आम आदमी पार्टी के लिए 24 अप्रैल 2026 की तारीख किसी सियासी भूकंप से कम नहीं रही. कभी AAP के 'पोस्टर बॉय' कहे जाने वाले राघव चड्ढा ने न केवल पार्टी छोड़ी, बल्कि अपने साथ 6 अन्य राज्यसभा सांसदों को लेकर भाजपा का दामन थाम लिया. यह महज एक दलबदल नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीतिक 'सर्जिकल स्ट्राइक' है, जिसने संसद में 'AAP' के वजूद और पंजाब में उसकी सरकार के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिए हैं.
वह मोड़ जहां से रास्ते अलग हुए
इस पूरी कहानी की शुरुआत 15 दिन पहले यानी 5 अप्रैल को हुई थी. उस दिन AAP नेतृत्व ने राघव चड्ढा को राज्यसभा में पार्टी के उप-नेता के पद से हटा दिया था. पार्टी का यह फैसला चड्ढा के लिए एक साफ संकेत था कि उन्हें दरकिनार किया जा रहा है. एनडीटीवी ने सूत्रों के हवाले से लिखा है, पद से हटाए जाने के तुरंत बाद राघव चड्ढा ने सक्रियता बढ़ा दी. उन्होंने उन सांसदों से संपर्क करना शुरू किया जो पार्टी की कार्यप्रणाली या नेतृत्व से नाखुश थे. यह बगावत अचानक नहीं थी, इसके तार 2024 में केजरीवाल की गिरफ्तारी के वक्त चड्ढा की लंदन यात्रा और हालिया दिल्ली चुनाव में उनकी निष्क्रियता से जुड़े थे.
यह भी पढ़ें : राघव चड्ढा ने चला कौनसा ‘मास्टरस्ट्रोक’? जिससे खुद की बचाई सांसदी और केजरीवाल से छीनी राज्यसभा
पहले से थी प्लानिंग
रिपोर्ट में अंदरूनी सूत्रों के हवाले से लिखा गया है कि राघव चड्ढा के भाजपा में जाने की योजना काफी समय से बन रही थी. पहले इसके लिए दीवाली का समय तय किया गया था, जिसे बाद में बढ़ाकर अगस्त किया गया. मकसद था कि 2027 के पंजाब चुनाव से ठीक पहले भगवंत मान सरकार के खिलाफ माहौल बनाया जाए. लेकिन, अप्रैल में चड्ढा को पद से हटाने के 'अपमान' ने इस प्रक्रिया को फास्ट-फॉरवर्ड मोड में डाल दिया. 15 अप्रैल को जब अशोक मित्तल के ठिकानों पर ED की छापेमारी हुई, तो इसने गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले सांसदों को अपने भविष्य के प्रति असुरक्षित कर दिया, जिसे चड्ढा ने मौके के रूप में इस्तेमाल किया.
सांसदी बाचने का मास्टरस्ट्रोक
राघव चड्ढा एक चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं, और उन्होंने राजनीति में भी अपना गणित सटीक रखा. राज्यसभा में AAP के कुल 10 सांसद हैं. दलबदल विरोधी कानून के मुताबिक, अगर कोई अकेला सांसद पार्टी छोड़ता है, तो उसकी सदस्यता रद्द हो जाती है. लेकिन, अगर दो-तिहाई सदस्य एक साथ पार्टी छोड़कर किसी दूसरी पार्टी में विलय करते हैं, तो उनकी सांसदी बच जाती है.
यह भी पढ़ें : चुप्पी से लेकर BJP में एंट्री तक… कैसे और कब बिगड़े राघव चड्ढा और केजरीवाल के रिश्ते?
राज्यसभा में AAP के 10 सांसदों में से 7 का एक साथ आना इसी कानूनी दांवपेच का हिस्सा था. 70% सांसदों के साथ होने के कारण इन सांसदों की सदस्यता नहीं जाएगी. जिन्होंने AAP छोड़ी है, उनमें राघव चड्ढा, संदीप पाठक, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह, अशोक मित्तल, राजिंदर गुप्ता और विक्रम साहनी हैं.
7 में से 4 सांसद कहां हैं?
राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने तो शुक्रवार को भाजपा भी ज्वाइन कर ली. लेकिन चार दूसरे सांसद मंच पर नजर नहीं आए. रिपोर्ट्स के मुताबिक, स्वाति मालीवाल अभी पूर्वोत्तर में हैं तो हरभजन सिंह IPL में बिजी हैं. वहीं, राजिंदर गुप्ता इलाज के लिए विदेश में हैं तो विक्रम साहनी ने सेहत का हवाला दिया है. हालांकि, राघव चड्ढा ने साफ किया कि सभी 7 सांसदों के हस्ताक्षर वाला पत्र राज्यसभा सभापति को सौंपा जा चुका है.
यह भी पढ़ें : मोबाइल रिचार्ज, समोसा प्राइस, फूड डिलीवरी ब्वॉय…राघव चड्ढा ने राज्यसभा में उठाए ये मुद्दे
पंजाब 2027 पर नजर
इस टूट का सबसे बड़ा असर पंजाब की राजनीति पर पड़ेगा. बागी हुए 7 में से 6 सांसद पंजाब से हैं. यह भगवंत मान सरकार के लिए खतरे की घंटी है. भाजपा अब इन चेहरों के जरिए पंजाब में अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश करेगी.
आम आदमी पार्टी के लिए 24 अप्रैल 2026 की तारीख किसी सियासी भूकंप से कम नहीं रही. कभी AAP के ‘पोस्टर बॉय’ कहे जाने वाले राघव चड्ढा ने न केवल पार्टी छोड़ी, बल्कि अपने साथ 6 अन्य राज्यसभा सांसदों को लेकर भाजपा का दामन थाम लिया. यह महज एक दलबदल नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीतिक ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ है, जिसने संसद में ‘AAP’ के वजूद और पंजाब में उसकी सरकार के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिए हैं.
वह मोड़ जहां से रास्ते अलग हुए
इस पूरी कहानी की शुरुआत 15 दिन पहले यानी 5 अप्रैल को हुई थी. उस दिन AAP नेतृत्व ने राघव चड्ढा को राज्यसभा में पार्टी के उप-नेता के पद से हटा दिया था. पार्टी का यह फैसला चड्ढा के लिए एक साफ संकेत था कि उन्हें दरकिनार किया जा रहा है. एनडीटीवी ने सूत्रों के हवाले से लिखा है, पद से हटाए जाने के तुरंत बाद राघव चड्ढा ने सक्रियता बढ़ा दी. उन्होंने उन सांसदों से संपर्क करना शुरू किया जो पार्टी की कार्यप्रणाली या नेतृत्व से नाखुश थे. यह बगावत अचानक नहीं थी, इसके तार 2024 में केजरीवाल की गिरफ्तारी के वक्त चड्ढा की लंदन यात्रा और हालिया दिल्ली चुनाव में उनकी निष्क्रियता से जुड़े थे.
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पहले से थी प्लानिंग
रिपोर्ट में अंदरूनी सूत्रों के हवाले से लिखा गया है कि राघव चड्ढा के भाजपा में जाने की योजना काफी समय से बन रही थी. पहले इसके लिए दीवाली का समय तय किया गया था, जिसे बाद में बढ़ाकर अगस्त किया गया. मकसद था कि 2027 के पंजाब चुनाव से ठीक पहले भगवंत मान सरकार के खिलाफ माहौल बनाया जाए. लेकिन, अप्रैल में चड्ढा को पद से हटाने के ‘अपमान’ ने इस प्रक्रिया को फास्ट-फॉरवर्ड मोड में डाल दिया. 15 अप्रैल को जब अशोक मित्तल के ठिकानों पर ED की छापेमारी हुई, तो इसने गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले सांसदों को अपने भविष्य के प्रति असुरक्षित कर दिया, जिसे चड्ढा ने मौके के रूप में इस्तेमाल किया.
सांसदी बाचने का मास्टरस्ट्रोक
राघव चड्ढा एक चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं, और उन्होंने राजनीति में भी अपना गणित सटीक रखा. राज्यसभा में AAP के कुल 10 सांसद हैं. दलबदल विरोधी कानून के मुताबिक, अगर कोई अकेला सांसद पार्टी छोड़ता है, तो उसकी सदस्यता रद्द हो जाती है. लेकिन, अगर दो-तिहाई सदस्य एक साथ पार्टी छोड़कर किसी दूसरी पार्टी में विलय करते हैं, तो उनकी सांसदी बच जाती है.
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राज्यसभा में AAP के 10 सांसदों में से 7 का एक साथ आना इसी कानूनी दांवपेच का हिस्सा था. 70% सांसदों के साथ होने के कारण इन सांसदों की सदस्यता नहीं जाएगी. जिन्होंने AAP छोड़ी है, उनमें राघव चड्ढा, संदीप पाठक, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह, अशोक मित्तल, राजिंदर गुप्ता और विक्रम साहनी हैं.
7 में से 4 सांसद कहां हैं?
राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने तो शुक्रवार को भाजपा भी ज्वाइन कर ली. लेकिन चार दूसरे सांसद मंच पर नजर नहीं आए. रिपोर्ट्स के मुताबिक, स्वाति मालीवाल अभी पूर्वोत्तर में हैं तो हरभजन सिंह IPL में बिजी हैं. वहीं, राजिंदर गुप्ता इलाज के लिए विदेश में हैं तो विक्रम साहनी ने सेहत का हवाला दिया है. हालांकि, राघव चड्ढा ने साफ किया कि सभी 7 सांसदों के हस्ताक्षर वाला पत्र राज्यसभा सभापति को सौंपा जा चुका है.
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पंजाब 2027 पर नजर
इस टूट का सबसे बड़ा असर पंजाब की राजनीति पर पड़ेगा. बागी हुए 7 में से 6 सांसद पंजाब से हैं. यह भगवंत मान सरकार के लिए खतरे की घंटी है. भाजपा अब इन चेहरों के जरिए पंजाब में अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश करेगी.