Bharat Ek Soch: विकसित भारत में लोगों का बुढ़ापा खुशहाल होगा या मुश्किलों से भरा?

हमारे देश के बुजुर्गों की कमाई यूरोपीय देशों की तुलना में बहुत कम है. यूरोप और पश्चिमी देशों के बुजुर्ग अधिक उम्र में कमाई के लिए अलग-अलग रास्ते आजमाते हैं. दूसरी ओर, एक अनुमान के मुताबिक, भारत में सरकारी नौकरी से रिटायर बुजुर्गों को पंद्रह हजार से लेकर एक लाख रुपये से अधिक की पेंशन मिल जाती है.

Bharat Ek Soch

हर मिनट दुनिया में करीब 250 बच्चे जन्म लेते हैं. मतलब हर दिन साढ़े तीन लाख बच्चे इस दुनिया में पैदा होते हैं. (News24)

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आठ अरब से अधिक आबादी वाली इस दुनिया में राजनीति और कूटनीति में हमेशा कुछ-न-कुछ ऐसा होता रहता है जिस पर घंटों बहस की जा सकती है. अखबारों में लंबे-चौड़े लेख लिखे जा सकते हैं. लेकिन, आज मैं न तो राजनीति की बात करुंगी, न कूटनीतिक दांव-पेंच की, कोई भी मुल्क लोगों से बनता है और लोग ही किसी मुल्क की असली ताकत होते हैं. ऐसे में भारत एक सोच में आज बात लोगों की . उसमें भी बुजुर्गों की आबादी की, क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे देश में बुर्जुगों की आबादी घट रही है या बढ़ रही है ? अगर बुजुर्गों की आबादी बहुत बढ़ गयी – तो हमारे देश पर क्या असर पड़ेगा ? विकसित भारत में लोगों का बुढ़ापा खुशहाल होगा या मुश्किलों से भरा ? इन दिनों एक नई बहस आकार ले रही है कि भारत उम्मीद से ज्यादा तेजी से बूढ़ा हो रहा है? सवाल ये भी उठ रहा है कि जब भारत आजादी की 100वीं सालगिरह मना रहा होगा – तब देश में बुजुर्गों की आबादी किस रफ्तार से बढ़ रही होगी ? बुजुर्ग हमारे देश में सामाजिक-आर्थिक धरातल पर कहां खड़े होंगे? क्या उनकी जेब में इतना पैसा होगा कि खुशहाल जिंदगी जी सकें? रोजमर्रा के खर्चे और दवाई के लिए उनके सामने नौकरी की मजबूरी नहीं होगी? क्या हमारी बुजुर्ग आबादी सिल्वर डिविडेंड बन कर विकसित भारत की तरक्की की बुलंद कहानी लिखने में दमदार भूमिका निभा सकती है? दुनिया के दूसरे मुल्कों में बुजुर्गों की स्थिति क्या है ? आज कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे.

समय कभी नहीं रुकता…हमेशा अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता रहता है. क्या आपने कभी सोचा है कि हर मिनट दुनिया में कितने बच्चे जन्म लेते हैं ? कितने लोग मरते हैं ? दरअसल, हर मिनट दुनिया में करीब 250 बच्चे जन्म लेते हैं. मतलब हर दिन साढ़े तीन लाख बच्चे इस दुनिया में पैदा होते हैं. इसी तरह हर मिनट दुनिया में 105 से 110 लोगों की मौत होती है. रोजाना करीब एक लाख 60 हजार लोग मरते हैं. जन्म और मृत्यु इस दुनिया का शाश्वत सच है. जन्म और मृत्यु के बीच के समय को जीवन कहते हैं. इसी में हर किसी को अपना किरदार निभाना होता है. भारत की आबादी बढ़ने की रफ्तार को लेकर जारी आंकड़ा बताता है कि में TFR यानी Total Fertility Rate गिरकर 1.9 पर आ गई है. सामान्य बोलचाल की भाषा में TFR को प्रजनन दर कहा जाता है. मतलब, एक महिला अपने जीवनकाल में 1.9 बच्चे को जन्म देती है. जबकि आबादी के Replacement के लिए TFR 2.1 चाहिए. इस स्तर पर बने रहने का मतलब है – किसी भी मुल्क की आबादी न बढ़ेगी और न घटेगी ? आज की तारीख में भारत में दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी रहती है. हमारी आबादी में कामकाजी यानी 15 से 64 साल के लोगों की हिस्सेदारी करीब 68 फीसदी है. लेकिन, जब इन लोगों की उम्र बढ़ेगी–तो भारत कहां युवा देश रह जाएगा ? साल 2050 तक हमारे देश में 60 प्लस उम्र के लोगों की संख्या 32 से 35 करोड़ के बीच होने का अनुमान लगाया जा रहा है. मतलब, अगले 20-25 वर्षों में भारत में हर पांचवां शख्स 60 साल से ऊपर की उम्र का होगा?

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भारत तेजी से बदल रहा है. गांव बदल रहे हैं. शहर बदल रहे हैं. महानगर बदल रहे है. लोगों की जीवनशैली बदल रही है. हमारी Demography यानि जनसांख्यिकी में भी बदलाव दिख रहा है. आज की तारीख में भले ही दुनिया में सबसे अधिक युवा भारत में हैं – लेकिन, अब युवाओं की संख्या घट रही है और बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है. साल 2022 में हमारे देश की आबादी में 60 साल से अधिक उम्र के लोगों की हिस्सेदारी 15.3 करोड़ यानी 10 फीसदी थी. जो 2025 में बढ़कर 15.8 करोड़ पर पहुंच गयी..मतलब करीब11 फीसदी. मौजूदा ट्रेंड के मुताबिक, साल 2035 तक बुजुर्गों की आबादी 20.7 करोड़ के निशान तक पहुंच जाएगी. मतलब, आबादी में बुजुर्गों की हिस्सेदारी 13 से 14% के बीच हो जाएगी. साल 2045 तक बुजुर्गों की संख्या 26.5 से 29 करोड़ के बीच यानी 17 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान है. वहीं, 2050 तक भारत की आबादी में बुजुर्गों की हिस्सेदारी 34.6 से 34.7 करोड़ मतलब 20 से 21 फीसदी के बीच पहुंचने का संभावना है.

साल 2015 में भारत की औसत उम्र 26.8 वर्ष रही – जिसके 2050 तक बढ़कर 38 साल होने का अनुमान है. मतलब, भारत हमेशा युवा देश नहीं रहेगा. हमारी आबादी में बुर्जुगों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ रही है. दक्षिणी राज्य तेज़ी से बूढ़े हो रहे हैं. 2011 में केरल की आबादी में 60 साल से ऊपर के लोगों की हिस्सेदारी 13 फीसदी थी, जो 2036 में बढकर 23 फीसदी हो जाएगी. यानी केरल में हर चौथा शख्स 60 प्लस उम्र का होगा. इसी तरह आंध्र प्रदेश में 2011 में 60 साल से अधिक उम्र के लोगों की संख्या 10.1 प्रतिशत था…जो 2036 में बढकर 19 फीसदी तक पहुंच जाएगा यानी आंध्र में हर पांचवां व्यक्ति बुजुर्गों की कैटगरी में होगा. भारत की डेमेग्राफी के बारे में एक सच्चाई ये भी है कि जिन राज्यों ने आबादी को तेजी से कंट्रोल किया, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की वजह से Life expectency बढ़ी..वहां दिनों-दिन बुजुर्ग बढ़ रहे हैं और युवा कम होते जा रहे हैं.

हमारे देश में न्यूक्लियर फैमिली यानी छोटे परिवारों का चलन हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ा है. युवाओं को रोजी-रोटी के लिए
बड़े शहरों का रुख करना पड़ रहा है. ऐसे में ग्रामीण भारत में बुजुर्गों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है. एक अनुमान के मुताबिक… 2050 तक भारत के करीब 70% बुजुर्ग ग्रामीण इलाकों में जीवन बसर करते दिख सकते हैं. हमारे सामाजिक ताने-बाने में संयुक्त परिवार का ढांचा कमजोर पड़ने और लोगों की औसत आयु बढ़ने से बुजुर्गों की देखभाल का ढांचा चरमराता दिख रहा है. दूसरा, वर्कफोर्स में युवाओं की हिस्सेदारी घटने के आशंका है, जिससे आर्थिक विकास की रफ्तार प्रभावित हो सकती है.

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आज भी भारत में 90 फीसदी से अधिक बुजुर्गों की देखभाल उनके परिवारों के भीतर की जाती है…ऐसे में लगातार घटते संयुक्त परिवार और बढ़ते एकल परिवारों की वजह से बुजुर्गों की देखभाल का पारंपरिक सामाजिक – आर्थिक ढांचा कमजोर पड़ता दिख रहा है. हमारे देश में 58 या 60 साल की उम्र का क्या मतलब होता है? इसका एक मतलब होता है – रिटारमेंट. ऐसे में बड़ा सवाल ये उठता है कि रिटायरमेंट के बाद क्या? रिटायरमेंट के बाद खर्चा कैसे चलेगा? साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, हमारे देश में कुल 24 करोड़ 88 लाख परिवार थे. एक अनुमान के मुताबिक, अब परिवारों की संख्या 30 से 32 करोड़ के बीच होगी. अब जरा इस तस्वीर को दूसरे एंगल से देखने और समझने की कोशिश कीजिए… हमारे देश में फिलहाल केंद्र सरकार के पेंशनरों की संख्या करीब 69 लाख हैं. राज्य सरकारों के पेशनर्स का कोई ठोस आंकड़ा नहीं है. लेकिन, एक अनुमान के मुताबिक, राज्य सरकारों के पेंशनरों की संख्या डेढ़ से दो करोड़ के बीच हो सकती है. साल 1991 में उदारीकरण के बाद प्राइवेट सेक्टर में नौकरियां बढ़ने लगीं. आज की तारीख में अगर प्राइवेट सेक्टर से रिटायर्ड पेंशनरों की संख्या देखी जाए – तो ये आंकड़ा 78 से 80 लाख के बीच जाएगा. Employees’ Pension Scheme के तहत प्राइवेट सेक्टर में रिटायर्ड कर्मचारियों को एक हजार रुपये की न्यूनतम पेंशन मिलती है. जरा सोचिए…महंगाई के इस दौर में एक हजार रुपये महीना में क्या होता है ? ऐसे में हिसाब लगाइए कि 2047 में हमारे देश में बुजुर्गों की आर्थिक स्थिति क्या होगी?

एक अरब 45 करोड़ आबादी वाले हमारे देश में फिलहाल 60 साल से अधिक उम्र वाले बुजुर्गों की संख्या करीब 16 करोड़ है.
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी यानी NIPFP की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 87.5% कामगार किसी सार्वजनिक या निजी पेंशन योजना में शामिल नहीं हैं. केंद्र हो या फिर राज्य सरकारी नौकरियां लगातार कम हो रही हैं. कॉन्ट्रेक्ट पर कर्मचारियों को रखने की रफ्तार बढ़ी है. ऐसे में सरकारी नौकरी के बाद जिंदगी भर अच्छी पेंशन का पुराना सिस्टम धीरे-धीरे कमजोर होता रहा है. रिटायरमेंट के बाद आर्थिक सुरक्षा के लिए नए खिड़की-दरवाजे खोलने की कोशिश हो रही है.

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फिलहाल, प्राइवेट सेक्टर में नौकरी करनेवालों के लिए हर महीने अपनी सैलरी से योगदान देने के बाद भी जितनी पेंशन मिलती है – उससे अधिक रकम कई राज्य सरकारें अपनी योजनाओं के जरिए हर महीने महिलाओं के खाते में ट्रांसफर कर रही हैं. दूसरी ओर, नेशनल पेंशन स्कीम यानी NPS के जरिए रिटायरमेंट के बाद आर्थिक सुरक्षा के लिए रास्ता खोला गया. लंबी अवधी की इस Pension-cum-Investment Scheme में खाताधारकों को पैसा जमा करना पड़ता है. फिलहाल, इस स्कीम से जुड़े खाताधारकों की संख्या 2.2 करोड़ है.

सरकार की ओर से अटल पेंशन योजना और प्रधानमंत्री श्रमयोगी मानधन जैसी योजनाओं के जरिए भी ज्यादा लोगों को पेंशन सिस्टम से जोड़ने की कोशिश की जा रही है. लेकिन, बड़ा सवाल ये है कि महंगाई और खर्चे के बीच जिस तरह की रेस चल रही है और लोगों की कमाई दिनों घट रही है. अब सवाल उठता है कि ऐसे में देश की बड़ी आबादी रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी के लिए आखिर कितनी सेविंग यानी बचत कर पाएगी? मौजूदा समय में पेंशन की जो स्किम चल रही हैं-क्या वो विकसित भारत में बुजुर्गों की आर्थिक जरूरतों को पूरी करने के लिए पर्याप्त होंगी?

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हमारे देश के परिवारों में आधे से अधिक एकल परिवार हैं. संयुक्त परिवार धीरे-धीरे टूट रहे हैं. बेहतर करियर और कमाई के लिए बच्चे माता- पिता को छोड़कर अलग दुनिया बसा रहे हैं. कमाई और खर्च के बीच रेस में युवा सामाजिक जिम्मेदारियों से भी कतराने लगे हैं. गांव से शहर तक बुजुर्गों के सामने अकेलापन एक नई तरह की चुनौती के रूप में सामने आ रहा है.इससे Old Age Home के तेजी से बढ़ने के लिए खिड़की-दरवाजे खुलने लगे हैं. दूसरी ओर, हमारे देश में गरीब और अमीर के बीच खाई लगातार चौड़ी हो रही है. देश के टॉप 1 फीसदी लोगों के पास कमाई का 40 फीसदी हिस्सा है. वहीं, देश के निचले 50% लोगों के पास कमाई का सिर्फ 15 फीसदी हिस्सा है. ग्रामीण भारत में स्थिति और चिंता जनक है. अगर इसी तरह गरीब-अमीर के बीच खाई चौड़ी होती रही– तो हमारे सामाजिक ताने-बाने में बुजुर्गों का दो तरह का वर्ग दिख सकता है. एक, जिसके पास बेहतर गुजर-बसर और इलाज के लिए पैसा होगा. लेकिन अकेलापन भी साथ होगा. दूसरा, जिसके पास रोजमर्रा के खर्च के लिए न पैसा होगा – न परिवार के सदस्य सेवा के साथ होंगे. उसके सामने आखिरी सांस तक अपना खर्च चलाने के लिए काम करने की मजबूरी होगी ?

पिछले कुछ दशकों में अर्थव्यवस्था का चाक इस तरह चला, जिससे समाज में गरीब-अमीर के बीच की खाई और चौड़ी हुई है. साथ ही नौकरी और रोजगार की प्रवृतियों में भी बदलाव हुआ. हमारी वर्कफोर्स में एक नया वर्ग तेजी से उभरा-जिसे गिग वर्कर के नाम से जाना जाता है. हमारी Workforce में ये वो वर्ग है – जो अपनी मर्जी से काम करना चाहता है. घंटे के हिसाब से या काम के हिसाब के कमाई करना चाहता है. गिग वर्कर्स में बड़ी जमात युवाओं की है. आज की तारीख में भारत की वर्कफोर्स में गिगवर्कर्स की संख्या करीब 1.4 करोड़ के आसपास है – जिससे 2029-30 तक 2.35 से 2.50 करोड़ तक पहुंचने की संभावना है. अब सवाल उठता है कि युवा गिग वर्कर्स जिस तरह 20 से 25 साल की उम्र में काम करते है – क्या उस क्षमता के साथ 50 या 60 साल की उम्र में काम कर पाएंगे?

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ऑनलाइन डिलिवरी एजेंट से लेकर कैब ड्राइवर जैसे कामों में जुटे युवाओं की 60 साल के बाद की जिंदगी कैसी होगी? रिटायरमेंट के बाद क्या करेंगे? भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा करीब 50 से 60 करोड़ लोग खेती से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं. हमारे देश में एक किसान की औसत कमाई सभी स्त्रोतों को मिलाकर 10,218 से 13,661 रुपये के बीच है. ऐसे में सवाल उठता है कि महंगाई के इस दौर में एक किसान अपनी छोटी कमाई से क्या खाएगा और क्या भविष्य के लिए बचाएगा?अगर मौजूदा सोच से ही जिंदगी की गाड़ी को आगे बढ़ाया तो 2047 तक भारत में बुजुर्गों का एक ऐसा वर्ग तैयार हो जाएगा..जिनके हाथ और जेब दोनों खाली होंगे. ऐसे में सवाल उठता है कि अगले 15 या 25 वर्षों में देश के बुजुर्गों के पास सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा के नाम पर क्या होगा?

कई स्टडी इशारा कर रही है कि विकसित भारत में बुजुर्ग आबादी का दो तिहाई से अधिक हिस्सा ग्रामीण इलाकों में होगा. ऐसे में बढ़ती बुजुर्ग आबादी के लिए नियमित आय और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना – बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. हाल में जारी NIPFP की रिपोर्ट में पेंशन सिस्टम को दो हिस्सों में विकसित करने का सुझाव दिया गया है. पहला हिस्सा… जरुरतमंद बुजुर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा आधारित पेंशन का हो, जिसका खर्च सरकार उठाए. दूसरा हिस्सा कामगारों के लिए रोजगार आधारित पेंशन का हो, जिसे कर्मचारी और नियोक्ता दोनों के योगदान से आगे बढ़ाया जाये. इससे पेंशन के लिए पूरी तरह से सरकारी खजाने पर निर्भरता खत्म होगी.

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भारत के सामाजिक ताने-बाने में एक बड़ा वर्ग Low Skill और कम कमाई वाला है. तो दूसरा, High Skill और मोटी कमाई वाला है. ये वर्ग संख्या में छोटा है. लेकिन, कमाई के मायने में बहुत आगे है. आज का युवा जब देश के टॉप संस्थानों से पास- आउट होता है- तो उसके करियर की शुरुआत लाखों रुपये के पैकेज से होती है. कुछ का सालाना पैकेज इतना होता है – जिसमें किसी सामान्य मिडिल क्लास परिवार की पूरी जिंदगी आराम से कट जाए. ऐसे युवा देश की आर्थिक तरक्की की रफ्तार बढ़ाने में ईंधन की भूमिका में हैं. लेकिन, उनमें से कुछ ऐसे भी है, जो 10-15 साल की नौकरी में इतना कमा लेते हैं कि 40-45 साल की उम्र रिटायरमेंट जैसा फैसला ले लेते हैं.

इन दिनों GEN Z के बीच एक शब्द बहुत प्रचलित है–FIRE …ये शब्द पढ़े-लिखे युवाओं में सहरसा से सिलिकन वैली तक, नोएडा से न्यूयॉर्क तक, मेरठ से मेलबर्न तक बहुत प्रचलित है. Gen Z के लिए FIRE मतलब financially independent retire early है. मतलब, कुछ वर्षों में इतनी कमाई कर ली जाए–जिससे जल्दी रिटायरमेंट प्लान किया जा सके. रिटायरमेंट के बाद बुनियादी खर्चे के लिए सोचना न पड़े.हाल में मुझे दो ऐसे लोग मिले – जो सरकार की ओर से तय रिटायरमेंट की उम्र के बाद भी नौकरी करना चाहते हैं. एक, इसलिए नौकरी करना चाहता है – जिससे उसके घर का खर्च चल सके. पूरी जिंदगी नौकरी के बाद उसके पास इतनी सेविंग नहीं है–जिससे उसका रोजमर्रा का खर्चा पानी चल सके. दूसरा, इसलिए नौकरी चाहता है – क्योंकि उसके लिए पैसे से ज्यादा दिक्कत खाली समय काटने की है. मतलब, रिटायरमेंट के बाद एक के लिए नौकरी करना मजबूरी है और दूसरे लिए खुद को व्यस्त रखने का जरिया. मेडिकल साइंस जिस रफ्तार से तरक्की कर रहा है – उसमें 60 साल में आदमी शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह फिट रहता है. उसके साथ जिंदगी और कार्यक्षेत्र का लंबा अनुभव जुड़ा होता है. किसी इंसान के जीवनकाल में 60 साल या उससे अधिक की उम्र ऐसी होती है – जब वो अपनी निजी जिंदगी की ज्यादातर जिम्मेदारियों से करीब-करीब हल्का हो चुका होता है. वो अपने हिसाब से काम कर सकता है. प्रयोग करने और रिस्क लेने की स्थिति में होता है. ऐसे में हमारे सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने में ऐसी राह निकालने की जरूरत है – जिससे विकसित भारत में बुजुर्ग बोझ नहीं एक बहुत Productive assets साबित हो सकते हैं.

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विकसित भारत का रास्ता तकनीक और अनुभव के मेल से ही आसान बन सकता है. ऐसे में बेहतर नतीजों के लिए रिटायर्ड कर्मचारियों और टेक्नोफ्रेंडली युवा जोश दोनों का संगम बहुत जरूरी है. किसी भी सरकारी या प्राइवेट प्रोजेक्ट की मॉनटरिंग में अनुभवी रिटायर्ड कर्मचारी अहम भूमिका निभा सकते हैं. हमारे देश में अभी भी शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरे क्षेत्रों से जुड़ी बहुत सी समस्याएं हैं. खासतौर से ग्रामीण क्षेत्रों में, सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में भ्रष्टाचार भी एक बड़ी समस्या है, जिसका ट्रेलर आए दिन दिखता रहता है. ग्रामीण क्षेत्र से शहर तक, सरकारी योजनाओं की मॉनिटरिंग में भी रिटायर्ड और अनुभवी अफसर बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. बस उन्हें सिस्टम से जोड़ने का परदर्शी रास्ता होना चाहिए.

देश में स्कूली और उच्च शिक्षा में भी अच्छे ट्रेंड शिक्षकों की भारी कमी है. सरकार ऐसे रिटायर चुके टीचर और प्रोफेसरों की पहचान कर सकती है – जिन्होंने बदलते वक्त के साथ खुद को अपडेट और अपग्रेड किया. जो युवाओं को नए दौर की चुनौतियों के हिसाब से ट्रेंड करने में प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं. ऐसे रिटायर्ड गुरुओं को पार्ट- टाइम या Voluntary यानी स्वैच्छिक रूप से जोड़ने का रास्ता निकाला जा सकता है. मेंटरशिप और नॉलेज ट्रांसफर का एक सम्मानजनक मैकेनिज्म बना कर वरिष्ठ नागरिको के गहरे अनुभवों का फायदा उठाया जा सकता है. वरिष्ठ नागरिक समाज की गंभीर समस्याओं के सुलझाने में अपना समय और अनुभव दोनों दे सकते हैं. ऐसे में युवा पीढ़ी के लिए रिटायर्ड कर्मचारी या अफसर शिक्षक, ट्रेनर और सलाहकार के रूप में पथ प्रदर्शक बन सकते हैं.

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अब सवाल उठता है कि रिटायर्ड कर्मचारी या अफसर अपनी पेंशन के सहारे चल रही आराम की जिंदगी छोड़कर दोबारा भाग-दौड़ के लिए मैदान में क्यों उतरेंगे ? दरअसल, 60 की उम्र में नौकरी से रिटायर और खुद को समाज की जिम्मेदारी से रिटायर मान चुके लोगों के दिमाग में ये बात बैठानी होगी कि नौकरी के तौर पर उनकी एक जिम्मेदारी खत्म हुई है..लेकिन, समाज और देश के प्रति जिम्मेदारियां अभी बाकी हैं. इससे एक तो बुजुर्गों का खालीपन खत्म होगा. दूसरा देश और समाज को अपने बुजुर्ग लोगों के अनुभव का फायदा मिलेगा.

आज की तारीख में हमारे देश की आबादी एक अरब 45 करोड़ है. एक स्टडी के मुताबिक, 2047 तक हमारी आबादी बढ़कर 160 से 162 करोड़ के बीच होगी. अगर आबादी बढ़ने की रफ्तार लगातार कम होती रही – तो ये आंकड़ा छोटा भी हो सकता है. लेकिन, मेरे मन में एक सवाल उठ रहा है – 2026 में 36 से 40 साल की उम्र में जो लोग आईटी प्रोफेशनल हैं. ब्यूरोक्रेट हैं. सेना से जुड़े हैं. बैंकिंग या टीचिंग सेक्टर से जुड़े हैं. वो 2050 में 60 पार उम्र के होंगे – इनके पास एक ऐसा अनुभव होगा – जिसे सिल्वर डिविडेंड के तौर पर देखा जा सकता है. लेकिन, जो लोग गिग वर्कर्स के रूप में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के लिए काम कर रहे हैं. मसलन, कोई डिलीवरी ब्वॉय के रूप में…कोई कैब ड्राइवर के रूप में…कोई खेतों में किसान के रूप में … तो कोई कंस्ट्रक्शन लेबर के रूप में…ऐसे लोग जब बुजुर्ग होंगे–उनकी शारीरिक शक्ति कम होगी तो उनके पास अपनी रोजमर्रा की जिंदगी चलाने के लिए क्या रास्ता होगा? ऐसे में ये समझना भी जरूरी है कि दुनिया के विकसित देशों में बुजुर्गों की स्थिति क्या है?

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अमेरिका में भी बुजुर्गों की आबादी तेजी से बढ़ रही है. वहां हर पांचवां शख्स 65 साल से अधिक उम्र का है. अमेरिका में रोजाना 65 साल की उम्र पार करनेवाले लोगों की तादाद 10 से 11 हजार के बीच है…इसी तरह जापान की आबादी में हर तीसरा शख्स 65 साल से ऊपर का है. यूरोप के कई देशों में 65 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों की भरमार है. दुनिया के ज्यादातर विकसित देशों में बुजुर्गों की आर्थिक सुरक्षा मॉडल सिर्फ पेंशन तक सीमित नहीं है. मसलन, अमेरिका में Social Security Retirement Benefits जीवनभर की कमाई और Social Security में योगदान के आधार पर हर महीने पेंशन तय होती है…62 साल या उससे अधिक उम्र के पात्र अमेरिकी नागरिक retirement benefits ले सकते हैं. कम कमाई और सीमित संसाधनों वाले 65+ बुजुर्गों के लिए Supplemental Security Income का भी सिस्टम है. यूरोप के कई देशों में सरकारी पेंशन के साथ बुजुर्गों के लिए minimum-income protection और सामाजिक सेवाएं अहम भूमिका निभाती हैं. जापान में Public Pension System बुजुर्गों की आर्थिक सुरक्षा का सबसे बड़ा जरिया है.

ज्यादातर विकसित देशों में रिटायरमेंट के बाद बुजुर्गों की नियमित आय बनाए रखने के लिए सरकारी पेंशन, न्यूनतम आय गारंटी, स्वास्थ्य बीमा, टैक्स में राहत, घर की सुविधा, अकेले रहने वाले बुजुर्गों के लिए सोशल केयर जैसी योजनाएं चल रही हैं. इतना ही नहीं विकसित देशों के ज्यादातर बुजुर्ग रिटायरमेंट के बाद कमाई के दूसरे रास्ते भी तैयार रखते हैं – जिससे उन्हें अपनी रोजमर्रा के खर्चे के लिए दूसरों की ओर न देखना पड़े. लेकिन, उनके सामने पैसे से अधिक कमी देखभाल के लिए किसी अपने की महसूस होती है.

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हमारे देश के बुजुर्गों की कमाई यूरोपीय देशों की तुलना में बहुत कम है. यूरोप और पश्चिमी देशों के बुजुर्ग अधिक उम्र में कमाई के लिए अलग-अलग रास्ते आजमाते हैं. दूसरी ओर, एक अनुमान के मुताबिक, भारत में सरकारी नौकरी से रिटायर बुजुर्गों को पंद्रह हजार से लेकर एक लाख रुपये से अधिक की पेंशन मिल जाती है. प्राइवेट नौकरी वाले बुजुर्ग EPFO की पेंशन के सहारे हैं – जहां न्यूनतम पेंशन एक हजार रुपये है. कई राज्य सरकारें हजार रुपये से अधिक की रकम अपनी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के तहत हर महीने महिलाओं और बुजुर्गों के खाते में डाल रही हैं. वहीं, ग्रामीण और असंगठित क्षेत्र के बुजुर्ग हर महीने तीन हजार से 10 हजार रुपये के बीच ही अपना काम चलाते हैं. हमारे देश में ऐसे बुजुर्गों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है – जिन्हें दो वक्त की रोटी और दवाई के लिए अपनी शारीरिक क्षमता से कई गुना अधिक काम करना पड़ता है. प्रधानमंत्री मोदी 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का टारगेट लेकर आगे बढ़ रहे हैं. ऐसे में इस बात पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि 2047 में हर वर्ग के बुजुर्गों के अनुभवों का सम्मानजनक इस्तेमाल का कौन सा रास्ता निकाला जाए – जिससे हमारा सामाजिक ताना-बाना भी मजबूत बना रहे और आर्थिक रफ्तार बढ़ाने में बुजुर्ग आबादी की दमदार भूमिका बनी रहे. किसी भी परिवार में बुजुर्गों को बोझ नहीं बल्कि ताकत के रूप में देखा जाए.

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लेखक के बारे में

Anurradha Prasad

Anurradha Prasad

अनुराधा प्रसाद के लिए पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं...मिशन है। अपनी साढ़े तीन दशक की टेलीविजन पत्रकारिता में हर तरह का प्रयोग देखा...हर बदलाव की साक्षी रहीं... एक तेज-तर्रार रिपोर्टर से सफल मीडिया उद्यमी बनीं....अपनी तेज नज़र, दूरदर्शी सोच और कलम के दम पर मीडिया जगत में एक दमदार हस्ताक्षर हैं। अनुराधा प्रसाद जी न्यूज़ 24 की एडिटर-इन-चीफ और बीएजी नेटवर्क की सीएमडी हैं  । बतौर टेलीविजन पत्रकार हर भारतीय की आवाज बुलंद करने की ईमानदार कोशिश किया और हमेशा Think First के फलसफे पर आगे बढ़ने में यकीन करती हैं। न्यूज़ 24 पर इतिहास गवाह है...सीरीज के जरिए दर्शकों को अतीत के पन्नों से रू-ब-रू करवाती रही हैं.. तो भारत भाग्य विधाता जैसी सीरिज के जरिए उन संस्थाओं और व्यक्तियों से दर्शकों का परिचय कराया- जो आजाद भारत में लोकतंत्र को  मजबूत और गणतंत्र को बुलंद बनाने में खामोशी से कर्मयोगी की भूमिका में हैं। इसी तरह भारत एक सोच के जरिए वक्त से आगे की सोच से भी दर्शकों का साक्षात्कार कराती रही हैं । ये अनुराधा प्रसाद की मुखर और प्रखर सोच का ही नतीजा है कि न्यूज़ 24 पर माहौल क्या है-कार्यक्रम में आम आदमी की आवाज को  पूरी तवज्जो मिलती है...तो India’s Tiger जैसी टेली सीरीज के जरिए उन गुमनाम जासूसों के योगदान से भी दर्शकों तो मिलवाने का भगीरथ प्रयास हो रहा है, जो खामोशी से अपना काम कर नेपथ्य में चले गए । मंथन का मंच सजा कर समाज और सिस्टम के असरदार लोगों की सोच से दर्शकों का साक्षात्कार कराती रही हैं । 1990 के दशक में प्रसारित आपके The horse's mouth और Let’s Talk शो ने भारतीय टेलीविजन को चर्चित शख्सियतों के इंटरव्यू का नया अंदाज दिया...तो आमने-सामने में आपके तीखे सवालों का देश के ज्यादातर सियासतदानों ने सामना किया। आपकी अगुवाई में बीएजी नेटवर्क ने सामाजिक सरोकार और जागरूकता के संदेश वाले कई कार्यक्रम बनाए तो चुनावी मौसम में नेताओं के चाल, चरित्र और चेहरे को भी रोचक अंदाज में दर्शकों के सामने रखने का सफल प्रयोग किया । अनुराधा प्रसाद भारत में टेलीविजन पत्रकारिता में पहली पीढ़ी की पत्रकार हैं...जिन्होंने अपनी बुलंद सोच और नए-नए शोज से भारतीय टेलीविजन न्यूज़ का चेहरा बदला । अनुराधा प्रसाद भारत को समर्पित एक ऐसी शख्सियत हैं... जो पत्रकारिता के जरिए हमेशा समाज को कुछ नया देने के मिशन में पूरी शिद्दत से जुटी रहती हैं...जुटी हुई हैं और जुटी रहेंगी।
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