Puri Rath Yatra Facts: क्या आपने कभी सोचा है कि एक दिन ऐसा भी आता है, जब भगवान जगन्नाथ अपनी पत्नी माता लक्ष्मी को मनाने के लिए रसगुल्ला भेंट करते हैं? सुनने में यह कहानी किसी 'फैमिली मोमेंट' जैसी लगती है, लेकिन पुरी के जगन्नाथ मंदिर में यह परंपरा सदियों पुरानी है. ओडिशा में इसे रसगोला दिबासा यानी 'रसगुल्ला दिवस' के रूप में मनाया जाता है, जो सिर्फ मिठाई का त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान और रिश्तों की खूबसूरती का प्रतीक माना जाता है. आइए जानते हैं, जगन्नाथ मंदिर की अनोखी परंपरा क्या है और 'रसगुल्ला दिवस' पर देवी लक्ष्मी को यह खास भोग क्यों लगाया जाता है?
क्या है नीलाद्रि बीजे?
इस परंपरा की शुरुआत नीलाद्रि बीजे के दिन होती है. यही वह अवसर है, जब भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा नौ दिन की रथयात्रा पूरी करके श्रीमंदिर लौटते हैं. 27 जुलाई 2026 को भी इसी दिन महाप्रभु अपने रत्न सिंहासन पर वापस विराजमान होंगे. इसी के साथ रथयात्रा का समापन भी माना जाता है.
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खीर मोहन' परंपरा
मान्यता है कि जब भगवान जगन्नाथ अपने भाई-बहन के साथ रथयात्रा पर निकल गए, तो उन्होंने माता लक्ष्मी को साथ नहीं ले गए. इस बात से माता लक्ष्मी नाराज हो गईं. जब भगवान वापस लौटे, तो उन्होंने मंदिर के द्वार ही बंद कर दिए. तब भगवान जगन्नाथ ने उन्हें मनाने के लिए रसगुल्ला, जिसे मंदिर परंपरा में 'खीर मोहन' कहा जाता है, भेंट किया. रसगुल्ला मिलने के बाद माता लक्ष्मी का गुस्सा शांत हुआ और उन्होंने मंदिर के कपाट खोल दिए. तभी से यह अनोखी परंपरा निभाई जा रही है.
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बस एक दिन लगता है यह भोग
सबसे खास बात यह है कि पूरे साल में यही एक दिन होता है, जब भगवान जगन्नाथ को रसगुल्ले का विशेष भोग लगाया जाता है. साल 2015 से ओडिशा में इसे आधिकारिक तौर पर 'रसगुल्ला दिवस' के रूप में मनाया जाने लगा. वहीं, ओडिशा के रसगुल्ले को 2019 में GI टैग भी मिल चुका है. कई शोधों में इसका इतिहास सदियों पुराना बताया गया है.
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फिर होती है 'गोटी पहांडी' रस्म
नीलाद्रि बीजे के दिन तीनों देवताओं को रथ से उतारकर विशेष 'गोटी पहांडी' परंपरा के साथ मंदिर में प्रवेश कराया जाता है. इसके बाद लक्ष्मी-नारायण मान-भंजन की रस्म होती है. रसगुल्ला अर्पित होने के बाद ही मंदिर के द्वार खुलते हैं और भगवान अपने सिंहासन पर विराजमान होते हैं यानी यह, मान-मनौवल की रस्म है. यह परंपरा आज भी यह संदेश देती है कि रिश्तों में प्यार, सम्मान, मनुहार और माफी की मिठास हमेशा बनी रहनी चाहिए.
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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.