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इसमें कोई शक नहीं कि अयोध्या में श्रीराम का भव्य मंदिर बनने के बाद वहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ कई गुना बढ़ी है. इसमें कोई शक नहीं कि देश ही नहीं दुनिया के हर हिस्से से श्रद्धालु अयोध्या पहुंच रहे हैं. इसमें कोई शक नहीं कि मंदिर निर्माण के बाद अयोध्या की अर्थव्यवस्था को नई उड़ान मिली. इसमें कोई शक नहीं कि राम मंदिर और उसके आसपास के इलाकों में जमीन की कीमतें कई गुना बढ़ गयीं. कहा गया कि अयोध्या में राम मंदिर बनने से धार्मिक पर्यटन अब भारत के लिए सिर्फ सांस्कृतिक विषय नहीं है बल्कि एक मजबूत आर्थिक इंजन बन चुका है. लेकिन, क्या हजारों साल से अयोध्या का यही मिजाज रहा है.

पिछले एपिसोड में बता चुके हैं कि त्रेतायुग से अंग्रेजों के दौर तक आते-आते अयोध्या कितने उतार-चढाव के दौर से गुजरी. लेकिन, इतिहास के हर मोड़ पर इस सवाल का जवाब अलग-अलग कोण से तलाशने की कोशिश होती रही कि अयोध्या ने दुनिया के क्या सिखाया? अयोध्या ने दुनिया को सिखाया कि राजा दशरथ किस तरह अपने राजकुमारों को ऋषि के साथ जंगल भेजने में भी नहीं हिचकते. मतलब, व्यवहारिक ज्ञान हासिल करने के लिए सुख-साधन और घर का मोह छोड़ना पड़ता है. अयोध्या ने श्रीराम को विनम्रता का पाठ इस कदर पढ़ाया कि राजा जनक के दरबार में शिव धनुष टूटने पर गुस्साए ऋषि परशुराम से कहते है कि शिव धनुष तोड़ने वाला कोई आपका दास ही हो सकता है. अयोध्या ने सिखाया कि एक पुत्र किस तरह अपने पिता के वचन का मान रखने के लिए जंगल चला जाता है. ये अयोध्या से निकला संस्कार है – जिसमें सीता हरण के बाद यानी अपनी समस्याओं से लड़ने के लिए श्रीराम अपने किसी परिचित या रिश्तेदार से मदद नहीं मांगते. बल्कि जंगल में मौजूद बंदर-भालू की सेना तैयार कर जंग लड़ते हैं. मतलब अयोध्या आत्मनिर्भरता का पाठ सिखाती है. ये अयोध्या से निकला दर्शन है – जिसमें श्री राम रावण वध के बाद लंका का राजपाट विभीषण को सौंप देते हैं. लेकिन, पिछले 4-5 दशकों से अयोध्या की चर्चा वहां के जर्रें-जर्रें से निकलने वाले संदेशों की वजह से कम और राजनीतिक वजहों से अधिक हो रही है. ऐसे में आज आपको बताने की कोशिश करेंगे कि अयोध्या किस तरह भारत में चुनावी राजनीति की धुरी बनी? विनम्रता और त्याग का पाठ सिखाने वाली अयोध्या को किसने आक्रामक और संघर्ष क्षेत्र में बदल दिया.

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वैसे तो अयोध्या की चुनावी राजनीति में एंट्री आजादी के ठीक बाद ही हो गयी थी. लेकिन, दायरा बहुत सीमित था. श्रीराम और अयोध्या आस्था के केंद्र में रहे. इमरजेंसी के बाद जनता पार्टी की सरकार और उसके बाद फिर इंदिरा गांधी की प्रचंड बहुमत से सत्ता में वापसी. हिंदुवादी ब्रिगेड फिर चुनावी राजनीति में किनारे लग गयी. साल 1980 में भारतीय जनसंघ की गर्भ से बीजेपी का जन्म हुआ – जिसके नेता अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी थे. विश्व हिंदू परिषद लगातार अयोध्या के मुद्दे को उठा रहा था. साल 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे – युवा, जोश से लबरेज और नई सोच वाले राजीव गांधी. हिंदूवादी ब्रिगेड समझ नहीं पा रही थी कि कांग्रेस के खिलाफ सियासत की गाड़ी को किस ईंधन से आगे बढ़ाया जाए… लेकिन, राजीव गांधी के दौर में शाहबानो के तलाक का मामला ऐसा गर्म हुआ कि देश को 21 वीं सदी का सपना दिखाते – दिखाते राजीव गांधी भी हिंदू-मुस्लिमों की राजनीति में उलझ गए… हिंदूवादी संगठनों को भी मौका मिल गया-अयोध्या के मुद्दे को नए सिरे से गर्म करने का.

अक्टूबर, 1985 को उडुप्पि की धर्म संसद में ऐलान किया गया कि 8 मार्च, 1986 तक रामलला के मंदिर का ताला नहीं खोला गया तो 9 मार्च, 1986 से ताला खोल आंदोलन, ताला तोड़ आंदोलन में बदल जाएगा. ऐसे में केंद्र में बैठी राजीव सरकार की बेचैनियां बढ़ गयीं. अयोध्या को करीब से कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी किताब युद्ध में अयोध्या के 264 नंबर पेज पर राजीव गांधी और अरुण नेहरु के बीच बातचीत का जिक्र किया है. अरुण नेहरु ने राजीव गांधी से कहा, विश्व हिंदू परिषद अयोध्या में राम जन्मभूमि का ताला खुलवाने के लिए देश भर में रथ यात्राएं निकाल रही है. उसने ऐलान किया है कि फलां तारीख तक ताला नहीं खुला तो ताला खोल आंदोलन को ताला तोड़ आंदोलन में बदल दिया जाएगा. तो राजीव गांधी ने पूछा…’तो क्या ताला खुल सकता है?’

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अरुण नेहरू ने कहा- इसमें मुझे कोई दिक्कत नहीं दिखलाई पड़ती है. क्योंकि ताले का मूल मुकदमे से कोई ताल्लुक नहीं है. उसे प्रशासनिक कारणों से लगाया गया है. जिलाधिकारी ने अदालत से कहा, प्रशासनिक लिहाज से ताला बंद रहना चाहिए तो बंद हो गया. अब अगर जिलाधिकारी कहेगा ताले कि जरूरत नहीं है तो ताला खुल जाएगा.

हेमंत शर्मा की किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ के मुताबिक, राजीव गांधी ने अरुण नेहरु के प्लान को हरी झंडी दिखा दी. ये तो हुआ हेमंत शर्मा का दावा… वहीं, मौजूद रिकॉर्ड के मुताबिक, फैजाबाद कोर्ट में उमेश चंद्र पांडेय नाम के वकील ने याचिका दाखिल की- विवादित स्थल पर लगा ताला खुलवाने के लिए.

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इस मुकदमे की सुनवाई कर रहे थे जिला जज कृष्ण मोहन पांडेय. तब फैजाबाद के डीएम थे – इंदु कुमार पांडेय और एसएसपी कर्मवीर सिंह. सुनवाई के दौरान जज के एम पांडे ने फैजाबाद के डीएम और एसपी से पूछा- क्या याचिकाकर्ता की अपील पर ताला खोलने में कोई परेशानी है? क्या कानून-व्यवस्था को लेकर कोई दिक्कत हो सकती है? जवाब में डीएम इंदु कुमार पांडेय ने कहा- मुस्लिम समुदाय के सदस्यों को विवादग्रस्त स्थल पर नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं है. उन्हें वहां जाने की भी इजाजत नहीं है. ताले खुल जाने से कानून और व्यवस्था की कोई समस्या खड़ी होने की संभावना नहीं है. यह परिसर का अंदरूनी मामला है. तो फैजाबाद के एसएसपी कर्मवीर सिंह ने अदालत को भरोसा दिया कि ताला लगाया जाए या नहीं हर स्थिति में शांति-व्यवस्था कायम रखी जा सकती है.

इसके बाद जज कृष्ण मोहन पांडेय ने अपने फैसले में लिखा कि प्रतिवादियों को निर्देश दिया जाता है कि वे तुरंत ‘ओ’ तथा ‘पी’ द्वारों को खोल दें. वे आवेदक तथा समस्त समुदाय के सदस्यों द्वारा दर्शन व पूजा में कोई प्रतिबंध न लगाएं या बाधा न खड़ी करें. फैजाबाद कोर्ट के इस फैसले के करीब 40 मिनट के भीतर ही विवादित स्थल पर पिछले तीन दशकों से लगा ताला खुल गया.

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देश की राजनीति हिंदू-मुस्लिम, सेक्लुयर-कम्युनल के खांचे में तेजी बंटती जा रही थी. धीरे-धीरे 1989 में लोकसभा चुनाव का समय भी आ गया. राजीव गांधी ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत अयोध्या से की और राम-राज्य लाने का वादा किया. लेकिन, कांग्रेस को लोकसभा चुनावों में इसका कोई खास फायदा नहीं मिला.

साल 1989 के आम चुनाव में दिल्ली में सत्ता का मिजाज बदला. प्रचंड बहुमत वाली सरकार की जगह गठबंधन सरकार बनी. राजीव गांधी की जगह अब विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री की कुर्सी पर थे. उनकी प्रधानमंत्री वाली कुर्सी गठबंधन के कई पायों पर टिकी हुई थी. ऐसे में वीपी सिंह ने अपने विरोधियों पर बढ़त बनाने के लिए मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने का फैसला किया. इसके बाद अगड़े-पिछड़े की राजनीति में नए सिरे से फिल्डिंग बिछाने का काम शुरू हो गया. आरक्षण की गर्म हवा में बीजेपी को अपनी सियासी जमीन खिसकती दिखाई दी. ऐसे में बीजेपी नेताओं ने अपने राजनीतिक गुब्बारे में धर्म की हवा भरनी शुरू कर दी. नारा लगने लगा- ‘वो जात-पात से तोड़ेंगे, हम धर्म-संस्कृति से जोड़ेंगे.’ बीजेपी के लालकृष्ण आडवाणी सोमनाथ से राम रथ पर सवार हो गए. अयोध्या के नाम पर सियासी जमीन तैयार करने का खेल शुरू हो गया. हिंदूवादी संगठनों ने राम मंदिर के लिए ईंट और चंदा जमा करने का काम भी शुरू कर दिया.

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25 सितंबर, 1990… यही वो तारीख है – जब लालकृष्ण आडवाणी सोमनाथ मंदिर में पूजा-पाठ कर राम रथ पर सवार हुए. हर तरह की सुविधाओं से लैस एक मिनी बस को रथ का रूप दिया गया. करीब 10 हजार किलोमीटर का रूट तय था. बीजेपी के छोटे-बड़े नेताओं को क्षेत्रवार जिम्मेदारियां सौंपी गयी. बजरंग दल को रथ यात्रा में अधिक से अधिक लोगों को जुटाने की जिम्मेदारी दी गयी. आडवाणी के रथ के रफ्तार पकड़ते ही आरक्षण और मंडल की आवाज दबने लगी.

भाषणों में आडवाणी मंडल को हिंदुओं को आपस में बांटने वाला करार देने लगे. वो जनता दल पर भी हमला करते और कांग्रेस पर भी. बीजेपी नए राजनीतिक विकल्प के तौर पर मजबूत होने लगी. आडवाणी का रथ तेजी से आगे बढ़ता जा रहा था…कई जगहों पर सांप्रदायिक हिंसा भी हुई. लेकिन, बीजेपी ने सांप्रदायिक हिंसा की ख़बरों को नकार दिया या कोई अहमियत ही नहीं दी.

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प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे वीपी सिंह खतरे को महसूस तो कर रहे थे. पर कुछ खास कर नहीं पा रहे थे. आडवाणी को भरोसा था कि वीपी सिंह उन्हें गिरफ्तार करने की हिम्मत नहीं करेंगे. क्योंकि, वीपी सिंह की सरकार बीजेपी के दम पर चल रही थी. आडवाणी सीधे अयोध्या की ओर देख रहे थे. बिहार होते हुए आडवाणी की रथ यात्रा यूपी की सीमा में घुसने वाली थी, पूरे देश में राम लहर चल रही थी. आडवाणी की रथ यात्रा पटना होते हुए समस्तीपुर पहुंच चुकी थी. वहां से आडवाणी देवरिया यानी यूपी की सीमा में दाखिल होने वाले थे तब बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थे लालू प्रसाद यादव.

23 अक्टूबर, 1990 को लालू प्रसाद यादव के आदेश पर बिहार पुलिस ने समस्तीपुर सर्किट हाउस में आराम कर रहे आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया. इधर आडवाणी के रथ का पहिया रूका. उधर, बीजेपी ने वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस लिया. वीपी सिंह की सरकार गिर गयी. आडवाणी की रथयात्रा से बीजेपी के लिए मजबूत राजनीतिक जमीन तैयार हो चुकी थी.

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बिहार में लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी के साथ ही बीजेपी ने केंद्र की वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया. वीपी सिंह की सरकार मुंह के बल गिर गयी लेकिन, अयोध्या की गूंज भारत के हर हिस्से में सुनाई देने लगी. राम नाम का चमत्कार सियासत में साफ – साफ दिखाई देने लगा . बीजेपी और हिंदूवादी संगठनों को अयोध्या में भरपूर संभावना दिख रही थी. देशभर से राम-भक्तों का सैलाब अयोध्या पहुंचने लगा . अयोध्या किनारे बहती सरयू में देश के कोने-कोने से पहुंचे लोग अपनी-अपनी मनोकामना के साथ डुबकी लगा रहे थे. इसमें राम भक्त भी थे. हिंदूवादी संगठनों के कार्यकर्ता भी. वो साल था 1990 का और महीना नवंबर का. तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थे मुलायम सिंह यादव. उनकी सरकार ने फैजाबाद में कारसेवकों की एंट्री पर रोक लगा दी थी. अयोध्या में कारसेवकों और प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने गोलियां चलाईं, जिसमें कई कारसेवक मारे गए. अयोध्या में कारसेवकों पर फायरिंग के बाद मुलायम सिंह मुसलमानों के नए रहनुमा के तौर पर उभरे. उन्हें पॉलिटिकल पंडितों ने नया नाम दिया- मुल्ला मुलायम. 1990 के दशक की शुरुआत में ही अयोध्या राजनीति का नया लॉन्च पैड बन गयी. श्रीराम नाम का चमत्कार बीजेपी को यूपी समेत देश के कई राज्यों में साफ-साफ दिखा. यूपी की कमान अब बीजेपी के कल्याण सिंह के हाथों में थी. मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के कुछ दिनों बाद कल्याण सिंह अपने मंत्रियों के साथ अयोध्या पहुंचे और राम मंदिर बनाने की शपथ ली. वहीं दूसरी ओर, अयोध्या में मंदिर निर्माण को लेकर वीएचपी, बजरंग दल और बीजेपी ने मिलकर सुनामी तैयार करनी शुरू की.

मुख्यमंत्री बनते ही कल्याण सिंह ने अयोध्या में राममंदिर निर्माण को लेकर अपना इरादा साफ कर दिया. मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में पर्यटन विभाग ने विवादित ढांचे के ठीक सामने 2.77 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया. सरकार की दलील थी कि इससे अयोध्या में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा. लेकिन, कुछ दिनों बाद ही अधिग्रहण की गई जमीन राम जन्मभूमि न्यास को सिर्फ एक रुपये की लीज पर दे दी गयी.

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कहा जाता है कि VHP के अशोक सिंघल की अगुवाई में हिंदूवादी संगठनों का एक दल मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से मिला और विवादित ढांचे के बाहर लगे बैरिकेड्स हटाने की मांग की. दलील दी गई कि पुलिस बैरिकेड्स की वजह से कारसेवकों को रामलला के दर्शन और पूजा-पाठ में दिक्कत आती है. इस बीच, राज्य सरकार से मिली जमीन समतल करने का काम शुरू हो गया. RSS की मदद से VHP और बजरंग दल ने एक 40 दिन लंबा बजरंग रुद्र महायज्ञ का आयोजन किया. देश के कोने-कोने से यज्ञ के लिए अयोध्या पहुंचे कारसेवकों के ठहरने के लिए कार सेवकपुरम बनाया गया. मुस्लिम संगठनों ने पहले ही कल्याण सिंह सरकार के जमीन अधिग्रहण के फैसले का विरोध किया. मामला कोर्ट में पहुंचा. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित जमीन पर पक्के निर्माण पर रोक लगा दी. जिसके बाद राम जन्मभूमि न्यास ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए कहा कि विवादित ढांचे की सुरक्षा की जिम्मेदारी यूपी सरकार की है. जमीन अधिग्रहण पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को मानने का निर्देश दिया.

जुलाई 1992 को अयोध्या देश के कोने-कोने से कारसेवकों का अयोध्या पहुंचना शुरू हो गया. कार सेवक अयोध्या में चतुरमास और एक ऐसी जगह चबूतरे के निर्माण के इरादे से पहुंच रहे थे, जहां निर्माण कार्य पर कोर्ट की ओर से मनाही थी. कल्याण सिंह सरकार की ओर से पुलिस को बल प्रयोग नहीं करने के सख्त आदेश दिए गए थे. प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे नरसिम्हा राव कि मुश्किल ये थी कि अगर बाबरी ढांचे के सामने अधिग्रहण की गई जमीन पर कारसेवक चबूतरा का निर्माण कर देते तो कोर्ट की अवमानना होती. वहीं, कल्याण सिंह दलील दे रहे थे कि अगर चबूतरे का निर्माण कार्य रोका गया तो कारसेवक भड़क जाएंगे. ऐसे में प्रधानमंत्री राव ने बातचीत के जरिए इस मसले को सुलझाने का फैसला लिया. लेकिन, कोई खास कामयाबी नहीं मिली.

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30 अक्टूबर, 1992 को दिल्ली में धर्म संसद की बैठक हुई. VHP ने धर्म संसद में ही अयोध्या मसले पर बातचीत टूटने का ऐलान कर दिया. साधु-संतों के बीच VHP ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की मांग दोहराई. 6 दिसंबर से कारसेवा दोबारा शुरू करने का ऐलान कर दिया.

बात 5 दिसंबर 1992 की है. लखनऊ में एक बड़ी रैली हुई. जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी ने जमीन समतल करने की बात की तो आडवाणी ने संकल्प पूरा करने के लिए बलिदान देने की बात की. वीएचपी नेता अशोक सिंघल ने कहा कि कारसेवा सिर्फ भजन-कीर्तन के लिए नहीं है. बल्कि मंदिर का निर्माण कार्य शुरू करने के लिए है. दूसरी ओर, अयोध्या में मौजूद कारसेवकों का जोश सुनामी में बदल चुका था. अयोध्या में पुलिस अफसरों को सूबे की सरकार ने सख्त हिदायत दी थी कि किसी कीमत पर गोली नहीं चलानी है. अयोध्या में करीब दो लाख कारसेवक जमा थे. अगली सुबह कारसेवकों का सैलाब बाबरी ढांचे की ओर बढ़ा और कुछ घंटे में ही सदियों से खड़े तीनों गुंबद मलबे में तब्दील हो गए.

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कारसेवा से एक दिन पहले यानी 5 दिसंबर तक अयोध्या में दो लाख से ज्यादा कार सेवक मौजूद थे. इससे पहले कभी इतनी बड़ी तादाद में कारसेवकों का अयोध्या में जमावड़ा नहीं लगा था.

लखनऊ में अटल बिहारी वाजपेयी के भाषण का कारसेवक अपने-अपने हिसाब से मतलब निकाल रहे थे. 6 दिसंबर की सुबह-सुबह कारसेवकों का रेला और कवरेज के लिए अयोध्या में मौजूद पत्रकार विवादित ढांचे के पास पहुंच गए. RSS के स्वयंसेवक वहां पहले से मौजूद थे. उन्होंने उस जगह को खाली करा लिया, जहां चबूतरे पर कारसेवा होनी थी.

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विवादित ढांचे की सुरक्षा में तैनात पुलिसवालों ने कारसेवकों को रोकने की कोई कोशिश नहीं की. तो वहां तैनात अफसर सीता रसोई की छत से बाबरी ढांचे को देख रहे थे. तब देश के गृह मंत्री की कुर्सी पर थे- शंकरराव चव्हाण.

कारसेवकों ने बाबरी ढांचे के तीनों गुंबद गिरा दिए. कारसेवक पूरे जोर-शोर से अपने काम को अंजाम दे रहे थे. केंद्र सरकार तक एक-एक सेकेंड की रिपोर्ट पहुंच रही थी और गृह मंत्रालय के अफसरों के जरिए प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के पास. केंद्रीय गृह मंत्रालय के अफसर प्रधानमंत्री के आदेश का इंतजार करते रहे. जो Don’t Disturb की सख्त हिदायत के साथ एक कमरे में चले गए थे. बाबरी ढांचा गिरने के बाद कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. तब माधव गोडबोले देश के गृह सचिव की जिम्मेदारी संभाल रहे थे. कुछ साल पहले न्यूज़ 24 को दिए एक इंटरव्यू में माधव गोडबोले ने बताया था कि बाबरी गिराए जाने के तुरंत बाद क्या हुआ था?

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फैजाबाद में खड़ी सेंट्रल पैरा-मिलिट्री जवानों की कंपनियां स्थानीय मैजिस्ट्रेट का इंतजार करती रहीं. कारसेवकों में गिराए गए ढांचे की ओर आने वाले हर रास्ते को बंद कर दिया था. बिना किसी रोक-टोक के कारसेवक अपना काम करते रहे. रामलला का एक अस्थायी मंदिर तैयार कर दिया गया. इस बीच, कल्याण सिंह सरकार बर्खास्त को कर दिया गया और यूपी में राष्ट्रपति शासन लगा गया.

अयोध्या में बाबरी ढांचा गिराए जाने के अगले दिन यानी 7 दिसंबर, 1992 को जब CRPF और रैपिड एक्शन फोर्स एक्शन ने उस जगह को अपने कब्जे में लिया. तब तक वहां एक अस्थायी मंदिर बन चुका था. राम-सीता की मूर्ति स्थापित हो चुकी थी. 6 दिसंबर, 1992 की घटना को हिंदुत्ववादी संगठन शौर्य दिवस के रूप में मनाता है. तो सेक्युलर स्याह दिवस के तौर पर. लेकिन, अयोध्या की उस तारीख पर श्रीराम क्या सोचते होंगे – यह निकला मशहूर शायर कैफी आज़मी की नज़्म में…आजमी साहब लिखते हैं –

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राम बनवास से जब लौटकर घर में आए….याद जंगल बहुत आया जो नगर में आए
रक्से-दीवानगी आंगन में जो देखा होगा…छह दिसम्बर को श्रीराम ने सोचा होगा
इतने दीवाने कहां से मेरे घर में आए…
इतना ही नहीं कैफी आजमी साहब आगे लिखते हैं –
पांव सरयू में अभी राम ने धोये भी न थे…कि नज़र आए वहां ख़ून के गहरे धब्बे
पांव धोये बिना सरयू के किनारे से उठे…राम ये कहते हुए अपने दुआरे से उठे
राजधानी की फज़ा आई नहीं रास मुझे…छह दिसम्बर को मिला दूसरा बनवास मुझे.

ये तो हुई शायर और साहित्यकारों की बात. बाबरी ढांचा गिराए जाने के बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में हिंसा हुई… जिनमें निर्दोष लोगों की जान गयी. अयोध्या को हर शख्स अपनी-अपनी लेंस से देखता रहा. श्रीराम की नगरी के नाम पर बहुत कुछ चलता रहा. एक ओर अयोध्या में भव्य-दिव्य राम मंदिर के लिए आंदोलन. दूसरी ओर, अदालत में अयोध्या की लड़ाई. तीसरी ओर, अयोध्या के नाम पर सियासत. अयोध्या के सियासी लॉन्च पैड से मंदिर आंदोलन से चमके कई चेहरे सत्ता में ऊंचे पायदान तक पहुंचे. लेकिन, अयोध्या जहां की तहां खड़ी रही.

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First published on: Jul 13, 2026 06:26 PM

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Anurradha Prasad

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Arif Khan

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