विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के सामने अब आपत्तियां दर्ज कराने की मांग उठी है. राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता पी. विल्सन ने JPC के अध्यक्ष डॉ. संजय जायसवाल को पत्र लिखकर मांग की है कि विधेयक पर सिर्फ सुझाव और विचार ही नहीं, बल्कि आपत्तियां भी स्पष्ट रूप से आमंत्रित की जाएं. पी. विल्सन ने 29 सितंबर को लिखे अपने पत्र में कहा है कि FCRA संशोधन विधेयक का असर धर्मार्थ संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, धार्मिक संस्थानों, ट्रस्ट, सोसायटियों और NGOs समेत बड़ी संख्या में संस्थाओं पर पड़ सकता है. ऐसे में प्रभावित हितधारक जरूरी नहीं कि कोई वैकल्पिक सुझाव देना चाहें, बल्कि वे किसी प्रस्तावित प्रावधान के सिद्धांत, दायरे, प्रभाव या संवैधानिक और कानूनी पहलुओं पर आपत्ति भी दर्ज करा सकते हैं.
सात दिन का समय अपर्याप्त बताया
पी. विल्सन ने JPC की ओर से सुझाव देने के लिए दी गई सात दिन की समय-सीमा को बेहद कम बताया है. उन्होंने कहा कि विधेयक की धाराओं का अध्ययन करने के साथ-साथ संस्थाओं को अपने प्रबंधन, कानूनी सलाहकारों, ऑडिटरों और अन्य जिम्मेदार लोगों से विचार-विमर्श करना पड़ सकता है. उन्होंने मांग की है कि हितधारकों को अपनी विस्तृत और धारावार राय रखने के लिए कम से कम चार सप्ताह का समय दिया जाए. उनके मुताबिक, इतनी कम अवधि में व्यापक स्तर पर विचार-विमर्श और तथ्यात्मक जानकारी जुटाकर विस्तृत अभ्यावेदन तैयार करना मुश्किल होगा.
देशभर में व्यापक प्रचार की भी मांग
पी. विल्सन ने सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित करने की प्रक्रिया का व्यापक प्रचार करने की भी मांग की है. उन्होंने कहा कि इसके लिए राष्ट्रीय और क्षेत्रीय समाचार पत्रों, टीवी और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, संसद एवं लोकसभा की वेबसाइटों, सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि नोटिस को अंग्रेजी और हिंदी के साथ प्रमुख भारतीय भाषाओं में भी जारी किया जाना चाहिए, ताकि देश के अलग-अलग हिस्सों में काम करने वाले संगठन और अन्य प्रभावित पक्ष इस प्रक्रिया में भाग ले सकें.
FCRA संशोधन विधेयक JPC के पास
गौरतलब है कि Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 को आगे की जांच और विचार के लिए संयुक्त संसदीय समिति को भेजा गया है. समिति की ओर से 28 सितंबर को विधेयक की विशिष्ट धाराओं पर विशेषज्ञों, संस्थानों, ट्रस्ट, सोसायटी, संगठनों, NGOs और अन्य हितधारकों से विचार एवं सुझाव आमंत्रित किए गए थे. इसके लिए सात दिनों की समय-सीमा तय की गई है.