Arpit Pandey
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Rajasthan Politics: केजी श्रीवास्तव। राजस्थान में जहां अशोक गहलोत बतौर सीएम कांग्रेस और अपनी सरकार की योजनाओं को लेकर चुनावी मोड में आ चुके हैं, तो वहीं नाराज सचिन पायलट अपनी अलग ही उड़ान पर हैं। इन दोनों के बीच सीएम की कुर्सी को लेकर चल रही अदावत के चलते अब राजस्थान कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता ही खेमेबाजी में बंट कर आपस में उलझे हुए हैं।
मनमुटाव भी इस तरह की ना तो संगटन अपनी पूरी ताकत के साथ सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचा पा रहा है और ना ही पार्टी एकजुट दिखाई दे रही है। ऊपर से आये दिन दोनों ही गुटों के समर्थकों की हाथापाई और आपसी खींचतान चुनावी साल में पार्टी के लिए चिंता का सबसे बड़ा कारण बनी हुई है।
हाल ही में अजमेर से एक वीडियो सामने आया था। जिसमें सीएम अशोक गहलोत और सचिन पायलट के समर्थक आपस में झगड़ते हुए नजर आए थे। ऐसा नजारा अकेले अजमेर से ही नहीं बल्कि राजस्थान में लगभग हर जिले में कांग्रेस की सभाओं में आम हो चुका है। वह भी उस समय जब राजस्थान में सरकार रिपीट करवाने के लिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बजट में घोषणाओं के अंबार लगाते हुए 19 नए जिले, 25 लाख तक का फ्री इलाज, 500 रुपए में गरीबों को गैस सिलेंडर, महिलाओं को स्मार्टफोन, बुजुर्गों को 1000 रुपए पेंशन, किसानों और घरेलू उपभोक्ताओं को फ्री बिजली जैसी कई ऐसी घोषणाएं की हैं। जिनके दम पर कांग्रेस को चुनावी मैदान में उतरना है।
सरकार के साथ साथ सत्तारूढ़ कांग्रेस के छोटे बड़े नेताओं पर पार्टी को भी इस योजनाओं को बेहतर तरीके से जनता के बीच पहुंचाने की जिम्मेदारी है। क्योकि मुकाबला मोदी-शाह के माइक्रो मैनेजमेंट से है, लेकिन जब आपस में ही कांग्रेस नेता आपस में इस तरह से सरेआम उलझते रहे तो किसकी चिंताए नहीं बढ़ेगी। पार्टी में भी सभी जानते हैं की गहलोत और पायलट के बीच सुलह किए बिना कांग्रेस के लिए चुनाव में भाजपा का मुकाबला करना आसान नहीं होगा।
इसके पीछे तर्क है कि अभी ग्रास रूट तक के कार्यकर्ताओं में यह मैसेज आम है कि इन दोनों के विवाद के कारण कांग्रेस जिला और ब्लॉक स्तर तक गुटों में बट गई है। ऐसे में नेता चाहते हैं की कार्यकर्ताओं में मैसेज दिया जाए कि कांग्रेस एकजुट है और चुनाव दोनों के नेतृत्व दमदार तरीके से लड़ा जाएगा। ताकि चुनाव में कांग्रेस मजबूत दिखे।
दरअसल, सीएम की कुर्सी को लेकर साल 2018 में हुए विधानसभा चुनावों के बाद से ही अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच मनमुटाव शुरू हो गया, समझाइश भी शुरू हुई। जिसके बाद कई मौकों पर अशोक गहलोत और सचिन पालयट साथ भी नजर आए। जिसका नतीजा भी अच्छा रहा। पिछले चार सालों में हुए 9 उपचुनावों में कांग्रेस को जीत मिली। लेकिन साल 2020 के बाद दोनों के बीच बात बिगड़ने लगी तो अदावत-बगावत में तब्दील हो गई। खुलकर एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी को इनके समर्थकों ने इसे अपने नेता के साथ-साथ खुद की प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया।
जिसका नतीजा यह हुआ है कि कांग्रेस में होने के बावजूद भी ना तो सचिन पायलट और ना ही उनके समर्थक कभी पीसीसी में नजर आये हैं। अब जब पायलट ने अपनी ही सरकार के खिलाफ पहले अनशन और फिर 5 दिनों की अजमेर से जयपुर तक की जनसंघर्ष पैदल यात्रा क्या निकाली तो मनभेद और मतभेद हाथापाई में तब्दील होने लग गये। जिसे लेकर अब बीजेपी ने भी तंज कसना शुरू कर दिया है।
हाईकमान भी यह अच्छे से जनता है की केवल गहलोत सरकार की घोषणाओं के दम पर बिना सचिन पायलट को साधे कांग्रेस का फिर से सत्ता में आना आसन नहीं होगा, क्योंकि जातिगत समीकरणों और व्यक्तिगत प्रभाव के कारण गहलोत और पायलट का कांग्रेस में अपना-अपना कद है। गहलोत की कार्यक्षमता, अनुभव और पार्टी पर पकड़ के सभी कायल है तो, वहीं युवा वर्ग को लुभाने वाले सचिन पायलट हैं। पूर्वी राजस्थान समेत कुछ क्षेत्र में पायलट का प्रभाव है, तो पश्चिमी क्षेत्रों में गहलोत की पकड़ है।
अशोक गहलोत और सचिन पायलट की इन खूबियों के बाद भी गुटबाजी ऐसी है कि भाजपा जिस स्पीड से ग्राउंड लेवल पर बूथ मैनेजमेंट की मोदी-शाह की मॉनिटरिंग में तैयारियां कर रही है। वहीं कांग्रेस कैंप अब भी अनिश्चितताओं भरा सन्नाटे सा ही माहौल है। ऐसे में जब तक बेमन से ही सही ये दोनों कांग्रेस के ‘पोस्टर बॉय’ बनकर जनता के बीच नहीं जाते तब तक कांग्रेस के पक्ष में एक मंच और और एक सुर से माहौल नहीं बनायेंगे तब तक इन दोनों की अलग-अलग सभाओं और दौरों के कारण पॉजिटिव की बजाय कार्यकर्ताओं के साथ साथ जनता के बीच भी नेगेटिव मैसेज ही जाएगा।
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