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Ram Mandir Dhwajarohan 2025: अयोध्या आज एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक क्षण का साक्षी बन रही है. मंगलवार 25 नवंबर 2025, विवाह पंचमी के शुभ दिन, रामलला मंदिर के 161 फीट ऊंचे शिखर पर केसरिया ध्वज फहराया जाएगा. यह सिर्फ एक ध्वजारोहण नहीं, बल्कि अयोध्या की परंपरा, इतिहास और आस्था का ऐसा संगम है जो पूरे देश को एक विशेष ऊर्जा से भर देगा.

विवाह पंचमी का दिव्य संयोग

25 नवंबर का दिन यूं ही नहीं चुना गया. इस दिन मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पड़ रही है, जिसे पूरे भारत में विवाह पंचमी के रूप में मनाया जाता है. मान्यता है कि इसी तिथि पर त्रेतायुग में भगवान राम और माता सीता का विवाह हुआ था. यह दिन प्रेम, मर्यादा, आदर्श दांपत्य और धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है. इसलिए इस तिथि पर मंदिर शिखर पर ध्वज फहराना केवल उत्सव नहीं, बल्कि दिव्य ऊर्जा की स्थापना भी है.

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प्रधानमंत्री द्वारा ध्वजारोहण

इस शुभ अवसर पर दोपहर में 11 बजकर 52 मिनट से 12 बजकर 35 मिनट तक का अभिजीत मुहूर्त निकाला गया है. यह 43 मिनट का समय अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है. इसी मध्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ध्वजारोहण करेंगे. सुबह से ही अयोध्या राम-बारात की गूंज से भरी है. शहर में उत्सव का वातावरण, भजन-कीर्तन, पुष्पवर्षा और आनंद की लहरें लगातार फैल रही हैं.

ऐसा है राम मंदिर का केसरिया ध्वज

राम मंदिर का केसरिया ध्वज केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि पूरी रामायण, सूर्यवंश की परंपरा और अयोध्या की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है. 161 फीट ऊंचे मंदिर शिखर पर स्थापित 30 फीट ऊंचे ध्वजदंड पर लहराने वाला यह ध्वज लगभग 4 किलोमीटर दूर से सहज दिखाई देता है. जब यह आकाश में लहराता है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो हजारों वर्षों का इतिहास, परंपराएं और रामायण की दिव्यता हवा की हर लहर के साथ गान करती हुई समूचे वातावरण में फैल रही हो.

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ध्वज पर अंकित धार्मिक प्रतीक

राम मंदिर का ध्वज केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि पूरी रामायण, सूर्यवंश की परंपरा और अयोध्या की सांस्कृतिक विरासत का सार है. इस ध्वज पर तीन प्रमुख धार्मिक प्रतीक अंकित हैं—सूर्य का तेजस्वी चिह्न, उसके मध्य स्थित पवित्र ‘ॐ’ और मर्यादा तथा रामराज्य का द्योतक कोविदार वृक्ष. ये तीनों प्रतीक मिलकर सूर्यवंश की गौरवगाथा, आध्यात्मिक ऊर्जा और रामायण की दिव्य परंपरा का ऐसा अद्भुत समन्वय रचते हैं जो इस ध्वज को मात्र प्रतीक नहीं, बल्कि एक जीवंत आध्यात्मिक पहचान बना देता है.

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ध्वज के प्रतीकों का महत्व

सूर्य: सूर्य, सूर्यवंशी इक्ष्वाकु वंश का प्रमुख प्रतीक है. भगवान राम इसी वंश के राजा थे. सूर्य जीवन, प्रकाश और निष्ठा का द्योतक है. ध्वज पर सूर्य का अंकन यह दर्शाता है कि मंदिर की पहचान तेजस्विता और सत्य के मार्ग पर आधारित है.

ॐ (ओंकार): ‘ॐ’ को हिंदू संस्कृति में सर्वश्रेष्ठ, शुद्धतम और परम शक्ति माना गया है. यह आध्यात्मिक ऊर्जा, मन की शांति और दिव्य कंपन का प्रतीक है.
सूर्य और ‘ॐ’ जब एक साथ रखे जाते हैं, तो वे सृष्टि, ऊर्जा और आध्यात्मिक संतुलन के मिलन को दर्शाते हैं.

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कोविदार वृक्ष: कोविदार अयोध्या का राजवृक्ष था. वाल्मीकि रामायण में इसका उल्लेख मिलता है. हरिवंश पुराण में वर्णन है कि जब भरत श्रीराम को मनाने चित्रकूट गए, तब उनके रथ पर कोविदार चिह्न वाला ध्वज लगा था. इसे देखकर लक्ष्मण ने सेना को पहचान लिया था. इसलिए राम मंदिर के ध्वज में कोविदार का स्थान रामराज्य, मर्यादा और समर्पण का प्रतीक है.

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ध्वज की बनावट और मजबूती

किसने बनाया है ध्वज{ ध्वज का निर्माण अहमदाबाद के कारीगर कश्यप मेवाड़ा और उनकी टीम ने किया है. इसे पूरी तरह हाथ से तैयार किया गया. इसमें स्वदेशी तकनीक का प्रयोग किया गया. इसे बनाने में 25 दिन लगे है. यह ध्वज अत्यंत खास पैराशूट नायलॉन फैब्रिक से बना है, जो हवा की गति 200 किमी/घंटा तक होने पर भी सुरक्षित रहता है. इसमें न फटने की क्षमता है, न ही छेद होता है. धूप और बारिश से बचाने के लिए डबल कोटेड सिंथेटिक लेयर लगाई गई है. इस ध्वज का वजन लगभग 2 से 3 किलो है. कहा जा रहा है कि लगभग 3 साल नहीं फटेगी. ध्वज की रस्सी भी विशेष रूप से तैयार की गई है. स्टेनलेस स्टील और सिंथेटिक फाइबर से बनी दृढ़ रस्सी इसे हर मौसम में सुरक्षित रखती है.

इक्ष्वाकु वंश: सूर्यवंश की गौरवगाथा

रामलला का जन्म इक्ष्वाकु वंश में हुआ, जो भारतीय परंपरा के सबसे प्राचीन और गौरवशाली राजवंशों में गिना जाता है. राजा इक्ष्वाकु सूर्यदेव के पुत्र वैवस्वत मनु के पुत्र थे. इसी वंश से राजा भगीरथ, राजा सगर, रघु, दिलीप और अंततः प्रभु श्रीराम का जन्म हुआ. यह वंश सत्य, न्याय, लोककल्याण और धर्म के पालन के लिए जाना जाता है. सूर्यवंश की इन्हीं परंपराओं को ध्वज पर उकेरे गए प्रतीकों से पुनर्जीवित किया गया है.

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ध्वज स्थापना का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

हिंदू परंपरा में मंदिर के शिखर पर ध्वज का स्थापित होना अत्यंत शुभ और पवित्र माना जाता है, क्योंकि यह संकेत देता है कि मंदिर का निर्माण पूर्ण हो चुका है, देवता की कृपा सक्रिय है और उनके निवासस्थान में दैवी ऊर्जा निरंतर प्रवाहित हो रही है. ऐसा ध्वज यह भी दर्शाता है कि मंदिर अब एक जीवंत आध्यात्मिक केंद्र के रूप में स्थापित हो चुका है. जब यह ध्वज हवा में लहराता है, तो उसे देवताओं का आशीर्वाद माना जाता है और विशेषकर अयोध्या जैसे पवित्र तीर्थ पर इसका आरोहण पूरे वातावरण को सकारात्मक कंपन, श्रद्धा और दिव्यता से भर देता है.

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ध्वज स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा में अंतर

ध्वज स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा दोनों ही पवित्र लेकिन अलग धार्मिक प्रक्रियाएं हैं, जिनका उद्देश्य मंदिर की आध्यात्मिक पूर्णता को स्थापित करना है. प्राण प्रतिष्ठा वह अनुष्ठान है जिसमें मंत्रोच्चार और वैदिक विधियों के माध्यम से मूर्ति में जीवन शक्ति का संचार किया जाता है, ताकि वह देवत्व से युक्त होकर पूजा योग्य बन सके; रामलला की प्राण प्रतिष्ठा 22 जनवरी 2024 को इसी विधि से सम्पन्न हुई थी.

इसके विपरीत, ध्वज स्थापना मंदिर के शिखर पर धर्म ध्वज का आरोहण है, जो मंदिर-निर्माण की पूर्णता, उसकी महिमा, विजय, शक्ति और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है तथा वातावरण में दैवी ऊर्जा का संचार करता है. इस प्रकार, दोनों अनुष्ठान मिलकर मंदिर की आत्मा को पूर्णता प्रदान करते हैं—एक देवता को प्रतिष्ठित करता है, जबकि दूसरा मंदिर की पहचान, उद्देश्य और आध्यात्मिक उपस्थिति को ऊँचाई देता है.

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जब हवा में फैलेगी भक्ति और ऊर्जा

ध्वज जब हवा में लहराएगा, तब उसके साथ केवल केसरिया कपड़ा नहीं, बल्कि सूर्यवंश की महिमा, ‘ॐ’ की दिव्यता, और कोविदार की मर्यादा भी उड़ान भरेगी. चारों दिशाएं सकारात्मक ऊर्जा से भर जाएंगी. भक्तों का मन श्रद्धा से भर उठेगा और अयोध्या, राम-राज्य का भाव फिर से जीवंत कर देगी.

यह सिर्फ ध्वज नहीं, एक युग का बदलाव है

विवाह पंचमी के शुभ अवसर पर राम मंदिर के शिखर पर केसरिया ध्वज का फहराया जाना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं, बल्कि एक युग के बदलाव और सनातन संस्कृति की पुनर्स्थापना का प्रतीक है. यह ध्वज अयोध्या की परंपरा, सूर्यवंश की गौरवगाथा और रामायण की दिव्यता को नई ऊँचाई पर स्थापित करता है, मानो आस्था और इतिहास दोनों ही एक साथ फिर से जीवंत हो उठे हों. आने वाली पीढ़ियों के लिए यह ध्वज एक अमर संदेश भी छोड़ जाता है कि ‘जहाँ धर्म है, वहीं विजय है.’

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है।

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First published on: Nov 25, 2025 10:55 AM

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