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PoK में ‘मुनीर का नरसंहार’! क्या है 12 रिजर्व सीटों का विवाद, जिसकी वजह से गई 27 प्रदर्शनकारियों की जान; 200 घायल

अक्टूबर 2025 में सरकारी और JAAC के बीच हुए 'मुजफ्फराबाद समझौते' ने कुछ समय के लिए विवाद को शांत कर दिया था, उस समझौते में सब्सिडी, मुआवजा और प्रशासनिक सुधारों के वादे किए गए थे. लेकिन JAAC का आरोप है कि जमीन पर ये वादे पूरी तरह लागू नहीं हुए.

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पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) हिंसा की आग में झुलस उठा है, यहां विधानसभा की 12 आरक्षित सीटों को लेकर चल रहे संघर्ष ने बड़े जनआंदोलन और सुरक्षा बलों के साथ हिंसक झड़प का रूप ले लिया है. स्थानीय संगठन जम्मू-कश्मीर जॉइंट आवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने लगातार इन सीटों को रद्द करने की मांग उठा रहा है. आरोप है कि ये व्यवस्थाएं स्थानीय जनता के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कमजोर कर देती हैं और बाहरी प्रभावों को बढ़ावा देती हैं. विवाद तेज होने के बाद सुरक्षा बलों के साथ झड़पों में कथित तौर पर 27 प्रदर्शनकारी मारे गए और लगभग 200 लोग घायल बताए जा रहे हैं. लोग आसिम मुनीर और शहबाज सरकार के खिलाफ भी नारेबाजी कर रहे हैं.

क्या है 12 रिजर्व सीटों का विवाद?


PoK की विधानसभा कुल 53 सदस्यीय है, जिसमें 45 सीटों पर सीधे चुनाव होते हैं और 8 सीटें महिलाओं, तकनीकी विशेषज्ञों और धार्मिक विद्वानों के लिए आरक्षित हैं. विवाद के केंद्र में आने वाली 12 सीटें इन्हीं 45 में शामिल हैं और इन्हें उन शरणार्थियों के लिए आरक्षित रखा गया है जो जम्मू और कश्मीर से पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में बस गए थे. इनमें 1947, 1965 और 1971 के संघर्षों के दौरान विस्थापित हुए परिवार भी हैं. JAAC का कहना है कि इन सीटों के कारण स्थानीय निवासियों की राजनीतिक भागीदारी सीमित रहती है और निर्णयक्षमता बाहरी समूहों के हाथ में चली जाती है.

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JAAC की मांग पर सरकार का रुख


JAAC इन 12 सीटों को समाप्त कर स्थानीय लोगों के लिए अधिक प्रतिनिधित्व और पारदर्शी चुनाव व्यवस्था की मांग कर रहा है. संगठन का तर्क है कि इन आरक्षित पदों पर चुनाव प्रक्रिया प्रभावित रहती है और लाभ कुछ विशेष परिवारों तक ही सीमित रहता है. इसके चलते लंबे समय से विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं. दूसरी ओर, सरकारी अधिकारी दावा करते रहे हैं कि कई मांगें पहले ही मान ली गयी हैं और प्रशासन सुधारों पर काम कर रहा है.

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पिछले समझौते का असर


अक्टूबर 2025 में सरकारी और JAAC के बीच हुए ‘मुजफ्फराबाद समझौते’ ने कुछ समय के लिए विवाद को शांत कर दिया था, उस समझौते में सब्सिडी, मुआवजा और प्रशासनिक सुधारों के वादे किए गए थे. लेकिन JAAC का आरोप है कि जमीन पर ये वादे पूरी तरह लागू नहीं हुए और विकास और सार्वजनिक सेवाओं में ठोस प्रगति नहीं दिखी. यह निराशा इस बार बड़े आंदोलनों और हड़तालों में बदल गई.

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First published on: Jun 09, 2026 03:34 PM

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