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न कोई शोर, न फेयरवेल मैच! क्या सिस्टम की बलि चढ़ गए गाबा का घमंड तोड़ने वाले अजिंक्य रहाणे?

नाम का मतलब भले ही 'अजेय' हो लेकिन अजिंक्य रहाणे की असली ताकत, मैदान के नतीजों से बढ़कर उनका साफ-सुथरा खेल और कभी हार न मानने वाला जज्बा रहा. इंटरनेशनल क्रिकेट के सभी फॉर्मेट्स को अलविदा कहने वाले रहाणे ने कभी पब्लिसिटी के लिए शोर नहीं मचाया. एक खेल पत्रकार के रूप में उनके पूरे करियर को बहुत करीब से देखने के बाद मेरी राय यही है कि कठिन पिचों पर टीम की ढाल बनने से लेकर ऑस्ट्रेलिया में ऐतिहासिक जीत दिलाने तक, रहाणे की कहानी भारतीय क्रिकेट के सबसे शांत और खूबसूरत पन्नों में हमेशा जिंदा रहेगी.

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बचपन में स्कूल की किताबों में एक शब्द पढ़ा था… ‘अजिंक्य’! टीचर यानी वो जिसे कोई हरा न सके. भारतीय क्रिकेट में फैंस ने इस नाम को एक खिलाड़ी के रूप में मैदान पर उतरते देखा. लेकिन 30 जुलाई 2026 के दिन जब अजिंक्य रहाणे ने क्रिकेट के हर फॉर्मेट से संन्यास का ऐलान किया, तो उन्होंने इस नाम को एक अलग ही पहचान दे दी. जब उन्होंने अपना वीडियो मैसेज शेयर किया तो उनकी भर आई आवाज़ ने हर फैन को भावुक कर दिया.

रहाणे ने कहा कि जैसे क्रिकेट में सही टाइमिंग से शॉट खेला जाता है, वैसे ही खेल से आगे बढ़ने की भी एक सही टाइमिंग होती है. दिल छू लेने वाली बात कहते हुए रहाणे ने माना कि ‘अजिंक्य’ का मतलब अजेय होता है. लेकिन क्रिकेट ने उन्हें कई बार हारना और अपनी गलतियों से सीखना सिखाया. वे मैदान पर हारे, गलतियां भी हुईं लेकिन फैंस के दिलों में वे कभी नहीं हारे. बिना किसी शो-ऑफ के लिखी गई उनकी यह विदाई सीधी दिल में उतर गई.

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चमक-धमक से दूर रहाणे का अलग था अंदाज

अहमदनगर के एक छोटे से शहर से निकलकर मुंबई के कड़े क्रिकेट कल्चर में ढले रहाणे कभी सुर्खियों में रहने की रेस में नहीं दौड़े. एमएस धोनी जैसा ठंडा दिमाग और राहुल द्रविड़ जैसी सब्र की दीवार उनकी पहचान बन गई. मुझे याद है 2008 से 2011 का वो दौर जब आईपीएल की शुरूआत के बाद भारतीय क्रिकेट तेज़ी से बदल रहा था. बल्लेबाज़ों के बीच लगभग हर बॉल पर चौका-छक्का मारने और विरोधी क्रिकेटर्स के खिलाफ अग्रेशन दिखाने का क्रेज बढ़ रहा था.

उसी दौर में भी रहाणे ने अपने पुराने क्लासिक स्टाइल और अनुशासन का साथ कभी नहीं छोड़ा. ऑफ स्टंप के बाहर जाती मुश्किल गेंदों के साथ-साथ असमान उछाल लेती गेंदों को शांत दिमाग से डिफेंस करना उनकी सबसे बड़ी खूबी थी. टीम जीते या हारे उनका रवैया हमेशा एक जैसा रहा. यही वजह है कि क्रिकेट के फैंस से लेकर विरोधी टीम के क्रिकेटर्स भी उन्हें हमेशा ‘जेंटलमैन’ मानकर ही याद रखेंगे.

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टीम इंडिया के बड़े संकटमोचक थे रहाणे

सच कहूं तो रहाणे कभी आसान मौकों के खिलाड़ी रहे ही नहीं. जब-जब भारतीय टीम विदेशी पिचों पर फंसी, अजिंक्य ने अपने नाम के अनुरूप चट्टान बनकर खड़े होने का काम किया. इंग्लैंड की स्विंग होती पिचें हों, साउथ अफ्रीका का बाउंस हो या ऑस्ट्रेलिया की तेज गेंदबाजी, रहाणे की क्लास ऐसे ही मौकों पर सबसे ज्यादा निखरकर आती थी. खासतौर से विराट कोहली और चेतेश्वर पुजारा के साथ खेलते हुए वो गेंदबाजों को थकाते थे. उनकी अच्छी गेंदों को सम्मान देते थे और फिर क्रीज पर सेट होकर अपनी स्टाइल में रन बनाते थे. 2014 में इंग्लैंड के खिलाफ लॉर्ड्स में टेस्ट शतक से लेकर 2020 की मेलबर्न टेस्ट की यादगार शतकीय पारियों तक, रहाणे ने बार-बार साबित किया कि जब टीम पर संकट आता था तो वो संकटमोचक बनने के लिए तैयार रहते थे.

फैंस ने दिया था मेलबर्न के महाराज का नाम!

एक क्रिकेटर के तौर पर अगर किसी खिलाड़ी का करियर रहाणे जितना लंबा और उपलब्धियों से भरा हो, तो यकीनन इस बात का चुनाव करना मुश्किल होगा. शायद रहाणे के करियर की भी सबसे बड़ी उपलब्धि चुनना आसान नहीं है. लेकिन मेरी नज़र में कोविड-19 की महामारी के दौर में साल 2020-21 का टीम इंडिया का ऑस्ट्रेलिया दौरा हमेशा याद रखा जाएगा. एडिलेड टेस्ट में पूरी टीम महज 36 रन पर ऑलआउट हो गई थी.

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सीरीज़ के लिए चुने गए रेगुलर कप्तान विराट कोहली पैटरनिटी लीव लेकर बीच दौरे पर घर लौट गए थे, टीम का मनोबल पूरी तरह टूट चुका था. ऐसे मुश्किल दौर में रहाणे ने टीम की कप्तानी संभाली. उन्होंने बिना किसी शोर-शराबे के बिखरी हुई टीम को एक साथ जोड़ा और मेलबर्न में कप्तानी शतक जड़कर टीम की वापसी कराई. जिसके बाद गाबा के मैदान पर ऑस्ट्रेलिया का 32 साल पुराना घमंड तोड़कर 2-1 से सीरीज जीत ली. एक कप्तान के तौर पर रहाणे का रिकॉर्ड ऐसा रहा कि वे कभी कोई टेस्ट सीरीज नहीं हारे, और यही बात उन्हें इतिहास के सबसे खास कप्तानों की लिस्ट में खड़ा करती है.

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करियर में जुड़ सकते थे कुछ और यादगार लम्हे?

85 टेस्ट, 90 वनडे और 20 टी-20 में 8,000 से ज्यादा इंटरनेशनल रन बनाना किसी भी खिलाड़ी के लिए सपने जैसा है. लेकिन रहाणे की काबिलियत देखकर यह मलाल जरूर रहता है कि क्या वे 100 से ज्यादा टेस्ट नहीं खेल सकते थे ? बीते 10 सालों में भारतीय क्रिकेट ने कई सिलेक्शन कमेटियां देखीं, जिन्होंने कई चौंकाने वाले फैसले भी लिए. यहां मुझे लगता है कि मॉडर्न क्रिकेट के तेजी से बदलते ट्रेंड्स और हर बॉल पर रन बनाने के प्रेशर ने उनकी क्लासिक स्टाइल पर असर डाला.

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यही वजह रही कि पहले वो व्हाइट बॉल क्रिकेट से बाहर हुए. फिर धीरे-धीरे टेस्ट में भी बड़ी पारियां न खेल पाने की वजह से टीम मैनेजमेंट की पहली पसंद नहीं रहे. पीछे मुढ़कर देखा जाए तो ऐसा लगता है कि अगर सिस्टम का थोड़ा और भरोसा उन्हें मिलता तो वो टीम इंडिया के मिडिल ऑर्डर को कुछ और सालों तक मजबूती दे सकते थे.

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मैदान से दूर होकर भी फैंस के पास रहेंगे रहाणे

इंटरनेशनल क्रिकेट से अब बतौर बल्लेबाज़ अजिंक्य रहाणे का सफर पूरा हो गया है. लेकिन अच्छी बात ये है कि क्रिकेट से उनका रिश्ता कभी खत्म नहीं हो सकता. हाल ही में उन्होंने इंग्लैंड में ‘द हंड्रेड’ टूर्नामेंट से कमेंट्री और मेंटरशिप की अपनी नई इनिंग्स शुरू की है. अपने विदाई मैसेज में भी उन्होंने कहा कि वे इस खेल से सीखी बातों को नई जनरेशन के साथ शेयर करते रहेंगे. यानी क्रिकेट लवर्स उन्हें आगे भी अलग अंदाज में देखते रहेंगे. कभी कमेंट्री बॉक्स से मैच का हाल सुनाते हुए तो कभी डगआउट से यंग प्लेयर्स को गाइड करते हुए.

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कौन जाने कि अगले आईपीएल सीज़न-20 में अजिंक्या रहाणे किसी टीम के साथ बतौर कोच भी जुड़े हुए दिखाई दें. कुल मिलाकर एक बात डंके की चोट पर दावे के साथ कह सकता हूं कि अजिंक्य रहाणे का नाम जब भी लिया जाएगा तो बात सिर्फ उनके रनों, शतकों या स्लिप में पकड़े गए शानदार कैचों की नहीं होगी. वे याद किए जाएंगे अपनी उस सोच के लिए, जिसमें उन्होंने हमेशा अपने से ऊपर टीम और देश को रखा. जहां दूसरे खिलाड़ी अपने तेवरों और सेलिब्रिटी वाले अंदाज से छाए रहते थे तब रहाणे उस शांत सितारे की तरह चमकते रहे जो बिना किसी ड्रामे के अपना काम ईमानदारी से करता है.

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First published on: Jul 30, 2026 07:21 PM

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