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Shani Stotra: शनिवार को करें ‘दशरथकृत शनि स्तोत्र’ का पाठ, शनिदेव की कृपा से दूर होंगे सभी कष्ट

Shani Stotra: शनिवार का दिन शनिदेव को प्रसन्न करने और उनकी कृपा दृष्टि पाने के लिए बहुत ही खास होता है. आप शनिवार के दिन दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ कर शनिदेव को प्रसन्न कर उनकी विशेष कृपा प्राप्त कर सकते हैं. चलिए दशरथकृत शनि स्तोत्र के पाठ करने के लाभ और नियमों के बारे में जानते हैं.

Author Edited By : Aman Maheshwari
Updated: Dec 5, 2025 19:17
Shani Stotra
(Photo- News24 GFX)

Dashrathkrit Shani Stotra: शनिदेव की कृपा-दृष्टि पाने और शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के प्रभाव को कम करने के लिए शनिवार के दिन कई खास उपाय कर सकते हैं. शनिवार का दिन इन उपायों के लिए खास होता है. शनिवार शनिदेव को समर्पित होता है. आप इस दिन खास उपाय के साथ ही शनि स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं. शनिदेव स्तोत्र का पाठ करने से आपको लाभ मिलेगा. इसका पाठ करने से कष्टों से मुक्ति मिलेगी. चलिए आपको दशरथकृत शनि स्तोत्र के पाठ के लाभ और नियमों के बारे में बताते हैं.

दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ करने के लाभ

आप दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ करते हैं तो इससे शनि की दशा, साढ़ेसाती और ढैय्या से राहत मिलती है. आपके कार्य में आने वाली रुकावट दूर होती हैं. आप कोर्ट-कचहरी के मामलों में फंसे हुए हैं तो इसकी बाधाओं से मुक्ति मिलती है.

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दशरथकृत शनि स्तोत्र पाठ के नियम

आपको दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ करने के लिए शनिवार के दिन स्नान आदि कर साफ कपड़े पहनें. आप काले या नीले रंग के कपड़े पहन सकते हैं. इसके बाद शनिदेव की प्रतिमा स्थापित करें. शनिदेव के समक्ष सरसों के तेल का दीपक जलाएं. शांति से बैठकर मन को शांत करें और दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ करें. इस स्तोत्र के पाठ के साथ ही ‘ॐ शं शनैश्चराय नमः’ मंत्र का 108 बार जाप करें.

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दशरथकृत शनि स्तोत्र (Dashrathkrit Shani Stotra)

“नमः कृष्णाय नीलाय शीतिकण्ठनिभाय च ।
नमः कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नमः ।।
नमो निर्मांसदेहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदरभायकृते ।।

नमः पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णे च वै पुनः ।
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते ।।
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नमः ।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय करलिने ।।

नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते ।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च ।।
अधोदृष्टे नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते ।
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तु ते ।।

तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च ।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नमः ।।
ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मजसूनवे ।
तुष्टो ददासि वै राज्यम रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ।।

देवासुरमनुष्याश्च सिद्धविद्याधरोरगा: ।
त्वया विलोकिताः सर्वे नाशं यान्ति समूलतः ।।
प्रसादम कुरु में देव वराहोरऽहमुपागतः ।।
एवं स्तुतस्तद सौरिग्र्रहराजो महाबल:।।

डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.

First published on: Dec 05, 2025 07:17 PM

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