यूनाइटेड किंगडम (UK) में अलगाव की सुगबुगाहट तेज हो गई है और स्कॉटलैंड समेत तीन देशों के अलग होने की चर्चा है. पीएम बर्नहम ने सांसदों को संबोधित करते हुए कहा कि यदि किसी नए स्कॉटिश जनमत संग्रह के पक्ष में जनता की ओर से स्पष्ट सहमति बनती है तो उनकी सरकार इसकी अनुमति देने से पीछे नहीं हटेगी. स्कॉटलैंड के नेता जॉन स्विनी ने भी साफ किया है कि जनता ही अपने भविष्य का फैसला करेगी. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि यदि स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड अलग हो जाते हैं तो अकेले इंग्लैंड की ताकत और आकार कितना रह जाएगा? अगर यूनाइटेड किंगडम बिखरा तो इंग्लैंड की जमीन, आबादी और अर्थव्यवस्था पर क्या पढ़ेगा असर?

तीन देशों के एकजुट होने की चर्चा

ब्रिटिश संसद में पीएम के इस रुख के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या ब्रिटेन के टुकड़े हो जाएंगे? यूनाइटेड किंगडम से अलगाव के लिए तीन क्षेत्रों की हलचल और एकजुटता की खबरें सामने आ रही हैं. प्रधानमंत्री का यह बयान ब्रिटिश राजनीति में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है, क्योंकि इससे पहले की सरकारें स्कॉटलैंड की आजादी के लिए किसी भी नए मतदान के विकल्प को सिरे से खारिज करती रही हैं.

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यूनाइटेड किंगडम और ग्रेट ब्रिटेन का गणित

लोग अक्सर यूनाइटेड किंगडम और ग्रेट ब्रिटेन को एक समझ लेते हैं, लेकिन इनमें थोड़ा अंतर है. यूनाइटेड किंगडम असल में चार देशों का समूह है, इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड. इनमें से इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और वेल्स मिलकर 'ग्रेट ब्रिटेन' कहलाते हैं. जब इसमें उत्तरी आयरलैंड जुड़ता है, तब यह 'यूनाइटेड किंगडम' बनता है.

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जमीन, आबादी और अर्थव्यवस्था

वर्तमान में पूरे यूनाइटेड किंगडम का क्षेत्रफल लगभग 2,42,749 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें इंग्लैंड की हिस्सेदारी करीब 54% है. यदि बाकी तीन देश अलग होते हैं तो इंग्लैंड का क्षेत्रफल घटकर 1,30,309 वर्ग किलोमीटर रह जाएगा. इंग्लैंड अपनी लगभग 46% जमीन खो देगा. इसके बावजूद इंग्लैंड का आकार ग्रीस या बांग्लादेश जैसे देशों के बराबर या उनसे बड़ा रहेगा. आबादी में भी इंग्लैंड को बड़ा झटका नहीं लगेगा. यूनाइटेड किंगडम की 6.9 करोड़ की कुल आबादी में से 84% से ज्यादा लगभग 5.8 करोड़ लोग अकेले इंग्लैंड में रहते हैं. अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर भी यूनाइटेड किंगडम की कुल जीडीपी का 85% से 90% हिस्सा अकेले इंग्लैंड से आता है. दुनिया का प्रमुख वित्तीय केंद्र 'लंदन' इंग्लैंड में ही है. विभाजन के बाद अलग हुए देशों को आर्थिक रूप से ज्यादा संघर्ष करना पड़ सकता है, जबकि इंग्लैंड दुनिया की शीर्ष 10 अर्थव्यवस्थाओं में बना रहेगा.

सेना और वीटो पावर का क्या होगा?

सैन्य रूप से यूनाइटेड किंगडम की कमान हमेशा से लंदन के हाथ में रही है. अलग होने की स्थिति में इंग्लैंड ही सेना और परमाणु शक्ति का मुख्य उत्तराधिकारी बनेगा. साथ ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में यूनाइटेड किंगडम की स्थायी 'वीटो' सीट भी सोवियत संघ के टूटने पर रूस की तर्ज पर इंग्लैंड के पास रहने की पूरी उम्मीद है.

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हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती परमाणु पनडुब्बियों की होगी, जो फिलहाल स्कॉटलैंड के 'फासलेन' बेस पर तैनात हैं. स्कॉटलैंड के अलग होने पर इंग्लैंड को अपना नेवल बेस शिफ्ट करने में भारी खर्च उठाना पड़ेगा. वैश्विक मंच पर भले ही ब्रिटेन का पुराना रुतबा थोड़ा कम हो, लेकिन इंग्लैंड अपने दम पर एक मजबूत और संपन्न राष्ट्र बना रहेगा.

जॉन स्विनी ने बताया ऐतिहासिक फैसला

स्कॉटलैंड के नेता जॉन स्विनी ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री के इस रुख का स्वागत किया है. उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पहले जहां इस मुद्दे को पूरी तरह ‘बंद’ मान लिया गया था, वहीं अब इस हकीकत को स्वीकार किया गया है कि स्कॉटलैंड के लोग ही अपना भविष्य तय करेंगे, न कि यूनाइटेड किंगडम की सरकार. जॉन स्विनी के मुताबिक, साल 2014 के बाद यह पहली बार है जब किसी ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने खुले तौर पर यह माना है कि अगर जनता का भारी समर्थन मिलता है, तो जनमत संग्रह कराया जाना चाहिए. पीएम एंडी बर्नहम के इस रुख ने उन ताकतों को नई ताकत दी है जो लंबे समय से ब्रिटेन से अलग होकर अपने स्वतंत्र अस्तित्व की मांग कर रहे हैं. आने वाले दिनों में यह फैसला यूनाइटेड किंगडम की अखंडता और राजनीति की दिशा पूरी तरह बदल सकता है.

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