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Religion

Shani Puja: यहां काले नहीं ‘भगवा’ रंग में दिखते हैं शनिदेव, पिंडी रूप में होती है पूजा, दर्शन मात्र से साढ़ेसाती-ढैय्या से मिलती है मुक्ति

Shani Puja: मध्य प्रदेश के इस प्राचीन नगर के क्षिप्रा नदी तट पर स्थित प्राचीन शनि मंदिर अपने अनोखे पिंडी रूप और भगवा रंग की मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है. यहां दर्शन और पूजा मात्र से साढ़ेसाती, ढैय्या और सभी शनि दोषों से मुक्ति मिलती है.

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Written By: Shyamnandan Updated: Mar 7, 2026 22:52
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Shani Puja: महाकाल की नगरी उज्जैन केवल शिव भक्ति के लिए ही नहीं, बल्कि शनि दोषों से मुक्ति दिलाने वाले एक अत्यंत प्राचीन और दुर्लभ मंदिर के लिए भी प्रसिद्ध है. इस शिवनगरी में क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित शनि मंदिर अपनी अनूठी परंपराओं और चमत्कारों के लिए जाना जाता है, जहां देश भर से श्रद्धालु साढ़ेसाती और ढैय्या के कष्टों को दूर करने की अर्जी लेकर आते हैं. आइए जानते हैं, इस अनोखे शनि मंदिर के बारे में जहां काले नहीं ‘भगवा’ रंग में दिखते हैं शनिदेव, पिंडी रूप में होती है पूजा और दर्शन मात्र से साढ़ेसाती-ढैय्या समेत सभी शनि दोष से मिलती है मुक्ति.

राजा विक्रमादित्य ने बनवाया था मंदिर

शिप्रा नदी के त्रिवेणी घाट के किनारे बसा यह नवग्रह शनि मंदिर लगभग 2000 साल पुराना माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण न्यायप्रिय राजा विक्रमादित्य ने करवाया था. यह स्थान इसलिए भी खास है क्योंकि यहां शनिदेव के साथ-साथ सभी नवग्रहों की मौजूदगी मानी जाती है. शनिवार को पड़ने वाली अमावस्या के दिन यहां का नजारा देखने लायक होता है, जब हजारों भक्त अपनी कुंडली के ग्रहों को शांत करने के लिए यहां अनुष्ठान करते हैं.

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यहां पिंडी और भगवा रूप में हैं शनि

आमतौर पर शनिदेव के मंदिरों में उनकी प्रतिमा काले रंग की होती है, लेकिन उज्जैन के इस मंदिर में उनकी मूर्ति का रंग भगवा है. पहली नजर में यह प्रतिमा भगवान हनुमान की तरह प्रतीत होती है. मंदिर के मुख्य गर्भगृह में शनिदेव पिंडी के रूप में स्थापित हैं, जिन पर चौबीसों घंटे तेल टपकता रहता है. शनिदेव के इस शांत और सौम्य रूप को भगवान शिव का ही एक स्वरूप माना जाता है. कहा जाता है कि यह दुनिया का इकलौता ऐसा मंदिर है जहां शनिदेव ‘बाबा’ के रूप में पूजे जाते हैं.

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चप्पल और वस्त्र छोड़ने की अनोखी परंपरा

इस मंदिर से जुड़ी एक बहुत ही रोचक और प्राचीन मान्यता है. स्थानीय लोगों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति शारीरिक या मानसिक कष्ट से बहुत अधिक परेशान है, तो वह मंदिर परिसर में ही अपने पहने हुए वस्त्र और चप्पल छोड़कर चला जाता है. माना जाता है कि ऐसा करने से व्यक्ति अपनी बीमारियां और ग्रहों की नकारात्मकता वहीं छोड़ देता है और उसे परेशानियों से तुरंत निजात मिलती है. मंदिर प्रांगण में मौजूद एक विशाल और पुराना पीपल का पेड़ भी श्रद्धा का केंद्र है, जहां धागा बांधने से भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है.

शनि दोषों से मुक्ति के लिए ‘दशा पूजन’

यदि किसी जातक पर शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या का अशुभ प्रभाव चल रहा है, तो यहां का ‘दशा पूजन’ उसके लिए रामबाण माना जाता है. भक्त दूर-दूर से इस विशेष पूजा के लिए उज्जैन पहुंचते हैं. ज्योतिषियों का मानना है कि यहां पूजा करने से शनिदेव की वक्र दृष्टि का प्रभाव खत्म होता है और जीवन में सुख-समृद्धि का संचार होता है. मंदिर की सादगी और आध्यात्मिक शांति यहां आने वाले हर श्रद्धालु को एक नई सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है.

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.

First published on: Mar 07, 2026 10:52 PM

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