अक्सर कहा जाता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरता है. उत्तर प्रदेश को भारत में चुनावी राजनीति की प्रयोगशाला के तौर पर देखा जाता है। अगले साल मार्च-अप्रैल में यूपी की 403 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव होना तय है. ऐसे में यूपी के सियासी अखाड़े में खड़ा हर राजनीतिक दल का महारथी हिसाब लगाने में जुटा है कि अबकी बार जाति का जोड़ तोड़ चलेगा या Gen Z फैक्टर काम करेगा ? Gen Z के लिए बड़ा मुद्दा बेरोजगारी है या फिर शिक्षा व्यवस्था में सुधार?
Gen Z में एक बड़ा वर्ग ऐसा है– जिसके हाथों में इंटरनेट से लैस स्मार्टफोन हैं, लेकिन डिग्री के हिसाब से रोजगार नहीं,इस बड़े और मुखर वोट बैंक को आखिर सियासी पार्टियां कैसे साधेंगी? क्या राहुल गांधी, अखिलेश यादव, मायावती, चंद्रशेखर आजाद, असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेता Gen Z का वोट खाते में जोड़ पाएंगे ? सवाल ये भी उठ रहा है कि क्या Gen Z के अंदर भी ध्रुवीकरण के लिए नई स्क्रिप्ट पर भीतरखाने काम चल रहा है?
क्या मोदी सरकार फिर से UGC के Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 को बंद बोतल से बाहर निकालेगी? 2027 के यूपी चुनाव में सियासी दल किस तरह का समीकरण बनाते दिख सकते हैं , आज कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे–इस एक्सक्लूसिव खबर में – 2027 की महाभारत, जाति का जोड़ तोड़ या Gen-Z का जोर ?
2027 मार्च-अप्रैल में 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव
वैसे तो 2027 मार्च-अप्रैल में 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. यूपी, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर, इसमें से पंजाब को छोड़कर बाकी राज्यों में बीजेपी की सरकार है। आबादी के लिहाज से यूपी भारत का सबसे बड़ा राज्य है , इस प्रदेश ने देश को कुल 9 प्रधानमंत्री दिए है. पीएम नरेंद्र मोदी खुद 2014 से लोकसभा में वाराणसी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. यूपी तेजी से अगले विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है. सियासी पार्टियां वोट युद्ध के लिए नए-नए समीकरण और फॉर्मूलों पर काम कर रही हैं.
सवाल उठ रहा है कि क्या यूपी में 2027 में भी 2024 वाला ट्रेंड दिखेगा? क्या Gen Z फैक्टर बीजेपी के लिए घाटे और विपक्षी पार्टियों के लिए फायदे का सौदा साबित होगा ? क्या विपक्षी पार्टियां Gen-Z आक्रोश को अपने पक्ष में भुनाने में कामयाब होगी? शुरुआत करते हैं – राहुल गांधी से. प्रयागराज की जमीन से राहुल गांधी ने Gen-Z को किस तरह साधने की कोशिश कर रहे हैं.
यूपी के सियासी समीकरणों में कांग्रेस कहां?
राहुल गांधी अच्छी तरह समझ रहे हैं कि आज की तारीख में जेन के जेहन में कौन सी बात सबसे अधिक घूम रही है. वो भी अच्छी तरह जानते हैं कि यूपी के सियासी समीकरणों में कांग्रेस कहां खड़ी है? ऐसे में दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर देश के कई शहरों में जेन जी के गुस्से को देखते हुए संभवत: कांग्रेस ने यूपी की सत्ता में वापसी के लिए एक नया प्रयोग किया,प्रयागराज की जमीन से जातीय समीकरणों की काट के तौर पर जेन जी के मुद्दों को राहुल गांधी आगे बढ़ाते दिखे.
यूपी में युवा वोटरों की तादाद करीब 30 फीसदी
उत्तर प्रदेश में 18 से 30 साल से वोटरों की तादाद करीब 30 फीसदी है. वहीं, 18 से 40 साल के वोटरों की हिस्सेदारी 40 फीसदी करीब है. माना जाता है कि युवा वोट का बड़ा हिस्सा बीजेपी के खाते में जाता है। दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर दूसरे कई शहरों से आईं आंदोलन की तस्वीरों के मायने निकाले जा रहे हैं कि Gen- Z मौजूदा सरकार और सिस्टम से कितना नाराज है. यही, वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी जेन जी से उनके लहजे में संवाद करते हैं।
नरेंद्र मोदी कहते हैं कि कैंपस लाइफ और असल जिंदगी में बहुत अंतर होता है। IIT में सिलेबस होता है और पता होता है कि कौन-सी परीक्षा देनी है। कौन-सा कोर्स पढ़ना है। उधर, असली जिंदगी में सब कुछ आउट ऑफ सिलेबस होता है। वहां यह भी खुद पहचानना पड़ता है कि असली सवाल क्या है।
जेन जी का आंदोलन डायलॉग का तरीका : मोहन भागवत
RSS प्रमुख मोहन भागवत जेन जी के आंदोलन को डायलॉग का तरीका बताते हैं..अपनी पीढ़ी से अधिक ईमानदार बताते हैं। एक बात साफ है कि बिना जेन जी को साधे न तो सत्ता हासिल करना आसान है , ना सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एजेंडा को आगे बढ़ाना. जेन जी हो या जेन अल्फा हमारे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तानेबाने का वर्तमान है,साथ ही एक मजबूत और मुखर वोट बैंक भी है.
जेन जी आंदोलन ने साफ कर दिया कि हुक्मरानों को उनकी सुननी पड़ेगी,उनसे जुड़े बुनियादी मुद्दों पर गंभीरता से ध्यान देना. ऐसे में राहुल गांधी ने प्रयागराज की जमीन से एक नया प्रयोग शुरू कर दिया है. संभवत: कांग्रेस की कोशिश होगी कि मौजूदा राजनीति नैरेटिव जात-पात के खांचों से निकालकर जेन जी बनाम सिस्टम की ओर शिफ्ट कर दिया जाए.
Gen Z के जोश और जुनून का अंदाजा सियासी दलों को है। इतिहास गवाह है कि युवाओं ने कई मौकों पर हुक्मरानों की गलतफहमियां दूर की है,यही, वजह है कि ज्यादातर सियासी पार्टियों के नेता Gen Z के सुर में सुर मिलाते दिख रहे हैं.
क्या 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में जाति के जोड़ तोड़ नहीं दिखेगा?
दिल्ली के जंतर-मंतर पर Gen Z के प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी Full Action दिखा चुके हैं। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव और उनकी पत्नी डिंपल यादव भी Gen Z के सुर में सुर मिलाते दिखे , तो आजाद समाज पार्टी के मुखिया चंद्रशेखर आजाद की संसद भवन के बाहर रात के अंधेरे में बारिश के बीच अनशन की तस्वीरें भी बहुत वायरल हुईं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या Gen Z आंदोलन ने चुनावी राजनीति की धारा बदल दी ? क्या 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में जाति के जोड़ तोड़ नहीं दिखेगा? क्या जाति के आधार पर गोलबंदी नहीं होगी,क्या सिर्फ Gen Z के मुद्दों पर नेता वोट मांगते दिखेंगे और सियासी वैतरणी पार कर जाएंगे?
उत्तर प्रदेश में हर तीसरा वोटर Gen-Z
एक अनुमान के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में हर तीसरा वोटर Gen-Z है. बीजेपी के रणनीतिकार अच्छी तरह जानते हैं कि Gen Z के भीतर कौन सा तूफान चल रहा है. ऐसे में बीजेपी महारथी जरूर हिसाब लगा रहे होंगे कि Gen Z के भीतर किस तरह ध्रुवीकरण किया जाए. इसकी एक तस्वीर 2026 की शुरुआत में दिखी – जब सरकार ने UGC के नियमों में बदलाव का फैसला लिया. मकसद बताया गया – कॉलेज और यूनिवर्सिटी में भेदभाव रोकना,इसके लिए Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 लाया गया. इसका सवर्ण छात्रों में बहुत कड़ा विरोध किया.
यूनिवर्सिटी कैंपस में छात्र ठीक उसी तरह बंटे दिखे—जैसा मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद हुआ था. ऐसे में सवर्ण वर्ग की तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से खासी नाराजगी महसूस की गयी। सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद UGC कानून वापस हो गया. लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ये भी साफ-साफ कह चुका है कि कानून बनाना सरकार का अधिकार है, ऐसे में सवाल उठता है कि क्या Gen Z के भीतर ध्रुवीकरण के लिए नए सिरे से खिड़की – दरवाजे खोलने की कोशिश होगी ?
निशाने पर थे – तब के देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान
इस साल मकर संक्रांति के बाद एकएक देशभर के कॉलेज और यूनिवर्सिटी के छात्र एकाएक सड़कों पर आ गए, केंद्र सरकार के खिलाफ नारे सुनाई देने लगे. निशाने पर थे – तब के देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान। वजह थी-13 जनवरी, 2026 को जारी यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन का नया नियम,दलील दी गई कि नए नियम कॉलेज और यूनिवर्सिटी में भेदभाव रोकने के लिए लाए गए हैं. नए नियमों में कैंपस में SC-ST, OBC के किसी छात्र के साथ जातिगत भेदभाव पर आरोपी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का प्रावधान किया था,नए नियमों का सवर्ण जाति के छात्रों ने कड़ा विरोध किया.
दलील दी गई कि UGC के नए नियम सामान्य वर्ग के लोगों के खिलाफ है. क्योंकि इस नियम का दुरुपयोग कर सामान्य वर्ग के छात्र-छात्राओं के ख़िलाफ़ फ़र्जी आरोप लगाए जा सकते हैं जो उनके लिए मुश्क़िलें पैदा कर सकते हैं ,कॉलेज कैंपस में जेन जी UGC के नए नियमों के समर्थन और विरोध में तेजी से बंटने लगा,
बांकीपुर में कमल नहीं खिलने की एक बड़ी वजह
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और UGC के नए नियमों पर रोक लग गया. अभी 2012 के पुराने भेदभाव-रोधी नियम लागू हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ये कह चुका है कि नियम बनाना सरकार का काम है. लेकिन, राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा जोरशोर से चलती रही कि पिछड़ों का वोट पाने के लिए बीजेपी अगड़ों को प्रताड़ित करना चाहती है. बीजेपी के कोर वोटर रहे अगड़ों का मन खट्टा होने की बातें भी गाहे-बगाहे चर्चा में रही हैं. हाल में बीजेपी का गढ़ माने जानेवाले बांकीपुर में कमल नहीं खिलने की एक बड़ी वजह अगड़ों की नाराजगी भी रही.
जेन जी ने बीजेपी की मुश्किलें और बढ़ा दी है. मोदी सरकार ने हाल में जेन जी आंदोलन की एक लहर झेली – जिसमें शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा. पेपर लीक रोकने के लिए एक सख्त बिल संसद में लाना पड़ा..अब सवाल उठ रहा है कि अगर फिर से Gen-Z बुनियादी मुद्दों के साथ सड़कों पर उतर गया, तो सरकार क्या करेगी ?
जेन जी सुनामी को रोकने का तरीका क्या होगा?
आखिर, जेन जी सुनामी को रोकने का तरीका क्या होगा? क्या केंद्र सरकार UGC के नए नियमों वाले जिन्न को फिर बोलत से बाहर निकालेगी? क्योंकि, ये एक ऐसा मुद्दा है – जिसमें जेन जी के भीतर भी अगड़ा- पिछड़ा के मुद्दे पर गोलबंदी की ट्रेलर दिख चुका है.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आने-वाले दिनों में जेन जी भी अगड़ा और पिछड़ा में बदल जाएगा? क्या जेन जी में ध्रुवीकरण से जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन के मूल मुद्दे किनारे लग जाएंगे ? जरा याद कीजिए , साल1974 के जेन जी आंदोलन को,गुजरात और बिहार में छात्रों ने प्रचंड आंदोलन किया. भले ही वो आंदोलन छात्रों से जुड़े बुनियादी मुद्दों से शुरू हुआ..लेकिन, निशाने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थी। तब जेन जी के बीच जाति की लकीर उतनी चमकदार नहीं थी। आंदोलन का नेतृत्व जयप्रकाश नारायण जैसे नेता कर रहे थे–जिनकी छवि एक राजनीतिक संन्यासी की थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जब भी जेन जी आंदोलन के लिए उतरे,सामाजिक ताने-बाने में जाति की लकीर और चमकदार होती गयी..जाति और आरक्षण जेन जी के भीतर कॉलेज में दाखिला से लेकर नौकरी तक में अगड़ा-पिछड़ा की दीवार को लगातार ऊंचा बना रहा है।
भविष्य की राजनीति धारा बदलने के संकेत
साथ ही, जेन जी आंदोलनों की अगुवाई करते ऐसे चेहरे दिखे – जिनकी Moral Authority को 24 कैरेट का नहीं माना गया. लेकिन, जेन जी आंदोलन ने भविष्य की राजनीति धारा बदलने के संकेत जरूर दे दिए हैं. ऐसे में इसके बहुत कम चांस हैं कि 2027 के यूपी चुनाव में Gen Z वोटिंग के पुराने ढर्रे पर आगे बढ़े, लेकिन, वोटिंग का पिछला पैटर्न पूरी तरह बदल जाए– ये भी मुश्किल है. ऐसे में 2027 के चुनावी समीकरणों में जाति का जोड़ तोड़ पूरी तरह खत्म होता नहीं दिख रहा है. लेकिन, उसमें नई चीजें जरूर जुड़ती दिख रही हैं। जेन जी चुनावी राजनीति में नई परिभाषाएं गढ़ता दिख सकता है,पहले Power Politics में जातीय गोलबंदी के लिए आवाज उठती थी-जिसकी जितनी हिस्सेदारी उसकी उतनी भागीदारी,लेकिन, Gen Z के सेंटर स्टेज में आने के साथ अगले चुनाव में आवाज सुनाई दे सकती है – हमारे समाज के युवाओं का कितना प्रतिनिधित्व. पुरानी राजनीति इस बात पर आगे बढ़ती थी कि किस जाति को कितने टिकट ? नई राजनीति हवा ऐसे सवालों के साथ आगे बढ़ सकती है कि अमुक समुदाय के कितने युवा IAS, IPS, PCS, Doctor, Professor या Entrepreneur… इस बात के चांस अधिक है कि चुनावों में Gen Z अब जातीय पहचान की जगह Opportunity Distribution की बात मुखर रूप करे.
भारत की आबादी में जेन जी की हिस्सेदारी 25 से 30 फीसदी के बीच है. लेकिन, लोकसभा में सिर्फ जेन जी वर्ग में 6 सांसद है- जिसमें से दो यूपी से आते हैं. समाजवादी पार्टी के पास 29 साल से कम उम्र के दो सांसद हैं-एक कौशांबी से पुष्पेंद्र सरोज और दूसरी मछलीशहर से प्रिया सरोज , देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के विधायकों की संख्या जोड़ दी जाए – तो ये आंकड़ा 4131 पर पहुंचता है। लेकिन, इसमें से सिर्फ 20 ही जेन जी वर्ग में आते हैं। ऐसे में जल्द जेन जी राजनीति में प्रतिनिधित्व की मांग को लेकर भी सड़कों पर दिख सकता है. ये एक बड़ा राजनीति शिफ्ट होगा
जंतर-मंतर पर जेन जी आंदोलन के बाद 2027 मार्च-अप्रैल में होने वाले 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में राजनीतिक दलों का पहला टेस्ट होना है , जेन जी को साधने के लिए बीजेपी एक साथ कई मोर्चों पर काम कर रही है , GenZ की बोली और उनके माध्यम यानी सोशल मीडिया के जरिए कनेक्शन मजबूत करने की कोशिश हो रही है, रोजगार, शिक्षा सुधार और Digital Empowerment पर फोकस किया जा रहा है। माना जा रहा है कि 2027 के लिए यूपी में बीजेपी थ्री लेयर फॉर्मूले पर बढ़ सकती है.
बीजेपी अपनी जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं में इस तरह ट्रेंड करने में जुटी है – जिससे वो जेन जी से मजबूती से जुड़ सकें. वहीं, सामाजवादी पार्टी अपने युवा सांसदों को आगे कर जेन जी वोट बैंक अपनी ओर खिंचने की कोशिश करती दिख सकती है,समाजवादी पार्टी अपने PDA नैरेटिव में रोजगार, शिक्षा और युवा प्रतिनिधित्व की मांग को ड्राइविंग सीट पर ले जाती दिख सकती है.
पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन को मायावती सोशल मीडिया के जरिए समर्थन कर चुकी है. पिछले कुछ समय से बीएसपी ने युवाओं से जुड़ने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मौजूजगी बढ़ाई है,मायावती अपने भतीजे आकाश आनंद को आगे कर BSP से जेन जी वोटरों को जोड़ने की कोशिश कर रही हैं,पिछले कुछ वर्षों से BSP जिस रास्ते बढ़ी – उसमें सियासी जमीन सिकुड़ती गयी. ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि आकाश आनंद बीएसपी के साथ जेन जी को कितना जोड़ पाएंगे ?
आज की तारीख में दलित युवा वोटरों की उम्मीदें सिर्फ पहचान तक सीमित नहीं रहीं..वो अच्छी पढ़ाई, अच्छी सरकारी नौकरी, अच्छा रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं में निष्पक्षता, राजनीति में प्रतिनिधित्व की ख्वाहिश रखते हैं..युवाओं के मिजाज को देखते हुए यूपी के सियासी अखाड़े में खड़ी नई पार्टियां भी BSP के सामने बड़ी चुनौती पैदा करती दिख रही हैं. लेकिन, एक बात तय है कि 2027 में वोट के लिए जोड़-तोड़ के जाति फॉर्मूले में कई नयी चीजें जुड़नी तय हैं.
भारत की चुनावी राजनीति में BJP की इमेज एक Election Winning Machine के तौर पर है. ऐसे में ये कई लेयर में काम करने वाली बीजेपी की रणनीति का एक बड़ा हिस्सा हो सकता है – जिसमें अभी से हिंदुत्ववादी ब्रिगेड ने Gen Z को उनकी ही भाषा और मंच से साधना शुरू कर दिया है। बीजेपी 2027 में Hindutva+Welfare+Aspirational Youth फॉर्मूले को आगे करते हुए सत्ता समीकरण बनाने की कोशिश करती दिख सकती है. वहीं, समाजवादी पार्टी PDA को नए सिरे से परिभाषित करती दिख सकती है – जिसमें Gen Z से जुड़े मुद्दे जुड़ते दिख सकते हैं. कांग्रेस और बीएसपी भी इसी रास्ते आगे बढ़ती दिख सकती हैं.
आजादी के बाद से ही यूपी में वोट के लिए जातीय गोलबंदी का खेल शुरू हो गया,यूपी में कांग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी रहे. पिछले 36 वर्षों से कांग्रेस लखनऊ की सत्ता से बाहर है। कांग्रेस को सवर्ण, दलित और अल्पसंख्यक वोट का बड़ा हिस्सा मिलता था। बाद में मुलायम सिंह यादव ने कांग्रेस के अल्पसंख्यक, मायावती ने दलित और बीजेपी ने सवर्ण वोट में सेंधमारी की , लखनऊ में सत्ता के लिए नए जातीय समीकरण बनने और बिगड़ने लगे. साल 2014 के बाद वोटों के ध्रुवीकरण के लिए हिंदू बनाम मुस्लिम और गरीब बनाम अमीर के मुद्दे को धार दी गयी. 2022 के यूपी चुनाव में प्रियंका गांधी ने महिलाओं के मुद्दों के आगे किया. भले ही चुनाव में कांग्रेस को फायदा नहीं हुआ, लेकिन, महिलाओं को एक मजबूत वोट बैंक के रूप में देखने की शुरुआत जरूर हो गयी.
आजादी के बाद 1952 में पहली बार यूपी विधानसभा के लिए चुनाव हुआ, चुनावी अखाड़े में किस्मत आजमा रहे सभी दलों ने विचारधारा के आधार पर वोट मांगा. कांग्रेस के विकल्प के तौर खुद को सोशलिस्ट पेश कर रहे थे और सोशलिस्टों के बड़े नेता डॉक्टर राममनोहर लोहिया थे. विधानसभा पहुंचनेवाले नेताओं में से ज्यादतर का ताल्लुक ऊंची जाति से था. कांग्रेस यूपी समेत पूरे देश में छाई हुई थी. कांग्रेस में ब्राह्मण, ठाकुर और बनिया जाति के नेताओं की भरमार थी,कांग्रेस में ऊंची जातियों के वर्चस्व को सबसे पहले चुनौती लोहिया की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने दी।
उन्होंने नारा दिया-
संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़ा पावे सौ में साठ
पिछड़ी जातियों को एक जुट करने की मुहिम में डॉक्टर लोहिया जुट गए, जो कांग्रस की गोलबंदी योजना में छूट गयी थीं..साल 1967 में यूपी में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी. फिर सूबे के जातीय समीकरण को देखते हुए एक ऐसा फॉर्मूला तैयार किया गया, जिसकी बुनियाद पूरी तरह से जाति के जोड़-घटाव पर रखी गयी। नाम दिया गया- अजगर.
अहीर यानी यादव, जाट, गुर्जर और राजपूत को एक छतरी के नीचे लाने की कोशिश हुई,जो पूरे यूपी में चुनाव बूथों को मैनेज कर लें.
चौधरी चरण सिंह ने जाट, गुर्जर और यादवों को अपने साथ जोड़ लिया..लेकिन, राजपूत इस गोलबंदी में शामिल नहीं हुए. 1980 के दशक में कांशीराम ने दलितों को एक छतरी के नीचे लाने की मुहिम शुरू की..वहीं, हिंदुत्वादी संगठनों ने अयोध्या में मंदिर के लिए आंदोलन तेज कर दिया,1989 के चुनाव में यूपी की सत्ता से भी कांग्रेस आउट हो गयी। राजनीति का चक्र कुछ इस तरह बढ़ा – जिसमें 1990 में वोटों के ध्रवीकरण मंडल-कमंडल के ईंद-गिर्द होने लगा.
कांग्रेस के सवर्ण वोटबैंक में बीजेपी ने चुंबक लगाया,तो मुलायम सिंह यादव ने मुस्लिम वोट बैंक में, वहीं दलित वोटबैंक का बड़ा हिस्सा कांशीराम की बीएसपी की ओर खिसक गया
राजनीतिक सहूलियत के हिसाब से जातीय गोलबंदी और जातीय समीकरणों के आधार पर सत्ता के लिए अद्भुत प्रयोग यूपी की सियासी प्रयोगशाला में होने लगे.
राजनीतिक महत्वाकांक्षा के विस्तार के साथ जाति आधारित पार्टियां बनने लगीं. दलील दी जाने लगी की समाजवादी पार्टी के शासन में OBC में यादव अधिक मजबूत हुए तो मायावती के शासन में दलितों में जाटव. मुलायम सिंह यादव के दौर के MY फॉर्मूले को अखिलेश यादव ने विस्तार देने की कोशिश की,साल 2014 में नरेंद्र मोदी का चेहरा आगे कर बीजेपी ने अच्छे दिन आएंगे के नाम पर वोट मांगा.
चुनाव का नतीजा आया तो जात-पात के पुराने समीकरण ध्वस्त दिखे,साल 2017 में यूपी चुनाव की घंटी बजी , ये नोटबंदी के बाद बीजेपी की पहली चुनावी परीक्षा थी. बीजेपी ने इसे 80% बनाम 20% की लड़ाई में बदल दिया, एक ओर हिंदू बनाम मुसलमान की बातें हो रही थी..दूसरी ओर, नोटबंदी को गरीब बनाम अमीर की लड़ाई के तौर पर पेश किया गया. बीजेपी प्रचंड बहुमत से यूपी की सत्ता में आई और योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे.
बीजेपी एक ओर सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश करती रही. दूसरी ओर, केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के जरिए लाभार्थियों का एक बड़ा वर्ग तैयार कर दिया. साल 2022 के लिए जब चुनाव की घंटी बजी , विपक्षी दल पुराने जातीय समीकरणों के आधार पर ही बीजेपी को टक्कर देने की कोशिश करते रहे. वहीं, महिला वोटरों की ताकत को समझते हुए – कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने जाति की जगह जेंडर कार्ड को आगे बढ़ाया. उन्होंने न सिर्फ सूबे में 40 फीसदी महिला उम्मीदवारों को टिकट देने का वादा किया, बल्कि उसे निभाया भी।
हालांकि, कांग्रेस को चुनाव में जाति की जगह जेंडर कार्ड का खास फायदा नहीं मिला. प्रियंका के इस दांव के बाद दूसरी पार्टियों को भी महिलाओं को लेकर रणनीति में बदलाव करना पड़ा,साल 2022 के यूपी चुनाव में बीजेपी की सत्ता में वापसी तो हुई. लेकिन, सीटें घटी गयी.
साल 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद तीसरी बाद नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने-लेकिन, पिछले चुनाव की तुलना में सीटें बहुत कम हो गयी. खासतौर से यूपी में, दरअसल, विपक्षी पार्टियों द्वारा संविधान और आरक्षण को लेकर बनाया गया नैरेटिव माना जाता है, 2027 में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव से पहले जेन जी आंदोलन के बीजेपी की टेंशन बढ़ा दी है
यूपी के लोगों ने सत्ता के लिए कई अजब-गजब प्रयोग, जातीय समीकरण, दल-बदल और गठबंधन देखे हैं. आज की तारीख में लखनऊ में सत्ता का रास्ता अजगर-मजगर, ढ़ाई जात, मुस्लिम+यादव, महिला+यूथ समीकरण से बहुत आगे निकल चुका है. वो दौर गया – जब 33 से 35 फीसदी वोट पर सरकारें बन जाया करती थी। अब बीजेपी 50%+ वोट के टारगेट से साथ चुनाव में उतरती है. बीजेपी के चुनाव जीतने वाले फॉर्मूले में जाति का जोड़ तोड़ भी है, कट्टर हिंदुत्व भी है,लाभार्थी भी हैं,आधी आबादी भी हैं.
2027 का यूपी चुनाव पिछले चुनावों से बहुत अलग होने वाला है. इसमें बीजेपी के सामने पहली चुनौती Gen Z को साधने की है. माना जा रहा है कि वोटों के ध्रुवीकरण के लिए हिंदू-मुस्लिम, गरीब-अमीर का दांव पुराना हो चुका है. अब Gen Z के भीतर ध्रुवीकरण का प्रयोग दिखना बाकी है। दूसरी चुनौती, राम मंदिर चंदा चोरी मसले पर लोगों को यकीन दिलाने की भी है कि चंदा चोरों को किसी कीमत छोड़ा नहीं जाएगा , तीसरी चुनौती, PDA की राजनीति से निपटने की है।
चौथी चुनौती, उस नैरेटिव को तोड़ने की है – जिसमें बांकीपुर और दतिया By-Poll के बाद ये संदेश देने की कोशिश हो रही है कि बीजेपी अब ढलान की ओर बढ़ने लगी है. लेकिन, एक बात तय है कि 2027 के चुनाव में न तो सिर्फ जाति के जोड़ तोड़ से बात बनेगी और ना ही Gen Z के गुस्से को भुना कर, भविष्य में जाति की राजनीति Gen Z के सवालों के बीच से आगे बढ़ती दिख सकती है. बहुत हद तक संभव है कि Identity Politics और Aspirational Politics के बीच से गुजरते वोट शास्त्र की चाबी से लखनऊ की सत्ता का ताला खुले.