भूख हड़ताल करना भारत में है कानूनी? जानिए क्या सरकार जबरन तुड़वा सकती है अनशन, क्या कहता देश का है कानून
NEET paper leak: भारत में पहले भी कई चर्चित भूख हड़तालें हुई हैं. इरोम शर्मिला को सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) के विरोध में लंबे अनशन के दौरान हिरासत में नाक के जरिए तरल आहार दिया गया था.
Written By: Akarsh Shukla|Updated: Jul 25, 2026 07:26
Edited By : Akarsh Shukla|Updated: Jul 25, 2026 07:26
Share :
---विज्ञापन---
नीट पेपर लीक के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के साथ आंदोलन में शामिल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने 26 दिनों बाद अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दी. उन्होंने केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह द्वारा 3 मांगों पर लिखित में सहमति मिलने के बाद अपना अनशन खत्म किया. सोनम वांगचुक को पिछले सप्ताह दिल्ली पुलिस ने कोर्ट का हवाला देते हुए जंतर-मंतर से उठाकर अस्पताल में भर्ती करा दिया था. वर्तमान में सोनम गुरुग्राम के मेदांता हॉस्पिटल में भर्ती है. सोनम वांगचुके का अनशन समाप्त होने के बाद लोगों के मन में कई तरह के सवाल उठ रह हैं.
सोशल मीडिया पर ऐसे दावे किए जा रहे हैं कि सरकार ने जबरन सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से उठाया और उनका अनशन तुड़वाया. हालांकि सोनम वांगचुक ने खुद एक वीडियो जारी कर बताया कि उन्होंने सरकार द्वारा तीन मांगें पूरी किए जाने के बाद ही अनशन समाप्त किया है. सोनम वांगचुक के अनशन के बाद लोग इससे जुड़े कानून के बारे में सर्च कर रहे हैं. क्या सरकार किसी का अनशन जबरन तुड़वा सकती है, इसे लेकर क्या है कानून? ऐसे कई सवाल लोग इंटरनेट पर सर्च कर रहे हैं.
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि दिल्ली हाई कोर्ट ने सोनम वांगचुक को जबरन खाना खिलाने का कोई आदेश नहीं दिया था. अदालत ने यह भी कहा था कि हर नागरिक का जीवन बहुमूल्य है और उसकी रक्षा करना राज्य की जिम्मेदारी है. आपको बता दें कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार देते हैं. हालांकि भूख हड़ताल को लेकर कोई कानून नहीं है, ये अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ा फैसला है. हालांकि अनशन पर बैठने से पहले व्यक्ति को प्रशासन को सूचित जरूर करना पड़ता है. भूख हड़ताल को लंबे समय से लोकतांत्रिक विरोध के एक महत्वपूर्ण और गंभीर प्रदर्शन के तौर पर देखा जाता रहा है.
क्या आत्महत्या मानी जाएगी भूख हड़ताल से मौत?
महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इसे अहिंसक संघर्ष का प्रभावी हथियार बनाया था. 2021 में मद्रास हाईकोर्ट ने भी स्पष्ट किया था कि केवल भूख हड़ताल पर बैठना आत्महत्या का प्रयास नहीं माना जा सकता. वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने रामलीला मैदान मामले में कहा था कि उपवास सत्याग्रह की परंपरा से जुड़ा संवैधानिक रूप से स्वीकार्य विरोध है.
संविधान का अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार भी देता है. इसी वजह से जब किसी अनशनकारी की जान पर गंभीर खतरा मंडराने लगता है, तब सरकार पूरी तरह मूकदर्शक नहीं रह सकती. 2024 में किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल के अनशन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और पंजाब सरकार को तत्काल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था, लेकिन साथ ही यह भी कहा था कि जब तक स्थिति जिंदगी और मौत की ना हो, तब तक अनशन तुड़वाने के लिए बल प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए.
अनशन तुड़वाने का कोई नियम नहीं
भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है जो हर भूख हड़ताल करने वाले व्यक्ति को जबरन खाना खिलाने की अनुमति देता हो. सुप्रीम कोर्ट ने भी इस विषय पर कोई सार्वभौमिक नियम तय नहीं किया है. अदालतें व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति, डॉक्टरों की राय, वह सरकारी हिरासत में है या नहीं और संबंधित न्यायिक आदेश जैसे पहलुओं को ध्यान में रखकर फैसला करती हैं. भारत में पहले भी कई चर्चित भूख हड़तालें हुई हैं. इरोम शर्मिला को सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) के विरोध में लंबे अनशन के दौरान हिरासत में नाक के जरिए तरल आहार दिया गया था.
नीट पेपर लीक के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के साथ आंदोलन में शामिल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने 26 दिनों बाद अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दी. उन्होंने केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह द्वारा 3 मांगों पर लिखित में सहमति मिलने के बाद अपना अनशन खत्म किया. सोनम वांगचुक को पिछले सप्ताह दिल्ली पुलिस ने कोर्ट का हवाला देते हुए जंतर-मंतर से उठाकर अस्पताल में भर्ती करा दिया था. वर्तमान में सोनम गुरुग्राम के मेदांता हॉस्पिटल में भर्ती है. सोनम वांगचुके का अनशन समाप्त होने के बाद लोगों के मन में कई तरह के सवाल उठ रह हैं.
सोशल मीडिया पर ऐसे दावे किए जा रहे हैं कि सरकार ने जबरन सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से उठाया और उनका अनशन तुड़वाया. हालांकि सोनम वांगचुक ने खुद एक वीडियो जारी कर बताया कि उन्होंने सरकार द्वारा तीन मांगें पूरी किए जाने के बाद ही अनशन समाप्त किया है. सोनम वांगचुक के अनशन के बाद लोग इससे जुड़े कानून के बारे में सर्च कर रहे हैं. क्या सरकार किसी का अनशन जबरन तुड़वा सकती है, इसे लेकर क्या है कानून? ऐसे कई सवाल लोग इंटरनेट पर सर्च कर रहे हैं.
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि दिल्ली हाई कोर्ट ने सोनम वांगचुक को जबरन खाना खिलाने का कोई आदेश नहीं दिया था. अदालत ने यह भी कहा था कि हर नागरिक का जीवन बहुमूल्य है और उसकी रक्षा करना राज्य की जिम्मेदारी है. आपको बता दें कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार देते हैं. हालांकि भूख हड़ताल को लेकर कोई कानून नहीं है, ये अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ा फैसला है. हालांकि अनशन पर बैठने से पहले व्यक्ति को प्रशासन को सूचित जरूर करना पड़ता है. भूख हड़ताल को लंबे समय से लोकतांत्रिक विरोध के एक महत्वपूर्ण और गंभीर प्रदर्शन के तौर पर देखा जाता रहा है.
---विज्ञापन---
क्या आत्महत्या मानी जाएगी भूख हड़ताल से मौत?
महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इसे अहिंसक संघर्ष का प्रभावी हथियार बनाया था. 2021 में मद्रास हाईकोर्ट ने भी स्पष्ट किया था कि केवल भूख हड़ताल पर बैठना आत्महत्या का प्रयास नहीं माना जा सकता. वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने रामलीला मैदान मामले में कहा था कि उपवास सत्याग्रह की परंपरा से जुड़ा संवैधानिक रूप से स्वीकार्य विरोध है.
संविधान का अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार भी देता है. इसी वजह से जब किसी अनशनकारी की जान पर गंभीर खतरा मंडराने लगता है, तब सरकार पूरी तरह मूकदर्शक नहीं रह सकती. 2024 में किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल के अनशन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और पंजाब सरकार को तत्काल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था, लेकिन साथ ही यह भी कहा था कि जब तक स्थिति जिंदगी और मौत की ना हो, तब तक अनशन तुड़वाने के लिए बल प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए.
अनशन तुड़वाने का कोई नियम नहीं
भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है जो हर भूख हड़ताल करने वाले व्यक्ति को जबरन खाना खिलाने की अनुमति देता हो. सुप्रीम कोर्ट ने भी इस विषय पर कोई सार्वभौमिक नियम तय नहीं किया है. अदालतें व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति, डॉक्टरों की राय, वह सरकारी हिरासत में है या नहीं और संबंधित न्यायिक आदेश जैसे पहलुओं को ध्यान में रखकर फैसला करती हैं. भारत में पहले भी कई चर्चित भूख हड़तालें हुई हैं. इरोम शर्मिला को सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) के विरोध में लंबे अनशन के दौरान हिरासत में नाक के जरिए तरल आहार दिया गया था.