित्व बना रहा.इतिहासकारों के मुताबिक, गौतम बुद्ध के दौर में जिसे साकेत कहा गया,वो अयोध्या नगरी ही थी ।

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ईसा पूर्व 5वीं सदी यानी गौतम बुद्ध के काल तक अयोध्या की स्थापना पवित्र तीर्थ के रूप में हो गई थी, लेकिन, मौर्य काल में राजनीतिक केंद्र के रूप में पाटलिपुत्र अहम था,मौर्य काल में सम्राट अशोक के बाद बौद्ध धर्म का अधिक ज़ोर रहा..अयोध्या भी बौद्ध धर्म के प्रभाव में रही ।

महाराज विक्रमादित्य के आदेश पर भव्य मंदिर का निर्माण

बात करीब 2100 साल पुरानी है .उज्जैन के सिंहासन पर थे- चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य , एक दिन शिकार खेलते हुए विक्रमादित्य अयोध्या पहुंच गए, सरयू के किनारे .आसपास घना जंगल था .एक आम के पेड़ के नीचे अपनी सेना के साथ विक्रमादित्य आराम करने लगे,आसपास कोई बसावट नहीं .लेकिन, विक्रमादित्य को जमीन में कुछ चमत्कार जैसा लगा, कहा जाता है कि खोज शुरू हुई तो पता चला कि यह श्रीराम की अवध भूमि है ।

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महाराज विक्रमादित्य के आदेश पर एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया गया.कहा जाता है कि श्रीराम जन्मभूमि पर 84 स्तंभों पर विशाल मंदिर का निर्माण हुआ..जिसकी भव्यता और दिव्य देखते ही बनती थी .विक्रमादित्य के बाद के राजाओं ने भी मंदिर की देख-रेख की .हिंदू धर्म का उत्कर्ष मौर्य काल के बाद शुंग वंश में भी दिखता है,शुंग वंश के पहले राजा पुष्यमित्र ने भी मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था,उस का एक शिलालेख अयोध्या से मिला था ।

कालिदास ने अयोध्या का रघुवंश में कई बार किया जिक्र

कई अभिलेख और ऐतिहासिक दस्तावेजों से पता चलता है कि गुप्तवंशीय चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय और उसके बाद अयोध्या गुप्त साम्राज्य की राजधानी थी.इस दौर के महाकवि कालिदास ने अयोध्या का रघुवंश में कई बार जिक्र किया है .मतलब, गुप्त काल तक श्रीराम वाल्मिकी रामायण से निकलकर आमलोगों के बीच पहुंचने के लिए तैयार थे ।

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इतिहासकार हांस टी बेकर अपनी किताब अयोध्या में लिखते हैं कि दूसरी शताब्दी आते-आते अयोध्या अहम तीर्थ स्थान बन चुकी थी .सरयू नदी के मोड की वजह से वजह अयोध्या तीन तरफ पानी से घिरी थी,सरयू की लहरों से टकराते जमीन के केंद्र को राम कोट के नाम से जाना जाता था , 7 वीं सदी में चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत आया,तब भारत पर प्रतापी राजा हर्षवर्धन का शासन था..ह्वेनसांग करीब 15 वर्षों तक भारत में रहा .भारत प्रवास के दौरान वो अयोध्या भी गया.उस दौर में अयोध्या बौद्ध धर्म का बड़ा केंद्र हुआ करता था ,

ह्वेनसांग ने अपने अनुभवों को सी-यू-की नाम की किताब में लिखा .इसे एक प्रामाणिक ऐतिहासिक दस्तावेज के तौर पर देखा जाता है .ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृतांत में अयोध्या के चार प्रमुख बौद्ध वनों यानी उत्तर कारू वन, अंजन वन, कालका राम वन और कंटकी वन के साथ-साथ कई मंदिरों का भी जिक्र किया.हर्षवर्धन के बाद छोटे-छोटे इलाकों पर राजपूत राजाओं का प्रभुत्व कायम हुआ..जिनके पूज्य थे-क्षत्रिय कुलश्रेष्ठ श्रीराम.राजाओं के आराध्य श्री राम आम लोगों में भी परम पूज्य हो गए,मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने तेजी से सामाजिक जीवन में जगह बनानी शुरू कर दी .13वीं सदी में रामानंद संप्रदाय ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम को सामाजिक क्रांति का सूत्रधार बना दिया,बाद में इसी धारा से कबीर और तुलसीदास निकले .

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एक ओर तुलसीदास की चौपाइयां हिंदू समाज में सांस्कृतिक जागरण का झंडा बुलंद कर रही थीं..दूसरी ओर, हिंदुस्तान की सरज़मीं पर पश्चिम से आए विदेशी आक्रमणकारियों का राज कायम हो रहा था,हिंदुओं के हाथों से सत्ता फिसल चुकी थी,हिंदू अब प्रजा थे और पश्चिमी से आए आक्रमणकारी राजा ।

10वीं सदी तक हिंदुस्तान के नक्शे पर छोटे-छोटे हिंदू राजाओं का राज था, ये आपस में लड़ते रहते, मौर्य या गुप्त राजाओं की तरह कोई शक्तिशाली केंद्रीय ताकतें नहीं थीं , मुस्लिम आक्रमणकारियों को इसका फ़ायदा मिला ,ऐसी परिस्थिति में राम ने हिंदुओं के सांस्कृतिक एकीकरण में सीमेंट का रोल अदा किया, अयोध्या इसकी बुनियाद बनी ।

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मध्यकाल में अयोध्या मोक्ष नगरी के रूप में परिभाषित

मध्यकाल से पहले ही हिंदू ग्रंथों में अयोध्या और श्रीराम की महिमा स्थापित हो चुकी थी, अयोध्या स्वर्ग सरीखी थी और मोक्ष नगरी के रूप में परिभाषित हो चुकी थी , मध्यकाल में अयोध्या से हिंदुओं की आस्था को गहरा करने पर ज़ोर था .कई आक्रमण और तूफानों को झेलते हुए अयोध्या में श्रीराम का भव्य मंदिर 14 वीं शताब्दी तक खड़ा रहा,कहा जाता है कि सिकंदर लोदी के शासनकाल के दौरान भी वहां मंदिर मौजूद था,16वीं शताब्दी में हिन्दुस्तान पर मुगलों का अधिकार हो गया ।

पूर्वी उत्तर प्रदेश में अयोध्या के वैभव और महत्व को बताने के लिए एक कहावत प्रचलित है ।
गंगा बड़ी गोदावरी,
तीरथ बड़ो प्रयाग,
सबसे बड़ी अयोध्या नगरी,
जहँ राम लियो अवतार,

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तुगलक काल में अयोध्या का काफी महत्व

मध्यकाल में मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने हिंदुओं के सांस्कृतिक एकीकरण में सीमेंट का रोल अदा किया , अयोध्या इसकी बुनियाद बनी,1206 ईस्वी में मोहम्मद गौरी की मौत के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली के सिंहासन पर बैठा, भारत में पहली बार गुलाम वंश की स्थापना हुई .इतिहासकारों के मुताबिक, 1320 से 1414 ईस्वी के बीच तुगलक काल में अयोध्या का काफी महत्व था.इतिहास के कई पड़ावों से गुजरते हुए अयोध्या आगे बढ़ रही थी,लेकिन, इस प्राचीन नगरी के ताने-बाने में बड़ी हलचल 16वीं शताब्दी में बाबर के आने के बाद शुरू हुई .इतिहासकार लाला सीताराम भूप ने अपनी किताब अयोध्या का इतिहास में लिखा है कि1528 ईस्वी में मुगल शासक बाबर ने अयोध्या से कुछ दूरी पर पूर्व की ओर तंबू ताना .बाबर के साथ उसका सेनापति मीर बाकी ताशकंदी भी था,अयोध्या के पास बाबर 7 दिनों तक रुका .लेकिन, इतिहासकार इस बात पर एक मत नहीं है कि बाबर अयोध्या आया या नहीं ।

वो साल 1526 का था, महीना अप्रैल का,पानीपत की लड़ाई में बाबर की सेना जीत गयी,इसी के साथ हिंदुस्तान में मुगल साम्राज्य की नींव पड़ी , मुगल बादशाह बाबर तेजी से आगे बढ़ रहा था , पानीपत की लड़ाई के दो साल बाद 1528 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद बननी शुरू हुई,जिसे बाबर के सेनापति मीर बाकी ने बनवाया ।

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जन्मभूमि मंदिर को नहीं तोड़ना चाहता था बाबर

इतिहासकार सीताराम भूप ने अपनी किताब – अयोध्या का इतिहास में लिखा है कि बाबर राम – जन्मभूमि मंदिर को नहीं तोड़ना चाहता था,लेकिन, फकीर बददुआ न दे दे .इस डर से उसने जन्म-स्थान पर बने मंदिर को तोड़ने का आदेश दिया..इसी किताब में तारीख पारीना मदीनतुल औलिया के हवाले से लिखा गया है

बाबर अपनी किशोरावस्था में एक बार हिंदुस्तान आया था और अयोध्या के मुसलमान फकीरों से मिला .एक फकीर थे- फजल अब्बास कलंदर और दूसरे का नाम था मूसा अशिकाम.बाबर ने दोनों फकीरों से हिंदुस्तान का बादशाह बनने का आशीर्वाद मांगा.दोनों फकीरों ने कहा कि अगर तुम जन्मस्थान के मंदिर को तोड़कर मस्ज़िद बनवाने की प्रतिज्ञा करो तो हम तुम्हारे लिए दुआ करेंगे .बाबर ने फ़कीरों की बात मान ली।

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बाबर की कहानी पर इतिहासकारों को संदेह

हालांकि, बाबर के बारे में इस कहानी पर इतिहासकारों को संदेह है.बाबरनामा में भी उसके अयोध्या जाने का कहीं जिक्र नहीं मिलता है , इस किताब में बाबर के युद्घ-अभियानों से लेकर हिंदुस्तान में मौसम के मिजाज तक का जिक्र है .खेती-बाड़ी के तौर-तरीकों से लेकर पके हुए कटहल के स्वाद तक का जिक्र किया गया है .लेकिन, इतिहासकारों का एक बड़ा तपका मानता है कि बाबर अयोध्या आया था ।

इतिहासकारों और आर्कियोलॉजिस्ट के अध्ययन बताते हैं कि एक मंदिर के अवशेष पर विवादित ढांचा खड़ा किया गया ,लेकिन, इतिहास में कहीं इस बात का जिक्र नहीं मिलता कि अयोध्या का विवादित ढांचा मध्यकाल में मुस्लिमों के लिए कितना महत्वपूर्ण स्थान था ।

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मुगलकाल में बाबर के बाद अकबर के राज में अवध क्षेत्र का महत्व बहुत बढ़ गया,गंगा के उत्तरी भाग को पूर्वी क्षेत्रों और दिल्ली-आगरा को बंगाल से जोड़ने वाला रास्ता अयोध्या से होकर गुज़रता था , इसलिए अकबर ने जब 1580 ईस्वी में अपने साम्राज्य को 12 सूबों में बांटा तो उसने अवध को एक सूबा बनाया और उसकी राजधानी अयोध्या बनी ।

अकबर की जीवनी लिखने वाले अबुल फजल ने आईने अकबरी में लिखा है कि अयोध्या जिसे आमतौर पर अवध के नाम से जाना जाता है, जो पूरब में चालीस कोस और उत्तर में बीस कोस तक फैली है, इसे भूमि का एक पवित्र टुकड़ा माना जाता है .यह अवध देश के सबसे बड़े नगरों में से एक है और इसकी मान्यता सबसे प्राचीन शहरों में से एक है .यह त्रेतायुग में रामचंद्र जी का निवास था, जिन्हें उनके शासन और धर्मनिष्ठा के लिए आदर्श माना जाता है .अकबर ने हिंदुओं में श्रीराम की आस्था देखते हुए राम और सीता की आकृति वाली मोहरें जारी की थी ।

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अकबर के दौर में एक ओर तेजी से मुगल साम्राज्य का विस्तार हो रहा था, दूसरी ओर, इसी दौर में तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना की,अवधी राम साहित्य की भाषा बन गयी..तुलसीदास के रामचरित मानस का घर-घर पाठ होने लगा ।

कहीं भी अयोध्या में बाबर के अत्याचार का जिक्र नहीं

तुलसीदास ने अपने ग्रंथ राम चरितमानस में कहीं भी अयोध्या में बाबर के अत्याचार का जिक्र नहीं किया है , न ही बाबर के सेनापति मीरबाकी के मंदिर तोड़कर मस्ज़िद बनाने का वर्णन किया है ।

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अयोध्या का मतलब होता है – जिसके जीतने की संभावना न हो .इतिहास का पन्ना पलटता गया, सरयू की धारा गवाह है कि अब तक कोई अयोध्या को जीत नहीं पाया है.हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख धर्म के केंद्र में अयोध्या रही, सभी धर्मों को मानने वाले लोगों ने अयोध्या को अपनी आस्था और अपने इष्ट देवता के हिसाब से देखा, समझा और स्वीकार किया .लेकिन, अयोध्या की कहानी में सबसे बड़ा मोड़ बाबरी मस्जिद बनने के बाद आया .

अयोध्या की कहानी में आज की किस्त में बस इतना ही , आगे की कहानी अगली खबर में .

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First published on: Jul 11, 2026 07:09 PM

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Anurradha Prasad

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