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6 साल नहीं, जीवनभर का बैन लगे…सुप्रीम कोर्ट से सिफारिश, सजायाफ्ता नेताओं को लग सकता बड़ा झटका

किसी आपराधिक मामले या अन्य केस में सजा पा चुके नेताओं के चुनाव लड़ने पर बड़ा फैसला लेने की तैयारी है। एमिक्स क्यूरी ने सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट सौंप दी है। इसमें मांग की गई है कि सजा पा चुके नेताओं पर 6 साल के लिए नहीं, बल्कि आजीवन चुनाव लड़ने पर बैन लगाया जाना […]

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किसी आपराधिक मामले या अन्य केस में सजा पा चुके नेताओं के चुनाव लड़ने पर बड़ा फैसला लेने की तैयारी है। एमिक्स क्यूरी ने सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट सौंप दी है। इसमें मांग की गई है कि सजा पा चुके नेताओं पर 6 साल के लिए नहीं, बल्कि आजीवन चुनाव लड़ने पर बैन लगाया जाना चाहिए। अभी तक केस में सजा मिलने पर नेताओं की सदस्यता रद्द की जाती है और 6 साल चुनाव लड़ने पर बैन लगाया जाता है, लेकिन यह बैन जीवनभर के लिए होना चाहिए।

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एमिक्स क्यूरी ने 19वीं रिपोर्ट पेश की

मामले में सुझाव लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया को एमिक्स क्यूरी बनाया था, जिन्होंने 19वीं रिपोर्ट सबमिट की है। इसमें कहा गया है कि केन्द्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम 2003 और लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम 2013 के तहत प्रावधान है। धारा 8 के तहत इसे गंभीरता और गंभीरता के आधार पर कैटैगराइज किया गया है, लेकिन सभी मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद सिर्फ 6 साल का बैन लगाने का प्रावधान है, इसे आजीवन किया जाना चाहिए।

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प्रशासनिक अधिकारियों का उदाहरण दिया

हंसारिया का कहना है कि प्रशासनिक अधिकारी आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त पाए जाने पर नौकरी नहीं कर सकते हैं। इसी तरह के सख्त नियम नेताओं पर भी लागू होने चाहिएं। अगर वैधानिक पदों पर दोषियों को नहीं बैठाया जाता तो नेताओं पर भी यह नियम लागू होना चाहिए। नेता जनसेवक होते हैं तो उनकी छवि साफ सुथरी होनी चाहिए। उनका पवित्र होना जरूरी है, तभी वे जनता के लिए आदर्श बन पाएंगे।

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उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा केस लंबित

बता दें कि देशभर में सांसद और विधायकों के खिलाफ कोर्ट केसों की संख्या में इजाफा हुआ है। नवंबर 2022 तक कुल 5175 केस हैं। यह संख्या 2018 में 4122 थी। उत्तर प्रदेश में ऐसे केसों की संख्या सबसे ज्यादा है।उत्तर प्रदेश में नवंबर 2022 तक कुल 1377 केस लंबित हैं। दूसरे नंबर पर बिहार है, जहां 546 केस लंबित हैं। भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी, जिसमें जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8 को चुनौती दी गई थी।

First published on: Sep 15, 2023 10:18 AM

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About the Author

Khushbu Goyal

खुशबू गोयल ने कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएशन एवं एमफिल कोर्स किया है। 13 साल से डिजिटल मीडिया इंडस्ट्री से जुड़ी हूं। वर्तमान में BAG Convergence Limited के माल‍िकाना हक वाले News 24 हिंदी डिजिटल विंग से बतौर चीफ सब एडिटर जुड़ी हूं। चीफ सब एडिटर की भूमिका निभाते हुए यहां की कोर टीम का हिस्सा हूं। नेशनल, इंटरनेशनल, राजनीति, क्राइम, फीचर आदि टॉपिक कवर करती हूं। घूमने, खाने और शॉपिंग की शौकीन खुशबू को नए ट्रेंड, नई जगह और ऐडवेंचर की तलाश रहती है।

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