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भारत कब नहीं… कैसे बनेगा विश्व गुरु, 2047 से पहले विकसित देशों से क्या-क्या सीखने की है जरूरत?

दुनिया की ज्यादातर दिग्गज टेक कंपनियां अमेरिका की हैं . दुनिया के चिप बाजार पर भी अमेरिकी कंपनियों का वर्चस्व है. सॉफ्टवेयर सिस्टम और क्लाउड कंप्यूटिंग पर भी दुनिया के बाजार में अमेरिकी कंपनियों की पकड़ बरकरार है.

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अक्सर पूछा जाता है कि भारत विश्व गुरु कब बनेगा? लेकिन, मेरे मन में सवाल आता है कि भारत आखिर विश्व गुरु कैसे बनेगा? जिस भारत ने दुनिया को जीरो दिया. बीमारियों के इलाज के लिए आयुर्वेद का ज्ञान दिया. मानव सभ्यता को लोकतंत्र और गणतंत्र का रास्ता दिखाया. पहली व्यवस्थित विश्वविद्यालय से दुनिया का परिचय कराया. दूसरी परंपरा, विचार और लोगों को साथ लेकर चलने की साझा संस्कृति सिखाई. उसी सोच और फलसफे का नतीजा रहा कि 16वीं शताब्दी में दुनिया की GDP यानी Gross Domestic Product में भारत की हिस्सेदारी करीब एक चौथाई तक हुआ करती थी. ये किसी से छिपा नहीं है कि अंग्रेजों ने भारत का कितना शोषण किया. यहां के संसाधनों को कितना लूटा ? भारत अपनी आजादी की 80वीं वर्षगांठ मना चुका है. लेकिन, अभी दुनिया की GDP में भारत की हिस्सेदारी साढ़े तीन से चार फीसदी के बीच है . 5 ट्रिलियन इकोनॉमी का सपना भी अभी अधूरा है. आज की तारीख में दुनिया में GDP के लिहाज के पहले नंबर पर अमेरिका, दूसरे नंबर पर चाइना, तीसरे नंबर पर जर्मनी और चौथे नंबर पर जापान है. दूसरे विश्वयुद्ध में पूरी तरह बर्बाद होने के बाद किस तरह जापान और जर्मनी खड़े हुए, दुनिया की मजबूत अर्थव्यस्था बने. अमेरिका और चाइना में ऐसा क्या है – जिससे एक दुनिया में इनोवेशन और टेक्नोलॉजी का सिकंदर बना और दूसरा ग्लोबल सप्लाई चेन का ‘धुरंधर’. मैन्युफैक्चरिंग में जर्मनी पर कैसे दुनिया का भरोसा कायम है और जापान किस तरह अपने वर्क कल्चर की वजह से पूरी दुनिया को हैरान करता है. आज मैं आपको बताने की कोशिश करूंगी कि भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए विकसित देशों से क्या-क्या सीखने की जरूरत है ? कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे.

भारतीय परंपरा में बदलावों और नए विचारों का हमेशा स्वागत हुआ है. दुनिया में सबसे अधिक युवा शक्ति भारत में है. लेकिन, इतनी बड़ी युवा शक्ति का पूरा फायदा संभवत: भारत को नहीं मिल पा रहा है. हमारी युवा शक्ति के सामने तीन तरह की समस्याएं हैं. पहली, युवा शक्ति का बड़ा हिस्सा Skilled नहीं है. दूसरी, जो Skilled है – वो अनुशासित नहीं है. तीसरी, बेरोजगारों का ज्यादातर समय Shots/Reel देखने में गुजर रहा है. ऐसे में हमें जापान की ओर देखना चाहिए. दूसरे विश्वयुद्ध में जापान पर अमेरिका ने एटम बम गिराया था. उसके बाद भी ये मुल्क अनुशासन और अपने वर्ककल्चर की वजह से दुनिया टॉप 5 अर्थव्यवस्था में बना हुआ है. जापान के लोग सामूहिक अनुशासन, समय के पाबंद, जिम्मेदारी और लगातार सुधार की सोच के साथ आगे बढ़ते हैं. जापान के लोग दफ्तरों में काम के वक्त सिर्फ काम करते हैं – ड्यूटी टाइम में निजी और दूसरे कामों को पाप की तरह देखा जाता है. बेवजह छुट्टी लेने को भी Self Guilt की तरह लिया जाता है. यहीं, वजह है कि कम समय में जापान ने बहुत तेजी से तरक्की की. ऐसे में जापान के Work Culture, Punctuality और Collectivism से सीखा जा सकता है.

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जापान ने अपनी स्पीड, अपने प्रोडक्ट्स की क्वालिटी और स्मार्ट तकनीक के जरिए पूरी दुनिया को सम्मोहित किया. दूसरे विश्वयुद्ध में तबाही के बाद जापान के दोबारा आर्थिक महाशक्ति बनने की कहानी कोई एक दिन में तैयार नहीं हुई. ये कोई चमत्कार नहीं बल्कि वहां के मेहनती और अनुशासित लोगों के लगातार प्रयास का नतीजा है. हर दिन थोड़ा-थोड़ा सुधार वाली सोच का परिणाम है . जापान में रिटायरमेंट की उम्र 65 साल है . लेकिन, 70 साल की उम्र तक भी लोग कंपनियों में 25 साल के युवा की तरह पूरे जोश के साथ काम में जुटे दिख जाएंगे . पिछले कई दशकों में जापान में एक ऐसी कार्य संस्कृति विकसित हुई विकासित हुई -जिसमें ज्यादा से ज्यादा काम करना लोगों का शौक और जुनून बन गया. ईमानदारी से काम को जापान के लोगों ने अपना धर्म और राष्ट्रभक्ति माना . Individual Perfomance से अधिक Team Performance पर जोर दिया गया. ऐसे में मैं से पहले हम वाली सोच ने जापान की तरक्की में बड़ी भूमिका निभाई .

जापान को आर्थिक महाशक्ति बनाने में वहां के 5S और काइजेन सिस्टम का बड़ा योगदान है.

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  1. सेइरी यानी काम की जगह से फालतू चीजों को हटाना
  2. सीटन यानी जरूरी सामान को व्यवस्थित करना
  3. सेइसो यानी कार्यक्षेत्र और मशीन को दुरुस्त रखना
  4. सेइकेत्सु मतलब पहले के तीनों नियमों को तय SOP के मुताबिक चलाना
  5. शित्सुके मतलब अनुशासन बनाए रखना

जापान में बच्चों को स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही समय का पाबंद होना और अनुशासन की कड़ी ट्रेनिंग दी जाती है. वहां, मीटिंग या दफ्तर में तय समय से कुछ मिनट पहले पहुंचना लोगों की आदत का हिस्सा है . समय का सम्मान यानी Punchuality को व्यक्तिगत आदत नहीं सामाजिक जिम्मेदारी की तरह लिया जाता है. अनुशासन, समय की पाबंदी और सामूहिक जिम्मेदारी की वजह से लोगों की उत्पादकता कई गुना बढ़ जाती है. वहीं, भारत में अनुशासन और समय की पाबंदी को बहुत सख्ती से नहीं लिया जाता है. टीम के प्रदर्शन से अधिक व्यक्तिगत प्रदर्शन पर जोर रहता है .

जापान के लोग Kaizen का भी पालन करते हैं . मतलब, हर दिन थोड़ा बेहतर करने की सोच . इससे काम की गुणवत्ता में लगातार सुधार होता है. जापान की तरक्की में Kaizen ने बड़ी भूमिका निभाई है. जापान में काम के वक्त सिर्फ और सिर्फ काम का कल्चर है . वहीं, भारत में दफ्तर में काम के साथ कई चीजें चलती रहती हैं . ऐसे में हमारे यहां जापान की तुलना में प्रति व्यक्ति प्रोडक्टिविटी कम है .

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आज की तारीख में जापान युवा आबादी और Workforce की कमी से जूझ रहा है. ऐसे में जापान ने Production जारी रखने के लिए ओवरटाइम के नियमों में फिर बदलाव किया है. नए नियम कर्मचारियों को खास परिस्थितियों में महीने में 100 घंटे तक ओवरटाइम की इजाजत देते हैं . वहीं, भारत में युवा रोजाना अपना 4 से 6 घंटे तक का समय स्मार्टफोन पर बिताते हैं . मतलब, महीने में 100 घंटे से अधिक समय हमारे युवाओं का स्मार्टफोन पर Reel/Shots और सोशल मीडिया पोस्ट पर खर्च होता है . जापान के अनुशासन + वर्क कल्चर + डिजिटल तकनीक + क्वालिटी प्रोडक्शन + सामूहिक जिम्मेदारी + काइजेन यानी हर दिन सुधार में बहुत कुछ सीखने लायक है . भारत की युवा शक्ति को मंथन करना चाहिए कि अपनी क्षमता का बेहतर से बेहतर इस्तेमाल किस तरह किया जाए ?

जापान की बुलेट ट्रेन शिंकासेन साल भर में औसत एक मिनट से भी कम लेट होती है . अगर वहां ट्रेन कभी 20 से 35 सेकंड लेट हो जाए – तो अफसर और ड्राइवर देरी से लिए लाउडस्पीकर पर पैसेंजर से सार्वजनिक रूप से माफी मांगते हैं. क्या भारत में ऐसा सोच सकते हैं ? जापान के Toyota, Sony और Honda जैसे ब्रांड पूरी दुनिया में अपनी क्वालिटी के लिए जाने जाते हैं . जापान में स्कूल के दौरान ही बच्चों के दिमाग में ये बात बैठा दी जाती है कि छोटा लेकिन हर दिन बेहतरी के लिए बदलाव. इसे Kaizen कहा जाता है . जापान ने दफ्तरों में एक ऐसा Work Culture विकसित किया – जिसमें कर्मचारी अपने काम के लिए खुद को नैतिक रुप से जिम्मेदार मानता है, उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई दूसरा उसके काम को देख रहा है या नहीं . लेकिन, हमारे देश के दफ्तर और कारखानों में जिस तरह की कार्य संस्कृति है – उसमें 8 या 9 घंटे की शिफ्ट के दौरान बड़ा हिस्सा इधर-उधर या छोटे-बड़े ब्रेक में निकल जाता है. क्या भारत अपनी युवा शक्ति की क्षमताओं का सही इस्तेमाल करने के लिए जापान की अनुशासन संस्कृति में से कुछ ग्रहण करेगा? जापान के बाद बात जर्मनी की . दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी भी एक तरह से खंडहर में बदल चुका था . लेकिन, लंबे समय से ये मुल्क एक औद्योगिक महाशक्ति बना हुआ है . Mercedes Benz, BMW, Porsche, Volkswagen जैसी कंपनियां जर्मनी की हैं . जर्मन गाड़ियों की डिमांड पूरी दुनिया में है – जो अपनी बेहतर गुणवत्ता, टिकाऊपन और भरोसे के लिए जानी जाती हैं. Quality Manufacturing में जर्मनी दुनिया की एक बड़ी ताकत बना हुआ है . ऐसे में जर्मनी के Manufacturing Model में बहुत कुछ ऐसा है – जिससे कुछ रास्ता भारत अपनी जरूरतों के हिसाब से निकालकर Make in India को Make for World में बदल सकता है.

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दुनिया के ज्यादातर बड़े शहरों में संभवत: रईसों की पहली पसंद के तौर पर मर्सिडीज-बेंज, BMW जैसी लग्जरी गाड़ियां दिख जाएंगी. तो पोर्श और फॉक्सवैगन जैसी गाड़ियां बताती है कि Made in Germany पर भरोसा कायम है . साल 1945 में दूसरा विश्व युद्ध खत्म हुआ तो जर्मनी के शहर खंडहर में तब्दील हो चुके थे. उद्योग-धंधे तबाह हो चुके थे और ज्यादातर कारखाने मलबे का ढेर बन चुके थे. बुनियादी ढांचा बुरी तरह तहस-नहस हो चुका था . लेकिन, जर्मनी ने ऐसी राह चुनी. जिससे एक- डेढ़ दशक में कारखानों की तस्वीर बदलने लगी. जर्मनी देखते ही देखते मशीन,कार, केमिकल, इंलेक्ट्रिकल और इंजीनियरिंग प्रोडक्ट का दुनिया में भरोसेमंद निर्माता बन गया .

दरअसल, जर्मनी ने एकसाथ कई मोर्चों पर काम शुरू किया . इसमें पहली शर्त रखी गयी कि सिर्फ प्रोडक्शन नहीं क्वालिटी. मतलब, जर्मनी ने ऐसा माल बनाना शुरू किया–जिसकी कीमत भले ही ज्यादा हो . लेकिन, क्वालिटी से कोई समझौता नहीं . आज की तारीख में भारत को भी जर्मनी से ये सबक सीखने की जरूरत है,जिससे Made in India, trusted by the world बन सके . जर्मनी की असली ताकत वहां की बड़ी कंपनियां नहीं – वहां के छोटे और मझोले उद्योग रहे हैं. जर्मनी के नक्शे पर खड़ी ऐसी हजारों मझोली कंपनियां हैं– जिनकी खास तरह के प्रोडक्ट या मशीन तैयार करने में पूरी दुनिया में विशेषज्ञता है . जर्मनी के Mittelstand businesses की ग्लोबल सप्लाई चेन में खास जगह है. ऐसे भारत के लाखों छोटे उद्योग यानि MSMEs को छोटे कारोबार की जगह इस तरह तैयार करना होगा – जिससे वो Global Supply Chain में दमदार भूमिका निभा सकें .

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जर्मनी ने अपने उद्योगों के लिए Skilled Manpower तैयार करने के लिए खास रणनीति अपनाई. वहां की शिक्षा व्यवस्था में कुछ इस तरह खिड़की-दरवाजे खोले गए हैं – जिससे स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही युवा इंडस्ट्री में काम-काज की प्रैक्टिकल ट्रेनिंग भी लेते हैं . इससे डिग्री और नौकरी के बीच खाई कम हो जाती है. आज की तारीख में भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है – लेकिन, बहुत कम के पास उद्योगों में काम करने के लिए Skill है . ऐसे में भारत को भी अपने स्कूल-कॉलेज को इंडस्ट्री के साथ जोड़ने की दरकार है, जिससे Skilled Workforce तैयार की जा सके . जर्मनी की तरह रिसर्च और इनोवेशन को भी यूनिवर्सिटी से जोड़ने की जरूरत है – जिससे तकनीक में आते बदलावों के हिसाब से Workforce को अपडेट या अपग्रेड किया जा सके .

जर्मन गाड़ियां, मशीनरी, प्रोडक्ड दुनिया के हर बाजार में मिल जाएंगी. क्योंकि, जर्मन कंपनियों ने अपने प्रोडक्ट Global Market को ध्यान में रखते हुए तैयार किया . जर्मनी के बड़े और छोटे उद्योगों की रणनीति के केंद्र में Export रहा. ऐसे में भारत को भी अपने प्रोडक्ट Export mindset को ध्यान में रखते हुए तैयार करना चाहिए . जर्मनी की असली ताकत वहां की बड़ी कंपनियां नहीं हजारों छोटे और मध्यम आकार के कंपनियां यानि Mittelstand Businesses हैं . इन कंपनियों की खासियत ये रही कि खास मशीन, टेक्नोलॉजी और इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन के मामले में ग्लोब पर खास पहचान बनाई . लेकिन, आज की तारीख में जर्मनी भी दबाव में है . Made in Germany Products को चाइना से कड़ी टक्कर मिल रही है . महंगी ऊर्जा, इलेक्ट्रिक गाड़ियों का बढ़ता चलन और कमजोर वैश्विक मांग ने Germany के Manufacturing Model पर दबाव बढ़ा दिया है . ऐसे में अब चाइना की बात करना भी जरूरी है . GDP के लिहाज से दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था . पिछले कुछ दशकों में चीन ने जिस तरह से तरक्की की. उसमें बहुत कुछ ऐसा है – जिससे भारत सबक ले सकता है .

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साल 2025 में चीन की फैक्ट्रियों में बना 3.77 ट्रिलियन डॉलर का सामान दुनियाभर के बाजारों में पहुंचा. दुनिया के हर तरह की बाजार और लोगों की खरीदारी क्षमता देखते हुए चीन माल तैयार करता है. अपनी स्पीड, इनोवेशन और अत्याधुनिक तकनीक के दम पर चीन दुनिया में सबसे तेजी से और सबसे सस्ता प्रोडक्ट बनाने में टॉप पर है. इसके लिए चाइना की सरकार ने माहौल तैयार किया. Special Economic Zone बनाए. इससे चाइना में किसी प्रोडक्ट की पूरी सप्लाई चेन अक्सर एक ही इलाके में मिल जाती है . इतना ही नहीं, उद्योगों की राह में खड़े स्पीड ब्रेकर्स हटाए गए और चीन की फैक्ट्रियों में तैयार प्रोडक्ट्स को दुनियाभर के बाजारों में पहुंचाने की राह आसान बनाई गई . चाइना को World Factory बनाने में वहां की Skilled Work Force का बड़ा योगदान है. चीन ने अपनी वर्क फोर्स को सेना के जवानों की तरह अनुशासित. समर्पित और जुझारू बनाया है . युवाओं की तकनीकी शिक्षा पर जोर दिया. जिससे मैन्युफैक्चरिंग में अपना योगदान दे सकें . चीन के लोगों में ये भावना कूट-कूट कर भरी है कि फैक्ट्री में मौजूदगी का मतलब है एक-एक मिनट काम को समर्पित और अपने काम का सेल्फ असेसमेंट .

चाइना सस्ता माल तैयार करने के लिए अपने कारखानों में बड़े पैमाने पर Automation का भी इस्तेमाल कर रहा है. आज का चीन सिर्फ Labour Intensive Manufacturing पर निर्भर नहीं है. Robotics, AI के साथ स्मार्ट फैक्ट्री की ओर भी चीन तेजी से बढ़ रहा है. साल 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, चीन की फैक्ट्रियों में करीब 2.95 लाख रोबोर्ट्स काम कर रहे थे . आज का चीन Quantity के साथ Quality पर भी जोर दे रहा है . रिसर्च और इनोवेशन के मामले में अमेरिका को टक्कर दे रहा है . दुनिया के नक्शे पर शायद ही कोई ऐसा देश हो, जहां चीन में बने सामान नहीं बिकते हों . चाइना के मैन्युफैक्चरिंग मॉडल की कॉपी करना जरूरी नहीं . लेकिन, चाइना से ये सबक लिया जा सकता है कि सिर्फ Factory खड़ी करना ही नहीं उसके लिए Eco System बनाना भी जरूरी है . मेक इन इंडिया के साथ ग्लोबल सप्लाई चेन और मार्केट को ध्यान में रखते हुए बड़े Scale पर प्रोडक्शन के लिए Infrastructure तैयार किया जा सकता है . बड़े उद्योग और छोटे उद्योगों के बीच गठजोड़ जरूरी है, जिससे दोनों एक-दूसरे की ताकत बन सकें . भारत के उद्योगों को भी Speed, Skill और Automation के क्षेत्र में बहुत काम करने की जरूरत है .

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चाइना की असली ताकत बड़े पैमाने पर Production का Eco System है . चीन ने सिर्फ फैक्ट्री या कारखाना लगाने को कारोबार नहीं माना – किसी कारोबोर के फलने-फूलने, प्रोडक्शन और तैयार माल खपाने के लिए पूरा तंत्र खड़ा किया . चीन के Industrial Production System में ऐसा बहुत कुछ है – जिससे भारत की तरक्की की रफ्तार बढ़ाने में मदद मिल सकती है . लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि अमेरिका ने किस तरह दुनिया पर दबदबा कायम किया? दरअसल, आधुनिक तकनीकी क्रांति का सबसे बड़ा मंच अमेरिका में ही तैयार हुआ. Google, NVIDIA, Microsoft, Apple, Amazon, Meta, Tesla, Oracle जैसी कंपनियां अमेरिका की हैं – इनमें से ज्यादातर दुनिया के डिजिटल सिस्टम को चलाने में रीढ़ की भूमिका में हैं . लेकिन, अमेरिका ने ये सब एक दिन में हासिल नहीं किया . Research & Development पर भारी-भरकम खर्च किया. रिसर्च को बाजार, प्रतिभा को पूंजी और विचार को कंपनी में बदलने का पूरा Ecosystem तैयार किया – जिसकी एक बुलंद तस्वीर सिलिकन वैली है – जहां दुनियाभर के सबसे टैलेंटेड युवाओं के हुनर से तकनीक को नया आसमान मिला .

दुनिया की ज्यादातर दिग्गज टेक कंपनियां अमेरिका की हैं . दुनिया के चिप बाजार पर भी अमेरिकी कंपनियों का वर्चस्व है. सॉफ्टवेयर सिस्टम और क्लाउड कंप्यूटिंग पर भी दुनिया के बाजार में अमेरिकी कंपनियों की पकड़ बरकरार है. अमेरिका दुनिया भर के बेहतरीन Technical Telent की पसंद नंबर वन बना हुआ है . माइक्रोसॉफ्ट हो या मेटा. टेस्ला हो या फिर ब्रॉडकॉम. लॉकहीड मार्टिन हो या बोइंग डिफेंस. अमेरिका की ऐसी कई कंपनियां हैं – जिनका पूरी दुनिया में डंका बज रहा है . दरअसल, अमेरिका ने सिर्फ रिसर्च पर खर्च नहीं किया बल्कि इसे अपनी आर्थिक बनाया . नाकामयाबी से डरने की जगह प्रयोग की संस्कृति को बढ़ावा दिया. ऐसी सोच को व्यवहारिक रूप से बढ़ावा दिया गया कि University में विचार पैदा होता है और प्रयोगशाला में तकनीक . Startup उस तकनीक को Product में बदलता है . उद्योग उस प्रोडक्ट को दुनिया तक पहुंचाता है .

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अमेरिका ने University से Startup की यात्रा को आसान और छोटा बनाया . वहां खड़ी ज्यादातर यूनिवर्सिटी मसलन MIT, Stanford, Harvard सिर्फ डिग्री थमाने वाले संस्थान नहीं हैं. अमेरिकी विश्विद्यालय नई टेक्नोलॉजी, पेटेंट, स्टार्टअप और इंडस्ट्री पार्टनरशिप का ईको-सिस्टम तैयार करते हैं. ऐसे में अमेरिका में उद्योग जगत ने हमेशा रिसर्च और इनोवेशन में अपना फायदा देखा. आज की तारीख में अमेरिका में रिसर्च और डेवलपमेंट पर होने वाले कुल खर्च में से सिर्फ 25 फीसदी सरकार करती है. बाकी का 75 फीसदी हिस्सा प्राइवेट सेक्टर खर्च करता है . ऐसे में हजारों साल से ज्ञान, विज्ञान और प्रयोग की धरती रहे भारत को विकिसत राष्ट्र बनाने के लिए रिसर्च एंड डेवलपेंट के क्षेत्र में बजट बढ़ाना होगा . भविष्य की तकनीक और इनवोशन को बढ़ावा देने के लिए यूनिवर्सिटी कैंपस से कारोबार के बीच एक मजबूत ईको-सिस्टम बनाने की जरूरत है . जैसा अमेरिका ने किया . भारत को ऐसा रास्ता निकालता होगा – जिससे यहां के बेहतरीन ब्रेन बेहतर मौके की तलाश में देश छोड़कर बाहर न जाएं. भारत में ही उन्हें बेहतर रिसर्च, इनोवेशन और करियर का मौका मिले . 2047 तक विकसित भारत बनाने के लिए सरकार को Risk Taking Research में पैसा लगाना होगा. यूनिवर्सिटी कैंपस से लेकर फैक्ट्री तक इनोवेशन की बढ़ावा देने और कारोबारी कामयाबी के लिए प्राइवेट सेक्टर को कदम आगे बढ़ाना होगा .

अमेरिका ने कई बार ऐसी तकनीक में पैसा लगाया – जिसका तुरंत कोई व्यवसायिक फायदा नहीं था. Internet, GPS, Semiconductor Technology, Quantum Computing, Robotics जैसी तकनीक में निवेश का अमेरिका को भले ही तुरंत फायदा नहीं मिला. लेकिन, आज अपनी Technology के दम पर ही दुनिया का सुपरपावर बना हुआ है . ऐसे में Research & Development पर निवेश वर्तमान से अधिक भविष्य के लिए निवेश है . अमेरिका ने बड़ी चतुराई से Research & Development को Industry से जोड़ा . इससे यूनिवर्सिटी और इंडस्ट्री आपस में जुड़ गये . नतीजा ये निकला कि रिसर्च सिर्फ सरकारी तंत्र के भरोसे नहीं रहा . अमेरिका में Research & Development के बजट का करीब 75 फीसदी हिस्सा Industry से आता है . आज की तारीख में अमेरिका अपनी GDP का करीब 3.5% Research & Development पर खर्च करता है . वहीं, चीन अपनी GDP का 2.8%. Economic Survey 2025-26 के मुताबिक, भारत में Research & Development का बजट 0.64% रहा . अब अमेरिका की राह पर चीन भी तेजी से बढ़ रहा है . ऐसे में भारत को विश्व गुरु बनने के लिए दुनिया के विकसित देशों जैसा बनने की जरूरत नहीं है – लेकिन, उनकी सफलता की कहानियों से उन अनुभवों को भारत से हिसाब से ढालने की जरूरत है – जिससे तरक्की की रफ्तार को तेज किया जा सके . पहला, Research & Development पर खर्चा बढ़ाना होगा . दूसरा, रिसर्च को यूनिवर्सिटी और इंडस्ट्री से जोड़ना होगा . तीसरा, प्रोडक्शन स्केल बढ़ाने के लिए चीन जैसा Ecosystem बनना होगा . चौथा, जर्मनी की तरह Quality Production पर जोर देना होगा – जिससे भारतीय प्रोडक्ट पर दुनिया का भरोसा बढ़ सके . पांचवां, जापान की तरह Highly Skilled & Disciplined Work Force तैयार करने के लिए स्कूल के दिनों से ही ट्रेनिंग . बदलती तकनीक और दुनिया में होते बदलावों बीच भारत को तेजी से खड़ी अर्थव्यवस्थाओं के उन तत्वों को पहचानने और अपने देश की जरूरतों के हिसाब से उसे अपनाने की जरूरत है – जिससे तरक्की के लिए एक नया फलसफा निकल सके .

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First published on: Sep 05, 2026 09:14 PM

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About the Author

Anurradha Prasad

अनुराधा प्रसाद के लिए पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं...मिशन है। अपनी साढ़े तीन दशक की टेलीविजन पत्रकारिता में हर तरह का प्रयोग देखा...हर बदलाव की साक्षी रहीं... एक तेज-तर्रार रिपोर्टर से सफल मीडिया उद्यमी बनीं....अपनी तेज नज़र, दूरदर्शी सोच और कलम के दम पर मीडिया जगत में एक दमदार हस्ताक्षर हैं। अनुराधा प्रसाद जी न्यूज़ 24 की एडिटर-इन-चीफ और बीएजी नेटवर्क की सीएमडी हैं  । बतौर टेलीविजन पत्रकार हर भारतीय की आवाज बुलंद करने की ईमानदार कोशिश किया और हमेशा Think First के फलसफे पर आगे बढ़ने में यकीन करती हैं। न्यूज़ 24 पर इतिहास गवाह है...सीरीज के जरिए दर्शकों को अतीत के पन्नों से रू-ब-रू करवाती रही हैं.. तो भारत भाग्य विधाता जैसी सीरिज के जरिए उन संस्थाओं और व्यक्तियों से दर्शकों का परिचय कराया- जो आजाद भारत में लोकतंत्र को  मजबूत और गणतंत्र को बुलंद बनाने में खामोशी से कर्मयोगी की भूमिका में हैं। इसी तरह भारत एक सोच के जरिए वक्त से आगे की सोच से भी दर्शकों का साक्षात्कार कराती रही हैं । ये अनुराधा प्रसाद की मुखर और प्रखर सोच का ही नतीजा है कि न्यूज़ 24 पर माहौल क्या है-कार्यक्रम में आम आदमी की आवाज को  पूरी तवज्जो मिलती है...तो India’s Tiger जैसी टेली सीरीज के जरिए उन गुमनाम जासूसों के योगदान से भी दर्शकों तो मिलवाने का भगीरथ प्रयास हो रहा है, जो खामोशी से अपना काम कर नेपथ्य में चले गए । मंथन का मंच सजा कर समाज और सिस्टम के असरदार लोगों की सोच से दर्शकों का साक्षात्कार कराती रही हैं । 1990 के दशक में प्रसारित आपके The horse's mouth और Let’s Talk शो ने भारतीय टेलीविजन को चर्चित शख्सियतों के इंटरव्यू का नया अंदाज दिया...तो आमने-सामने में आपके तीखे सवालों का देश के ज्यादातर सियासतदानों ने सामना किया। आपकी अगुवाई में बीएजी नेटवर्क ने सामाजिक सरोकार और जागरूकता के संदेश वाले कई कार्यक्रम बनाए तो चुनावी मौसम में नेताओं के चाल, चरित्र और चेहरे को भी रोचक अंदाज में दर्शकों के सामने रखने का सफल प्रयोग किया । अनुराधा प्रसाद भारत में टेलीविजन पत्रकारिता में पहली पीढ़ी की पत्रकार हैं...जिन्होंने अपनी बुलंद सोच और नए-नए शोज से भारतीय टेलीविजन न्यूज़ का चेहरा बदला । अनुराधा प्रसाद भारत को समर्पित एक ऐसी शख्सियत हैं... जो पत्रकारिता के जरिए हमेशा समाज को कुछ नया देने के मिशन में पूरी शिद्दत से जुटी रहती हैं...जुटी हुई हैं और जुटी रहेंगी।

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