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नए लेबर कोड से क्‍या घट जाएगी टेक-होम सैलरी? नौकरी करने वाले जान लें

अगर आपकी बेस‍िक सैलरी 15000 से ज्‍यादा है तो नए लेबर कोड में EPF कंट्रीब्यूशन पर क्या असर पड़ेगा? इसके साथ ही CTC में वेरिएबल या परफॉर्मेंस-लिंक्ड पेमेंट का क्‍या ह‍िसाब क‍िताब रहेगा, जानें

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नए लेबर कोड में क्‍या बदल जाएगा सैलरी स्‍ट्रक्‍चर

भारत ने अपने लेबर कानूनों में बदलाव किए हैं. इसलिए अगर आप सैलरी पाने वाले कर्मचारी हैं, कॉन्ट्रैक्ट पर हैं, पार्ट-टाइम काम करते हैं या डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए काम करते हैं, तो नए लेबर कानून आपकी कमाई, नौकरी की शर्तों, फायदों और अधिकारों पर असर डालेंगे. लेकिन नए लेबर कानूनों के आने के साथ ही बढ़ी हुई सैलरी पर बहस भी तेज हो गई है. कई कर्मचारियों के सामने यह सवाल है कि क्या उनकी सैलरी बढ़ेगी? क्या नए लेबर कोड आपकी बढ़ी हुई सैलरी में कटौती करेंगे? आइए इसे समझते हैं. सबसे पहले, जानते हैं कि नए लेबर कानूनों के साथ क्या खास बदलाव किए गए हैं.

चार नए लेबर कोड कौन से?

  • कोड ऑन वेजेज, 2019
  • इंडस्ट्रियल रिलेशन्स कोड 2020
  • कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी 2020
  • ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड 2020

ग्रेचुटी के नियमों में बदलाव

नए लेबर कोड यह फिर से तय करते हैं कि सैलरी क्या है? वे यह जरूरी करते हैं कि बेसिक पे और DA अलाउंस मिलकर कुल सैलरी का कम से कम 50% होना चाहिए. चूंकि ग्रेचुटी पूरी तरह से बेसिक पे पर कैलकुलेट होती है, इसलिए इस रीस्ट्रक्चरिंग से इस्तीफा, रिटायरमेंट या टर्मिनेशन के समय अपने आप ज्‍यादा ग्रेचुटी पेआउट मिलेगा. आसान शब्दों में कहें तो, आज ज्‍यादा बेसिक सैलरी का मतलब है कल ज्‍यादा ग्रेचुटी बेनिफिट.

अब तक, ग्रेचुटी स‍िर्फ 5 साल की लगातार सर्विस के बाद ही मिलती थी. इसका मतलब था कि शॉर्ट-टर्म कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले लाखों वर्कर इससे बाहर हो गए थे. नए लेबर फ्रेमवर्क के तहत, यह पूरी तरह से बदल गया है. फिक्स्ड टर्म और कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारी अब सिर्फ एक साल की सर्विस पूरी करने के बाद ग्रेचुटी के लिए एलिजिबल हो जाएंगे.

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इसे भारत के बढ़ते कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों के पक्ष में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है् पहले ग्रेच्युटी प्रोटेक्शन जयादातर फॉर्मली काम करने वाले परमानेंट स्टाफ तक ही सीमित था. नई व्यवस्था के तहत, सोशल सिक्योरिटी का दायरा काफी बढ़ा दिया गया है. फिक्स्ड टर्म स्टाफ, कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले वर्कर, प्लेटफॉर्म वर्कर और गिग वर्कर अब फॉर्मल कानूनी कवरेज के करीब आ गए हैं.

इससे भारत के वर्कफोर्स का एक बहुत बड़ा हिस्सा ग्रेचुटी प्रोटेक्शन के दायरे में आ गया है. ट्रेडिशनल एम्प्लॉयमेंट कॉन्ट्रैक्ट के बाहर काम करने वाले लाखों लोगों के लिए, यह फॉर्मल रिटायरमेंट से जुड़ी सिक्योरिटी की ओर पहला कदम है.

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सालों तक, कई ऑर्गनाइजेशन ने सैलरी को इस तरह से स्ट्रक्चर किया कि बेसिक पे को आर्टिफ‍ि‍शियली कम रखा गया, जबकि एक बड़ा हिस्सा अलाउंस में चला गया. इससे कंपनियों को PF और ग्रेचुटी जैसी अपनी लॉन्ग-टर्म लायबिलिटीज को लिमिट करने में मदद मिली.

अब ये प्रैक्टिस मुमकिन नहीं होगी. एक जैसी सैलरी डेफिनिशन होने से, ग्रेचुटी कैलकुलेशन अब ट्रांसपेरेंट, स्टैंडर्डाइज्‍ड और सभी इंडस्ट्रीज में एक जैसी होगी. इससे फाइनल सेटलमेंट के समय झगड़े भी कम होते हैं.

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ज्‍यादा बेसिक पे, पहले एलिजिबिलिटी और ज्‍यादा वर्कफोर्स कवरेज के साथ, एक्सपर्ट्स का मानना ​​है कि पूरी वर्किंग लाइफटाइम में जमा हुई टोटल ग्रेचुटी काफी बढ़ जाएगी. एम्प्लॉइज के लिए, इसका मतलब है कि बाद के सालों में बेहतर एग्जिट बेनिफिट्स और बेहतर फाइनेंशियल स्टेबिलिटी म‍िलेगी.

क्‍या घट जाएगी इन-हैंड सैलरी?

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बदले हुए वेज स्ट्रक्चर के तहत, बेसिक पे टोटल CTC का कम से कम आधा होना चाहिए. इसलिए अलाउंस कम हो जाएंगे. प्रोविडेंट फंड और दूसरे कानूनी कंट्रीब्यूशन अपने आप बढ़ जाएंगे. तो प्रैक्टिकल तौर पर इसका क्या मतलब है? भले ही किसी एम्प्लॉई का टोटल CTC बदला न हो, मंथली डिडक्शन बढ़ जाएंगे और बढ़ी हुई सैलरी कम हो सकती है.

यही मुख्य कारण है कि सैलरी कट की बहस तेज हो गई है. इसके असर की बात करें तो, यह सभी कर्मचारियों पर एक जैसा नहीं होगा. यह ज्‍यादा अलाउंस, भारी सैलरी स्ट्रक्चर वाले कर्मचारियों, कम बेसिक पे और एग्रेसिव CTC डिजाइन वाले प्राइवेट सेक्टर के प्रोफेशनल्स, लंबे समय की बचत के बजाय ज्‍यादा मंथली कैश फ्लो को प्राथमिकता देने वाले युवा कर्मचारियों, बुढ़ापे में फाइनेंशियल कमजोरी कम होने पर सबसे ज्‍यादा दिखेगा.

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नए लेबर कोड लागू होने से भारत में वेतन, बचत और कर्मचारियों की सुरक्षा को कैसे डिफाइन किया जाता है, इसमें एक स्ट्रक्चरल बदलाव आया है.

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लेखक के बारे में

Vandana Bharti

वन्‍दना भारती News 24 में बतौर ड‍िप्‍टी न्‍यूज एडिटर कार्यरत हैं और मौजूदा समय में बिजनेस डेस्‍क संभाल रही हैं. वन्दना News 24 के लिए स्टॉक मार्केट, पर्सनल फाइनेंस, कमोडिटी मार्केट, सरकारी योजनाओं पर खबरें लिखती हैं. वन्‍दना ने अपने करियर की शुरुआत दैन‍िक जागरण अखबार से की. इसके बाद देशबंधु अखबार में उन्होंने ब‍िजनेस रिपोर्टिंग में अपनी विशेषज्ञता विकसित की. साल 2010 में उन्होंने ह‍िन्‍दुस्‍तान अखबार में अपनी सेवाएं दीं, जहां उन्होंने ब‍िजनेस पेज के लिए 6 साल तक काम किया. वन्‍दना, आजतक डिजिटल, India.com और News18.com जैसे न्यूज प्लेटफॉर्म्स में बिजनेस डेस्क से जुड़ी रही हैं. वन्दना ने दिल्ली विश्वविद्यालय से बीकॉम किया है. कॉमर्स बैकग्राउंड होने के कारण उनकी बिजनेस की खबरों में अच्छी पकड़ है और इन खबरों को वह आसान भाषा में यूजर्स तक पहुंचाती हैं. कितने साल का अनुभव: 18 साल योग्यता: शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से बी.कॉम और नई द‍िल्‍ली के YMCA संस्‍थान से पत्रकार‍िता में पीजीडीएमए की डिग्री प्राप्त की है.
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