kj.srivatsan
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राजस्थान की भजनलाल सरकार प्रदेश में कथित “लैंड जिहाद” पर रोक लगाने के लिए एक सख्त कानून लाने की तैयारी में है. प्रस्तावित कानून के तहत राज्य सरकार किसी भी संवेदनशील या तनावग्रस्त क्षेत्र को अधिकतम तीन साल के लिए “अशांत क्षेत्र” घोषित कर सकेगी. इस अवधि के दौरान संबंधित इलाके में जमीन या मकान की खरीद–फरोख्त पर कड़ी पाबंदी रहेगी और कलेक्टर की पूर्व अनुमति के बिना किसी भी तरह का संपत्ति लेन–देन अवैध और शून्य माना जाएगा.
सरकार का दावा है कि प्रदेश के कई हिस्सों में एक समुदाय विशेष के दबाव, दंगों और हिंसा की वजह से बहुसंख्यक समाज को अपनी संपत्तियां औने–पौने दामों पर बेचकर पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा. सरकार का कहना है कि यह कानून ऐसे ही लोगों की सुरक्षा के लिए लाया जा रहा है, ताकि डर के बजाय कानून प्रभावी हो सके.
भाजपा ने विधानसभा चुनावों में कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान हुए सांप्रदायिक तनाव और पलायन को बड़ा मुद्दा बनाया था. अब सरकार के दो साल पूरे होने पर इस कानून को उसी दिशा में ठोस कदम बताया जा रहा है
विधि मंत्री जोगाराम पटेल का कहना है कि जनसंख्या असंतुलन और सांप्रदायिक तनाव दंगों की वजह बनते हैं और लोग मजबूरी में अपनी संपत्ति बेचते हैं, इस कानून से उन्हें संरक्षण मिलेगा.
सरकार उदाहरण के तौर पर जयपुर का रामगंज, टोंक, मालपुरा, चंबल का डांग क्षेत्र, जोधपुर, उदयपुर, भीलवाड़ा और करौली जैसे इलाकों का हवाला दे रही है, जहां हाल के वर्षों में कर्फ्यू, इंटरनेट बंदी और तनाव की स्थिति बनी. सरकार का दावा है कि यह कानून दंगों और पलायन पर रोक लगाने में कारगर साबित होगा.
वहीं, विपक्ष ने इस प्रस्तावित कानून पर तीखा हमला बोला है. कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद डोटासरा ने इसे ‘गुजरात मॉडल की पर्ची’ बताते हुए कहा कि यह कानून संवैधानिक भाषा नहीं, बल्कि राजनीतिक एजेंडे की उपज है. विपक्ष का आरोप है कि सरकार अपनी कानून-व्यवस्था की नाकामी छिपाने के लिए पूरे इलाकों को अशांत घोषित कर नागरिकों के संपत्ति अधिकारों पर रोक लगा रही है.
कानूनी जानकार भी सवाल उठा रहे हैं कि कलेक्टर की अनुमति जैसी शर्तें मौलिक अधिकारों से टकरा सकती हैं. उल्लेखनीय है कि गुजरात में 1991 से और असम में 1995 से इसी तरह के कानून लागू है. सरकार संकेत दे चुकी है कि जनवरी 2026 के बजट सत्र से पहले इस बिल को विधानसभा में पेश किया जा सकता है. अब सवाल यही है—यह कानून सुरक्षा कवच बनेगा या लोकतांत्रिक अधिकारों की नई बहस को जन्म देगा.
दरअसल, कांग्रेस भजनलाल सरकार के डिस्टर्ब एरिया कानून को आर्टिकल 300(A) और आर्टिकल 14 के खिलाफ बता रही है. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 300 A संपत्ति के अधिकार से संबंधित है. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम 1978 में संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया गया था था. संशोधन के बाद इसे संविधान के भाग X.. में अनुच्छेद 300 A के तहत कानूनी अधिकार बना दिया गया. सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, कानून से शासित किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्य कानून की अनुमति के बिना नागरिकों से उनकी संपत्ति नहीं छीन सकता. कोर्ट ने यह भी कहा है कि कानून से संचालित कल्याणकारी सरकार होने के नाते सरकार संवैधानिक सीमा से परे नहीं जा सकती.
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