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दुनिया की सबसे बड़ी आर्मी अमेरिका के पास है. दुनिया की दिग्गज टेक कंपनियां अमेरिका के पास हैं दुनिया में सबसे बड़ी जीडीपी अमेरिका की है. दुनिया के सबसे अधिक लेनदेन यानी कारोबार अमेरिकी डॉलर में होता है. Forex Market में होने वाले लेनदेन में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी करीब 88 फीसदी है. स्वतंत्रता, समानता और न्याय – ये तीन शब्द अमेरिका की पहचान रहे हैं. अमेरिका इस मुकाम तक दस-पंद्रह या पच्चीस साल में नहीं पहुंचा. पिछले ढाई सौ वर्षों से अमेरिकी हुक्मरान दावा करते रहे हैं कि दुनिया में लोकतंत्र, मानवाधिकार और आजादी की रक्षा करना ही उनकी विदेश नीति का आधार रहा है. लेकिन क्या अब भी अमेरिकी विदेश नीति का आधार यही है. फिलहाल अमेरिका के राष्ट्रपति की कुर्सी पर डोनाल्ड ट्रंप हैं और उनका मिजाज थोड़ा अलग है. वो अपने करीबियों के लिए भी Unpredictable हैं. वो अमेरिका फर्स्ट की बात करते हैं. मेक अमेरिका ग्रेट अगेन की बात करते हैं. वो टैरिफ को एक असरदार हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं तो Energy Dominance और AI Dominance भी स्थापित करना चाहते हैं. प्रेसिडेंट ट्रंप को सौदेबाजों का भी सौदेबाज कहा जा सकता है. उन्हें ना तो किसी गंभीर और पेचीदा मुद्दे पर कोई बड़ा दावा करने में देर लगती है और ना अपने दावे से यू-टर्न मारने में. 4 जुलाई को हर अमेरिकी अपने लोकतंत्र पर गर्व करता है. इस तारीख को अपनी स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाता है. अमेरिका को ब्रिटिश उपनिवेशवाद से आजाद हुए 250 साल हो चुके हैं. अमेरिका ने दुनिया के कई देशों को आधुनिक लोकतंत्र का रास्ता दिखाया. लेकिन, मौजूदा समय में अमेरिकी लोकतंत्र पर सवाल उठ रहे हैं. ऐसे में आजादी का जश्न मनाते ज्यादातर अमेरिकियों के मन में एक सवाल जरूर उठ रहा होगा कि क्या दुनिया के आधुनिक लोकतंत्र की नींव इतनी कमजोर है, जिसे ट्रंप जैसे तुनकमिजाज और Unpredicatable नेता की राजनीति, महत्वाकांक्षा और कूटनीति हिलाने में सक्षम है? डोनाल्ड ट्रंप का रास्ता अमेरिका को मजबूत बना रहा है या फिर कमजोर? आज कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब अतीत, वर्तमान और भविष्य के आईने में तलाशने की कोशिश करेंगे.

डोनाल्ड ट्रंप का 20 जनवरी, 2029 तक अमेरिकी राष्ट्रपति की कुर्सी पर बने रहना तय है. वो अमेरिका को अपने तरीके से चला रहे हैं. कूटनीति के कुछ जानकारों की सोच है कि डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका को एक राजनेता की तरह नहीं बल्कि किसी मल्टीनेशनल कंपनी के CEO की तरह चला रहे हैं. राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ के मौके पर ऐलान किया कि अपने प्यारे देश को पहले से अधिक मजबूत, गर्व करने वाला, अमीर और महान बनाने में कामयाब होंगे. ये राष्ट्रपति ट्रंप का स्टाइल है – जिसमें वो 6 लोगों को माफ करते हैं, जिन पर बाइडेन प्रशासन के तहत केस चला था. लेकिन, अमेरिका में एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है – जिसे डोनाल्ड ट्रंप का रास्ता, तौर-तरीका और नीतियां ठीक नहीं लगती. उनमें से एक हैं – न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी. उन्होंने अमेरिका की आजादी की 250 वीं वर्षगांठ पर अपने संबोधन के लिए एक खास जगह चुनी. ममदानी ने उस मेज के पीछे खड़े होकर अपनी बात रखी, जिसका इस्तेमाल कभी अमेरिका के पहले राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन किया करते थे. उनके अगल-बगल प्रवासी अमेरिकी खड़े थे. न्यूयॉर्क के मेयर ममदानी के प्रवासियों की उन पीढ़ियों का जिक्र किया – जिन्होंने न्यूयॉर्क शहर के निर्माण और विकास में अहम भूमिका निभाई.

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दरअसल, प्रवासियों को लेकर ट्रंप प्रशासन की नीतियों को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं. अमेरिका एक ऐसा मुल्क है – जिसकी तरक्की में सबसे दमदार किरदार दुनिया अलग-अलग हिस्सों से जाकर बसे लोगों ने निभाया. राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों में हमेशा ड्राइविंग सीट पर मुनाफा रहा है. वो टैरिफ का इस्तेमाल व्यापारिक दबाव बनाने के लिए एक कूटनीतिक हथियार के तौर पर कर रहे हैं. वो ऐसे ट्रेड एग्रीमेंट की स्क्रिप्ट तैयार कर रहे हैं – जिसमें अमेरिका को अधिक फायदा मिले. राष्ट्रपति ट्रंप दुनिया में रिश्तों को अपनी दूरबीन से देखने और परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में सबसे पहले समझते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप आखिर अमेरिका को चला कैसे रहे हैं?

अमेरिकी की आजादी के 250 साल पूरे हो चुके हैं. ये लम्हा किसी भी मुल्क और उसके नागरिकों के सीने को चौड़ा और सिर ऊंचा करने के लिए बहुत है. लेकिन, जब अमेरिका जैसे मुल्क की बात होती है – तो ये मौका और भी खास बन जाता है. ढाई सौ साल की यात्रा में आज की तारीख में अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य महाशक्ति है. अत्याधुनिक तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में अमेरिका का वर्चस्व है – जिसे अभी दूर-दूर तक कोई चुनौती देता नहीं दिख रहा है.

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राष्ट्रपति ट्रंप ने Make America Great Again का सपना दिखाया है. वो एक ऐसे आक्रामक राष्ट्रवाद को आगे बढ़ा रहे हैं – जिसमें अमेरिका में दो वर्ग तैयार गए है. एक वहां के मूल निवासी और दूसरे प्रवासी. ट्रंप प्रशासन 2.0 में बाहरियों को अमेरिका से बाहर निकालने की लगातार कोशिश चल रही है. सुपर पावर अमेरिका में कमाने या बसने का सपना लिए दाखिल अवैध प्रवासियों को खूंखार कैदियों की तरह वापस उनके मुल्क भेजा जा रहा है.

राष्ट्रपति ट्रंप के देश चलाने के तौर-तरीकों से अमेरिका का हर वर्ग खुश हो – ऐसा भी नहीं है. अमेरिकी के 250 वें स्थापना दिवस के मौके पर न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने एक खास भाषण दिया – उनकी दोनों तरफ दूसरे देशों से आकर अमेरिका में बसे महिला और पुरुष खड़े थे – जो अब अमेरिका के नागरिक हैं. मेयर ममदानी ने अपने खास संबोधन में बताया कि प्रवासियों ने किस तरह से न्यूयॉर्क शहर के निर्माण और विकास में योगदान दिया.

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जोहरान ममदानी खुद युगांडा में पैदा हुए और 7 साल की उम्र में न्यूयॉर्क आए और 2018 में अमेरिका के नागरिक बने. अब न्यूयॉर्क के मेयर जैसी अहम कुर्सी पर हैं. अमेरिका आज जिस मुकाम पर है – वहां पहुंचाने में प्रवासियों ने बड़ी भूमिका निभाई है. प्रवासियों के मुद्दे पर मेयर ममदानी की सोच राष्ट्रपति ट्रंप की सोच से बिल्कुल विपरीत है. इतना ही नहीं मेयर ममदानी ने तो यहां तक कह दिया कि देशभक्ति का मतलब कभी यह दिखावा करना नहीं रहा कि हमारा देश पूरी तरह दोष रहित है. देशभक्ति हर उस न्यायपूर्ण असहमति में है, हर उस मार्च में है जो तपती धूप में निकाला जाता है, और हर उस विरोध प्रदर्शन में है जो अपने समय से पहले किया जाता है. हम इस देश से प्रेम करते हैं, इसलिए हम इसे कभी नहीं छोड़ेंगे.

मतलब, राष्ट्रपति ट्रंप और उनके पीछे खड़े दिख रहे लोगों की राष्ट्रवाद की परिभाषा को अमेरिका के भीतर से चुनौती मिलनी शुरू हो गयी है. हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप अपने मेक अमेरिका ग्रेट अगेन एजेंडा को पूरी मजबूती के साथ और अपने चिर परिचित अंदाज में आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं.

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अब सवाल उठ रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका को किस तरह महान देश बनाने में लगे हुए है… उनकी रणनीति और कूटनीति क्या है?

  • राष्ट्रपति ट्रंप दूसरी पारी में टैरिफ का इस्तेमाल दूसरे देशों पर दबाव बनाने के लिए कर रहे हैं.
  • टैरिफ को हथियार की तरह इस्तेमाल कर नए सिरे से ट्रेड डील. पुराने करार खत्म कर नए ट्रेड एग्रीमेंट के जरिए अमेरिका का फायदा सुनिश्चित करने वाली नीति.
  • दुनिया की Energy Supply Chain पर अमेरिकी वर्चस्व के लिए तिकड़म. वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन और ईरान के खिलाफ युद्ध को भी इसी कड़ी में देखा जा रहा.
  • भविष्य के खनिज यानी रेयर अर्थ मिनरल्स पर कब्जे की रणनीति.
  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में अमेरिकी प्रभुत्व को बनाए रखने की रणनीति.
  • समंदर में अहम कारोबारी रूट पर अमेरिकी वर्चस्व के लिए तिकड़म.

    ऐसे में सवाल उठ रहा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों से अमेरिका को फायदा हो रहा है या नुकसान?

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    राष्ट्रपति ट्रंप अपनी दूसरी पारी की शुरुआत के साथ ही पूरी दुनिया में खलबली मचाए हुए है. वो अपने दिमाग के एक हिस्से से टेंशन के लिए स्क्रिप्ट तैयार करते हैं तो अपने दिमाग के दूसरे हिस्से से टॉक यानी बातचीत की टेबल पर सौदेबाजी की स्क्रिप्ट साथ-साथ आगे बढ़ाते हैं. पिछले कई दशकों से चले आ रहे कूटनीतिक करार और कूटनीतिक रिश्तों में रीसेट बटन दबा चुके हैं. डोनाल्ड ट्रंप दुनिया में शक्ति संतुलन इस तरह बदलने की कोशिश कर रहे हैं – जिसमें अमेरिकी वर्चस्व को किसी भी क्षेत्र में दूर-दूर तक चुनौती न दी जा सके.

    राष्ट्रपति ट्रंप का फंडा बहुत हद तक साफ है. किसी भी कीमत पर फायदा. उनके लिए अंतरराष्ट्रीय कायदा-कानून और अंतरराष्ट्रीय मंच बहुत मायने नहीं रखते हैं. वो अमेरिका की शक्ति को और बढ़ाना चाहते हैं. उन अंतर्राष्ट्रीय जिम्मेदारियों से भी छुटकारा चाहते हैं – जिन्हें पहले से अमेरिका निभाता आ रहा है. राष्ट्रपति ट्रंप की अगुवाई वाला अमेरिका पूरी दुनिया को संदेश देना चाह रहा है कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था एक भ्रम है. दुनिया में सिर्फ एक ही सुपर पावर है – वो है अमेरिका. राष्ट्रपति ट्रंप की नीति अमेरिकी नीतियों की विरोधी सत्ता को दुनियाभर में कमजोर करना है. साथ ही अमेरिकी मिलिट्री की ताकत का प्रदर्शन करना और युद्ध के बाद Reconstruction की जिम्मेदारी से बचना भी शामिल है.

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    ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को उनकी मौत के चार महीने बाद अंतिम विदाई दी जा रही है. अली खामेनेई की 28 फरवरी को तेहरान पर अमेरिका-इजरायल के हमलों में मौत हो गई थी. एक अनुमान के मुताबिक अमेरिका-इजरायल हमले में ईरान को करीब 140 से 145 अरब डॉलर का नुकसान हुआ. ईरान के 50 से अधिक सैन्य अड्डे तबाह हुए. तेल निर्यात ठप होने की वजह से ईरान की कमाई का जरिया भी बुरी तरह प्रभावित हुआ. लेकिन, ईरान के नुकसान की कैसी भरपाई होगी – इसका किसी के पास जवाब नहीं है. युद्ध की वजह से कच्चा तेल और गैस सप्लाई का व्यस्त समुद्री रूट होर्मुज स्ट्रेट प्रभावित रहा. दुनिया के उन देशों को भी बड़ा नुकसान हुआ- जिनका युद्ध से कोई लेना-देना नहीं था.

    अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमले के साथ अरब वर्ल्ड में असुरक्षा का माहौल बन गया. ईरान अरब वर्ल्ड के उन देशों को निशाना बनाने लगा – जहां अमेरिका के सैन्य अड्डे थे. ऐसे में अमेरिका की इस क्षेत्र में अहमियत एकाएक बढ़ गयी. पिछले कुछ वर्षों से ईरान की मदद से चाइना अरब वर्ल्ड में अपनी पैठ बढ़ा रहा था. लेकिन, ईरान के युद्ध में उलझते ही अरब वर्ल्ड में बन रही केमेस्ट्री बिगड़ गयी. दूसरी ओर, दुनिया में कच्चे तेल के बाजार का पूरा समीकरण बदल गया.

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    दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले वेनेजुएला में साल की शुरुआत में ही राष्ट्रपति ट्रंप ने एक मिलिट्री ऑपरेशन के जरिए सत्ता परिवर्तन करा दिया. इजरायल और हमास जंग के दौरान मिसाइल और ड्रोन का रूस लेबनान की ओर भी हुआ. माना जा रहा था कि इसका मकसद लेबनान से लगी समुद्री सीमा को नए सिरे से परिभाषित करना था. यूक्रेन के खनिज संसाधनों पर कब्जे की स्क्रिप्ट ट्रंप प्रशासन ने किस तरह बढ़ाई – ये भी किसी से छिपा नहीं है.

    राष्ट्रपति ट्रंप ने मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के नाम पर सामरिक रूप से अहम ग्रीनलैंड जैसे द्वीपों पर कब्जे की मंशा का खुलकर इजहार किया. कनाडा जैसे स्वतंत्र और संप्रभु देश को अमेरिका का 51 वां राज्य बनाने की बात कही गयी. राष्ट्रपति ट्रंप ने ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की – जिससे Make for America को Make in America में बदला जा सके.

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    राष्ट्रपति ट्रंप जिस तरह दुनिया के झगड़ों में सीजफायर कराने का दावे करते हैं. जिस तरह अमेरिका का समर्थन नहीं करने वाले मुल्कों पर अधिक टैरिफ लगाते हैं और फिर यूटर्न लेते है. दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्षों या शासनाध्यक्षों पर हल्की टिप्पणी करने लगते हैं – इससे दुनिया भर में सुपर पावर अमेरिका के राष्ट्रपति की बात की वैल्यू खत्म हो गयी है. कूटनीति में एक कड़वी सच्चाई ये भी है कि राष्ट्रपति ट्रंप के दौर में दुनिया के ज्यादातर देश अमेरिका को अविश्वास की नज़रों से देख रहे हैं.

    वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन और ईरान पर हमले को अमेरिका की दुनिया के Energy Market में वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश के तौर पर भी देखी जा सकती है. राष्ट्रपति ट्रंप दुनिया भर में ऐसे नेताओं का समर्थन करते हैं – जो उनके सुर में सुर मिलाते हैं. लेकिन, विरोधी सुर को वो अधिक टैरिफ के जरिए अपने पाले में लाने की कोशिश करते हैं. ये ट्रंप का अमेरिका है – जिसमें उदार लोकतंत्र की स्थापना या साम्यवाद को रोकने के नाम पर सत्ता परिवर्तन का खेल नहीं चल रहा है. इसमें विचारधारा बहुत पीछे छूट चुकी है. राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों में तीन चीज ऊपर है – पहली, अमेरिका का फायदा. दूसरी, अन्य देशों के रेयर अर्थ मिनरल्स हथियाना और तीसरा सामरिक रूप से अहम क्षेत्रों पर कब्जा. अक्सर कहा जाता है कि अमेरिका से दुश्मनी खतरनाक और दोस्ती घातक साबित होती है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि इजरायल का क्या होगा? सवाल ये भी उठ रहा है कि आखिर ट्रंप अमेरिका को मजबूत बना रहे हैं या कमजोर? अमेरिका के मूल चरित्र को समझने के ढाई सौ साल पीछे जाना होगा. अमेरिका के मूल निवासियों ने ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ लंबी लड़ाई के बाद आजादी हासिल की. तब अमेरिकियों का नारा था – प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं. 4 जुलाई 1776 को एक स्वतंत्र राष्ट्र का जन्म हुआ और नाम दिया गया संयुक्त राज्य अमेरिका. आजादी के बाद इस बात पर मंथन शुरू हुआ कि अमेरिका किन मूल्यों और नियमों के साथ आगे बढ़ेगा?

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    ब्रिटिश उपनिवेशवाद से आजादी के बाद अमेरिका के सामने चुनौती थी संविधान बनाने की. ऐसा संविधान, जिसमें हर नागरिक अपनी भागीदारी समझे. एक ऐसी साझी व्यवस्था जिसमें राज्यों के अधिकार सुरक्षित रहें और एक ऐसी केंद्रीय सत्ता भी रहे. जो अमेरिका को बाहरी हमलों से बचा सके.

    1787 में फिलाडेल्फिया में 12 राज्यों के 55 प्रतिनिधियों का सम्मेलन हुआ. जिसकी अध्यक्षता जॉर्ज वाशिंगटन ने की और एक ऐसा लिखित संविधान सामने आया. जिसकी प्रस्तावना में कहा गया है कि इसे अमेरिकी लोगों ने तैयार किया है. दुनिया के पहले लोकतंत्र के पहले चुनाव के लिए जब मतदान हुआ. तो वोटिंग का अधिकार सिर्फ संपत्ति रखने वाले श्वेत पुरुषों को मिला.

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    अमेरिकी संविधान निर्माताओं ने अपने राष्ट्रपति को शक्तिमान तो बनाया. पर उसकी निरंकुशता पर अंकुश लगाने का इंतजाम भी किया. संविधान में सेपरेशन ऑफ पावर यानी शक्तियों के बंटवारे और चेक्स एंड बैलेंस यानी नियंत्रण और संतुलन को आजमाया. शक्तियों को राष्ट्रपति, संसद और न्यायपालिका में बांट दी गयी. राष्ट्रपति बगैर सीनेट की मंजूरी के कुछ भी नहीं कर सकते हैं और कांग्रेस यानी संसद के बनाए कानून को न्यायपालिका खारिज कर सकती है. ऐसे में अमेरिका को चलाने वाले में अहम भूमिका निभाने वाले तीनों अंग एक-दूसरे पर नियंत्रण रखते हैं.

    अमेरिका ने शासन का जो रास्ता चुना, उसने दुनिया को शासन प्रणाली की नई राह दिखा दी. अमेरिकी क्रांति ने तब के शक्तिशाली इंग्लैंड की चूले हिला दी. इंग्लैंड के हाउस ऑफ कॉमन्स में राजा के अधिकारों को सीमित करने का प्रस्ताव पारित करना पड़ा. इंग्लैंड को अपने नजरिए और शासन प्रणाली में बदलाव करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

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    स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के नारे के साथ फ्रांस में भी लोगों ने आवाज बुलंद की और निरंकुश राजशाही का खात्मा किया. यूरोप के दूसरे देशों से भी सामंती व्यवस्था की जड़ें उखड़ने लगीं तो लोकप्रिय संप्रभुता के विचार ने आकार लेना शुरू किया. अमेरिका से निकली लोकतंत्र की राह फ्रांस की क्रांति से गुजरते हुए व्यक्ति की अहमियत और गरिमा पर आ गयी. इसमें व्यक्ति के अधिकार अहम हो गए. उन्नीसवीं सदी में लोकतंत्र के लिए होने वाले संघर्ष में राजनैतिक समानता, आजादी और न्याय की बात जोर-शोर से उठने लगी.

    वक्त के साथ समाजवादी व्यवस्था का विचार भी आकार लेना लगा. रूस में जारशाही के खिलाफ क्रांति हुई और साम्यवादी सरकार की स्थापना हुई. इसके बाद दुनिया दो खांचों में बंट गयी- लोकशाही और समाजवादी. दोनों व्यवस्थाओं के केंद्र में व्यक्ति की गरिमा, उसके अधिकार और न्याय थे.

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    अमेरिका और यूरोप से लोकतंत्र के विस्तार और विकास की जो बयार तेज हुई. उसका असर 20वीं सदी आते-आते एशिया और अफ्रीका के उपनिवेशों में साफ दिखने लगा. उपनिवेशों में भी आजादी और अधिकार की मांग जोर पकड़ने लगी. दूसरी ओर महाशक्तियों के बीच वर्चस्व की लड़ाई प्रथम विश्वयुद्ध में बदल गयी.

    अमेरिका ने हमेशा अलग राह पकड़ने में अपनी भलाई समझी. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान दुनिया की ज्यादातर देशों की अर्थव्यवस्था War Centric थी. जहां यूरोपीय ताकतें युद्ध के लिए हथियार बनाने और गोला-बारूद जमा करने में अपनी पूरी ताकत झोंके हुई थी. वहीं, अमेरिका ने हथियार बनाने की जगह खाने-पीने की चीजों के उत्पादन पर फोकस किया. अनाज के बदले दूसरे देशों से सोना जमा करना शुरू किया. अमेरिका की इस रणनीति ने उसे आर्थिक तौर पर बहुत मजबूत बना दिया. न्यूयार्क में खड़ी स्टैचू ऑफ लिबर्टी दुनियाभर के उपनिवेशों को पहले से ही स्वतंत्रता और समानता के लिए संघर्ष की प्रेरणा दे रही थी. आर्थिक रूप से संपन्न अमेरिका तेजी से अंतरराष्ट्रीय मामलों को सुलझाने में मध्यस्थता भी करने लगा था. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद league of nations और दूसरे विश्वयुद्ध के बाद United Nations जैसी संस्थाओं के गठन में भी अमेरिका ने अहम किरदार निभाया. जिसके बाद एशिया के भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, मलेशिया, म्यांमार जैसे मुल्कों को औपनिवेशिक गुलामी से आजादी का रास्ता साफ हुआ. अमेरिका और USSR के बीच होड़ के बीच दुनिया ने लोकतंत्र और साम्यवाद के नाम पर शीत युद्ध भी देखा. अमेरिका ने अपने फायदे के लिए दुनिया के दूसरे हिस्सों में ना तो तानाशाह खड़े करने में देर लगाया और ना ही उन्हें मिट्टी में मिलाने में.

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    प्रथम विश्व युद्ध ने पूरी दुनिया को तबाही की कगार पर पहुंचा दिया. लेकिन, अमेरिका जंग में शामिल मुल्कों को हथियार से लेकर राशन सप्लाई में अहम भूमिका निभाई. अमेरिका दुनिया का इकलौता ऐसा देश था, जिसने विश्व युद्ध में भी मुनाफा कमाया. यूरोप में फैक्ट्रियों के शटर गिरे और अमेरिकी जमीन पर बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां खड़ी होने लगीं. अमेरिका की ताकत में गजब की बढ़ोत्तरी हुई. ऐसे में अमेरिका की समझ में युद्ध का फायदा संभवत: पहली बार आया.

    दूसरे विश्वयुद्ध की आहट को भांपते हुए अमेरिका ने हथियारों की बड़ी मंडी भी सजा दी. हथियार बेचकर अमेरिका ने मोटी कमाई की और एक तरह से दुनिया का चौधरी बन गया. उस दौर में दुनिया में दो विचारधाराएं तेजी से फैल रही थीं – पहली लोकतांत्रिक पूंजीवाद, जिसकी अगुवाई अमेरिका कर रहा था. दूसरी, साम्यवाद जिसकी अगुवाई सोवियत संघ कर रहा था. तेजी से बदलती विश्व व्यवस्था में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए विचारधारा का लबादा ओढ़े अमेरिका और सोवियत रूस दांव पेंच चल रहे थे, जो आगे चलकर कोल्ड वार में तब्दील हो गया.

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    अमेरिका और USSR के बीच वर्चस्व की लड़ाई में पिस रहे थे – छोटे-छोटे देश. दुनिया में तेल की बढ़ती मांग को देखते हुए अमेरिका ने अरब वर्ल्ड में तेल के कुओं पर अप्रत्यक्ष रूप से कब्जे का प्लान बनाया. ऐसे में अरब देशों के सुरक्षा की गारंटी और डॉलर में तेल कारोबार करने के लिए तैयार कर लिया. इससे अमेरिका बहुत तेजी से आर्थिक तरक्की की सबसे ऊंची सीढ़ी पर पहुंच गया. अमेरिका ने अपने वर्चस्व में बढ़ोत्तरी के लिए सैन्य समझौते किए, दुनिया भर में मिलिट्री बेस बनाए. आज की तारीख में दुनिया के 80 से अधिक देशों में अमेरिका 750 से अधिक मिलिट्री बेस हैं.

    कभी अमेरिका ने अफगानिस्तान में रूस की सेना को रोकने के लिए अलकायदा को हथियार और डॉलर थमाए, तालिबान को खड़ा किया. उसी अल-कायदा ने जब अमेरिका में वर्ल्ड सेंटर पर हमला किया तो आतंकवाद के खिलाफ जंग के नाम पर हथियारों की मंडी सजाई.

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    ये अमेरिका है – जो बीस साल अफगानिस्तान में जंग लड़ने के बाद धीरे से वहां से निकल जाता है और तालिबान का दोबारा कब्जा हो जाता है. ये अमेरिका ही है – जिसने सामूहिक विनाश के हथियार विकसित करने का आरोप लगाते हुए इराक पर हमला किया. इराक के सैन्य तानाशाह सद्दाम हुसैन का नामो-निशान मिटा दिया गया. लेकिन, इराक में सामूहिक विनाश के हथियार नहीं मिले. इराक युद्ध के दौरान अरब वर्ल्ड में असुरक्षा का एक अजीब सा माहौल बना. जिसमें मुल्कों ने अपनी सहूलियत के हिसाब से पाला चुना और हथियारों की डील की. इसमें भी अमेरिका की हथियार बनाने वाली कंपनियों की पांचों उंगलियां घी में रहीं.

    फरवरी 2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया और जंग लंबी खिंची – तो यूरोपीय देशों में असुरक्षा का माहौल पैदा हो गया. यूरोपीय देश अपनी सुरक्षा मजबूत करने के तंत्र पर काम करने लगे. इजरायल-अमेरिका ने जब ईरान पर हमला किया तो एशियाई देश अपनी सुरक्षा के लिए हथियार जमा करने लगे. हाल में हुए बड़े टकरावों यानी रूस-यूक्रेन, इजरायल-हमास, अमेरिका-ईरान ने दुनिया को एहसास करा दिया कि पारंपरिक
    हथियारों के दम पर सरहद की सुरक्षा की गारंटी नहीं है. ऐसे में पारंपरिक हथियारों की जगह नए तरह के सुपर स्मार्ट हथियारों के लिए बाजार के खिड़की दरवाजे खुले हैं, जिसका सबसे बड़ा सौदागर अमेरिका है.

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    ये राष्ट्रपति ट्रंप के दौर का अमेरिका है – जो एक ओर लोकतंत्र की बात करता है, आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की बात करता है. दूसरी ओर, आतंकियों को पालने-पोसने वाले पाकिस्तान के साथ अंतराष्ट्रीय मंचों पर खड़ा दिखता है. ये राष्ट्रपति ट्रंप का खास स्टाइल है – जिसमें पहले वो भीतरखाने दुनिया के किसी हिस्से में टेंशन की स्क्रिप्ट तैयार करते हैं, फिर मध्यस्थता और सीजफायर की बात करते हैं.

    चाहे वियतनाम युद्ध हो…चाहे इराक युद्ध हो…चाहे अफगानिस्तान में युद्ध हो. सवाल उठता है कि इन लंबे युद्धों से अमेरिका को क्या मिला? रूस के खिलाफ युद्ध में यूक्रेन की मदद से अमेरिका को क्या फायदा हुआ? एशिया में इजरायल को खड़ा कर अमेरिका ने क्या हासिल किया? ईरान से उलझने के बाद अमेरिका की नाक ऊंची हुई या नीची? पूरी दुनिया में तनाव पैदा कर अमेरिका ने हथियारों की मंडी कितनी बढ़ाई? ऐसे सवालों के जवाब डिप्लोमेट अपनी-अपनी सहूलियत के हिसाब से देने की कोशिश करते हैं. आज की तारीख में दुनिया के नक्शे पर अमेरिका की पहचान एक ऐसे मुल्क के तौर पर बनती जा रही है – जिसे युद्ध शुरू करना आता है. लेकिन, खत्म करना नहीं. ये सच है कि कुछ दशक पहले तक दुनिया की बड़ी-बड़ी समस्याओं को सुलझाने में अमेरिका अगुवा भूमिका में दिखता था. लेकिन, अब वहां के हुक्मरान हाइपर नेशनलिस्ट एजेंडा आगे बढ़ाने में लगे हैं. दूसरे मुल्कों के क्षेत्र और संसाधनों पर कब्जे के तिकड़म में लगे हैं. लेकिन, एक सच्चाई ये भी है कि राष्ट्रपति ट्रंप सिर्फ कमजोर देशों पर दबाव बनाने में कामयाब रहे – भारत, चीन या रूस जैसे ताकतवर देशों पर नहीं. राष्ट्रपति ट्रंप को ये नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका अगर दुनिया का सुपर पावर बना – तो अपने लोकतांत्रिक मूल्यों की वजह से, अपने समावेशी समाज की वजह से, बेस्ट टैलेंट के इस्तकबाल वाली सोच से, दुनिया की समस्याओं को सुलझाने में अपने लीडर वाले रोल से.

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    First published on: Jul 04, 2026 09:02 PM

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    About the Author

    Anurradha Prasad

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    Arif Khan

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