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फालता से दिल्ली तक ‘ऑपरेशन सेंधमारी’: TMC में टूट की आहट, हार के बाद असंतोष और संपर्क राजनीति तेज!

फालता में दोबारा हुए चुनाव में भाजपा की बड़ी जीत के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई हलचल शुरू हो गई है. टीएमसी के भीतर सांसदों और नेताओं की नाराजगी खुलकर सामने आने लगी है. भाजपा अब चुनावी लड़ाई के साथ-साथ तृणमूल कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं से संपर्क बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है. फालता हार, संगठनात्मक फैसलों और अंदरूनी खेमेबाजी ने बंगाल की राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है.

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पश्चिम बंगाल की राजनीति में अब ‘सेंधमारी मॉडल’ खुलकर दिखाई देने लगा है. विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार और फालता सीट पर भाजपा की ऐतिहासिक जीत ने पार्टी के भीतर दबा असंतोष बाहर ला दिया है. भाजपा अब सिर्फ चुनावी लड़ाई नहीं लड़ रही, बल्कि टीएमसी के सांसदों और नेताओं के बीच पैदा हुई नाराजगी को अपने पक्ष में मोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है. फालता सीट पर तृणमूल उम्मीदवार जहांगीर खान का चुनाव मैदान छोड़ देना और उसके बाद भाजपा उम्मीदवार देवांशु पांडा की एक लाख से ज्यादा वोटों से जीत ने पार्टी कैडर को बड़ा झटका दिया है. ये सीट अभिषेक बनर्जी के डायमंड हार्बर मॉडल का हिस्सा मानी जाती थी. भाजपा अब इसे ‘टीएमसी के किले में सेंध’ के तौर पर पेश कर रही है.

क्यों नाराज हैं TMC सांसद?

टीएमसी के अंदर सबसे ज्यादा चर्चा सांसदों की नाराजगी को लेकर है. बारासात से सांसद डॉ. काकोली घोष दस्तीदार को लोकसभा में मुख्य सचेतक पद से हटाकर फिर से कल्याण बनर्जी को जिम्मेदारी दिए जाने के बाद पार्टी के भीतर असंतोष तेज हुआ है. काकोली घोष पहले ही संगठनात्मक पद से इस्तीफा देकर I-PAC की कार्यशैली और पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठा चुकी हैं. भाजपा ने इसी बीच उन्हें वाई प्लस सुरक्षा देकर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है. पार्टी सूत्रों के मुताबिक कई सांसद अब खुलकर नहीं, लेकिन ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में हैं. उनका मानना है कि चुनावी हार के बाद ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी ने आक्रामक लड़ाई छोड़ दी. फालता में तृणमूल उम्मीदवार के हटने के बाद कांग्रेस और लेफ्ट के साथ सामूहिक रणनीति नहीं बनने से भी कई नेता नाराज बताए जा रहे हैं.

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क्या है बीजेपी का प्लान?

टीएमसी के भीतर यह धारणा बन रही है कि भाजपा अब व्यक्तिगत संपर्क, सुरक्षा, राजनीतिक महत्व और भविष्य की संभावनाओं के जरिए सांसदों में सेंधमारी करने की जुगत में है. महिला सांसदों की नाराजगी की चर्चा भी तेज है. महुआ मोइत्रा और कल्याण बनर्जी विवाद के बाद जिस तरह संगठनात्मक फैसले हुए, उसने पार्टी के अंदर खेमेबाजी को और बढ़ाया है. भाजपा की रणनीति साफ मानी जा रही है- पहले चुनावी मनोबल तोड़ो, फिर संगठन के अंदर असंतोष को हवा दो. बंगाल की राजनीति में यह नया नहीं है. सत्ता के बदलते समीकरणों के साथ नेताओं का पाला बदलना यहां की राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा रहा है. फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार भाजपा उसी मॉडल को टीएमसी के खिलाफ इस्तेमाल करती दिख रही है. फिलहाल टीएमसी नेतृत्व सार्वजनिक तौर पर किसी बड़े संकट से इनकार कर रहा है. लेकिन फालता की हार, सांसदों की नाराजगी और भाजपा की सक्रियता ने इतना साफ कर दिया है कि बंगाल में अब लड़ाई सिर्फ विधानसभा की नहीं, बल्कि ‘सांसदों में सेंधमारी’ की भी शुरू हो चुकी है.

First published on: May 25, 2026 09:22 PM

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