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भारत एक सोच

Bharat Ek Soch: Bihar में महिला वोटिंग में आगे, विधानसभा में पीछे क्यों?

Bharat Ek Soch: बिहार में महिला वोटरों की संख्या साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा है और हर चुनाव में उनकी भागीदारी बढ़ रही है. बावजूद इसके, विधानसभा में उनकी मौजूदगी घटती जा रही है. 2020 में केवल 26 महिलाएं ही विधायक बनीं. सवाल है जब महिलाएं मतदान में पुरुषों से आगे निकल रही हैं, तो सत्ता की कुर्सियों से वो दूर क्यों हैं? क्या राजनीतिक दल उन्हें सिर्फ 'वोट बैंक' मानते हैं?

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Written By: News24 हिंदी Updated: Sep 20, 2025 21:55
Anuradha Prasad
Anuradha Prasad

Bharat Ek Soch: बिहार में इन दिनों तीन मुद्दों पर सबसे अधिक चर्चा हो रही है. पहली, इलेक्शन कमीशन चुनाव की तारीखों का ऐलान कब करेगा? दूसरी, अबकी बार सूबे की महिला वोटरों का आशीर्वाद किसे मिलेगा? तीसरी, प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी से उम्मीदवार कौन होगा? क्योंकि, जनसुराज पार्टी के उम्मीदवारों की लिस्ट आने के बाद कुछ हद तक तस्वीर साफ होगी कि स्कूल बैग चुनाव चिन्ह से किसे ज्यादा नुकसान या फायदा होगा? लेकिन आज बात होगी बिहार की महिलाओं की, जिन्हें हर राजनीतिक दल किंगमेकर के रूप में देख रहा है, जिनके वोट के सहारे सत्ता की वैतरणी पार करने का सपना देखा जा रहा है. एक सच्चाई ये भी है कि राजनीतिक दल चुनावों में आधी आबादी का वोट तो चाहते हैं लेकिन उन्हें टिकट देने में हिचकते हैं.

इस बार भी हर गठबंधन और हर दल की नजर जिताऊ उम्मीदवारों पर है. ऐसे में सवाल उठता है कि 2025 में बिहार के सियासी अखाड़े में खड़े राजनीतिक दल कितनी महिला उम्मीदवारों को टिकट देंगे? उसमें से कितनी महिलाएं चुनाव जीत कर विधानसभा पहुंच पाएंगी? आखिर बिहार में किसी राजनीतिक दल के अध्यक्ष की कुर्सी पर कोई महिला क्यों नहीं है? आज़ादी के बाद से बिहार को महिला मुख्यमंत्री के तौर पर सिर्फ राबड़ी देवी मिलीं, वो किन परिस्थितियों में सीएम बनीं, ये जगजाहिर है. लेकिन किसी सामान्य परिवार की महिला सीएम की कुर्सी तक क्यों नहीं पहुंची? वो दिन कब आएगा– जब बिहार में विधानसभा की सीटों पर आधी महिलाएं दिखेंगी? आज ऐसे ही सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे.

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2020 चुनाव में किसे मिले कितने वोट?

बिहार में महिला वोटरों की संख्या साढ़े तीन करोड़ से अधिक है. अगर इसमें से आधा वोट भी किसी एक राजनीतिक दल को चला गया तो संभवत: सूबे में उसकी अपने दम पर सरकार बननी तय है, वो भी प्रचंड बहुमत से. साल 2020 के बिहार चुनाव में NDA को कुल वोट मिले, एक करोड़ 57 लाख. इसमें BJP, JDU, मुकेश सहनी की VIP और जीतनराम मांझी की HAM को मिले वोट शामिल हैं. इसी तरह, महागठबंधन के खाते में आए एक करोड़ 56 लाख 91 हजार वोट. इसमें RJD, Congress और लेफ्ट पार्टियां शामिल हैं. पिछले कुछ चुनावों का ट्रेंड साफ इशारा कर रहा है कि बिहार में महिलाओं का वोट प्रतिशत लगातार बढ़ रहा है. साल 2020 में सूबे की 243 विधानसभा सीटों में से 167 सीटों पर महिलाओं ने पुरुषों की तुलना में अधिक मतदान किया. मतलब, कौन विधानसभा जाएगा और कौन नहीं… ये तय करने में महिला वोटरों ने अधिक निर्णायक भूमिका निभाई. बिहार में कभी लालू प्रसाद यादव ने जिस MY यानी मुस्लिम + यादव समीकरण के सहारे 15 वर्षों तक राज किया, उसी बिहार में अब तेजस्वी यादव के लिए MY का मतलब महिला + यूथ है.

चिराग पासवान के लिए भी MY का मतलब महिला + यूथ है. प्रधानमंत्री मोदी महिलाओं को “साइलेंट वोटर” कहते हैं तो नीतीश कुमार के पिछले 20 वर्षों से सत्ता में बने रहने की एक बड़ी वजह महिला वोटरों का साथ मिलना है. ऐसे में 2025 में बिहार के वोटयुद्ध में महिलाओं का वोट हासिल करने के लिए किस तरह के दांव आज़माए जा रहे हैं, इसे जानना और समझना भी जरूरी है.

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तेजस्वी यादव ने किया सरकार बनने पर माई-बहिन योजना का ऐलान

नीतीश सरकार ने सूबे की महिलाओं की राजनीतिक और सामाजिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए पंचायत स्तर पर 50% आरक्षण लागू किया है. असर ये रहा कि लोकतंत्र की बुनियाद यानी पंचायत और स्थानीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी 55% तक पहुंच गई है. इसी तरह बिहार की सरकारी नौकरियों में महिलाओं को मिलने वाले 35% आरक्षण में डोमिसाइल नीति लागू कर दी गई है. महिला वोटरों को अपने साथ जोड़ने के लिए तेजस्वी यादव ने महागठबंधन की सरकार बनने पर माई-बहिन योजना के तहत महिलाओं को हर महीने ढाई हजार रुपये देने का वादा किया है. प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी भी महिलाओं के लिए कई वादे कर चुकी है. बिहार पुलिस से लेकर सरकारी स्कूलों तक में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है लेकिन, बिहार विधानसभा के भीतर गिनती की महिला सदस्य हैं. हैरानी की बात है कि विधानसभा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने की जगह घट रही है. 2010 में जहां 34 महिलाएं विधानसभा चुनाव जीतने में कामयाब रहीं, वहीं 2015 में ये संख्या गिरकर 28 हो गई और 2020 में तो 26 पर आ गई. वहीं दूसरी ओर महिलाओं का वोट प्रतिशत लगातार बढ़ा है. अब सवाल उठता है कि बिहार उल्टी गंगा क्यों बह रही है? बिहार की आधी आबादी विधानसभा पहुंचने में पीछे क्यों छूट जाती है?

कब कितनी महिलाएं पहुंची विधानसभा?

आजादी के बाद यानी 1952 से लेकर 2020 तक बिहार विधानसभा में करीब 315 महिलाएं ही पहुंच पाई हैं. वहीं, पुरुष विधायकों का आंकड़ा 4700 के आसपास है. आजादी के 50वें वर्ष में राबड़ी देवी के रूप में बिहार को पहली मुख्यमंत्री मिलीं. उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी इसलिए मिली क्योंकि लालू प्रसाद यादव को जेल जाना पड़ा था. राष्ट्रीय जनता दल में कोई ऐसा नहीं था, जिसमें लालू यादव की बात काटने की हिम्मत हो. इसीलिए, राबड़ी देवी बिहार की सबसे ताकतवर कुर्सी पर पहुंच गईं. एक सच्चाई ये भी है कि बिहार की राजनीति में कामयाब ज्यादातर महिलाएं विरासत की सियासत को आगे बढ़ा रही हैं. ऐसे में ये समझना भी जरूरी है कि आजादी के बाद बिहार में महिलाएं विधानसभा से सरकार में कितनी जगह बना पाईं. साल 1952 से 1962 तक जितनी भी महिलाएं बिहार विधानसभा पहुंचीं, उनका कहीं न कहीं आजादी की लड़ाई से सीधा या उनके परिवार का रिश्ता रहा. साल 1952 में हुए विधानसभा चुनाव में 13 महिलाएं विधानसभा पहुंचीं. लेकिन, श्रीकृष्ण सिंह के पहले मंत्रिमंडल में किसी महिला को जगह नहीं मिली. दूसरे मंत्रिमंडल में राजेश्वरी सरोज दास और ज्योतिर्मय देवी को उप मंत्री बनाया गया. साल 1963 में के.बी. सहाय सरकार में एक महिला को कैबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी मिली वो थीं सुमित्रा देवी. मतलब, सुमित्रा देवी बिहार सरकार में पहली कैबिनेट मंत्री थीं और वो पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार की सास थीं.

बिहार के अर्ध-सामंती समाज में महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में भूमिका निभाने का बहुत कम मौका मिला. सामान्य परिवारों की ज्यादातर महिलाएं घूंघट में घरेलू जिम्मेदारियों तक ही सिमटी रहीं. बिहार के सामाजिक ताने-बाने में ज्यादातर महिलाओं की पहचान किसी की पत्नी, किसी की मां, किसी की बहू, किसी की बेटी के तौर पर थी. ऐसे में उनकी राजनीतिक पसंद-नापसंद पर परिवार के पुरुषों का प्रभाव था. महिलाओं को फैसला लेने की आजादी नहीं थी. शायद यही वजह है कि सोशलिस्ट डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने अपने सामाजिक वर्गीकरण में महिलाओं को पिछड़ी श्रेणी में रखा. साल 1978 में जब कर्पूरी ठाकुर सरकार ने ओबीसी के लिए 26 फीसदी आरक्षण लागू किया, उसमें सभी जातियों की महिलाओं के लिए 3 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था थी. लेकिन, पिछले 20-25 वर्षों में सूबे की महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति और सोच में बड़ा बदलाव हुआ है. समाज का भी बेटियों को लेकर नजरिया बहुत हद तक बदला है. लेकिन, अभी बहुत बदलाव की जरूरत है.

एक चौथाई कुर्सियों पर भी महिलाओं की मौजूदगी नहीं

एक दौर वो भी था, जब पूरी दुनिया में इस बात को लेकर आंदोलन चला कि पुरुषों की तरह महिलाओं को भी मतदान का अधिकार मिले. देश में आजादी की लड़ाई में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. साल 1921 यानी अंग्रेजों के दौर में बिहार एंड उड़ीसा लेजिस्लेटिव काउंसिल में महिलाओं को वोट देने का अधिकार पर एक प्रस्ताव पेश किया गया, जिसके 21 पक्ष में और 31 विरोध में वोट पड़े. लेकिन, साल 1929 में महिलाओं को वोट के अधिकार के समर्थक विरोधियों पर भारी पड़े और महिलाओं को वोट का अधिकार मिला. आजादी के बाद हमारे देश में बिना किसी भेद-भाव के महिला और पुरुष दोनों को बराबरी के आधार पर वोट का अधिकार मिला. सबको चुनाव लड़ने और जीत कर संसद और विधानसभा पहुंचने का हक मिला. लेकिन, आज भी संसद और विधानसभाओं के भीतर महिलाएं गिनती की हैं. जहां देश और राज्य के लिए कानून बनता है, नीतियां तय होती हैं वहां एक चौथाई कुर्सियों पर भी महिलाओं की मौजूदगी नहीं दिखती है.

ऐसे में देश की आधी आबादी को एक उम्मीद संसद से पास नारी शक्ति वंदन अधिनियम से है, जो महिलाओं के लिए संसद से लेकर विधानसभाओं के भीतर 33% आरक्षण का रास्ता खोलता है. लेकिन, ये कानून कब और कैसे जमीन पर लागू होगा. सामान्य परिवारों की बेटियों के लिए संसद और विधानसभाओं का रास्ता कितनी ईमानदारी से खोलेगा? अभी ये सवाल ज्यों का त्यों बना हुआ है. सवाल ये भी है कि आखिर वो दिन कब आएगा, जब संसद और विधानसभाओं के भीतर आधी सीटों पर महिलाएं दिखेंगी?

First published on: Sep 20, 2025 09:24 PM

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