चीन की हाईप्रोफाइल यात्रा से आखिर अमेरिका को क्या मिला? चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग फायदे में रहे या घाटे में? आखिर इस मेल-मुलाकात में ऐसा क्या हुआ–जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप बहुत सफल और कभी न भूलने वाला बता रहे हैं . राष्ट्रपति शी जिनपिंग को ऐसा क्या मिला– जिससे वो हालिया मेल-मुलाकात को ऐतिहासिक और मील का पत्थर बता रहे हैं. क्या बंद कमरों में कुछ ऐसी डील हुई– जिसका खुलासा करना अभी ट्रंप और जिनपिंग ने ठीक नहीं समझा? या फिर ऐसा कुछ हुआ ही नहीं –जिसे कैमरे के सामने पूरी दुनिया को बताया जा सके. राष्ट्रपति ट्रंप की दूसरी पारी में अमेरिका और चीन के बीच टेंशन कई गुना बढ़ी. चाइनीज राष्ट्रपति जिनपिंग भी अमेरिका को उसी भी भाषा में जवाब देने लगे . चाइना ने अमेरिका की एक ऐसी नस दबा दी…जिसका विकल्प शायद राष्ट्रपति ट्रंप को दुनिया में कहीं नहीं मिला.
ऐसे में आज समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर टैरिफ वॉर लड़ते-लड़ते ट्रंप और जिनपिंग बातचीत की टेबल तक कैसे पहुंच गए? बंद कमरे में दुनिया की नंबर वन और नबंर टू अर्थव्यवस्था के प्रमुखों के बीच किन मुद्दों पर बात हुई होगी? बीजिंग और वॉशिंगटन डीसी के बीच बनती केमेस्ट्री का भारत पर किस तरह असर पड़ेगा ? आज कुछ ऐसे ही सुलगते सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे – अपने खास कार्यक्रम में हम आपके हैं कौन ?
हम आपके हैं कौन?
ये किसी से छिपा नहीं है कि अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप का मिजाज कारोबारी है. वो हर मेल-मुलाकात और रिश्ते में नफा-नुकसान का हिसाब लगाते रहते हैं. सौदेबाजी के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं. ये किसी से छिपा नहीं है कि ईरान युद्ध में अमेरिका बुरी तरह उलझा हुआ है…अमेरिका को इस युद्ध से निकलने का रास्ता नहीं दिख रहा है. अपनी दूसरी पारी में राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिका के दोस्त कम और दुश्मन अधिक बनाए हैं. आंकड़े बताते हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ती जा रही है. महंगाई आसमान छू रही है . सुपर पावर अमेरिका पर कर्ज 39 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो चुका है . मतलब, GDP से अधिक का कर्ज बोझ हो गया है . डोनाल्ड ट्रंप Make America Great Again के वादे और नारे के साथ सत्ता में आए और आज की तारीख में हर घंटे उनके मुल्क पर 2,374 करोड़ का कर्ज बढ़ता जा रहा है. हर मिनट 49 करोड़ रुपये का कर्ज अमेरिका पर जुड़ रहा है . ऐसे में एक साथ कई मोर्चों पर जूझ रहे राष्ट्रपति ट्रंप को ख्याल आया चीन का…उस चीन का जिस पर भारी-भरकम टैरिफ लगा रहे थे. उस चाइना का, जहां के सस्ते स्मार्टफोन-लैपटॉप का इस्तेमाल अमेरिका के घर-घर में होता है. राष्ट्रपति ट्रंप अपने खास मंत्रियों और मुल्क के बिजनेस टायकून के साथ पहुंच गए बीजिंग. लेकिन, बीजिंग में सवाल वही था – हम आपके हैं कौन ?
कूटनीति में कब दोस्त दुश्मन बन जाए और कब दुश्मन दोस्त अनुमान लगाना बहुत मुश्किल होता है. ये वही राष्ट्रपति ट्रंप है- जो पिछले साल चाइना पर टैरिफ लगातार बढ़ा रहे थे. जिनकी नीतियों की वजह अमेरिका और चाइना के बीच ट्रेड वार चरम पर पहुंच गया .
ये वही ट्रंप हैं - जो कोविड 19 महामारी को चाइनीज वायरस कहते थे…सत्ता में वापसी से पहले कसम खाई थी कि चीन को कीमत चुकानी पड़ेगी . ये वही ट्रंप हैं - जो कहा करते थे कि अमेरिका को चीन की तरह किसी और ने नहीं लूटा है .
अब उसी डोनाल्ड ट्रंप का बीजिंग में ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल के बाहर शानदार स्वागत हुआ . चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपने खास मेहमान का गर्मजोशी से स्वागत करते दिखे..तो ट्रंप भी ये कहना नहीं भूले कि आप एक बेहतरीन नेता हैं. मैं सबसे यह बात कहता हूं .
राष्ट्रपति ट्रंप की चीन यात्रा मार्च में होनी थी … जब उनकी बीजिंग यात्रा का प्लान फ्रीज करने की तैयारी चल रही थी- तब उनके हौसले बुलंद थे - उन्हें अपने एक हाथ में वेनेजुएला और दूसरे हाथ में ईरान दिख रहा था . उनका अनुमान था कि बमबारी में ईरान की लीडरशिप खत्म हो जाएगी और तेहरान में एक ऐसी हुकूमत बैठा दी जाएगी - जो अमेरिका के इशारों पर काम करेगी . संभवत: ट्रंप का अनुमान रहा होगा कि मिडिल ईस्ट में हलचल से कच्चे तेल की कीमतें इतनी कम हो जाएंगी - जिससे अमेरिका को फायदा होगा . लेकिन, हुआ उल्टा . मार्च की जगह मई में जब राष्ट्रपति ट्रंप बीजिंग यात्रा पर अपने दल-बल और मुल्क को कारोबारी दिग्गजों के साथ पहुंचे…तो ट्रंप के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचे थे. वो ईरान के साथ एक ऐसे अनिश्चित युद्ध में फंसे हुए हैं - जिसके अंजाम की भविष्यवाणी करना बहुत मुश्किल है . अमेरिकी अर्थव्यवस्था की सेहत ठीक नहीं है . विकास दर सुस्त पड़ती जा रही है . अमेरिका में तेजी से बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और बैंकों की ब्याज दर से आम अमेरिकी की कमरतोड़ दी है . ऐसे में राष्ट्रपति ट्रंप बड़ी उम्मीद के साथ अपने मुल्क के बिजनेस टायकून के साथ चीन पहुंचे - दिल में ट्रेड बढ़ाने की ख्वाहिश लेकर .
राष्ट्रपति ट्रंप के साथ बीजिंग पहुंचने वालों में टेस्ला और स्पेसएक्स के एलन मस्क, एनवीडिया के जेनसन हुआंग, एप्पल के टिम कुक, ब्लैक रॉक के लॉरी फिंक, ब्लैकस्टोन के स्टीफन श्वार्ज़मैन, बोइंग के केली ऑर्टबर्ग, गोल्डमैन सैक्स के डेविड सोलोमन, माइक्रोन के संजय मेहरोत्रा, कोहेरेंट के जिम एंडरसन, जीई एयरोस्पेस के एच. लॉरेंस कल्प जैसे कारोबारी दिग्गज शामिल रहे . लेकिन, राष्ट्रपति ट्रंप के मिशन चाइना से अमेरिका को क्या मिला? इसे लेकर तस्वीर बहुत साफ नहीं है. हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप का दावा है कि चीन अमेरिका से 200 बोइंग जेट खरीदने के लिए तैयार है . ये डील भी अमेरिका की उम्मीदों से बहुत कम मानी जा रही है .
राष्ट्रपति ट्रंप चाहते हैं कि अमेरिकी कंपनियों के लिए चाइना की राह आसान हो…जिस तरह अमेरिकी बाजार में चीन के प्रोडक्ट बिकते हैं..उसी तरह अमेरिकी प्रोडक्ट भी चाइना के बाजारों में बिके . एक स्टडी के मुताबिक, अमेरिका चाइना से करीब 300 बिलियन डॉलर का सामान आयात करता है … वहीं अमेरिका 100 से 110 बिलियन डॉलर का सामान ही चीन को निर्यात करता है . राष्ट्रपति ट्रंप इस व्यापार घाटे को पाटते हुए अपने मुल्क की आर्थिक विकास की रफ्तार को बढ़ाना चाहते हैं .
अमेरिका का चाइना में बहुत बड़ा निवेश है. पिछले कुछ वर्षों में व्यापार युद्ध, तकनीकी प्रतिबंध और भू-राजनीतिक तनाव की वजह से निवेश की रफ्तार सुस्त हुई…एक स्टडी के मुताबिक, 2023 तक चीन में अमेरिकी प्रत्यक्ष निवेश 127 अरब डॉलर का था .
अमेरिकी कंपनिया चीन में मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी, उपभोक्ता बाजार, हेल्थकेयर, वित्तीय सेवाएं, रिसर्च एवं डेवलपमेंट के क्षेत्र में बड़े स्तर पर निवेश करती हैं . चाइना के कई स्पेशल इकोनॉमिक जोन में अमेरिकी पूंजी और कंपनियों का दबदबा दिखाई देता है . चाहे वो शंघाई हो या बीजिंग…शेन्ज़ेन हो या ग्वांगझू . राष्ट्रपति ट्रंप इस उम्मीद के साथ चीन गए थे कि बात इतनी बन जाए कि अमेरिकी कंपनियों के लिए चीन के खिड़की-दरवाजे पूरी तरह खुल जाएं .
राष्ट्रपति ट्रंप 5B एजेंडा के साथ बीजिंग पहुंचे थे . एक, BOEING…दूसरा BEEF…तीसरा, BEANS…चौथा BOARD OF INVESTMENT और पांचवां BOARD OF TRADE…चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग अच्छी तरह समझ रहे थे कि राष्ट्रपति ट्रंप किस मंशा से बीजिंग आए हैं . वहीं, चीन अपने 3T एजेंडा के साथ तैयार था- TAIWAN, TARRIF & TECHNOLOGY…ऐसे में बिना लाग-लपेट चीन ने कह दिया अगर ताइवान मुद्दे को सही तरीके से संभाला गया तो दोनों देशों के रिश्तों में स्थिरता बनी रहेगी…अगर गलत तरीके से संभाला गया तो टकराव और संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है, जिससे रिश्ते खतरे में पड़ सकते हैं. मतलब, बीजिंग तभी किसी के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाएगा – जब उसकी वन चाइना पॉलिसी को समर्थन मिलेगा . ये पूरी दुनिया जानती है कि ताइवान को हथियार और ताकत कहां से मिलती रही है . ऐसे में राष्ट्रपति ट्रंप ने एक और यू-टर्न के संकेत दे दिए . माना जा रहा है कि ताइवान को 11 अरब डॉलर के बड़े हथियार पैकेज देने के वादे से अमेरिका मुकर सकता है या उस पर फिर से विचार कर सकता है . ऐसे में कूटनीतिक रिश्तों की नई कमेस्ट्री के लिए अमेरिका ताइवान को किनारे रखता दिख रहा है…तो चाइना ईरान को .
राष्ट्रपति ट्रंप और राष्ट्रपति जिनपिंग के बीच मुलाकात में क्या हुआ? इसे अमेरिका की कूटनीति और कारोबारी मिजाज पर बारीक नजर रखने वाले रोबिंदर सचदेव ने कुछ इस अंदाज में बयां किया . अमेरिका ने अपने फायदे के लिए छोटे सहयोगी ताइवान को अपनी कूटनीति की बस के नीचे ला दिया … तो चाइना ने ईरान को .
राष्ट्रपति जिनपिंग अच्छी तरह समझ रहे थे कि मौजूदा समय में अमेरिका कितना दबाव में है? अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप उनसे क्या चाहते हैं? ऐसे में चाइना अपने तीनों मुख्य एजेंडा यानी ताइवान, टैरिफ और टेक्नोलॉजी पर डटा रहा. मतलब, ताइवान के मुद्दे पर अमेरिका वन चाइना पॉलिसी का समर्थन करे . ट्रंप प्रशासन 2.0 में बढ़ाई गई टैरिफ पर नए सिरे से बात हो और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर में अमेरिका अपने बंद खिड़की दरवाजों को खोले .
आज की तारीख में चीन भी बढ़ती बेरोज़गारी, असमान विकास, रियल एस्टेट संकट जैसी गंभीर आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है . दुनिया के कई हिस्सों में चीन का भारी-भरकम निवेश फंसा हुआ है . लेकिन, घरेलू और आर्थिक दबावों के बावजूद जिनपिंग ने अपने चीन को एक मजबूत देश के तौर पर पेश करने की कोशिश की..ऐसे में बीजिंग समिट में ट्रंप और जिनपिंग के बीच मेल-मुलाकात की तस्वीरों के जरिए संदेश देने की कोशिश होती दिखी कि आज का चाइना अमेरिका के साथ बराबरी में खड़ा है .
दरअसल, बीजिंग समिट दुनिया के सामने चीन की ताकत का भी प्रदर्शन था . जिनपिंग ने खुद को एक धीर, गंभीर वैश्विक नेता के रूप में पेश किया…वहीं, राष्ट्रपति ट्रंप की दुनियाभर में छवि एक अस्थिर और तुनकमिजाज नेता की बनती जा रही है..जो कभी भी अपनी बात से पलट सकते हैं . आज की तारीख में चाइना कारोबार के लिए दूसरे देशों की ओर देख रहा है…वहीं,
कनाडा, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देश चीन की ओर देख रहे हैं . मतलब, दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था वाला चाइना खुद को अमेरिका के विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश करता दिख रहा है . पिछले साल जब राष्ट्रपति ट्रंप ने टैरिफ लगाया…तो जिनपिंग ने भी टैरिफ का जवाब टैरिफ से दिया . इतना ही नहीं, रेयरअर्थ मिनिरल्स देने से भी मना कर दिया .
चाइना ने ये संदेश देने की कोशिश की कि आज की तारीख में अमेरिका जैसा देश भी चाइनीज मैन्यूफैक्चरिंग, सस्ती तकनीक और सप्लाई चेन में उसकी भूमिका पर कितना निर्भर है … बंद कमरे में राष्ट्रपति ट्रंप और राष्ट्रपति जिनपिंग के बीच गंभीर मुद्दों पर पेंच उलझा या सुलझा…ये तो साफ नहीं हो पाया . लेकिन, ईरान और हॉर्मुज स्ट्रेट के मुद्दे पर भी संभवत: राष्ट्रपति ट्रंप को चाइना का साथ नहीं मिला…क्योंकि, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चाइना ने अमेरिका और बहरीन के समर्थन वाले प्रस्ताव का विरोध किया है .
बीजिंग में जब अमेरिका और चीन के प्रतिनिधि मंडल आपस में बैठे थे – तो नजर वहां दिख रहे हर चेहरे पर गयी…उसमें मुझे एक कमी दिखी . शी जिनपिंग को जोड़कर चीन के 13 प्रतिनिधि बैठे थे..उनके सामने डोनाल्ड ट्रंप के साथ 11 प्रतिनिधि बैठे थे. दुनिया की इतनी बड़ी मेल-मुलाकात, कूटनीतिक के इतने बड़े मंच पर दोनों पक्षों में किसी ओर एक भी महिला नहीं दिखी . क्या अमेरिकी लोकतंत्र और कम्युनिस्ट चाइना का नया चरित्र यही है . क्या महाशक्तियों की नई व्यवस्था में महिलाओं की जगह कम होती जा रही है ? ये भी मुझे हैरान कर रहा है कि इतनी हाईप्रोफाइल मीटिंग के बाद कुछ ज्वाइंट स्टेटमेंट या प्रेस बीफिंग क्यों नहीं हुई. ऐसा लग रहा है – जैसे न राष्ट्रपति ट्रंप के कुछ खास हाथ लगा और न राष्ट्रपति जिनपिंग के…अभी सबकुछ भविष्य के गर्भ में है . लेकिन, राष्ट्रपति ट्रंप की अमेरिका के दिग्गज कारोबारियों के साथ बीजिंग यात्रा से चाइना का अंतरराष्ट्रीय मंच पर कद बढ़ा है. दूसरी बात, बीजिंग और वाशिंगटन डीसी के बीच बिगड़े रिश्तों की रिपेयरिंग की शुरुआत की कोशिश हुई. तीसरी बात, भीतरखाने अमेरिकी कंपनियों के लिए चाइनीज बाजार की राह में खड़े स्पीडब्रेकर्स हटाने पर भी सहमति बनी होगी. चौथी बात, राष्ट्रपति ट्रंप चाह रहे होंगे कि चीन अब यूएस ट्रेजरी होल्डिंग में कटौती न करे..क्योंकि, पिछले कुछ वर्षों से चाइना लगातार अमेरिकी सरकारी बॉन्ड में अपनी हिस्सेदारी घटा रहा है .
दुनियाभर के तेज-तर्रार कूटनीतिज्ञ माथापच्ची कर रहे हैं कि क्या बीजिंग शिखर वार्ता से नए तरह की कूटनीति की शुरुआत हो रही है? क्या आने वाले दिनों में अमेरिका और चीन मिलकर पूरी दुनिया को चलाएंगे? दरअसल, राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिका और चीन के बीच बनती नई केमेस्ट्री को G2 का नाम दिया…G2 मतलब-दुनिया की GDP में 43 फीसदी हिस्सेदारी वाला समूह…G2 मतलब - मिलिट्री पावर के लिहाज से दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली देशों का साथ आना… G2 मतलब- दुनिया की सप्लाई चेन में सबसे बड़ी भागीदारी निभाने वाले दो देशों का साथ आन ा. G2 मतलब - एडवांस तकनीक के मामले में दुनिया के दो सबसे प्रभावशाली देशों का साथ आना . ऐसे में बीजिंग शिखर वार्ता के बाद दुनिया में नए समीकरणों पर गुना-भाग होने लगा है..ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या भविष्य में अमेरिका-चीन मिलकर पूरी दुनिया को चलाएंगे? कूटनीति में कुछ भी नामुमकिन नहीं…लेकिन, ये बहुत आसान भी नहीं है .
आज की तारीख में अमेरिका की अपनी समस्याएं हैं और चीन की अपनी…एक साथ कई मोर्चों पर जूझ रहा अमेरिका चाहेगा कि चीन अमेरिकी ट्रेजरी होल्डिंग्स को कम न करे . एक स्टडी के मुताबिक…एक स्टडी के मुताबिक, साल 2012 में चीन के पास अमेरिकी ट्रेजरी होल्डिंग्स करीब 1.2 ट्रिलियन डॉलर थी..जो अब घटकर करीब 600 बिलियन डॉलर पर आ गयी है .
चीन ऐसे समय में अमेरिकी ट्रेजरी होल्डिंग में हिस्सेदारी कम कर रहा है - जब अमेरिका का कर्जा रिकॉर्ड स्तर पर है . एक सच ये भी है कि अगर चाइना ने अमेरिकी बॉन्ड में हिस्सेदारी घटाई है-तो जापान और ब्रिटेन जैसे देशों ने बढ़ाई है . चीन
अमेरिकी बॉन्ड से इतर अपना निवेश सोना और गैर अमेरिकी मुद्राओं में तेजी से बढ़ा रहा है . अगर चाइना अमेरिकी बॉन्ड में लगातार हिस्सेदारी कम करता रहा तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर और दबाव बढ़ना तय है . ऐसे में इसबात के चांस कम हैं कि अमेरिकी ट्रेजरी होल्डिंग में हिस्सेदारी के मुद्दे पर अमेरिका और चीन के बीच सहमति बने .
राष्ट्रपति ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि वो चीन से एक ट्रिलियन डॉलर का निवेश अमेरिका में लाएंगे . लेकिन, अमेरिका में एक वर्ग ऐसा भी है - जो चीन को शक की नजरों से देखता है . ऐसे में चाइनीज कंपनियों के अमेरिका की जमीन पर फैक्ट्री लगाने की राह में खड़ी दिक्कतों को हटाना राष्ट्रपति ट्रंप के लिए बहुत आसान नहीं होगा.
अमेरिका और चीन के बीच निवेश के रास्ते में खड़ी अड़चनों को दूर करने के लिए आकार ले रहे - बोर्ड ऑफ इनवेस्टमेंट के सामने कई तरह की चुनौतियां होंगी . इसी तरह बोर्ड ऑफ ट्रेड में भी दोनों ओर से कड़ी सौदेबाजी दिखनी तय है..ऐसे में चीन और अमेरिका के बीच गंभीर विवादित मुद्दों पर सहमति बनाना बहुत मुश्किल होगा .
अगर राष्ट्रपति ट्रंप का मिजाज कारोबारी है…तो राष्ट्रपति जिनपिंग का साहूकारों वाला. अगर डोनाल्ड ट्रंप तुनकमिजाज हैं तो शी जिनपिंग बहुत Calculative… शायद उनके मन-मस्तिष्क पर प्राचीन चाइनीज रणनीतिकार Sun Tzu की The Art of War का गहरा प्रभाव है … माना जा रहा है कि राष्ट्रपति जिनपिंग ने Board Of Trade और Board of Investment के जरिए चाइनीज कंपनियों की अमेरिका में एंट्री आसान करने का दांव चला होगा…वो अमेरिका से चाहेंगे कि Technology ट्रांसफर की राह में खड़े स्पीडब्रेकर्स हटाए..राष्ट्रपति ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि वो चाइना से अमेरिका में वन ट्रिलियन डॉलर का निवेश लाएंगे. अगर राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा होगा कि चाइना अब अमेरिकी सरकारी बॉन्ड में हिस्सेदारी न घटाए…तो बहुत हद तक संभव है कि राष्ट्रपति जिनपिंग ने कह दिया हो कि इस मुद्दे को किनारे रखते हैं. पिछले कुछ वर्षों में शक्ति संतुलन जिस तरह बदला है – उसमें चीन की कई कंपनियों ने भारत का रुख किया है. चीन की अर्थव्यवस्था भी दबाव के दौर से गुजर रही है. बदले हालात में राष्ट्रपति जिनपिंग चाहेंगे कि कंपनियां वापस चीन में आकर पहले की तरह प्रोडक्ड तैयार करें . ऐसे में चीन और अमेरिका के बीच साझेदारी का भारत पर क्या असर पड़ेगा – इसे भी समझना जरूरी है?
चीन और अमेरिका के बीच साझेदारी का भारत पर क्या असर
भारत में ब्रिक्स के विदेश मंत्री जुटे…दुनिया का ये प्रभावशाली मंच राष्ट्रपति ट्रंप की आंखों में खटकता रहा है . ब्रिक्स की ट्रंप सरेआम आलोचना कर चुके हैं…2026 की शुरुआत के साथ ही दुनिया का शक्ति संतुलन तेजी से बदलने लगा..दिल्ली में ब्रिक्स के मंच से विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि दुनिया मौजूदा समय में बहुत अनिश्चिता और मुश्किल दौर से गुजर रही है . दुनिया इस समय काफी अनिश्चित और जटिल दौर से गुजर रही है, जहां लगातार संघर्ष, आर्थिक अस्थिरता, व्यापार और तकनीक से जुड़ी चुनौतियां वैश्विक परिदृश्य को प्रभावित कर रही हैं.
दूसरी ओर, अमेरिका और चीन के बीच जिस तरह की केमेस्ट्री बनती दिख रही है… उसमें G2 यानी अमेरिका + चीन बनाम BRICS की बात भी होने लगी है . हालांकि, ब्रिक्स में चीन भी शामिल है. अमेरिका और चीन के बीच साझेदारी बढ़ने का एक मतलब ये भी सकता है कि ग्लोबल साउथ के देशों से पूंजी और तकनीक का रास्ता बदल सकता है..चाइना पूंजी और तकनीक को अमेरिका की ओर मोड़ सकता है . इसी तरह, राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों की वजह से अमेरिका की कई कंपनियों ने चाइना की जगह भारत में प्रोडक्शन बढ़ाया… मेक्सिको, वियतनाम, मलेशिया, थाइलैंड, इंडोनेशिया, ताइवान जैसे देशों में निवेश बढ़ाया . अगर बीजिंग और वाशिंगटन डीसी के बीच केमेस्ट्री कामयाब रही तो चीन चाहेगा कि वही दुनिया की फैक्ट्री बना रहे .
एशिया में चीन के विस्तार को रोकने के लिए अमेरिका भारत की ओर देखता था…QUAD की छतरी भी इसी सोच के साथ तानी गई थी - ऐसे में G2 के आकार लेने के बाद QUAD के अप्रासंगिक होने के चांस बढ़ जाएंगे . अगर राष्ट्रपति ट्रंप का प्लान कामयाब रहा तो एशिया में शक्ति संतुलन के लिए दूसरे देशों के लिए खास अहमियत नहीं रह जाएगी…
भारत के लिए चीन के साथ रिश्ते भी जरूरी हैं और अमेरिका के साथ भी . दुनिया में तेजी से बदलते आर्थिक व्यवहार और शक्ति संतुलन के बीच भारत को अमेरिका और चीनों दोनों के साथ बहुत संभलकर आगे बढ़ना होगा … साथ ही दुनिया के दूसरे बाजारों की ओर भी देखना होगा .
ये अमेरिका की ट्रंप डिप्लोमेसी का साइड इफेक्ट है कि आज की तारीख में भारत दुनिया के कई देशों के साथ Free Trade agreement कर रहा है… प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के UAE दौरे में तेल, गैस और रक्षा को लेकर कई बड़े समझौते हुए…UAE ने भारत में 5 अरब डॉलर निवेश का ऐलान भी किया . यूरोप को भी साधने की लगातार कोशिश चल रही है .
राष्ट्रपति ट्रंप का तौर-तरीका भले ही भारत को अधिक परेशान कर रहा हो…लेकिन, अमेरिकी रूख को लेकर दिल्ली ने हमेशा सर्तकता बरती है. इसी तरह, चीन के साथ कारोबार और सीमा पर तनाव दोनों साथ-साथ आगे बढ़े हैं. ऐसे में दो अति स्वार्थी शक्तियों के बीच गठजोड़ की बात दुनिया के ज्यादातर देशों की टेंशन बढ़ाने के लिए काफी है .
दुनिया में अमेरिका का दबदबा है और एशिया में चीन का . भारत बहुध्रुवीय दुनिया की वकालत करता है और बहुध्रुवीय एशिया की भी . लेकिन, दुनिया की नंबर वन और नंबर टू Economy या कहें आर्थिक प्रतिद्वंदियों के हाथ मिलाने का भारत पर असर न पड़े..ऐसा हो नहीं सकता है. आज की तारीख में भारत के अमेरिका से भी कारोबारी रिश्ते हैं और चाइना से भी..ऐसे में बीजिंग और वॉशिंगटन के बीच बनती नई केमेस्ट्री के बीच भारत को दोनों से बहुत संतुलित रिश्ता रखना होगा…क्योंकि, न तो चीन पर भरोसा किया जा सकता है और ना अमेरिका पर. वैसे भी कहा जाता है कि अमेरिका से दुश्मनी खतरनाक और दोस्ती घातक… लेकिन, बीजिंग में डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात में जो कुछ हुआ–उसकी अधूरी तस्वीर ही दुनिया के सामने आई है. पूरी तस्वीर सितंबर महीने में आ सकती है– जब राष्ट्रपति ट्रंप के न्यौते पर राष्ट्रपति जिनपिंग अमेरिका जाएंगे. क्योंकि, अगले चार महीने में अमेरिका और चीन के अधिकारी बोर्ड और ट्रेड और बोर्ड ऑफ इन्वेस्टमेंट में किस तरह का मैकेनिज्म बनते हैं – उसकी बुनियाद पर ही बहुत हद तक बीजिंग और वाशिंगटन डीसी का रिश्ता निर्भर करेगा? नहीं तो अमेरिका और चाइना एक दूसरे से सवाल करते दिख सकते हैं कि– हम आपके हैं कौन? आज बस इतना हीं–फिर मिलेंगे किसी ऐसे मुद्दे के साथ, जिसे जानना और समझना हम सबके लिए जरूरी होगा .
चीन की हाईप्रोफाइल यात्रा से आखिर अमेरिका को क्या मिला? चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग फायदे में रहे या घाटे में? आखिर इस मेल-मुलाकात में ऐसा क्या हुआ–जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप बहुत सफल और कभी न भूलने वाला बता रहे हैं . राष्ट्रपति शी जिनपिंग को ऐसा क्या मिला– जिससे वो हालिया मेल-मुलाकात को ऐतिहासिक और मील का पत्थर बता रहे हैं. क्या बंद कमरों में कुछ ऐसी डील हुई– जिसका खुलासा करना अभी ट्रंप और जिनपिंग ने ठीक नहीं समझा? या फिर ऐसा कुछ हुआ ही नहीं –जिसे कैमरे के सामने पूरी दुनिया को बताया जा सके. राष्ट्रपति ट्रंप की दूसरी पारी में अमेरिका और चीन के बीच टेंशन कई गुना बढ़ी. चाइनीज राष्ट्रपति जिनपिंग भी अमेरिका को उसी भी भाषा में जवाब देने लगे . चाइना ने अमेरिका की एक ऐसी नस दबा दी…जिसका विकल्प शायद राष्ट्रपति ट्रंप को दुनिया में कहीं नहीं मिला.
ऐसे में आज समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर टैरिफ वॉर लड़ते-लड़ते ट्रंप और जिनपिंग बातचीत की टेबल तक कैसे पहुंच गए? बंद कमरे में दुनिया की नंबर वन और नबंर टू अर्थव्यवस्था के प्रमुखों के बीच किन मुद्दों पर बात हुई होगी? बीजिंग और वॉशिंगटन डीसी के बीच बनती केमेस्ट्री का भारत पर किस तरह असर पड़ेगा ? आज कुछ ऐसे ही सुलगते सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे – अपने खास कार्यक्रम में हम आपके हैं कौन ?
हम आपके हैं कौन?
ये किसी से छिपा नहीं है कि अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप का मिजाज कारोबारी है. वो हर मेल-मुलाकात और रिश्ते में नफा-नुकसान का हिसाब लगाते रहते हैं. सौदेबाजी के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं. ये किसी से छिपा नहीं है कि ईरान युद्ध में अमेरिका बुरी तरह उलझा हुआ है…अमेरिका को इस युद्ध से निकलने का रास्ता नहीं दिख रहा है. अपनी दूसरी पारी में राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिका के दोस्त कम और दुश्मन अधिक बनाए हैं. आंकड़े बताते हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ती जा रही है. महंगाई आसमान छू रही है . सुपर पावर अमेरिका पर कर्ज 39 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो चुका है . मतलब, GDP से अधिक का कर्ज बोझ हो गया है . डोनाल्ड ट्रंप Make America Great Again के वादे और नारे के साथ सत्ता में आए और आज की तारीख में हर घंटे उनके मुल्क पर 2,374 करोड़ का कर्ज बढ़ता जा रहा है. हर मिनट 49 करोड़ रुपये का कर्ज अमेरिका पर जुड़ रहा है . ऐसे में एक साथ कई मोर्चों पर जूझ रहे राष्ट्रपति ट्रंप को ख्याल आया चीन का…उस चीन का जिस पर भारी-भरकम टैरिफ लगा रहे थे. उस चाइना का, जहां के सस्ते स्मार्टफोन-लैपटॉप का इस्तेमाल अमेरिका के घर-घर में होता है. राष्ट्रपति ट्रंप अपने खास मंत्रियों और मुल्क के बिजनेस टायकून के साथ पहुंच गए बीजिंग. लेकिन, बीजिंग में सवाल वही था – हम आपके हैं कौन ?
कूटनीति में कब दोस्त दुश्मन बन जाए और कब दुश्मन दोस्त अनुमान लगाना बहुत मुश्किल होता है. ये वही राष्ट्रपति ट्रंप है- जो पिछले साल चाइना पर टैरिफ लगातार बढ़ा रहे थे. जिनकी नीतियों की वजह अमेरिका और चाइना के बीच ट्रेड वार चरम पर पहुंच गया .
ये वही ट्रंप हैं – जो कोविड 19 महामारी को चाइनीज वायरस कहते थे…सत्ता में वापसी से पहले कसम खाई थी कि चीन को कीमत चुकानी पड़ेगी . ये वही ट्रंप हैं – जो कहा करते थे कि अमेरिका को चीन की तरह किसी और ने नहीं लूटा है .
अब उसी डोनाल्ड ट्रंप का बीजिंग में ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल के बाहर शानदार स्वागत हुआ . चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपने खास मेहमान का गर्मजोशी से स्वागत करते दिखे..तो ट्रंप भी ये कहना नहीं भूले कि आप एक बेहतरीन नेता हैं. मैं सबसे यह बात कहता हूं .
राष्ट्रपति ट्रंप की चीन यात्रा मार्च में होनी थी … जब उनकी बीजिंग यात्रा का प्लान फ्रीज करने की तैयारी चल रही थी- तब उनके हौसले बुलंद थे – उन्हें अपने एक हाथ में वेनेजुएला और दूसरे हाथ में ईरान दिख रहा था . उनका अनुमान था कि बमबारी में ईरान की लीडरशिप खत्म हो जाएगी और तेहरान में एक ऐसी हुकूमत बैठा दी जाएगी – जो अमेरिका के इशारों पर काम करेगी . संभवत: ट्रंप का अनुमान रहा होगा कि मिडिल ईस्ट में हलचल से कच्चे तेल की कीमतें इतनी कम हो जाएंगी – जिससे अमेरिका को फायदा होगा . लेकिन, हुआ उल्टा . मार्च की जगह मई में जब राष्ट्रपति ट्रंप बीजिंग यात्रा पर अपने दल-बल और मुल्क को कारोबारी दिग्गजों के साथ पहुंचे…तो ट्रंप के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचे थे. वो ईरान के साथ एक ऐसे अनिश्चित युद्ध में फंसे हुए हैं – जिसके अंजाम की भविष्यवाणी करना बहुत मुश्किल है . अमेरिकी अर्थव्यवस्था की सेहत ठीक नहीं है . विकास दर सुस्त पड़ती जा रही है . अमेरिका में तेजी से बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और बैंकों की ब्याज दर से आम अमेरिकी की कमरतोड़ दी है . ऐसे में राष्ट्रपति ट्रंप बड़ी उम्मीद के साथ अपने मुल्क के बिजनेस टायकून के साथ चीन पहुंचे – दिल में ट्रेड बढ़ाने की ख्वाहिश लेकर .
राष्ट्रपति ट्रंप के साथ बीजिंग पहुंचने वालों में टेस्ला और स्पेसएक्स के एलन मस्क, एनवीडिया के जेनसन हुआंग, एप्पल के टिम कुक, ब्लैक रॉक के लॉरी फिंक, ब्लैकस्टोन के स्टीफन श्वार्ज़मैन, बोइंग के केली ऑर्टबर्ग, गोल्डमैन सैक्स के डेविड सोलोमन, माइक्रोन के संजय मेहरोत्रा, कोहेरेंट के जिम एंडरसन, जीई एयरोस्पेस के एच. लॉरेंस कल्प जैसे कारोबारी दिग्गज शामिल रहे . लेकिन, राष्ट्रपति ट्रंप के मिशन चाइना से अमेरिका को क्या मिला? इसे लेकर तस्वीर बहुत साफ नहीं है. हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप का दावा है कि चीन अमेरिका से 200 बोइंग जेट खरीदने के लिए तैयार है . ये डील भी अमेरिका की उम्मीदों से बहुत कम मानी जा रही है .
राष्ट्रपति ट्रंप चाहते हैं कि अमेरिकी कंपनियों के लिए चाइना की राह आसान हो…जिस तरह अमेरिकी बाजार में चीन के प्रोडक्ट बिकते हैं..उसी तरह अमेरिकी प्रोडक्ट भी चाइना के बाजारों में बिके . एक स्टडी के मुताबिक, अमेरिका चाइना से करीब 300 बिलियन डॉलर का सामान आयात करता है … वहीं अमेरिका 100 से 110 बिलियन डॉलर का सामान ही चीन को निर्यात करता है . राष्ट्रपति ट्रंप इस व्यापार घाटे को पाटते हुए अपने मुल्क की आर्थिक विकास की रफ्तार को बढ़ाना चाहते हैं .
अमेरिका का चाइना में बहुत बड़ा निवेश है. पिछले कुछ वर्षों में व्यापार युद्ध, तकनीकी प्रतिबंध और भू-राजनीतिक तनाव की वजह से निवेश की रफ्तार सुस्त हुई…एक स्टडी के मुताबिक, 2023 तक चीन में अमेरिकी प्रत्यक्ष निवेश 127 अरब डॉलर का था .
अमेरिकी कंपनिया चीन में मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी, उपभोक्ता बाजार, हेल्थकेयर, वित्तीय सेवाएं, रिसर्च एवं डेवलपमेंट के क्षेत्र में बड़े स्तर पर निवेश करती हैं . चाइना के कई स्पेशल इकोनॉमिक जोन में अमेरिकी पूंजी और कंपनियों का दबदबा दिखाई देता है . चाहे वो शंघाई हो या बीजिंग…शेन्ज़ेन हो या ग्वांगझू . राष्ट्रपति ट्रंप इस उम्मीद के साथ चीन गए थे कि बात इतनी बन जाए कि अमेरिकी कंपनियों के लिए चीन के खिड़की-दरवाजे पूरी तरह खुल जाएं .
राष्ट्रपति ट्रंप 5B एजेंडा के साथ बीजिंग पहुंचे थे . एक, BOEING…दूसरा BEEF…तीसरा, BEANS…चौथा BOARD OF INVESTMENT और पांचवां BOARD OF TRADE…चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग अच्छी तरह समझ रहे थे कि राष्ट्रपति ट्रंप किस मंशा से बीजिंग आए हैं . वहीं, चीन अपने 3T एजेंडा के साथ तैयार था- TAIWAN, TARRIF & TECHNOLOGY…ऐसे में बिना लाग-लपेट चीन ने कह दिया अगर ताइवान मुद्दे को सही तरीके से संभाला गया तो दोनों देशों के रिश्तों में स्थिरता बनी रहेगी…अगर गलत तरीके से संभाला गया तो टकराव और संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है, जिससे रिश्ते खतरे में पड़ सकते हैं. मतलब, बीजिंग तभी किसी के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाएगा – जब उसकी वन चाइना पॉलिसी को समर्थन मिलेगा . ये पूरी दुनिया जानती है कि ताइवान को हथियार और ताकत कहां से मिलती रही है . ऐसे में राष्ट्रपति ट्रंप ने एक और यू-टर्न के संकेत दे दिए . माना जा रहा है कि ताइवान को 11 अरब डॉलर के बड़े हथियार पैकेज देने के वादे से अमेरिका मुकर सकता है या उस पर फिर से विचार कर सकता है . ऐसे में कूटनीतिक रिश्तों की नई कमेस्ट्री के लिए अमेरिका ताइवान को किनारे रखता दिख रहा है…तो चाइना ईरान को .
राष्ट्रपति ट्रंप और राष्ट्रपति जिनपिंग के बीच मुलाकात में क्या हुआ? इसे अमेरिका की कूटनीति और कारोबारी मिजाज पर बारीक नजर रखने वाले रोबिंदर सचदेव ने कुछ इस अंदाज में बयां किया . अमेरिका ने अपने फायदे के लिए छोटे सहयोगी ताइवान को अपनी कूटनीति की बस के नीचे ला दिया … तो चाइना ने ईरान को .
राष्ट्रपति जिनपिंग अच्छी तरह समझ रहे थे कि मौजूदा समय में अमेरिका कितना दबाव में है? अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप उनसे क्या चाहते हैं? ऐसे में चाइना अपने तीनों मुख्य एजेंडा यानी ताइवान, टैरिफ और टेक्नोलॉजी पर डटा रहा. मतलब, ताइवान के मुद्दे पर अमेरिका वन चाइना पॉलिसी का समर्थन करे . ट्रंप प्रशासन 2.0 में बढ़ाई गई टैरिफ पर नए सिरे से बात हो और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर में अमेरिका अपने बंद खिड़की दरवाजों को खोले .
आज की तारीख में चीन भी बढ़ती बेरोज़गारी, असमान विकास, रियल एस्टेट संकट जैसी गंभीर आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है . दुनिया के कई हिस्सों में चीन का भारी-भरकम निवेश फंसा हुआ है . लेकिन, घरेलू और आर्थिक दबावों के बावजूद जिनपिंग ने अपने चीन को एक मजबूत देश के तौर पर पेश करने की कोशिश की..ऐसे में बीजिंग समिट में ट्रंप और जिनपिंग के बीच मेल-मुलाकात की तस्वीरों के जरिए संदेश देने की कोशिश होती दिखी कि आज का चाइना अमेरिका के साथ बराबरी में खड़ा है .
दरअसल, बीजिंग समिट दुनिया के सामने चीन की ताकत का भी प्रदर्शन था . जिनपिंग ने खुद को एक धीर, गंभीर वैश्विक नेता के रूप में पेश किया…वहीं, राष्ट्रपति ट्रंप की दुनियाभर में छवि एक अस्थिर और तुनकमिजाज नेता की बनती जा रही है..जो कभी भी अपनी बात से पलट सकते हैं . आज की तारीख में चाइना कारोबार के लिए दूसरे देशों की ओर देख रहा है…वहीं,
कनाडा, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देश चीन की ओर देख रहे हैं . मतलब, दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था वाला चाइना खुद को अमेरिका के विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश करता दिख रहा है . पिछले साल जब राष्ट्रपति ट्रंप ने टैरिफ लगाया…तो जिनपिंग ने भी टैरिफ का जवाब टैरिफ से दिया . इतना ही नहीं, रेयरअर्थ मिनिरल्स देने से भी मना कर दिया .
चाइना ने ये संदेश देने की कोशिश की कि आज की तारीख में अमेरिका जैसा देश भी चाइनीज मैन्यूफैक्चरिंग, सस्ती तकनीक और सप्लाई चेन में उसकी भूमिका पर कितना निर्भर है … बंद कमरे में राष्ट्रपति ट्रंप और राष्ट्रपति जिनपिंग के बीच गंभीर मुद्दों पर पेंच उलझा या सुलझा…ये तो साफ नहीं हो पाया . लेकिन, ईरान और हॉर्मुज स्ट्रेट के मुद्दे पर भी संभवत: राष्ट्रपति ट्रंप को चाइना का साथ नहीं मिला…क्योंकि, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चाइना ने अमेरिका और बहरीन के समर्थन वाले प्रस्ताव का विरोध किया है .
बीजिंग में जब अमेरिका और चीन के प्रतिनिधि मंडल आपस में बैठे थे – तो नजर वहां दिख रहे हर चेहरे पर गयी…उसमें मुझे एक कमी दिखी . शी जिनपिंग को जोड़कर चीन के 13 प्रतिनिधि बैठे थे..उनके सामने डोनाल्ड ट्रंप के साथ 11 प्रतिनिधि बैठे थे. दुनिया की इतनी बड़ी मेल-मुलाकात, कूटनीतिक के इतने बड़े मंच पर दोनों पक्षों में किसी ओर एक भी महिला नहीं दिखी . क्या अमेरिकी लोकतंत्र और कम्युनिस्ट चाइना का नया चरित्र यही है . क्या महाशक्तियों की नई व्यवस्था में महिलाओं की जगह कम होती जा रही है ? ये भी मुझे हैरान कर रहा है कि इतनी हाईप्रोफाइल मीटिंग के बाद कुछ ज्वाइंट स्टेटमेंट या प्रेस बीफिंग क्यों नहीं हुई. ऐसा लग रहा है – जैसे न राष्ट्रपति ट्रंप के कुछ खास हाथ लगा और न राष्ट्रपति जिनपिंग के…अभी सबकुछ भविष्य के गर्भ में है . लेकिन, राष्ट्रपति ट्रंप की अमेरिका के दिग्गज कारोबारियों के साथ बीजिंग यात्रा से चाइना का अंतरराष्ट्रीय मंच पर कद बढ़ा है. दूसरी बात, बीजिंग और वाशिंगटन डीसी के बीच बिगड़े रिश्तों की रिपेयरिंग की शुरुआत की कोशिश हुई. तीसरी बात, भीतरखाने अमेरिकी कंपनियों के लिए चाइनीज बाजार की राह में खड़े स्पीडब्रेकर्स हटाने पर भी सहमति बनी होगी. चौथी बात, राष्ट्रपति ट्रंप चाह रहे होंगे कि चीन अब यूएस ट्रेजरी होल्डिंग में कटौती न करे..क्योंकि, पिछले कुछ वर्षों से चाइना लगातार अमेरिकी सरकारी बॉन्ड में अपनी हिस्सेदारी घटा रहा है .
दुनियाभर के तेज-तर्रार कूटनीतिज्ञ माथापच्ची कर रहे हैं कि क्या बीजिंग शिखर वार्ता से नए तरह की कूटनीति की शुरुआत हो रही है? क्या आने वाले दिनों में अमेरिका और चीन मिलकर पूरी दुनिया को चलाएंगे? दरअसल, राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिका और चीन के बीच बनती नई केमेस्ट्री को G2 का नाम दिया…G2 मतलब-दुनिया की GDP में 43 फीसदी हिस्सेदारी वाला समूह…G2 मतलब – मिलिट्री पावर के लिहाज से दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली देशों का साथ आना… G2 मतलब- दुनिया की सप्लाई चेन में सबसे बड़ी भागीदारी निभाने वाले दो देशों का साथ आन ा. G2 मतलब – एडवांस तकनीक के मामले में दुनिया के दो सबसे प्रभावशाली देशों का साथ आना . ऐसे में बीजिंग शिखर वार्ता के बाद दुनिया में नए समीकरणों पर गुना-भाग होने लगा है..ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या भविष्य में अमेरिका-चीन मिलकर पूरी दुनिया को चलाएंगे? कूटनीति में कुछ भी नामुमकिन नहीं…लेकिन, ये बहुत आसान भी नहीं है .
आज की तारीख में अमेरिका की अपनी समस्याएं हैं और चीन की अपनी…एक साथ कई मोर्चों पर जूझ रहा अमेरिका चाहेगा कि चीन अमेरिकी ट्रेजरी होल्डिंग्स को कम न करे . एक स्टडी के मुताबिक…एक स्टडी के मुताबिक, साल 2012 में चीन के पास अमेरिकी ट्रेजरी होल्डिंग्स करीब 1.2 ट्रिलियन डॉलर थी..जो अब घटकर करीब 600 बिलियन डॉलर पर आ गयी है .
चीन ऐसे समय में अमेरिकी ट्रेजरी होल्डिंग में हिस्सेदारी कम कर रहा है – जब अमेरिका का कर्जा रिकॉर्ड स्तर पर है . एक सच ये भी है कि अगर चाइना ने अमेरिकी बॉन्ड में हिस्सेदारी घटाई है-तो जापान और ब्रिटेन जैसे देशों ने बढ़ाई है . चीन
अमेरिकी बॉन्ड से इतर अपना निवेश सोना और गैर अमेरिकी मुद्राओं में तेजी से बढ़ा रहा है . अगर चाइना अमेरिकी बॉन्ड में लगातार हिस्सेदारी कम करता रहा तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर और दबाव बढ़ना तय है . ऐसे में इसबात के चांस कम हैं कि अमेरिकी ट्रेजरी होल्डिंग में हिस्सेदारी के मुद्दे पर अमेरिका और चीन के बीच सहमति बने .
राष्ट्रपति ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि वो चीन से एक ट्रिलियन डॉलर का निवेश अमेरिका में लाएंगे . लेकिन, अमेरिका में एक वर्ग ऐसा भी है – जो चीन को शक की नजरों से देखता है . ऐसे में चाइनीज कंपनियों के अमेरिका की जमीन पर फैक्ट्री लगाने की राह में खड़ी दिक्कतों को हटाना राष्ट्रपति ट्रंप के लिए बहुत आसान नहीं होगा.
अमेरिका और चीन के बीच निवेश के रास्ते में खड़ी अड़चनों को दूर करने के लिए आकार ले रहे – बोर्ड ऑफ इनवेस्टमेंट के सामने कई तरह की चुनौतियां होंगी . इसी तरह बोर्ड ऑफ ट्रेड में भी दोनों ओर से कड़ी सौदेबाजी दिखनी तय है..ऐसे में चीन और अमेरिका के बीच गंभीर विवादित मुद्दों पर सहमति बनाना बहुत मुश्किल होगा .
अगर राष्ट्रपति ट्रंप का मिजाज कारोबारी है…तो राष्ट्रपति जिनपिंग का साहूकारों वाला. अगर डोनाल्ड ट्रंप तुनकमिजाज हैं तो शी जिनपिंग बहुत Calculative… शायद उनके मन-मस्तिष्क पर प्राचीन चाइनीज रणनीतिकार Sun Tzu की The Art of War का गहरा प्रभाव है … माना जा रहा है कि राष्ट्रपति जिनपिंग ने Board Of Trade और Board of Investment के जरिए चाइनीज कंपनियों की अमेरिका में एंट्री आसान करने का दांव चला होगा…वो अमेरिका से चाहेंगे कि Technology ट्रांसफर की राह में खड़े स्पीडब्रेकर्स हटाए..राष्ट्रपति ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि वो चाइना से अमेरिका में वन ट्रिलियन डॉलर का निवेश लाएंगे. अगर राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा होगा कि चाइना अब अमेरिकी सरकारी बॉन्ड में हिस्सेदारी न घटाए…तो बहुत हद तक संभव है कि राष्ट्रपति जिनपिंग ने कह दिया हो कि इस मुद्दे को किनारे रखते हैं. पिछले कुछ वर्षों में शक्ति संतुलन जिस तरह बदला है – उसमें चीन की कई कंपनियों ने भारत का रुख किया है. चीन की अर्थव्यवस्था भी दबाव के दौर से गुजर रही है. बदले हालात में राष्ट्रपति जिनपिंग चाहेंगे कि कंपनियां वापस चीन में आकर पहले की तरह प्रोडक्ड तैयार करें . ऐसे में चीन और अमेरिका के बीच साझेदारी का भारत पर क्या असर पड़ेगा – इसे भी समझना जरूरी है?
चीन और अमेरिका के बीच साझेदारी का भारत पर क्या असर
भारत में ब्रिक्स के विदेश मंत्री जुटे…दुनिया का ये प्रभावशाली मंच राष्ट्रपति ट्रंप की आंखों में खटकता रहा है . ब्रिक्स की ट्रंप सरेआम आलोचना कर चुके हैं…2026 की शुरुआत के साथ ही दुनिया का शक्ति संतुलन तेजी से बदलने लगा..दिल्ली में ब्रिक्स के मंच से विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि दुनिया मौजूदा समय में बहुत अनिश्चिता और मुश्किल दौर से गुजर रही है . दुनिया इस समय काफी अनिश्चित और जटिल दौर से गुजर रही है, जहां लगातार संघर्ष, आर्थिक अस्थिरता, व्यापार और तकनीक से जुड़ी चुनौतियां वैश्विक परिदृश्य को प्रभावित कर रही हैं.
दूसरी ओर, अमेरिका और चीन के बीच जिस तरह की केमेस्ट्री बनती दिख रही है… उसमें G2 यानी अमेरिका + चीन बनाम BRICS की बात भी होने लगी है . हालांकि, ब्रिक्स में चीन भी शामिल है. अमेरिका और चीन के बीच साझेदारी बढ़ने का एक मतलब ये भी सकता है कि ग्लोबल साउथ के देशों से पूंजी और तकनीक का रास्ता बदल सकता है..चाइना पूंजी और तकनीक को अमेरिका की ओर मोड़ सकता है . इसी तरह, राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों की वजह से अमेरिका की कई कंपनियों ने चाइना की जगह भारत में प्रोडक्शन बढ़ाया… मेक्सिको, वियतनाम, मलेशिया, थाइलैंड, इंडोनेशिया, ताइवान जैसे देशों में निवेश बढ़ाया . अगर बीजिंग और वाशिंगटन डीसी के बीच केमेस्ट्री कामयाब रही तो चीन चाहेगा कि वही दुनिया की फैक्ट्री बना रहे .
एशिया में चीन के विस्तार को रोकने के लिए अमेरिका भारत की ओर देखता था…QUAD की छतरी भी इसी सोच के साथ तानी गई थी – ऐसे में G2 के आकार लेने के बाद QUAD के अप्रासंगिक होने के चांस बढ़ जाएंगे . अगर राष्ट्रपति ट्रंप का प्लान कामयाब रहा तो एशिया में शक्ति संतुलन के लिए दूसरे देशों के लिए खास अहमियत नहीं रह जाएगी…
भारत के लिए चीन के साथ रिश्ते भी जरूरी हैं और अमेरिका के साथ भी . दुनिया में तेजी से बदलते आर्थिक व्यवहार और शक्ति संतुलन के बीच भारत को अमेरिका और चीनों दोनों के साथ बहुत संभलकर आगे बढ़ना होगा … साथ ही दुनिया के दूसरे बाजारों की ओर भी देखना होगा .
ये अमेरिका की ट्रंप डिप्लोमेसी का साइड इफेक्ट है कि आज की तारीख में भारत दुनिया के कई देशों के साथ Free Trade agreement कर रहा है… प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के UAE दौरे में तेल, गैस और रक्षा को लेकर कई बड़े समझौते हुए…UAE ने भारत में 5 अरब डॉलर निवेश का ऐलान भी किया . यूरोप को भी साधने की लगातार कोशिश चल रही है .
राष्ट्रपति ट्रंप का तौर-तरीका भले ही भारत को अधिक परेशान कर रहा हो…लेकिन, अमेरिकी रूख को लेकर दिल्ली ने हमेशा सर्तकता बरती है. इसी तरह, चीन के साथ कारोबार और सीमा पर तनाव दोनों साथ-साथ आगे बढ़े हैं. ऐसे में दो अति स्वार्थी शक्तियों के बीच गठजोड़ की बात दुनिया के ज्यादातर देशों की टेंशन बढ़ाने के लिए काफी है .
दुनिया में अमेरिका का दबदबा है और एशिया में चीन का . भारत बहुध्रुवीय दुनिया की वकालत करता है और बहुध्रुवीय एशिया की भी . लेकिन, दुनिया की नंबर वन और नंबर टू Economy या कहें आर्थिक प्रतिद्वंदियों के हाथ मिलाने का भारत पर असर न पड़े..ऐसा हो नहीं सकता है. आज की तारीख में भारत के अमेरिका से भी कारोबारी रिश्ते हैं और चाइना से भी..ऐसे में बीजिंग और वॉशिंगटन के बीच बनती नई केमेस्ट्री के बीच भारत को दोनों से बहुत संतुलित रिश्ता रखना होगा…क्योंकि, न तो चीन पर भरोसा किया जा सकता है और ना अमेरिका पर. वैसे भी कहा जाता है कि अमेरिका से दुश्मनी खतरनाक और दोस्ती घातक… लेकिन, बीजिंग में डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात में जो कुछ हुआ–उसकी अधूरी तस्वीर ही दुनिया के सामने आई है. पूरी तस्वीर सितंबर महीने में आ सकती है– जब राष्ट्रपति ट्रंप के न्यौते पर राष्ट्रपति जिनपिंग अमेरिका जाएंगे. क्योंकि, अगले चार महीने में अमेरिका और चीन के अधिकारी बोर्ड और ट्रेड और बोर्ड ऑफ इन्वेस्टमेंट में किस तरह का मैकेनिज्म बनते हैं – उसकी बुनियाद पर ही बहुत हद तक बीजिंग और वाशिंगटन डीसी का रिश्ता निर्भर करेगा? नहीं तो अमेरिका और चाइना एक दूसरे से सवाल करते दिख सकते हैं कि– हम आपके हैं कौन? आज बस इतना हीं–फिर मिलेंगे किसी ऐसे मुद्दे के साथ, जिसे जानना और समझना हम सबके लिए जरूरी होगा .