अभी कुछ ही हफ्ते पहले, पूरी दुनिया एक भयानक ऊर्जा संकट के मुहाने पर खड़ी थी. अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को देखकर निवेशकों और विश्लेषकों को डर था कि दुनिया के कुल तेल व्यापार का पांचवां हिस्सा ढोने वाले 'स्ट्रैट ऑफ होर्मुज' में जरा सी भी रुकावट कच्चे तेल की कीमतों को आसमान पर पहुंचा देगी. आशंका थी कि इससे वैश्विक स्तर पर महंगाई फिर भड़केगी और आर्थिक विकास पूरी तरह पटरी से उतर जाएगा.
लेकिन, वह खौफनाक झटका कभी पूरी तरह आया ही नहीं. तेल की कीमतें बढ़ीं जरूर, पर वैसी नहीं जैसी आशंका थी. शेयर बाजार संभल गए और अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पिजेशकियन के बीच दुश्मनी खत्म करने के ऐतिहासिक समझौते के बाद यह भू-राजनीतिक जोखिम काफी कम हो चुका है.
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आखिरकार इस महा-संकट को पीछे धकेलने के पीछे कौन सी अदृश्य ताकत थी? इंडिया टुडे ने अपनी रिपोर्ट में ब्लूमबर्ग के मशहूर एनर्जी एक्सपर्ट जेवियर ब्लास के हवाले से लिखा है, इसका जवाब एक बेहद अप्रत्याशित जगह पर छिपा है - और वह है चीन.
जब चीन बना दुनिया का पहला 'स्विंग इंपोर्टर'
कच्चे तेल के बाजार में सऊदी अरब को हमेशा से 'स्विंग प्रोड्यूसर' (बाजार को स्थिर करने के लिए उत्पादन घटाने या बढ़ाने वाला देश) माना जाता रहा है. लेकिन डिमांड के मोर्चे पर ऐसा कोई खिलाड़ी इतिहास में कभी नहीं रहा.
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जेवियर ब्लास का तर्क है कि ईरान संघर्ष के दौरान चीन ने इतिहास में पहली बार 'स्विंग इंपोर्टर' की भूमिका निभाई. चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को बिना कोई नुकसान पहुंचाए चुपचाप कच्चे तेल की वैश्विक खरीद में भारी कटौती कर दी और सप्लाई के बड़े झटके को अकेले ही सोख लिया.
चीनी कस्टम्स के आंकड़ों के मुताबिक, मई में चीन का कुल तेल आयात 8 साल के निचले स्तर (7.8 मिलियन बैरल प्रति दिन) पर आ गया. टैंकर्स के जरिए आने वाला समुद्री आयात 10 साल के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया, जो 2025 के औसत से 45% से भी कम था.
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आंकड़ों तो देखें तो चीन ने अपने समुद्री आयात में जितनी कटौती की, वह जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन की कुल संयुक्त तेल खपत के बराबर थी. इसके बावजूद चीन में आर्थिक संकट का कोई नामोनिशान नहीं दिखा.
चीन की 20 साल पुरानी सीक्रेट रणनीति
चीन ने यह करिश्मा रातों-रात नहीं किया, बल्कि इसके पीछे बीजिंग की दो दशक पुरानी सोची-समझी रणनीति थी. दरअसल, पूर्व चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ ने 'मलक्का डिलेमा' की चेतावनी दी थी. चीन को हमेशा डर रहा है कि ताइवान या किसी अन्य भविष्य के युद्ध में संकरे 'मलक्का स्ट्रेट' से होने वाला उसका तेल आयात ब्लॉक किया जा सकता है.
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इस कमजोरी को दूर करने के लिए चीन पिछले 20 सालों से नवीकरणीय ऊर्जा, कोयला उत्पादन, रणनीतिक तेल भंडार और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स में भारी निवेश कर रहा था, जो इस संकट में उसके लिए लाइफलाइन साबित हुआ.
चीन के पास इस समय करीब 1.4 बिलियन बैरल का स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व है, जो अमेरिका से तीन गुना और जापान से छह गुना बड़ा है. संघर्ष के दौरान चीन ने अपने इसी सुरक्षित भंडार से करीब 100 से 200 मिलियन बैरल तेल घरेलू बाजार में छोड़ दिया.
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वहीं, चीन के नेशनल हाईवेज के आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल और मई के दौरान वहां इलेक्ट्रिक वाहनों की चार्जिंग एक्टिविटी में सालाना आधार पर 50% से 80% का भारी उछाल देखा गया, जिसने ईंधन की मांग को काफी हद तक कम कर दिया. इसके अलावा चीन ने अपनी कोयला आधारित बिजली और 'कोयला-से-रसायन' उद्योगों को पूरी क्षमता पर चलाकर कच्चे तेल की कमी की भरपाई कर ली.
भारत के लिए क्या बड़ा सबक है?
चीन का यह कदम भारत जैसी उभरती और तेल पर निर्भर इकॉनमी के लिए एक बड़ी चेतावनी और सबक है. भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85% से अधिक हिस्सा आयात करता है. चीन की तुलना में भारत का स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व बेहद सीमित है. वहीं, भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर बदलाव अभी अपने शुरुआती चरणों में है.
इस संकट ने साफ कर दिया है कि एनर्जी सिक्युरिटी का मतलब सिर्फ तेल की सप्लाई सुनिश्चित करना नहीं है, बल्कि फ्लेक्सिबिलिटी लाना है. जो देश रणनीतिक बफर्स, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों और घरेलू उत्पादन में निवेश नहीं करेंगे, वे भविष्य के वैश्विक झटकों में बुरी तरह फंस सकते हैं.
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पिछले दो दशकों से कच्चे तेल की कीमतों को बढ़ाने वाले मुख्य कारक के रूप में देखे जाने वाला चीन अब ग्लोबल एनर्जी मार्केट में एक 'स्थिरता लाने वाली ताकत' में बदल रहा है. अगर सऊदी अरब दुनिया का स्विंग प्रोड्यूसर बना रहता है, तो चीन अब दुनिया का पहला सच्चा स्विंग इंपोर्टर बन चुका है.
अभी कुछ ही हफ्ते पहले, पूरी दुनिया एक भयानक ऊर्जा संकट के मुहाने पर खड़ी थी. अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को देखकर निवेशकों और विश्लेषकों को डर था कि दुनिया के कुल तेल व्यापार का पांचवां हिस्सा ढोने वाले ‘स्ट्रैट ऑफ होर्मुज’ में जरा सी भी रुकावट कच्चे तेल की कीमतों को आसमान पर पहुंचा देगी. आशंका थी कि इससे वैश्विक स्तर पर महंगाई फिर भड़केगी और आर्थिक विकास पूरी तरह पटरी से उतर जाएगा.
लेकिन, वह खौफनाक झटका कभी पूरी तरह आया ही नहीं. तेल की कीमतें बढ़ीं जरूर, पर वैसी नहीं जैसी आशंका थी. शेयर बाजार संभल गए और अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पिजेशकियन के बीच दुश्मनी खत्म करने के ऐतिहासिक समझौते के बाद यह भू-राजनीतिक जोखिम काफी कम हो चुका है.
यह भी पढ़ें : होर्मुज खुलते ही मिली गुड न्यूज, LPG का बैकलॉग घटकर 3.1 दिन हुआ, जानिए आम जनता को क्या होगा फायदा?
आखिरकार इस महा-संकट को पीछे धकेलने के पीछे कौन सी अदृश्य ताकत थी? इंडिया टुडे ने अपनी रिपोर्ट में ब्लूमबर्ग के मशहूर एनर्जी एक्सपर्ट जेवियर ब्लास के हवाले से लिखा है, इसका जवाब एक बेहद अप्रत्याशित जगह पर छिपा है – और वह है चीन.
जब चीन बना दुनिया का पहला ‘स्विंग इंपोर्टर’
कच्चे तेल के बाजार में सऊदी अरब को हमेशा से ‘स्विंग प्रोड्यूसर’ (बाजार को स्थिर करने के लिए उत्पादन घटाने या बढ़ाने वाला देश) माना जाता रहा है. लेकिन डिमांड के मोर्चे पर ऐसा कोई खिलाड़ी इतिहास में कभी नहीं रहा.
यह भी पढ़ें : अमेरिका-ईरान ने शांति समझौते पर किए साइन, MoU के 14 पॉइंट्स में होर्मुज स्ट्रेट और लेबनान के साथ और क्या-क्या?
जेवियर ब्लास का तर्क है कि ईरान संघर्ष के दौरान चीन ने इतिहास में पहली बार ‘स्विंग इंपोर्टर’ की भूमिका निभाई. चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को बिना कोई नुकसान पहुंचाए चुपचाप कच्चे तेल की वैश्विक खरीद में भारी कटौती कर दी और सप्लाई के बड़े झटके को अकेले ही सोख लिया.
चीनी कस्टम्स के आंकड़ों के मुताबिक, मई में चीन का कुल तेल आयात 8 साल के निचले स्तर (7.8 मिलियन बैरल प्रति दिन) पर आ गया. टैंकर्स के जरिए आने वाला समुद्री आयात 10 साल के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया, जो 2025 के औसत से 45% से भी कम था.
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आंकड़ों तो देखें तो चीन ने अपने समुद्री आयात में जितनी कटौती की, वह जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन की कुल संयुक्त तेल खपत के बराबर थी. इसके बावजूद चीन में आर्थिक संकट का कोई नामोनिशान नहीं दिखा.
चीन की 20 साल पुरानी सीक्रेट रणनीति
चीन ने यह करिश्मा रातों-रात नहीं किया, बल्कि इसके पीछे बीजिंग की दो दशक पुरानी सोची-समझी रणनीति थी. दरअसल, पूर्व चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ ने ‘मलक्का डिलेमा’ की चेतावनी दी थी. चीन को हमेशा डर रहा है कि ताइवान या किसी अन्य भविष्य के युद्ध में संकरे ‘मलक्का स्ट्रेट’ से होने वाला उसका तेल आयात ब्लॉक किया जा सकता है.
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इस कमजोरी को दूर करने के लिए चीन पिछले 20 सालों से नवीकरणीय ऊर्जा, कोयला उत्पादन, रणनीतिक तेल भंडार और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स में भारी निवेश कर रहा था, जो इस संकट में उसके लिए लाइफलाइन साबित हुआ.
चीन के पास इस समय करीब 1.4 बिलियन बैरल का स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व है, जो अमेरिका से तीन गुना और जापान से छह गुना बड़ा है. संघर्ष के दौरान चीन ने अपने इसी सुरक्षित भंडार से करीब 100 से 200 मिलियन बैरल तेल घरेलू बाजार में छोड़ दिया.
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वहीं, चीन के नेशनल हाईवेज के आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल और मई के दौरान वहां इलेक्ट्रिक वाहनों की चार्जिंग एक्टिविटी में सालाना आधार पर 50% से 80% का भारी उछाल देखा गया, जिसने ईंधन की मांग को काफी हद तक कम कर दिया. इसके अलावा चीन ने अपनी कोयला आधारित बिजली और ‘कोयला-से-रसायन’ उद्योगों को पूरी क्षमता पर चलाकर कच्चे तेल की कमी की भरपाई कर ली.
भारत के लिए क्या बड़ा सबक है?
चीन का यह कदम भारत जैसी उभरती और तेल पर निर्भर इकॉनमी के लिए एक बड़ी चेतावनी और सबक है. भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85% से अधिक हिस्सा आयात करता है. चीन की तुलना में भारत का स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व बेहद सीमित है. वहीं, भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर बदलाव अभी अपने शुरुआती चरणों में है.
इस संकट ने साफ कर दिया है कि एनर्जी सिक्युरिटी का मतलब सिर्फ तेल की सप्लाई सुनिश्चित करना नहीं है, बल्कि फ्लेक्सिबिलिटी लाना है. जो देश रणनीतिक बफर्स, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों और घरेलू उत्पादन में निवेश नहीं करेंगे, वे भविष्य के वैश्विक झटकों में बुरी तरह फंस सकते हैं.
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पिछले दो दशकों से कच्चे तेल की कीमतों को बढ़ाने वाले मुख्य कारक के रूप में देखे जाने वाला चीन अब ग्लोबल एनर्जी मार्केट में एक ‘स्थिरता लाने वाली ताकत’ में बदल रहा है. अगर सऊदी अरब दुनिया का स्विंग प्रोड्यूसर बना रहता है, तो चीन अब दुनिया का पहला सच्चा स्विंग इंपोर्टर बन चुका है.