Arif Khan
आरिफ खान मंसूरी को डिजिटल मीडिया में करीब 15 वर्षों का अनुभव है . वर्तमान में न्यूज24 की डिजिटल विंग में कार्यरत हैं. इससे पहले देश के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं.
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पश्चिम बंगाल विधानसभा से शुरू हुआ तृणमूल कांग्रेस (TMC) का आंतरिक घमासान अब संसद तक पहुंचता हुआ दिख रहा है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी इस समय सबसे गंभीर संकट से गुजर रही है. इंडिया टुडे ने अपनी रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से लिखा है कि टीएमसी के करीब 23 सांसद इस समय पार्टी के बागी विधायक गुट के सीधे संपर्क में हैं. ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि विधायकों की तरह पार्टी के सांसदों में भी बगावत हो सकती है.
पश्चिम बंगाल विधानसभा में ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में विधायकों के एक बड़े धड़े ने पार्टी से नाता तोड़ लिया और सदन में विपक्ष के नेता के पद पर अपना दावा ठोक दिया है. अब ठीक इसी तरह की सुगबुगाहट संसद के गलियारों में भी तेज हो गई है. सूत्रों के मुताबिक, टीएमसी के कई लोकसभा और राज्यसभा सांसद पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के काम करने के तरीके से बेहद नाराज हैं. इस असंतोष के चलते एक दर्जन से ज्यादा लोकसभा सांसद संसद में एक अलग गुट बनाने की संभावना टटोल रहे हैं. बताया जा रहा है कि पार्टी के ही एक बेहद वरिष्ठ सांसद इस पूरे बागी गुट का नेतृत्व कर रहे हैं.
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संसद में इस बगावत को अमलीजामा पहनाने के लिए नंबरों का गणित बेहद अहम है. वर्तमान में लोकसभा में टीएमसी के कुल 29 सांसद हैं. दलबदल विरोधी कानून के कड़े प्रावधानों के तहत सदन में बिना सदस्यता गंवाए एक अलग समूह के रूप में मान्यता पाने के लिए बागी गुट को कम से कम 22 सांसदों के समर्थन की जरूरत होगी. वहीं, राज्यसभा में टीएमसी के कुल 13 सदस्य हैं, जहां अलग गुट की मान्यता के लिए न्यूनतम संख्या 9 सांसदों की है.
रिपोर्ट में साथ ही लिखा गया है कि जब बागी गुट के मुखिया ऋतब्रत बनर्जी से इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने सीधे तौर पर सांसदों के शामिल होने की पुष्टि तो नहीं की, लेकिन मुस्कुराते हुए कहा, ‘आने वाले दिनों में बहुत कुछ हो सकता है’.
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इस बीच, टीएमसी के सबसे मुखर और दिग्गज राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने भी सार्वजनिक रूप से इस बात को स्वीकार किया है कि विधानसभा की यह आग अब संसद तक पहुंच सकती है. हाल के हफ्तों में पार्टी के आंतरिक कामकाज पर लगातार सवाल उठाने वाले रॉय ने कहा, ‘मैंने इतने कम समय में करीब 60 विधायकों को पार्टी छोड़ते कभी नहीं देखा. लोकसभा में भी ऐसी ही प्रतिक्रिया होने की पूरी संभावना है’.
इस संकट को देखते हुए खुद ममता बनर्जी ने मोर्चा संभाल लिया है. वे व्यक्तिगत रूप से हावड़ा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर के उन विधायकों से संपर्क साध रही हैं, जिन्हें ऋतब्रत बनर्जी के बागी खेमे की बैठकों में देखा गया था. इसके साथ ही दिल्ली में भी पार्टी को बिखरने से बचाने के लिए डैमेज-कंट्रोल की कवायद जारी है.
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दिलचस्प बात यह है कि बागी खेमे के भीतर भी ममता बनर्जी के कद को लेकर एक राय है. कई बागी विधायकों का साफ कहना है कि वे ममता बनर्जी का सम्मान करते हैं और उन्हें पार्टी की ‘सर्वोच्च नेता’ बने रहना चाहिए, उन्हें केवल एक ‘सलाहकार’ की भूमिका में सीमित करने की कोशिशें बर्दाश्त नहीं की जाएंगी.
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