ईरान और अमेरिका के बीच हुए शांति समझौते के बीच फ्रांस का ऐतिहासिक 'वर्साय पैलेस' एक बार फिर वैश्विक राजनीति के सेंटर में आ गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन के बीच हाल ही में हुए समझौते (MoU) ने दुनिया का ध्यान खींचा है. राष्ट्रपति ट्रंप और उनके समर्थकों के लिए यह एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी हो सकती है, लेकिन इतिहास के जानकार इसे एक अलग नजरिए से देख रहे हैं. इस समझौते की तुलना 1919 की 'वर्साय की संधि' से की जा रही है, जिसे दूसरा विश्व युद्ध का कारण माना जाता है.
क्या थी 1919 की 'वर्साय की संधि'?
प्रथम विश्व युद्ध खत्म होने के बाद साल 1919 में तैयार की गई वर्साय की संधि इतिहास में शांति समझौते से ज्यादा एक बड़े टकराव की बुनियाद के तौर पर दर्ज है. विजेता राष्ट्रों द्वारा जर्मनी पर थोपी गई इस बेहद सख्त संधि के तहत उसे न केवल युद्ध भड़काने का दोषी ठहराया गया, बल्कि उसकी 26 हजार वर्ग मील से अधिक जमीन और विदेशी उपनिवेश भी छीन लिए गए. भारी-भरकम आर्थिक हर्जाने और सैन्य क्षमता को सीमित किए जाने जैसी शर्तों का जब जर्मन प्रतिनिधियों ने विरोध किया, तो उन्हें दोबारा हमले की चेतावनी देकर दस्तखत करने पर मजबूर किया गया.
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इस चौतरफा आर्थिक और मानसिक उत्पीड़न ने जर्मन जनता के भीतर गहरे असंतोष और प्रतिशोध की भावना को जन्म दिया, जिसका फायदा उठाकर आगे चलकर एडोल्फ हिटलर ने सत्ता हासिल की। हिटलर ने इस संधि की शर्तों को धोखा बताते हुए देश का तेजी से सैन्यीकरण किया, जिसने आखिरकार सिर्फ दो दशक बाद दूसरे विश्व युद्ध का भीषण रूप ले लिया और दुनिया को 7 से 8 करोड़ लोगों की मौत के भयानक गर्त में धकेल दिया.
ट्रंप सरकार मान रही अपनी बड़ी जीत
ईरान के साथ हुए समझौते का समय अमेरिकी राजनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है. राष्ट्रपति ट्रंप अपने 80वें जन्मदिन के मौके पर इस समझौते को एक बड़ी जीत के रूप में पेश कर रहे हैं. अमेरिका आगामी 4 जुलाई को अपनी आजादी की 250वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है और नवंबर में देश में मिड-टर्म इलेक्शन भी होने हैं. ऐसे में ट्रंप प्रशासन इस समझौते के जरिए घरेलू स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है.
यह भी पढ़ें: US-ईरान शांति वार्ता को बड़ा झटका, वेंस का स्विट्जरलैंड दौरा हुआ रद्द
जमीनी हकीकत काफी अलग
हालांकि, इस कूटनीतिक जीत के बीच जमीनी हकीकत काफी अलग है. इस समझौते के बावजूद लेबनान पर इजरायल के हमले लगातार जारी हैं. इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का मानना है कि ईरान की परमाणु एंबिशन्स इजराइल के अस्तित्व के लिए अब भी एक बड़ा खतरा हैं. इजरायली एनालसिस इस समझौते को ईरान के सामने अमेरिका के आत्मसमर्पण के रूप में देख रहे हैं, क्योंकि इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह से रोकने का कोई ठोस प्रावधान नहीं दिख रहा है.
क्या मिडिल ईस्ट का ये स्थायी समझौता?
बड़ा सवाल यह है कि क्या यह समझौता मिडिल ईस्ट के दशकों पुराने संकट का स्थायी समाधान है? वर्साय की संधि की ही तरह, यह समझौता भी तात्कालिक तौर पर तनाव को कम कर सकता है और बाजार को राहत दे सकता है, लेकिन यह इस क्षेत्र के बुनियादी टकरावों का कोई स्थायी समाधान अभी भी नहीं निकला है. इतिहास गवाह है कि जो समझौते बुनियादी समस्याओं को अनसुलझा छोड़ देते हैं, वे अक्सर बड़े युद्ध की वजह बनते हैं. ट्रंप भले ही अपनी इस कामयाबी का जश्न मना रहे हों, लेकिन मिडिल ईस्ट में गिरते बम इस बात का संकेत हैं कि कागजों पर दस्तखत होने से युद्ध इतनी आसानी से खत्म नहीं होते.
ईरान और अमेरिका के बीच हुए शांति समझौते के बीच फ्रांस का ऐतिहासिक ‘वर्साय पैलेस’ एक बार फिर वैश्विक राजनीति के सेंटर में आ गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन के बीच हाल ही में हुए समझौते (MoU) ने दुनिया का ध्यान खींचा है. राष्ट्रपति ट्रंप और उनके समर्थकों के लिए यह एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी हो सकती है, लेकिन इतिहास के जानकार इसे एक अलग नजरिए से देख रहे हैं. इस समझौते की तुलना 1919 की ‘वर्साय की संधि’ से की जा रही है, जिसे दूसरा विश्व युद्ध का कारण माना जाता है.
क्या थी 1919 की ‘वर्साय की संधि’?
प्रथम विश्व युद्ध खत्म होने के बाद साल 1919 में तैयार की गई वर्साय की संधि इतिहास में शांति समझौते से ज्यादा एक बड़े टकराव की बुनियाद के तौर पर दर्ज है. विजेता राष्ट्रों द्वारा जर्मनी पर थोपी गई इस बेहद सख्त संधि के तहत उसे न केवल युद्ध भड़काने का दोषी ठहराया गया, बल्कि उसकी 26 हजार वर्ग मील से अधिक जमीन और विदेशी उपनिवेश भी छीन लिए गए. भारी-भरकम आर्थिक हर्जाने और सैन्य क्षमता को सीमित किए जाने जैसी शर्तों का जब जर्मन प्रतिनिधियों ने विरोध किया, तो उन्हें दोबारा हमले की चेतावनी देकर दस्तखत करने पर मजबूर किया गया.
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इस चौतरफा आर्थिक और मानसिक उत्पीड़न ने जर्मन जनता के भीतर गहरे असंतोष और प्रतिशोध की भावना को जन्म दिया, जिसका फायदा उठाकर आगे चलकर एडोल्फ हिटलर ने सत्ता हासिल की। हिटलर ने इस संधि की शर्तों को धोखा बताते हुए देश का तेजी से सैन्यीकरण किया, जिसने आखिरकार सिर्फ दो दशक बाद दूसरे विश्व युद्ध का भीषण रूप ले लिया और दुनिया को 7 से 8 करोड़ लोगों की मौत के भयानक गर्त में धकेल दिया.
ट्रंप सरकार मान रही अपनी बड़ी जीत
ईरान के साथ हुए समझौते का समय अमेरिकी राजनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है. राष्ट्रपति ट्रंप अपने 80वें जन्मदिन के मौके पर इस समझौते को एक बड़ी जीत के रूप में पेश कर रहे हैं. अमेरिका आगामी 4 जुलाई को अपनी आजादी की 250वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है और नवंबर में देश में मिड-टर्म इलेक्शन भी होने हैं. ऐसे में ट्रंप प्रशासन इस समझौते के जरिए घरेलू स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है.
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जमीनी हकीकत काफी अलग
हालांकि, इस कूटनीतिक जीत के बीच जमीनी हकीकत काफी अलग है. इस समझौते के बावजूद लेबनान पर इजरायल के हमले लगातार जारी हैं. इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का मानना है कि ईरान की परमाणु एंबिशन्स इजराइल के अस्तित्व के लिए अब भी एक बड़ा खतरा हैं. इजरायली एनालसिस इस समझौते को ईरान के सामने अमेरिका के आत्मसमर्पण के रूप में देख रहे हैं, क्योंकि इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह से रोकने का कोई ठोस प्रावधान नहीं दिख रहा है.
क्या मिडिल ईस्ट का ये स्थायी समझौता?
बड़ा सवाल यह है कि क्या यह समझौता मिडिल ईस्ट के दशकों पुराने संकट का स्थायी समाधान है? वर्साय की संधि की ही तरह, यह समझौता भी तात्कालिक तौर पर तनाव को कम कर सकता है और बाजार को राहत दे सकता है, लेकिन यह इस क्षेत्र के बुनियादी टकरावों का कोई स्थायी समाधान अभी भी नहीं निकला है. इतिहास गवाह है कि जो समझौते बुनियादी समस्याओं को अनसुलझा छोड़ देते हैं, वे अक्सर बड़े युद्ध की वजह बनते हैं. ट्रंप भले ही अपनी इस कामयाबी का जश्न मना रहे हों, लेकिन मिडिल ईस्ट में गिरते बम इस बात का संकेत हैं कि कागजों पर दस्तखत होने से युद्ध इतनी आसानी से खत्म नहीं होते.