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तमिलनाडु के तट पर स्थित भारत के सबसे सुरक्षित और प्रतिष्ठित वैज्ञानिक केंद्रों में से एक, कलपक्कम से एक ऐसी खबर आई है जिसने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों को हैरान और रोमांचित कर दिया है. 26 जून 2026 को भारत के परमाणु ऊर्जा विभाग ने इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र में दुनिया के पहले ऐसे हाइड्रोजन उत्पादन संयंत्र का उद्घाटन किया है, जो बिजली से नहीं बल्कि सीधे परमाणु रिएक्टर की गर्मी से पानी को तोड़कर हाइड्रोजन निकालता है.

अब तक दुनिया का कोई भी देश इस तकनीक को एक चालू परमाणु रिएक्टर के साथ जोड़ने में कामयाब नहीं हो पाया था. भारत का यह प्रयास क्लीन फ्यूल की दिशा में एक बहुत बड़ा मील का पत्थर साबित होने वाला है.

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कलपक्कम में भारत ने क्या हासिल किया?

आमतौर पर आज दुनिया में जितना भी क्लीन हाइड्रोजन बनाया जाता है, वह ‘इलेक्ट्रोलाइजर्स’ के जरिए बनता है, जिसमें पानी से बिजली गुजारकर हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को अलग किया जाता है. इस प्रक्रिया में बहुत ज्यादा बिजली खर्च होती है और यह बेहद खर्चीली है.

लेकिन कलपक्कम का यह प्लांट सीधे परमाणु रिएक्टर से निकलने वाली ‘प्रोसेस हीट’ का इस्तेमाल करता है. यह एक पायलट प्रोजेक्ट है, जिसका मकसद टन के हिसाब से ईंधन बनाना नहीं, बल्कि दुनिया को यह साबित करके दिखाना है कि यह तकनीक जमीन पर पूरी तरह काम करती है.

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भारत के लिए क्यों गेम-चेंजर है यह ‘न्यूक्लियर हाइड्रोजन’?

सूरज डूब जाता है और हवाएं थम जाती हैं, जिससे सोलर और विंड एनर्जी में उतार-चढ़ाव आता है, लेकिन एक परमाणु रिएक्टर चौबीसों घंटे लगातार चलता रहता है. इसलिए इस तकनीक से लगातार और बिना रुके हाइड्रोजन का उत्पादन किया जा सकता है. यह तकनीक भारत के ‘हार्ड-टू-अबेट’ सेक्टर्स (जैसे स्टील इंडस्ट्री, फर्टिलाइजर और ऑयल रिफाइनरी), जो सौर ऊर्जा या सामान्य बैटरी पर नहीं चल सकते, उनके लिए गेम-चेंजर साबित होगी.

First published on: Jun 29, 2026 06:52 PM

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