भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ऐतिहासिक व्यापार समझौते (Trade Deal) को लेकर एक बड़ी खबर सामने आ रही है। दोनों देशों के बीच व्यापारिक शर्तों को अंतिम रूप देने में हो रही देरी की वजहें अब खुलकर सामने आने लगी हैं। हाल ही में अमेरिकी सीनेटर और नीति निर्माताओं की ओर से आए बयानों ने साफ कर दिया है कि एक साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी यह डील अभी तक क्यों अधर में लटकी हुई है।
साल 2025 में शुरू हुई थी औपचारिक बातचीत
याद दिला दें कि भारत और अमेरिका ने पिछले साल 13 फरवरी 2025 को औपचारिक रूप से इस व्यापार समझौते के लिए बातचीत का आगाज किया था। दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों को नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए इस डील को बेहद अहम माना जा रहा था।
इसके बाद रफ्तार दिखाते हुए 7 फरवरी 2026 को दोनों पक्षों ने एक अंतरिम समझौते (Interim Deal) के लिए ढांचा तैयार करने की आधिकारिक घोषणा भी कर दी थी। लेकिन, इस ढांचे के एलान के बाद से अब तक दोनों देशों के बीच अंतिम शर्तें तय नहीं हो पाई हैं, जिसके चलते यह समझौता फाइलों में ही दबा हुआ है।
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आखिर कहां फंसा है पेंच? (Key Sticking Points)
अमेरिकी सीनेटरों और व्यापार प्रतिनिधियों (जैसे जेमिसन ग्रीर) के हवाले से सामने आई रिपोर्ट्स के मुताबिक, बातचीत के आगे न बढ़ पाने के पीछे कई कड़े नीतिगत मुद्दे हैं, जिन पर दोनों देश झुकने को तैयार नहीं हैं।
एग्रीकल्चर मार्केट (कृषि क्षेत्र): अमेरिका लगातार भारत से मांग कर रहा है कि वह अपने डेयरी प्रोडक्ट्स और चुनिंदा कृषि उत्पादों के बाजार को अमेरिकी आयात के लिए खोले। वहीं, भारत अपने स्थानीय किसानों के हितों की रक्षा के लिए इस पर बेहद सतर्क रुख अपनाए हुए है।
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टैरिफ और इम्पोर्ट ड्यूटी: अमेरिका भारत द्वारा कुछ खास सामानों पर लगाए जाने वाले उच्च आयात शुल्क (High Tariffs) को कम कराना चाहता है, जबकि भारत अपनी मेक इन इंडिया नीति के तहत घरेलू उद्योगों को संरक्षण देना चाहता है।
डिजिटल ट्रेड और डेटा लोकलाइजेशन: ई-कॉमर्स नियमों और भारतीय नागरिकों के डेटा को देश के भीतर ही स्टोर करने (Data Localization) के नियमों को लेकर भी अमेरिकी टेक कंपनियों और भारत सरकार के बीच मतभेद बरकरार हैं।
भारतीय पक्ष का क्या है रुख?
केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल पहले भी कई मौकों पर स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत किसी भी देश के साथ व्यापार समझौता करते समय अपने राष्ट्रीय हितों, छोटे व्यापारियों और किसानों के लाभ से समझौता नहीं करेगा। भारत एक संतुलित और पारस्परिक रूप से लाभप्रद (Win-Win) सौदा चाहता है, न कि ऐसा समझौता जो केवल एक पक्ष के हितों की पूर्ति करे।
विशेषज्ञों का मानना है कि 7 फरवरी 2026 को तैयार हुए अंतरिम ढांचे के बाद कूटनीतिक स्तर पर बातचीत जारी है, लेकिन दोनों देशों के घरेलू राजनीतिक और आर्थिक दबावों के कारण गति काफी धीमी है। जब तक दोनों पक्ष कुछ संवेदनशील मुद्दों पर बीच का रास्ता नहीं निकालते, तब तक इस समझौते पर अंतिम मुहर लगना मुश्किल दिखाई दे रहा है।
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ऐतिहासिक व्यापार समझौते (Trade Deal) को लेकर एक बड़ी खबर सामने आ रही है। दोनों देशों के बीच व्यापारिक शर्तों को अंतिम रूप देने में हो रही देरी की वजहें अब खुलकर सामने आने लगी हैं। हाल ही में अमेरिकी सीनेटर और नीति निर्माताओं की ओर से आए बयानों ने साफ कर दिया है कि एक साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी यह डील अभी तक क्यों अधर में लटकी हुई है।
साल 2025 में शुरू हुई थी औपचारिक बातचीत
याद दिला दें कि भारत और अमेरिका ने पिछले साल 13 फरवरी 2025 को औपचारिक रूप से इस व्यापार समझौते के लिए बातचीत का आगाज किया था। दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों को नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए इस डील को बेहद अहम माना जा रहा था।
इसके बाद रफ्तार दिखाते हुए 7 फरवरी 2026 को दोनों पक्षों ने एक अंतरिम समझौते (Interim Deal) के लिए ढांचा तैयार करने की आधिकारिक घोषणा भी कर दी थी। लेकिन, इस ढांचे के एलान के बाद से अब तक दोनों देशों के बीच अंतिम शर्तें तय नहीं हो पाई हैं, जिसके चलते यह समझौता फाइलों में ही दबा हुआ है।
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आखिर कहां फंसा है पेंच? (Key Sticking Points)
अमेरिकी सीनेटरों और व्यापार प्रतिनिधियों (जैसे जेमिसन ग्रीर) के हवाले से सामने आई रिपोर्ट्स के मुताबिक, बातचीत के आगे न बढ़ पाने के पीछे कई कड़े नीतिगत मुद्दे हैं, जिन पर दोनों देश झुकने को तैयार नहीं हैं।
एग्रीकल्चर मार्केट (कृषि क्षेत्र): अमेरिका लगातार भारत से मांग कर रहा है कि वह अपने डेयरी प्रोडक्ट्स और चुनिंदा कृषि उत्पादों के बाजार को अमेरिकी आयात के लिए खोले। वहीं, भारत अपने स्थानीय किसानों के हितों की रक्षा के लिए इस पर बेहद सतर्क रुख अपनाए हुए है।
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टैरिफ और इम्पोर्ट ड्यूटी: अमेरिका भारत द्वारा कुछ खास सामानों पर लगाए जाने वाले उच्च आयात शुल्क (High Tariffs) को कम कराना चाहता है, जबकि भारत अपनी मेक इन इंडिया नीति के तहत घरेलू उद्योगों को संरक्षण देना चाहता है।
डिजिटल ट्रेड और डेटा लोकलाइजेशन: ई-कॉमर्स नियमों और भारतीय नागरिकों के डेटा को देश के भीतर ही स्टोर करने (Data Localization) के नियमों को लेकर भी अमेरिकी टेक कंपनियों और भारत सरकार के बीच मतभेद बरकरार हैं।
भारतीय पक्ष का क्या है रुख?
केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल पहले भी कई मौकों पर स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत किसी भी देश के साथ व्यापार समझौता करते समय अपने राष्ट्रीय हितों, छोटे व्यापारियों और किसानों के लाभ से समझौता नहीं करेगा। भारत एक संतुलित और पारस्परिक रूप से लाभप्रद (Win-Win) सौदा चाहता है, न कि ऐसा समझौता जो केवल एक पक्ष के हितों की पूर्ति करे।
विशेषज्ञों का मानना है कि 7 फरवरी 2026 को तैयार हुए अंतरिम ढांचे के बाद कूटनीतिक स्तर पर बातचीत जारी है, लेकिन दोनों देशों के घरेलू राजनीतिक और आर्थिक दबावों के कारण गति काफी धीमी है। जब तक दोनों पक्ष कुछ संवेदनशील मुद्दों पर बीच का रास्ता नहीं निकालते, तब तक इस समझौते पर अंतिम मुहर लगना मुश्किल दिखाई दे रहा है।