अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में चल रही शांति वार्ता अचानक नाकाम हो गई है. ईरान का दावा है कि जब बातचीत एक बड़े फैसले की तरफ बढ़ रही थी, तभी इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को फोन किया. इस एक कॉल के बाद अमेरिका का पूरा रुख बदल गया और चर्चा ईरान-अमेरिका शांति से हटकर इजरायल के हितों पर टिक गई. ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने आरोप लगाया कि अमेरिका मेज पर वह सब हासिल करना चाहता था जो वह युद्ध के मैदान में नहीं कर पाया. वेंस के बिना किसी समझौते के पाकिस्तान छोड़ने के बाद अब खाड़ी देशों में तनाव चरम पर पहुंच गया है.
अमेरिका की शर्तें और ईरान का इनकार
इस्लामाबाद में हुई 21 घंटे की लंबी मैराथन बैठक में अमेरिका ने कुछ ऐसी शर्तें रखीं जिन्हें ईरान ने मानने से साफ इनकार कर दिया. सूत्रों के मुताबिक वाशिंगटन चाहता था कि ईरान न केवल होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों को रास्ता दे बल्कि अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को भी पूरी तरह खत्म कर दे. जेडी वेंस ने इसे अमेरिका का “अंतिम और सबसे अच्छा प्रस्ताव” बताया था लेकिन तेहरान ने इसे अपनी संप्रभुता के खिलाफ माना. ईरान का कहना है कि वे नेक नीयती के साथ बातचीत की मेज पर आए थे लेकिन अमेरिका का अड़ियल रवैया समझौते की राह में रोड़ा बन गया. व्हाइट हाउस ने फिलहाल इन शर्तों पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है.
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कच्चे तेल की कीमतों में फिर आग?
शांति वार्ता फेल होने का सीधा असर अब पूरी दुनिया की जेब पर पड़ने वाला है. युद्ध विराम खत्म होने में अब केवल नौ दिन बचे हैं और समझौते की उम्मीद टूटने से कच्चे तेल की कीमतों में फिर उछाल आने लगा है. इससे पहले जब संघर्ष विराम हुआ था तब तेल की कीमतें गिरकर 95 डॉलर के करीब आ गई थीं लेकिन अब इनके फिर से 100 डॉलर के पार जाने का अनुमान है. होर्मुज जलडमरूमध्य से व्यापारिक जहाजों की आवाजाही पहले ही लगभग बंद है क्योंकि ईरान ने वहां ड्रोन और मिसाइलें तैनात कर रखी हैं. अगर स्थिति नहीं सुधरी तो वैश्विक ऊर्जा संकट और भी गहरा सकता है जिसका असर हर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.
अपनों के बीच ही अकेला पड़ा अमेरिका
इस कूटनीतिक विफलता ने वाशिंगटन के अपने सहयोगियों के साथ बढ़ते मतभेदों को भी उजागर कर दिया है. स्पेन और इटली जैसे देशों ने ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य अभियान के लिए अपने हवाई क्षेत्र या जमीन के इस्तेमाल की इजाजत देने से मना कर दिया है. नाटो के कई सदस्य देश भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के युद्ध में शामिल होने के दबाव का विरोध कर रहे हैं. यहां तक कि खाड़ी देशों में अमेरिका के पुराने साथी भी इस बार पीछे हटते नजर आ रहे हैं. ऐसे में अमेरिका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी अलग-थलग पड़ता दिख रहा है जबकि ईरान अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए पूरी तरह तैयार होने का दावा कर रहा है.










