Arpit Pandey
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Sharad Yadav: आज के वक्त में एक बार चुनाव जीतना भी किसी नेता के लिए बड़ी उपलब्धि होती है, नेता अपने क्षेत्र में इतने सक्रिए रहते हैं कि वह अगला चुनाव जीतने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। क्योंकि सियासत में जनता भी अब समझदार हो गई हैं। लेकिन सोचिए अगर कोई नेता देश के तीन राज्यों की अलग-अलग लोकसभा सीटों से चुनाव जीते तो उसकी लोकप्रियता जनता के बीच कितनी होगी।
भारतीय राजनीति का यह अनोखा रिकॉर्ड मध्य प्रदेश की माटी में जन्में शरद यादव के नाम है। शरद यादव एक ऐसे राजनेता थे जिनकी स्वीकार्यता सबके बीच रही। बीती रात उनका निधन हो गया। लेकिन शरद यादव की सियासत से जुड़ा यह अनोखा किस्सा हम आपको बताते हैं।
शरद यादव का गुरुग्राम के फोर्टिस अस्पताल में 75 साल की उम्र में निधन हो गया। मध्य प्रदेश के जबलपुर से सियासत का ककहरा सीखने वाले शरद यादव का सिक्का बिहार से दिल्ली तक चलता था, जिसके चलते उनकी गिनती देश के दिग्गज समाजवादी नेताओं में होती थी। शरद यादव मूलरूप से मध्य प्रदेश के जबलपुर के रहने वाले थे, उनका जन्म एमपी के नर्मदापुरम जिले के बंदाई गांव में 1 जुलाई 1947 एक किसान परिवार में हुआ था, लेकिन वह जल्द ही संस्कारधानी यानि जबलपुर आ गए और फिर यही छात्र जीवन से राजनीति की शुरुआत की, लेकिन संस्कारधानी के इस लाल ने सियासत का ज्यादा वक्त बिहार में बिताया।
शरद यादव पढ़ाई-लिखाई में तेज थे, लेकिन इसके साथ उनकी दिलचस्पी राजनीति में भी थी, जिसके चलते उन्होंने छात्रों के हित की आवाज उठानी शुरू कर दी और फिर ग्रेजुएशन के दौरान जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में छात्र संघ के अध्यक्ष बने। जिस वक्त शरद यादव राजनीति में आ रहे थे, उस वक्त देश में समाजवादी राजनीति की धूम थी, डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों से प्रेरित नेताओं में लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार जैसे दिग्गज बिहार और यूपी से आ रहे थे, लेकिन मध्य प्रदेश का लड़का शरद यादव भी राम मनोहर लोहिया के मार्ग पर चलने की राह पर निकल चुके थे।
शरद यादव ने राजनीति में आते ही जनता के हितों की आवाज उठानी शुरू कर दी और कई आंदोलनों में भाग लिया, देखते ही देखते वह मध्य प्रदेश समाजवादी नेताओं की पंक्ति में आगे नजर आने लगे, जिसके बाद लोहिया की नजर भी शरद यादव पर पड़ी और फिर उनकी राजनीति में चमक आने लगी। शरद यादव के नाम एक अनोखा और अद्भुत रिकॉर्ड हैं वह मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार से लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं, जो अपने आप में एक बड़ा रिकॉर्ड हैं।
शरद यादव राजनीति में तो 1971 से ही सक्रिए हो चुके थे, समाजवादी नेताओं में मुलायम सिंह यादव, एचडी देवगौड़ा, लालू यादव और गुरुदास दासगुप्ता जैसे दिग्गजों के बीच उनका नाम सबसे ऊपर रखा जाता था, शरद यादव पहली बार 1974 में जबलपुर से लोकसभा सांसद चुने गए, खास बात यह है कि उस वक्त उनकी उम्र महज 27 साल थी, तब शरद यादव और रामविलास पासवान देश के सबसे युवा सांसद हुआ करते थे। 1977 में भी वह जबलपुर से दोबारा चुनाव जीते। 1986 में वह देश के उच्च सदन राज्यसभा पहुंचे।
राजनीति में शरद यादव के नाम का सिक्का अब चलने लगा था, एक ऐसा नेता जिसकी सियासत दूसरे नेताओं से अलग थी, जो सबकी आवाज उठाने के लिए तैयार रहता था, ऐसे 1989 में शरद यादव ने देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की राजनीति तरफ रुख किया। वह उत्तर प्रदेश की बदायूं लोकसभा सीट से मैदान में उतरे और जनता ने उन्हें लोकसभा भेजा। तीसरी बार लोकसभा चुनाव जीतने के बाद शरद यादव केंद्र सरकार में पहली बार मंत्री बने।
शरद यादव राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी थे, 1991 में वह उत्तर प्रदेश से बिहार पहुंचे और सबसे ज्यादा वक्त तक शरद यादव ने बिहार में ही राजनीति की, 1991 से 2014 तक शरद यादव बिहार में ही सियासत करते रहे। वह 1991 में बिहार की मधेपुरा सीट से लोकसभा सांसद चुने गए, जहां से वह 4 बार लोकसभा का चुनाव जीते। इस तरह शरद यादव ने देश के तीन राज्यों की अलग-अलग लोकसभा सीटों से चुनाव जीतने का रिकॉर्ड बनाया। 1995 में शरद यादव को जनता दल का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया।
साल 1999 का लोकसभा चुनाव अपने आप में अहम था, क्योंकि वर्ष 1999 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने लालू यादव को शिकस्त दी थी. 1998 में उन्होंने जनता दल यूनाइटेड पार्टी बनाई. इसके बाद 2004 में दूसरी बार राज्यसभा पहुंचे. जनता दल दो फाड़ हो चुका था। जहां एक गुट की अगुआई देश के पूर्व पीए एचडी देवेगौड़ा (जनता दल सेक्यूलर) के पास थी, तो दूसरे गुट यानि जनता दल (यूनाइटेड) की कमान शरद यादव के पास थी। जनता दल (यूनाइटेड) ने शरद यादव के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ने का मन बनाया।
शरद यादव खुद बिहार की मधेपुरा सीट से मैदान में थे, लेकिन उनके सामने उस वक्त बिहार के सबसे दिग्गज नेता लालू प्रसाद यादव थे, लेकिन ये मध्य प्रदेश बेटे का ही कमाल था कि उनकी स्वीकार्यता देशभर में थी, शरद यादव ने बिहार में जब लालू यादव की लोकप्रियता शिखर पर थी तब उन्हें सियासी पटखनी दी, यानि लालू को भी चुनाव हरा दिया। जिसके बाद उनका नाम पूरे देश में गूंज उठा।
समाजवाद के पुरोधा शरद यादव 75 साल की उम्र में अंतिम सांस ली हैं, उनका अंतिम संस्कार 14 जनवरी को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद स्थित उनके पैतृक गांव बंदाई में होगा, इससे पहले 13 जनवरी को उनके पार्थिव शरीर को सुबह 10 बजे से अंतिम दर्शन के लिए उनके दिल्ली स्थित आवास में रखा गया है।
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