जब हड्डी टूट जाती है तो डॉक्टर एक्स रे की सलाह देते हैं, लेकिन एक्स रे सिर्फ हड्डियों के लिए नहीं होता. ऐसा इसलिए क्योंकि जब शरीर के अंदर किसी बीमारी या चोट का पता लगाना हो तो डॉक्टर कई तरह के इमेजिंग टेस्ट की सलाह देते हैं. हालांकि, हड्डियों में फ्रैक्चर, जोड़ से जुड़ी समस्या या छाती और फेफड़ों की कुछ परेशानियों को देखने के लिए एक्स-रे कराया जाता है. एक्स-रे में शरीर के अंदर की तस्वीर तैयार की जाती है. डॉक्टर इस तस्वीर को देखकर चोट या कुछ बदलावों की पहचान करने में मदद लेते हैं. आइए इस लेख में विस्तार से जानते हैं कि एक्स रे क्या है और इसे किन किन बीमारियों में कराया जाता है.
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हड्डी टूटने पर कराया जाता है एक्स-रे?
एक्स-रे का सबसे आम इस्तेमाल फ्रैक्चर यानी हड्डी टूटने का पता लगाने के लिए होता है. गिरने, चोट लगने या किसी घटना के बाद अगर दर्द, सूजन या अंग को हिलाने में परेशानी हो तो डॉक्टर एक्स-रे की सलाह दे सकते हैं. इसके जरिए हाथ, पैर, कलाई, टखने, कंधे और शरीर की दूसरी हड्डियों में फ्रैक्चर का टेस्ट किया जाता है.
किन समस्याओं में आता है काम?
सिर्फ फ्रैक्चर ही नहीं, एक्स-रे से हड्डियों और जोड़ों में होने वाले कुछ बदलावों का भी पता लगाने में मदद मिलती है जैसे ऑस्टियोआर्थराइटिस में जोड़ों के बीच की जगह कम होना या हड्डियों में दूसरे बदलाव दिखाई दे सकते हैं. कुछ मामलों में हड्डियों में दर्द या पुरानी चोट के असर को देखने के लिए भी एक्स-रे कराया जाता है.
फिर सीने में दर्द या सांस की परेशानी में क्यों होता है एक्स-रे?
फेफड़ों और छाती से जुड़ी कुछ समस्याओं को देखने के लिए चेस्ट एक्स रे किया जाता है. डॉक्टर खांसी, सांस लेने में परेशानी, सीने में दर्द, बुखार या किसी दूसरे लक्षण के आधार पर यह टेस्ट लिख सकते है. चेस्ट एक्स-रे से निमोनिया, फेफड़ों में इंफेक्शन, फेफड़ों के आसपास मौजूद पानी का पता लगाने में मदद मिल सकती है.
टीबी के टेस्ट में भी करना
ट्यूबरकुलोसिस की टेस्ट के दौरान भी चेस्ट एक्स-रे कराया जा सकता है. इसमें फेफड़ों में ऐसे बदलाव दिखाई दे सकते हैं जो टीबी की ओर संकेत कर सकते हैं. हालांकि, सिर्फ एक्स-रे से टीबी का पूरी तरह से पता नहीं लगाया जाता. डॉक्टर बलगम का टेस्ट भी करा सकते हैं.
क्या एक्स-रे सभी को कराया जा सकता है?
एक्स-रे जल्दी हो जाता है, इसलिए ज्यादातर डॉक्टर इसे कराने की सलाह देते हैं. इसमें आयोनाइजिंग रेडिएशन का इस्तेमाल किया जाता है. एक्स-रे की तस्वीर के हिसाब से डॉक्टर बीमारी का पता लगाता है और टेस्ट करता है. अगर बीमारी समझ नहीं आती है तो डॉक्टर सीटी स्कैन, एमआरआई, अल्ट्रासाउंड या दूसरा टेस्ट कराने की सलाह देते हैं.
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