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Ayodhya History Part Two: рднрд╛рд░рддреАрдп рдЬрдирдорд╛рдирд╕ рдореЗрдВ рдЕрдпреЛрдзреНрдпрд╛ рдХреА рд░рдЬ рд▓реЗрдиреЗ рдХреА рдкрд░рдВрдкрд░рд╛ рд╣рдЬрд╛рд░реЛрдВ рд╕рд╛рд▓ рд╕реЗ рдЪрд▓реА рдЖ рд░рд╣реА рдереА, рд╕рд░рдпреВ рдХреЗ рдкреНрд░рд╡рд╛рд╣ рдХреЗ рд╕рд╛рде рдЕрдпреЛрдзреНрдпрд╛ рднреА рдЕрдкрдиреА рд▓рдп рдореЗрдВ рдЖрдЧреЗ рдмрдврд╝ рд░рд╣реА рд╣реИ ред рдкрд╢реНрдЪрд┐рдо рд╕реЗ рдЖрдХреНрд░рдордг рдХреЗ рд╕рд╛рде рднрд▓реЗ рд╣реА рднрд╛рд░рдд рдореЗрдВ рд╕рддреНрддрд╛ рдХрд╛ рдорд┐рдЬрд╛рдЬ рд╕рдордп-рд╕рдордп рдкрд░ рдмрджрд▓рддрд╛ рд░рд╣рд╛ рд╣реЛ, рд▓реЗрдХрд┐рди рд╣рдорд╛рд░реЗ рд╕рд╛рдорд╛рдЬрд┐рдХ рддрд╛рдиреЗ-рдмрд╛рдиреЗ рдореЗрдВ рдорд░реНрдпрд╛рджрд╛ рдкреБрд░реБрд╖реЛрддреНрддрдо рд╢реНрд░реАрд░рд╛рдо рдХреА рдЬрдЧрд╣ рджрд┐рдиреЛрдВ-рджрд┐рдиреЛрдВ рдКрдВрдЪреА рд╣реЛрддреА рдЬрд╛ рд░рд╣реА рдереА,рдореМрдЬреВрджрд╛ рд╕рдордп рдореЗрдВ рдЬрд┐рд╕ рдЕрдпреЛрдзреНрдпрд╛ рдХреЗ рд╕рд╛рдВрд╕реНрдХреГрддрд┐рдХ рдФрд░ рдЖрдзреНрдпрд╛рддреНрдорд┐рдХ рд╡реИрднрд╡ рдХреА рдЗрддрдиреА рдмрд╛рддреЗрдВ рд╣реЛ рд░рд╣реА рд╣реИ-рд╡реЛ рдХреБрдЫ рджрд╢рдХ рддрдХ рдХреИрд╕реА рд░рд╣реА рд╣реЛрдЧреА? рдкрд┐рдЫрд▓реА рдХрд┐рд╕реНрдд рдореЗрдВ рдореИрдВ рдЖрдкрдХреЛ рдмрддрд╛ рдЪреБрдХреА рд╣реВрдВ рдХрд┐ рддреНрд░реЗрддрд╛рдпреБрдЧ рд╕реЗ рдЖрдХреНрд░рд╛рдВрддрд╛ рдмрд╛рдмрд░ рдХреЗ рдЖрдиреЗ рддрдХ рдЕрдпреЛрдзреНрдпрд╛ рдореЗрдВ рдХрд┐рди-рдХрд┐рди рдкрдбрд╝рд╛рд╡реЛрдВ рд╕реЗ рдЧреБрдЬрд░рддреЗ рд╣реБрдП рдЖрдЧреЗ рдмрдврд╝реА тАУ рдЕрдм рдЖрдЧреЗ рдХреА рдХрд╣рд╛рдиреА

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Ayodhya History Part Two: क्या आपने कभी सोचा है । कुछ साल पहले तक अयोध्या एक जिला तक नहीं था – वो यूपी के फैजाबाद जिले का एक छोटा सा हिस्सा भर था । अयोध्या नाम से एक छोटा रेलवे स्टेशन हुआ करता था–जहां गिनती की ट्रेन रुकती थी । त्रेता काल में जिस अयोध्या की तुलना स्वर्ग से होती थी – वो कुछ दशक पहले तक विकास से कोसों दूर खड़ी थी । लेकिन, इस प्राचीन नगरी का एक और मिजाज रहा है – सुबह शाम मंदिरों की घंटियां और मस्जिदों से अजान दोनों साथ-साथ सुनाई देते थे। लेकिन, आज की तारीख में अयोध्या पूरी तरह बदल चुकी है,वहां के हर हिस्से में आधुनिकता का रंग और पैसे की चमक दिखाई दे रही है।

पढ़ें मैं अयोध्या हूं, भाग एक : त्रेतायुग के वैभव से लेकर मुगल काल की उथल-पुथल तक, पढ़ें अयोध्या के उतार-चढ़ाव की पूरी कहानी

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मैं अयोध्या हूं, भाग-2, अंग्रेजी राज से भये प्रगट कृपाला तक

मुगल शासक अकबर के दौर में एक अहम सूबा था अवध, जिसकी राजधानी थी अयोध्या । भारतीय जनमानस के बीच खासकर उत्तर भारत में घर-घर रामचरित मानस की चौपाइयां सुनाई देने लगी। सामाजिक-धार्मिक जीवन में भगवान राम का महत्व बढ़ा, वैसे-वैसे अयोध्या भी एक हिंदू तीर्थ के तौर पर महत्वपूर्ण होती गयी। दूसरी ओर,भारत में औरंगजेब की मौत के बाद मुगल तेजी से कमजोर पड़ने लगे , साल 1731 में मुगल बादशाह मुहम्मद शाह ने अवध को काबू करने की ज़िम्मेदारी अपने शिया दीवान-वज़ीर सआदत खां को सौंपी,इसके बाद अवध की कमान मुगल शासकों के हाथों से निकल कर नवाबों-वजीरों के हाथों में आ गयी । धीरे-धीरे अयोध्या में नई बहस आकार लेने लगी , मसलन, अयोध्या में मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गयी थी?

ईस्ट इंडिया कंपनी में काम करनेवाला ब्रिटिश विलियम फिंच ने 1608 से 1611 के बीच भारत का दौरा किया । कारोबार की संभावना तलाशने के लिए हिंदुस्तान में जगह-जगह गया,अयोध्या के बारे में विलियम फिंच ने लिखा है कि भगवान राम से जुड़े भव्य भवन के अब सिर्फ अवशेष बचे हैं । इमारत के टूटे-फूटे हिस्से रह गए हैं, जहां हिंदू पुजारी श्रीराम की पूजा करते हैं । देश भर से हिंदू वहां पहुंचकर दर्शन करते हैं,इसे रामकोट कहा जाता है ।

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मुगल बादशाह औरंगजेब की मौत के बाद मुग़ल साम्राज्य कमजोर पड़ने लगा,इस दौर में अवध शक्तिशाली राज्य के तौर पर उभरा,नवाब शुजाउदौला के दौर में फैजाबाद यानी आज के अयोध्या ने गजब की तरक्की की,उस दौर की कई निशानियां आज भी मौजूद हैं ।

ब्रिटिश हुकूमत और पहला कानूनी विवाद

बात 1775 की है । नवाब असफउद्दौला ने अपनी राजधानी फैजाबाद से बदलकर लखनऊ करने का फैसला किया..इसी के साथ प्राचीन नगर अयोध्या अपनी रंगत खोने लगी,अयोध्या अब सत्ता का केंद्र नहीं रही,लेकिन, हिंदुओं के लिए पहले की तरह ही पवित्र तीर्थ बनी रही, तुलसीदास के राम रचितमानस की चौपाईयों ने श्रीराम के चरित्र को जन-जन तक पहुंचा दिया । हिंदुओं के बीच एक नई चेतना का तेजी से संचार हुआ,

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इस दौर में अयोध्या में हिंदू और मुसलमानों की आबादी अच्छी खासी थी । ऐसे में अयोध्या में अब मंदिर – मस्जिद के सुर तेज होने लगे,हिंदू-मुस्लिम आमने-सामने आने लगे । अयोध्या में कदम-कदम पर मंदिर बने,मस्जिदें भी । मंदिर से घंटियों की आवाज और मस्जिद से अजान दोनों सुबह – शाम साथ-साथ निकलने लगी। अवध के नवाब खुद हनुमान जी के उपासकों में थे। कुछ कट्टरपंथियों को हिंदू-मुस्लिमों में भाई-चारा हजम नहीं हो रहा था , नए तरह की तिकड़म और साजिश अयोध्या की फिजाओं में आकार लेने लगी । उस दौर में सुन्नी फकीर शाह गुलाम हुसैन समेत कुछ मुसलमानों ने अफवाह उड़ा दी कि हनुमानगढ़ी में जहां मंदिर है , वहां औरंगजेब ने एक मस्जिद बनवाई थी । ये अफवाह फैलाने की कोशिश की गई कि मस्जिद को तोड़कर मंदिर बनाया गया,शाह गुलाम हुसैन ने ऐलान किया कि उसी जगह 28 जुलाई,1855 को नमाज पढ़ेंगे। इसके बाद पूरे इलाके में तनाव फैल गया ।

बात करीब 170 साल पुरानी है । अयोध्या में कट्टरपंथियों का एक वर्ग तेजी से उभर रहा था – जिसकी अगुवाई कर रहा था सुन्नी फकीर शाह गुलाम हुसैन । कट्टरपंथियों के निशाने पर थी अयोध्या की हनुमानगढ़ी। कट्टरपंथियों ने अफवाह फैला दी कि मस्जिद को तोड़कर मंदिर बनाई गयी है,पूरे इलाके में तनाव फैल गया। नवाब वाजिद अली शाह ने इसकी जांच करवाई, नवाब की समझ में आ गया कि गुलाम हुसैन साजिश के तहत आग लगा रहा है । कट्टरपंथी भी अड़ गए,मामला इतना बढ़ा कि नवाब को शाही फौज को मोर्चा संभालना पड़ा, जिसमें 70 से अधिक मुसलमान मारे गए , नवाब की फौज तलवार की नोक पर मुस्लिम कट्टरपंथियों को शांत कर दिया ।

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1877 के ‘गजेटियर ऑफ दि प्रोविंस ऑफ अवध’ में पैट्रिक कारनेगी ने लिखा है मुसलमानों ने हनुमानगढ़ी पर कब्जे की कोशिश की..इसमें उन्हें बड़ा खामियाजा उठाना पड़ा,वो तीसरी कोशिश में राम जन्मभूमि पर कब्जा करने में कामयाब हुए,बाबरी मस्जिद के गेट पर हुए संघर्ष में करीब 75 मुसलमान मारे गए और 11 हिंदुओं की जान गयी । इस वक्त तक हिंदू इसमें पूजा करते थे। कुछ साल बार फिर अयोध्या सुलगने लगा,ये बात है- 1859 की । अयोध्या में फिर तनाव बढ़ने लगा । विवादित जमीन पर कब्जे को लेकर अयोध्या में हिंदू – मुस्लिमों के बीच बड़ा दंगा हुआ, जिसका साफ-साफ असर आसपास के इलाकों में भी दिखा..सुलह करवाने के लिए अंग्रेजों ने दोनों पक्षों के जिम्मेदार लोगों को आमने-सामने बैठाकर मामले को खत्म कराने की कोशिश की ।

1877 के ‘गजेटियर ऑफ दि प्रोविंस ऑफ अवध’ में लिखा गया है कि अयोध्या में बार-बार झगड़े से बचने के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने बीच में लोहे की रेलिंग लगवा दी। जिसके अंदर मुसलमान इबादत कर सकते थे और रेलिंग के बाहर हिंदुओं ने एक प्लेटफॉर्म बनाया, जिस पर हिंदू पूजा करते थे लेकिन, अंग्रेजी फॉर्मूले से भी अयोध्या का झगड़ा खत्म नहीं हुआ ।

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अंग्रेजों के आने से पहले अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी ढांचा विवाद की नींव पड़ चुकी थी , बाबरी ढांचा खड़ा होने के बाद भी हिंदुओं ने सीता रसोई और राम चबूतरे पर पूजा-अर्चना जारी रखी,अंग्रेजों के दौर में झगड़ा बढ़ा तो कंटीली बाड़ लगा कर विवादित जगह को दो हिस्सों में बांट दिया गया,लेकिन, भीतर जाने के लिए मुख्य गेट एक ही रहा। टकराव बढ़ता जा रहा था,वो साल था 1885 और महीना जनवरी । प्रचंड ठंड के मौसम में निर्मोही अखाड़े के महंत रघुबर दास ने अयोध्या विवाद में पहला केस फाइल किया और राम चबूतरे पर एक मंडप बनाने की इजाजत मांगी। इसके बाद एकाएक गर्मी बढ़ गयी, ये भी एक संयोग है कि यही वो साल था – जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई,फैजाबाद की जिला अदालत ने महंत रघुबर दास की याचिका खारिज कर दी ।

बात 1883 की है,महीना अप्रैल का । होली के बाद से ही अयोध्या के साधु-संतों में हलचल तेज हो गयी थी,निर्मोही अखाड़ा ने डिप्टी कमिश्नर फ़ैज़ाबाद के सामने अर्ज़ी लगाकर मंदिर बनाने की इजाजत मांगी,लेकिन, मुस्लिम समुदाय की आपत्ति पर निर्मोही अखाड़े की अर्जी नामंजूर हो गयी ।

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29 जनवरी, 1885: सिविल कोर्ट में पहला मुक़दमा दायर

निर्मोही अखाड़े के महंत रघुबर दास ने चबूतरे को राम जन्म स्थान बताते हुए सिविल कोर्ट में पहला मुक़दमा दायर कर दिया , 17X21 फीट के चबूतरे को श्रीराम का जन्मस्थान बताया गया और मंदिर बनाने की इजाजत मांगी गयी । इस मामले की सुनवाई कर रहे थे – सब जज पंडित हरिकिशन । दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद जज पंडित हरिकिशन ने अपने फैसले में लिखा चबूतरा और मस्जिद बिलकुल अग़ल-बग़ल हैं, दोनों के रास्ते एक हैं और मंदिर बनेगा तो शंख, घंटे वग़ैरह बजेंगे, जिससे दोनों समुदायों के बीच झगड़े होंगे,लोग मारे जाएंगे ।

निर्मोही अखाड़े को चबूतरे पर मंदिर बनाने की इजाजत नहीं मिली । सालभर के भीतर ही निर्मोही अखाड़ा पहला मुकदमा हार गया,इसके बाद महंत रघुबर दास ने फैजाबाद के जिला जज कर्नल एफ. ई. ए. कैमियर की अदालत पहुंच गए । जज कमियर ने अपने फैसले ने कहा हिंदू जिस जगह को पवित्र मानते हैं वहां मस्जिद बनाना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। यह घटना 356 साल पहले की है इसलिए अब इस शिकायत का समाधान करने के लिए बहुत देर हो गई है ।
ऐसे में सभी पक्ष पक्ष यथास्थिति बनाए रखें ।

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निर्मोही अखाड़ा अवध के जुडिशियल कमिश्नर डब्लू यंग की अदालत पहुंच गया , लेकिन, यहां से भी कोई रास्ता नहीं निकला । तीनों अदालतों ने अपने फैसले में विवादित स्थल के बारे में हिंदुओं की आस्था, मान्यता और जनश्रुति का उल्लेख तो किया। लेकिन, फैसले का आधार मौजूदा सबूत और रिकॉर्ड को बनाया ।अदालत का ध्यान शांति और तत्कालीन जरूरतों पर ज्यादा रहा ।

मार्च 1934 में गोहत्या के विरोध में हिंसा

वक्त तेजी से आगे बढ़ रहा था । एक ओर पूरे देश में ब्रिटिश हुकूमत से आजादी के लिए आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा था तो दूसरी ओर अयोध्या में तनाव बढ़ता जा रहा था । बात मार्च 1934 की है,.फैजाबाद के शाहजहांपुर में गोहत्या की घटना हुई,इसके विरोध में हिंसा शुरू हो गयी । इस हिंसा में बाबरी मस्जिद को नुकसान पहुंचा । अंग्रेजों ने किसी तरह से मामले को शांत करवाया और बाद में ब्रिटिश सरकार ने इसकी मरम्मत करवा दी । अयोध्या का मामला सुलझने की जगह लगातार उलझता जा रहा था,करीब दो साल बाद यानी 1936 ईस्वी में मुसलमानों में शिया और सुन्नी इस बात को लेकर उलझ गए कि मस्जिद किसकी है? इसके लिए अंग्रेजों ने जांच बैठा दी, मस्जिद के मुतवल्ली ने दावा किया कि मीर बाक़ी शिया था, इसलिए ये शिया समुदाय की मस्जिद हुई । जिला वक़्फ़ कमिश्रनर ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि मस्जिद का निर्माण करने वाला बादशाह सुन्नी था..इसलिए, सुन्नी समुदाय की मस्जिद हुई । मामला फिर अदालत में पहुंचा ।

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अंग्रेजी राज खत्म होने को आया तो हिंदुओं की ओर से फिर चबूतरे पर मंदिर निर्माण को लेकर हलचल तेज हो गयी..जिसके बाद फैजाबाद के सिटी मजिस्ट्रेन ने एक आदेश जारी किया,आदेश में दोनों पक्षों यानी हिंदू और मुसलमान से यथास्थिति बहाल रखने के लिए कहा गया ।

आजादी के बाद की सियासत और 1949 का मोड़

लंबी लड़ाई के बाद भारत को अंग्रेजों से आजादी मिल गयी । लेकिन,अयोध्या का झगड़ा ज्यों का त्यों बना रहा,आजाद भारत में अयोध्या का झगड़ा धीरे-धीरे वोट की राजनीति में बदलने लगा , सियासतदां अयोध्या को एक नए मौके के तौर पर देखने लगे । बात 1948 की है,फैजाबाद विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुए। समाजवादी आचार्य नरेंद्र देव के खिलाफ कांग्रेस ने हिंदू संत बाबा राघव दास को उम्मीदवार बनाया। तब उत्तर प्रदेश की कमान गोविंद वल्लभ पंत के हाथों में थी, इस चुनाव में पहली बार अयोध्या में मंदिर निर्माण अहम मुद्दा बना। मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने अपने चुनावी भाषणों ने बार-बार कहा कि आचार्य नरेंद्र देव श्रीराम को नहीं मानते । समाजवाद के झंडाबरदार आचार्य नरेंद्र देव करीब एक हजार वोट से चुनाव हार गए और बाबा राघव दास चुनाव जीत गए,इस तरह आजादी के साथ ही वोट बैंक पॉलिटिक्स में अयोध्या का श्रीगणेश हो गया । लेकिन, अयोध्या में मंदिर-मस्जिद झगड़े का टर्निंग प्वाइंट बना साल 1949,जब 23 दिसंबर को रात के अंधेरे में चमत्कारिक रूप से राम, सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां बाबरी मस्जिद के भीतर पहुंच गई ।

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23 दिसंबर, 1949 को बाबरी मस्जिद में मूर्तियां अवतरित

रात के अंधेरे में बाबरी मस्जिद में कुछ हलचल हुई और मूर्तियां अवतरित हो गयीं । सुबह होते ही पूरे इलाके में आग की तरह ये खबर फैली कि अयोध्या में रामलला का जन्म हुआ है । इस रहस्यमयी रात ने अयोध्या की पूरी तस्वीर बदल दी,कुछ ने इसे चमत्कार माना,तो कुछ ने सोची समझी साजिश ।

23 दिसंबर,1949 को ही एक FIR दर्ज हुई,जिसमें अयोध्या पुलिस स्टेशन के ऑफिसर इंचार्ज ने मुख्य रूप से तीन लोगों को नामजद किय- अभिराम दास, राम शक्ल दास और सुदर्शन दास । इन तीन नामों के साथ 50-60 अज्ञात लोगों के खिलाफ भी दंगा भड़काने, अतिक्रमण जैसी कुछ दफाओं में केस दर्ज किया गया फैजाबाद के तत्कालीन डीएम केके नायर ने इसे विवादित संपत्ति घोषित कर ताला लगवा दिया,उन्होंने नगर पालिका अध्यक्ष प्रियदत्त राम को वहां का रिसीवर नियुक्त कर दिया,हिंदुओं को रामलला की पूजा की इजाजत दी गई ।

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डीएम केके नायर अपने सीनियर अफसरों के निर्देश सुन तो रहे थे,लेकिन, कर अपने मन की रहे थे । यूपी के तत्कालीन मुख्य सचिव भगवान सहाय ने नायर को लिखित आदेश दिया कि अयोध्या में यथास्थिति बहाल की जाए यानी रामलला की मूर्ति को बाबरी मस्जिद से निकालकर राम चबूतरे पर रख दिया जाए। तब डीएम के के नायर ने जवाब में लिखा रामलला की मूर्तियों को गर्भगृह से निकालकर राम चबूतरे पर ले जाना संभव नहीं है. ऐसा करने से अयोध्या, फैजाबाद और आसपास के गांवों-कस्बों में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है। जिला प्रशासन के अधिकारियों, यहां तक कि पुलिस वालों की जान की गारंटी भी नहीं दी जा सकती ।

डीएम नायर से दोबारा यथास्थिति बहाल करने के लिए कहा गया तो जवाब में उन्होंने अपने इस्तीफे की पेशकश कर दी । लगे हाथों एक मशवरा भी दे दिया । नायर ने 27 दिसंबर 1949 को अपने जवाब में लिखा,विस्फोटक हालात को काबू में करने के लिए इस मसले को अदालत पर छोड़ा जा सकता है । अदालत का फैसला आने तक विवादित ढांचे के बाहर एक जालीनुमा गेट लगाया जा सकता है, जहां से श्रद्धालु रामलला के दर्शन तो कर सकें । लेकिन अंदर प्रवेश ना कर सकें ।

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मस्जिद अपनी जगह पर रही और रामलला की मूर्ति अपनी जगह

तब डीएम नायर का इस्तीफा तो यूपी की तत्कालीन गोविंद वल्लब पंत सरकार ने स्वीकार नहीं किया , लेकिन उनके सुझावों को जरुर मान लिया । इसके बाद मस्जिद अपनी जगह पर रही और रामलला की मूर्ति अपनी जगह । लेकिन, 23 दिसंबर, 1949 की घटना ने अयोध्या विवाद को बढ़ा दिया,1950 में गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद कोर्ट से रामलला की पूजा-अर्चना की विशेष अनुमति मांगी । 1959 में निर्मोही अखाड़ा बाद में सुन्नी वक्फ बोर्ड भी अदालत पहुंच गए ,

एक ओर कोर्ट में अयोध्या पर तारीख पर तारीख मिल रही थी ,1952 में ही केके नायर ने रिटायमेंट ले लिया । उनका राजनीति में पहले से झुकाव था,वो भारतीय जनसंघ के टिकट पर बहराइच से लोकसभा पहुंच गए,बाद में उनकी पत्नी शकुंतला नायर भी तीन बार कैसरगंज लोकसभा सीट से चुनी गयी..पार्टी वही भारतीय जनसंघ । जिस विचाराधारा के दम पर जनसंघ कांग्रेस का विकल्प बनना चाहती थी,उसे शुरुआती वर्षों में कोई खास कमायाबी नहीं मिली ।

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विरोधियों के सामने बड़ी ताकत बनीं इंदिरा गांधी

1971 में पाकिस्तान को युद्ध में धूल चटाने के बाद इंदिरा गांधी देश में अपने उन विरोधियों के सामने बड़ी ताकत बन गई थीं, जो खुद को राष्ट्रवादी होने का तमगा देते थे। ये वही वक्त था जब इंदिरा गांधी के खिलाफ एकजुट हो रही ताकतों को कहीं ना कहीं संघ परिवार का समर्थन मिल रहा था ।

एक ओर अयोध्या का केस अदालत में था,दूसरी ओर, भारत में वोट बैंक पॉलिटिक्स भी तेजी से बदल रही थी। इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव जनता पार्टी और जनसंघ ने इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल कर दिया,वो साल था 1977 का,आजादी के बाद पहली बार कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बेदखल हुई..लेकिन, आपसी मतभेद और कुर्सी के लिए खींचतान के बीच जनता पार्टी की सरकार ज्यादा दिन नहीं चल पायी । इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी के बाद संघ परिवार ने मंथन शुरू किया कि अगले चुनाव से पहले कैसे हिंदुओं को राजनीतिक रूप से एकजुट किया जाए।

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इस बीच एक बड़ी घटना घटी,बात 1981 की है,तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में सामूहिक धर्मान्तरण ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया , सैकड़ों दलितों को सरेआम मुसलमान बनाया गया। तब प्रधानमंत्री की कुर्सी पर इंदिरा गांधी थी। इस घटना के बाद साल 1982 में विश्व हिंदू परिषद ने संस्कृति रक्षा अभियान शुरू किया,कहा जाता है कि उस दौर में VHP नेताओं के साथ इंदिरा गांधी की कई गोपनीय बैठकें हुईं,अयोध्या धीरे-धीरे राजनीति के केंद्र में आने लगी । मैं अयोध्या हूं में आज बस इतना हीं , अगली किस्त में बात होगी – बाबरी मस्जिद का ताला खुलने से सदियों से खड़े ढांचे को गिराए जाने तक ।

First published on: Jul 12, 2026 05:31 PM

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Anurradha Prasad

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