Exit Poll History : क्या 4 मई को आने वाले नतीजे वही होंगे जो एग्जिट पोल के सर्वे दिखा रहे हैं? लेकिन पिछले एक दशक का इतिहास उठा कर देखें, तो एग्जिट पोल के आंकड़ों पर आंख मूंदकर भरोसा करना मुश्किल है. बंगाल से लेकर हरियाणा तक, चाहे बिहार हो, उत्तर प्रदेश या फिर देश की राजधानी दिल्ली, मतदाताओं ने हर बार सर्वेक्षकों के अनुमानों से उलट चौंकाने वाले परिणाम दिए हैं. पश्चिम बंगाल में एग्जिट पोल्स की चर्चा गलियारों में तेज हो गई है.
बंगाल में फेल होता रहा है गणित
2021 के विधानसभा चुनाव में ज्यादातर राष्ट्रीय एजेंसियों ने बंगाल में भाजपा की जीत या कांटे की टक्कर का अनुमान लगाया था. कुछ सर्वे तो ममता सरकार गिरने की भविष्यवाणी कर रहे थे, लेकिन जब नतीजे आए तो टीएमसी ने 215 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल किया. विश्लेषकों का मानना है कि सर्वे एजेंसियां 'साइलेंट महिला वोटरों' और 'लक्ष्मीर भंडार' जैसी कल्याणकारी योजनाओं के असर को भांपने में चूक गईं. ऐसा ही 2016 और 2024 के लोकसभा चुनाव में भी हुआ, जहां टीएमसी ने अनुमानों से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया.
हरियाणा और '400 पार' का सपना
सिर्फ बंगाल ही नहीं, 2024 के लोकसभा चुनाव में '400 पार' का नारा और एग्जिट पोल के दावे सबसे बड़े 'फेलियर' माने जाते हैं. एनडीए को भारी बहुमत मिलने के दावे के उलट भाजपा 240 सीटों पर सिमट गई. इसी तरह, हरियाणा विधानसभा चुनाव 2024 में लगभग सभी सर्वे कांग्रेस की एकतरफा जीत बता रहे थे, लेकिन नतीजे बिल्कुल उलट रहे और भाजपा ने सत्ता में वापसी की.
बिहार 2025: जीत की दिशा सही, पर आंकड़े कोसों दूर
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में ज्यादातर एग्जिट पोल्स ने एनडीए की जीत की भविष्यवाणी तो की थी, लेकिन वे जीत के बड़े अंतर को भांपने में पूरी तरह नाकाम रहे. सर्वे में कड़ी टक्कर या मामूली जीत की बात कही गई थी, लेकिन जब नतीजे आए तो एनडीए ने 200 सीटों का आंकड़ा पार कर सबको हैरान कर दिया. यहाँ तक कि सबसे सटीक मानी जाने वाली एजेंसियां भी भाजपा गठबंधन की इस भारी जीत का अंदाजा नहीं लगा पाईं.
उत्तर प्रदेश 2017: जब 'त्रिशंकु' का डर लहर में बदल गया
यूपी चुनाव 2017 में सर्वे एजेंसियों ने भविष्यवाणी की थी कि किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलेगा और भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी. लेकिन जब नतीजे घोषित हुए, तो भाजपा ने 325 सीटों के साथ एकतरफा जीत दर्ज की. यह हाल के दशकों की सबसे बड़ी चुनावी लहरों में से एक थी, जिसे एग्जिट पोल पकड़ ही नहीं सके.
छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश 2023 के चौंकाने वाले परिणाम
छत्तीसगढ़ में लगभग सभी सर्वे कांग्रेस की आसान जीत दिखा रहे थे, लेकिन भाजपा ने 50 से ज्यादा सीटों के अंतर से सरकार बनाकर सबको स्तब्ध कर दिया. वहीं, मध्य प्रदेश में भी चुनावी मॉडल क्षेत्रीय मुद्दों और स्थानीय भावनाओं को समझने में असफल रहे.
दिल्ली और बिहार (2015) का ऐतिहासिक उलटफेर
दिल्ली में 2015 में आम आदमी पार्टी की जीत की बात तो की गई थी, लेकिन 70 में से 67 सीटें जीतने वाले ऐतिहासिक तूफान का अंदाजा किसी को नहीं था. वहीं, 2015 के बिहार चुनाव में कांटे की टक्कर के दावों के बीच महागठबंधन ने एकतरफा बहुमत हासिल कर सर्वेक्षकों को गलत साबित कर दिया था. ये आंकड़े गवाह हैं कि वोट शेयर को सीटों में बदलना कोई आसान गणित नहीं है.
2026 की क्या है चुनौती?
इस बार बंगाल चुनाव में 15 साल की सत्ता विरोधी लहर और वोटर लिस्ट से कटे करीब 12% नामों को लेकर भारी विवाद है. भाजपा जहां 'डबल इंजन' सरकार का वादा कर रही है, वहीं टीएमसी अपनी जमीनी योजनाओं के भरोसे है. बंगाल में करीब 50-60% मतदाता अपनी पसंद जाहिर नहीं करते, जिसे 'साइलेंट वोटर' कहा जाता है. यही वजह है कि 4 मई को होने वाली मतगणना ही असली हकीकत बयां करेगी.
Exit Poll History : क्या 4 मई को आने वाले नतीजे वही होंगे जो एग्जिट पोल के सर्वे दिखा रहे हैं? लेकिन पिछले एक दशक का इतिहास उठा कर देखें, तो एग्जिट पोल के आंकड़ों पर आंख मूंदकर भरोसा करना मुश्किल है. बंगाल से लेकर हरियाणा तक, चाहे बिहार हो, उत्तर प्रदेश या फिर देश की राजधानी दिल्ली, मतदाताओं ने हर बार सर्वेक्षकों के अनुमानों से उलट चौंकाने वाले परिणाम दिए हैं. पश्चिम बंगाल में एग्जिट पोल्स की चर्चा गलियारों में तेज हो गई है.
बंगाल में फेल होता रहा है गणित
2021 के विधानसभा चुनाव में ज्यादातर राष्ट्रीय एजेंसियों ने बंगाल में भाजपा की जीत या कांटे की टक्कर का अनुमान लगाया था. कुछ सर्वे तो ममता सरकार गिरने की भविष्यवाणी कर रहे थे, लेकिन जब नतीजे आए तो टीएमसी ने 215 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल किया. विश्लेषकों का मानना है कि सर्वे एजेंसियां ‘साइलेंट महिला वोटरों’ और ‘लक्ष्मीर भंडार’ जैसी कल्याणकारी योजनाओं के असर को भांपने में चूक गईं. ऐसा ही 2016 और 2024 के लोकसभा चुनाव में भी हुआ, जहां टीएमसी ने अनुमानों से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया.
हरियाणा और ‘400 पार’ का सपना
सिर्फ बंगाल ही नहीं, 2024 के लोकसभा चुनाव में ‘400 पार’ का नारा और एग्जिट पोल के दावे सबसे बड़े ‘फेलियर’ माने जाते हैं. एनडीए को भारी बहुमत मिलने के दावे के उलट भाजपा 240 सीटों पर सिमट गई. इसी तरह, हरियाणा विधानसभा चुनाव 2024 में लगभग सभी सर्वे कांग्रेस की एकतरफा जीत बता रहे थे, लेकिन नतीजे बिल्कुल उलट रहे और भाजपा ने सत्ता में वापसी की.
बिहार 2025: जीत की दिशा सही, पर आंकड़े कोसों दूर
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में ज्यादातर एग्जिट पोल्स ने एनडीए की जीत की भविष्यवाणी तो की थी, लेकिन वे जीत के बड़े अंतर को भांपने में पूरी तरह नाकाम रहे. सर्वे में कड़ी टक्कर या मामूली जीत की बात कही गई थी, लेकिन जब नतीजे आए तो एनडीए ने 200 सीटों का आंकड़ा पार कर सबको हैरान कर दिया. यहाँ तक कि सबसे सटीक मानी जाने वाली एजेंसियां भी भाजपा गठबंधन की इस भारी जीत का अंदाजा नहीं लगा पाईं.
उत्तर प्रदेश 2017: जब ‘त्रिशंकु’ का डर लहर में बदल गया
यूपी चुनाव 2017 में सर्वे एजेंसियों ने भविष्यवाणी की थी कि किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलेगा और भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी. लेकिन जब नतीजे घोषित हुए, तो भाजपा ने 325 सीटों के साथ एकतरफा जीत दर्ज की. यह हाल के दशकों की सबसे बड़ी चुनावी लहरों में से एक थी, जिसे एग्जिट पोल पकड़ ही नहीं सके.
छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश 2023 के चौंकाने वाले परिणाम
छत्तीसगढ़ में लगभग सभी सर्वे कांग्रेस की आसान जीत दिखा रहे थे, लेकिन भाजपा ने 50 से ज्यादा सीटों के अंतर से सरकार बनाकर सबको स्तब्ध कर दिया. वहीं, मध्य प्रदेश में भी चुनावी मॉडल क्षेत्रीय मुद्दों और स्थानीय भावनाओं को समझने में असफल रहे.
दिल्ली और बिहार (2015) का ऐतिहासिक उलटफेर
दिल्ली में 2015 में आम आदमी पार्टी की जीत की बात तो की गई थी, लेकिन 70 में से 67 सीटें जीतने वाले ऐतिहासिक तूफान का अंदाजा किसी को नहीं था. वहीं, 2015 के बिहार चुनाव में कांटे की टक्कर के दावों के बीच महागठबंधन ने एकतरफा बहुमत हासिल कर सर्वेक्षकों को गलत साबित कर दिया था. ये आंकड़े गवाह हैं कि वोट शेयर को सीटों में बदलना कोई आसान गणित नहीं है.
2026 की क्या है चुनौती?
इस बार बंगाल चुनाव में 15 साल की सत्ता विरोधी लहर और वोटर लिस्ट से कटे करीब 12% नामों को लेकर भारी विवाद है. भाजपा जहां ‘डबल इंजन’ सरकार का वादा कर रही है, वहीं टीएमसी अपनी जमीनी योजनाओं के भरोसे है. बंगाल में करीब 50-60% मतदाता अपनी पसंद जाहिर नहीं करते, जिसे ‘साइलेंट वोटर’ कहा जाता है. यही वजह है कि 4 मई को होने वाली मतगणना ही असली हकीकत बयां करेगी.