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पूरी दुनिया में एक अजीब सी उथल-पुथल और अनिश्चितता की स्थिति है. ये समझना मुश्किल है कि कौन मोहरा है और कौन बाजीगर? पहले युद्ध जमीन के हिस्से पर कब्जे के लिए लड़े जाते थे. लेकिन, अब युद्ध दूसरे मुल्कों के संसाधनों पर कब्जे के लिए लड़ा जा रहा है. इतिहास गवाह है – दूसरे विश्वयुद्ध के बाद किस तरह अमेरिका ने मिडिल ईस्ट के तेल भंडारों पर कब्जे की बिसात बिछाई. इस क्षेत्र में प्रभुत्व के लिए इजरायल को मजबूत बनाया. युद्ध की आग को हवा देकर अरब देशों के बीच डर पैदा किया और सुरक्षा का भरोसा देकर अपने पेट्रोल डॉलर को मजबूत किया. अमेरिका ने इस तरह गोटियां चली की कॉल्ड वार में उसका प्रतिद्वंद्वी यूएसएसआर खंड-खंड हो गया और अमेरिका दुनिया का दारोगा बन गया. अमेरिकी हुक्मरानों ने अपनी सहूलियत और फायदे के हिसाब से, कभी तानाशाहों को खड़ा किया. कभी उन्हें ध्वस्त कर दिया. इस लिस्ट में इराक के सद्दाम हुसैन भी हैं और लीबिया के कर्नल गद्दाफी भी. जो भी अमेरिकी की मर्जी के खिलाफ गया – उसे मिटाने में देर नहीं लगाया. अमेरिका के खिलाफ लगातार मोर्चा लेने वाले ईरान के सुप्रीम लीडर अली हुसैनी खामेनेई का भी वही अंजाम हुआ. लेकिन, इन सबके पीछे एक बड़ी वजह रही – इन मुल्कों के संसाधन खासकर तेल पर कब्जा. ईरान युद्ध भी उसी स्क्रिप्ट का हिस्सा है. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप मिडिल ईस्ट में ऑयल प्रोडक्शन, मार्केट और सप्लाई चेन पर कंट्रोल करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं. ऐसे में ईरान में उन्हें कितनी कामयाबी मिलेगी- इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में है. लेकिन, अरब वर्ल्ड बुरी तरह से आपस में ही उलझ गया है. टूटता और बिखरता दिख रहा है.

इस बीच यूएई OPEC से बाहर निकल गया है…अब आपके जेहन में सवाल उठ रहा होगा कि OPEC से UAE के बाहर निकलने से हम भारत के लोगों का क्या लेना-देना? हमारी रोजी-रोटी पर इससे क्या फर्क पड़ेगा? इससे हमारे देश में पेट्रोल-डीजल सस्ता होगा या महंगा? भारत अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी कच्चा तेल दूसरे देशों से मंगाता है. तेल किसी भी मुल्क की ऊर्जा जरूरत पूरा करने, राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा के लिए बहुत जरूरी है. ऐसे में आज समझने की कोशिश करेंगे UAE के एक फैसले से तेल का पूरा खेल कितना उलझ गया है? UAE ने इतना बड़ा फैसला क्यों लिया? UAE के OPEC से बाहर निकलने से किसे फायदा और किसे नुकसान होगा? क्या अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप UAE के कंधे पर रखकर बंदूक चला रहे हैं. आखिर उनके निशाने पर है कौन?

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28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल के ईरान पर हमले के बाद दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में तेल सप्लाई प्रभावित हुई है. होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी के बीच अप्रैल का कैलेंडर पलटने से पहले कच्चे तेल की कीमत 126 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई. मतलब, चार साल में कच्चे तेल की कीमत रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गयी. एक मई को UAE तेल उत्पादक देशों के संगठन OPEC से बाहर हो गया. मतलब, UAE पर अब OPEC के नियम-कायदे लागू नहीं होंगे. वहां के सर्वेसर्वा शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की हुकूमत तय करेगी कि UAE को तेल का कितना उत्पादन करना है. कीमत कितनी रखनी है और किसे तेल बेचना है. ओपेक 12 सदस्य देशों का एक ग्रुप है-जो सदस्य देशों के लिए तेल उत्पादन का कोटा तय करता है. इससे तेल की कीमतें स्थिति रहती हैं. ओपेक सदस्यों में सबसे ज्यादा तेल का उत्पादन तो सऊदी अरब करता है. उसके बाद नंबर इराक का आता है. फिर ईरान का और चौथे नंबर पर यूएई था. आंकड़े बताते हैं कि UAE से करीब तीन गुना अधिक कच्चा तेल सऊदी अरब निकालता है. ऐसे में सबसे पहले समझते हैं कि यूएई के हुक्मरानों ने किस सोच के साथ OPEC से बाहर निकलने का फैसला किया और इसका दुनिया पर क्या असर पड़ेगा?

दुनियाभर के तेजतर्रार कूटनीतिज्ञ और अर्थशास्त्री हिसाब लगा रहे हैं कि UAE ने 50 साल से अधिक पुराने गठबंधन OPEC से निकलने का फैसला क्यों लिया? इससे तेल बाजार कितना प्रभावित होगा? UAE के इस फैसले से किन देशों को फायदा या नुकसान हो सकता है. UAE के OPEC से निकलने की वजह जानने से पहले इसके वजूद में आने की वजह समझना जरूरी है.

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1960 में पश्चिमी देशों की तेल कंपनियों के वर्चस्व को तोड़ने के लिए OPEC की स्थापना हुई- जिसके ईरान, कुवैत, इराक, सऊदी अरब, वेनेजुएला संस्थापक सदस्य थे. करीब सात साल बाद संयुक्त अरब अमीरात आधिकारिक रूप से OPEC में शामिल हुआ. ओपेक देश ग्लोबल ऑयल सप्लाई का करीब 30 फीसदी कंट्रोल करते हैं. वहीं, ओपेक प्लस की ग्लोबल ऑयल सप्लाई में हिस्सेदारी 40 फीसदी से अधिक हो जाती है. साल 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, ओपेक सदस्यों में क्रूड प्रोडक्शन में सऊदी अरब की 34.34%, इराक की 14.54%, ईरान की 11.83%, UAE की 11.39%, कुवैत की 8.97%, नाइजीरिया की 5.48%, लीबिया की 4.70%, वेनेजुएला की 3.40%, अल्जीरिया की 3.39%, कांगो की 0.94%, गैबॉन की 0.82% और इक्वेटोरियल गिनी की 0.19% हिस्सेदारी रही.

मतलब, ओपेक सदस्यों में क्रूड प्रोडक्शन के मामले में UAE चौथे नंबर पर है. UAE की क्रूड प्रोडक्शन क्षमता अधिक है. लेकिन, ओपेक के नियम-कायदों की वजह से UAE अपनी क्षमता के हिसाब से क्रूड प्रोडक्शन नहीं कर पाता है. अब अपनी इस क्षमता का UAE पूरा फायदा उठाना चाहता है.

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पिछले कुछ वर्षों में UAE के हुक्मरानों ने जो रास्ता चुना. जिस तरह की कूटनीति को आगे बढ़ाया. उससे ओपेक के सबसे बड़े खिलाड़ी सऊदी अरब और चौथे नंबर के खिलाड़ी UAE के बीच तल्खी बढ़ती गयी. यमन समेत दूसरे कई मुद्दों पर अबू धाबी और रियाद की राहें जुदा हैं. अमेरिका-इजरायल के साथ UAE के आर्थिक और कूटनीतिक रिश्ते गहरे हुए हैं.

करीब 6 साल पहले हुए अब्राहम समझौते की शर्तों के मुताबिक UAE ने इजरायल के साथ कूटनीतिक संबंध जोड़ा. ईरान युद्ध के दौरान UAE के शहरों पर मिसाइल और ड्रोन गिरने के बाद भी वहां के हुक्मरान इजरायल और अमेरिका से रिश्ता मजबूत करने की कोशिश करते दिखे. दरअसल, UAE को अपना क्षेत्र में प्रभुत्व बढ़ाने के लिए अमेरिका के साथ खड़ा होने में अधिक फायदा दिख रहा है.

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UAE अब 2027 तक तेल उत्पादन को 34 लाख बैरल से बढ़ाकर 50 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंचाने की योजना पर काम कर रहा है. OPEC से UAE के बाहर निकलने से उसे अपनी क्षमता के हिसाब से क्रूड प्रोडक्शन की पूरी आजादी होगी. अपने हिसाब से बाजार और कीमत तय कर सकेगा. ईरान की नाकेबंदी की वजह से तेल खरीदारों के लिए UAE के नए विकल्प के रूप में मौजूद होगा.

नए स्वतंत्र खिलाड़ी के मैदान में उतरने से तेल बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी. OPEC की तुलना में UAE सस्ता तेल बेच सकता है. इससे तेल उत्पादन और कीमतों को कंट्रोल करने वाली सबसे दमदार संगठन कमजोर होगा. ऐसे में मिडिल ईस्ट में तेल का बाजार और बंट जाएगा. अमेरिका भीतर खाने चाहता है कि दुनिया की एनर्जी सप्लाई चेन में दमदार भूमिका निभाने वाला OPEC धीरे-धीरे कमजोर हो जाए या फिर खत्म हो जाए.

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पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह कूटनीति आगे बढ़ी है. उसमें UAE और सऊदी अरब के बीच रिश्ते तल्ख हुए हैं. UAE खुद को सऊदी अरब के प्रभाव से मुक्त करना चाहता है. अकेले आगे बढ़ना चाहता है. शायद UAE के हुक्मरानों को लगता है कि उनकी बात प्रभावी ढंग से नहीं सुनी जा रही है. ऐसे में ओपेक की छतरी के नीचे से हटने से अबू धाबी को तेल उत्पादन और तेल मार्केटिंग के लिए खुला आसमान दिख रहा है. भले ही ये दावा किया जा रहा हो कि OPEC से निकलने के बाद UAE बेहिसाब तेल का उत्पादन कर सकेगा. लेकिन, एक सच ये भी है कि UAE की हबशन-फुजैरा पाइप लाइन की क्षमता 1.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन है. जिसे बढ़ाकर 1.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन किया जा सकता है. ऐसे में तेल उत्पादन और सप्लाई चेन में सऊदी अरब या होर्मुज स्ट्रेट का विकल्प बनता तो यूएई नहीं दिख रहा है. इतना जरूर है कि UAE अपने सहयोगी देशों को सस्ते में कच्चा तेल बेच सकता है. ऐसे में सवाल उठता है कि तेल की दुनिया में इस नई हलचल से भारत को फायदा होगा या नुकसान? माना जा रहा है कि UAE के इस कदम से भारत की रिफाइनरियों को सस्ता कच्चा तेल मिल सकता है. ऐसे में तेल कंपनियों के पास कीमतों में कटौती की गुंजाइश बढ़ जाएगी.

पेट्रोलियम का इस्तेमाल सिर्फ गाड़ी में ही नहीं होता. रोजमर्रा की जिंदगी के ज्यादातर हिस्से पेट्रोल-डीजल से प्रभावित होते हैं. कच्चे तेल की बढ़ती-घटती कीमतें आम आदमी पर महंगाई का बोझ बढ़ाती और घटाती है.

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भारत कच्चे तेल की जरूरत का 85 फीसदी हिस्सा आयात करता है. जो 40 देशों से आता है. हमारे देश की कच्चे तेल की जरूरतों का आधा से अधिक हिस्सा मध्य पूर्व के देशों से आता है-जिसमें से एक यूएई भी है. भारत के कुल कच्चे तेल आयात का करीब 10 फीसदी हिस्सा यूएई से आता है.

माना जा रहा है बदले कूटनीतिक समीकरण में यूएई अब क्रूड प्रोडक्शन तेजी से बढ़ाएगा. हाल के वर्षों में यूएई और भारत के बीच रिश्तों में मिठास और साझेदारी दोनों बढ़ी है. ऐसे में ओपेक की तुलना में UAE भारत को कम कीमत पर कच्चा तेल दे सकता है.

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अनुमान लगाया जा रहा है कि UAE के हालिया फैसले से भारतीय रिफाइनरियों को सस्ता कच्चा तेल मिलेगा इससे कंपनियों के पास कीमतों में कटौती की गुंजाइश होगी. UAE खुद को तेल बाजार में स्थापित करने के लिए भारत जैसे बड़े खरीददारों को बड़ी छूट दे सकता है. अनुमान लगाया जा रहा है कि इससे भारत को 50 हजार करोड़ से एक लाख करोड़ रुपये तक का फायदा हो सकता है.

यूपीए सरकार में तेल जरूरतों को पूरा करने के लिए ईरान के साथ चाबहार पोर्ट को लेकर बात बढ़ी. लेकिन, बाद ये प्रोजेक्ट लटक गया. दरअसल, भारत का मिशन चाबहार पूरा हो गया होता तो सामरिक रूप से पाकिस्तान में चीन के ग्वादर पोर्ट का जवाब होता चीन पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर की अहमियत कम होती और भारत तक ईरान से कच्चा तेल आने का रास्ता साफ होता.

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भारत के कच्चे तेल आयात का करीब 70 फीसदी हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट के बाहर के रास्तों से आ रहा है. ऐसे में होर्मुज के विकल्प के तौर फुजैरा पोर्ट तक पाइपलाइन को देखा जा रहा है. ये भी दलील दी जा रही है कि हबशन-फुजैरा पाइप लाइन की क्षमता में मामूली बढ़ोतरी की गुंजाइश है. दूसरी जेबेल धन्ना–फुजैरा पाइपलाइन अभी पूरी तरह से तैयार नहीं हुई है.

अमेरिका-ईरान टेंशन और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज ब्लॉकेड के बीच भारत ने रूस से अधिक कच्चा तेल खरीदा. अप्रैल में हर दिन 1.6 मिलियन बैरल तेल की रूस से सप्लाई हुई. वेनेजुएला और ईरान से भी कच्चे तेल का आयात किया गया. भारत अपनी जरूरत का कच्चा तेल करीब 40 देशों से आयात करता है. ऐसे में माना जा रहा है कि यूएई के ओपेक से अलग होने का बड़ा फायदा भारत को मिल सकता है. दरअसल, मिडिल ईस्ट में अमेरिका सबसे बड़ा खिलाड़ी रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को स्ट्रेट ऑफ ट्रंप बता रहे हैं. अमेरिका ने ईरान के खार्ग द्वीप पर हमला कर अपना मंसूबा साफ कर दिया. ईरान के उप-राष्ट्रपति एस्फहानी साफ-साफ कह चुके हैं कि अगर उनके तेल क्षेत्र पर हमला हुआ तो खाड़ी देशों में चार गुना तबाही मचाई जाएगी. आशंका जताई जा रही है कि अमेरिका ने जिस तरह से ईरान की नाकाबंदी की है – उससे ईरान के सामने नए तरह का संकट पैदा हो गया है. तेल की सप्लाई चेन प्रभावित होने की वजह से ईरान से तेल बाहर नहीं जा पा रहा है. इससे ईरान में तेल का भंडार बढ़ता जा रहा है. अगर अमेरिकी नाकाबंदी इसी तरह जारी रही तो ईरान को अपना तेल उत्पादन बंद करना होगा. और बंद कुओं से दोबारा तेल निकालना बहुत मुश्किल होता है. ईरान के खिलाफ अपनी इस रणनीति को अमेरिका इकॉनॉमिक फ्यूरी यानी आर्थिक तूफान का नाम दे रहा है. अमेरिका जिस रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है – उसमें दुनिया के तेल उत्पादन में 40 फीसदी हिस्सेदारी वाले OPEC में ईरान को पंगु बनाने पर तुला है और यूएई जैसा खिलाड़ी बाहर हो चुका है. मतलब, अमेरिका ऐसी रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है – जिससे दुनिया में एनर्जी सप्लाई का पूरा सिस्टम बदल जाए?

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ईरान का खार्ग द्वीप. इस अहम आर्थिक और सामरिक ठिकाने पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की नजर है. फारस की खाड़ी में स्थित खार्ग द्वीप से ईरान का 90 फीसदी तेल निर्यात होता है. इस द्वीप को ईरानी अर्थव्यवस्था की लाइफलाइन माना जाता है. अमेरिका चाहता है कि खार्ग द्वीप पर उसका कंट्रोल हो से में इराक, कुवैत और सऊदी अरब तीनों ओर से खार्ग द्वीप पर कब्जे की रणनीति पर बढ़ते राष्ट्रपति ट्रंप दिख सकते हैं. ईरान के तेल भंडार और तेल सप्लाई के अहम रूट होर्मुज पर भी अमेरिका अपना नियंत्रण चाहता है.

अमेरिका एक ऐसी रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है – जिससे ईरान का तेल बाहर नहीं निकल सके. ऐसे में स्टोरेज की दिक्कत की वजह से अगर ईरान को तेल उत्पादन बंद करना पड़ा. तो ऐसे तेल कुओं से दोबारा प्रोडक्शन आसान नहीं होगा.

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OPEC के दो बड़े खिलाड़ी पहला ईरान अपने वजूद के लिए लड़ रहा है. दूसरा, UAE इससे बाहर निकल चुका है. सऊदी अरब अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर है.

सऊदी हुक्मरान वही करने को मजबूर हैं-जो राष्ट्रपति ट्रंप चाहेंगे. कभी दुनिया के तेल संसाधनों पर कब्जे के लिए OPEC की छतरी तानी गयी. अब उसी OPEC के बिखराव की स्क्रिप्ट तैयार कर दुनिया के तेल संसाधनों पर दोबारा कब्जे की कहानी राष्ट्रपति ट्रंप ने तैयार कर दी है.

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आज की तारीख में दुनिया में तेल का सबसे बड़ा भंडार न अमेरिका के पास है और न ईरान के पास न चीन के पास और न रूस के पास. सबसे अधिक तेल वेनेजुएला की धरती के गर्भ में है.

वेनेजुएला के पास 303 बिलियन बैरल का भंडार है. सऊदी अरब के गर्भ में 297 बिलियन बैरल तेल है. उसके बाद 208 बिलियन बैरल के साथ ईरान है. चौथे नंबर पर 168 बिलियन बैरल के साथ कनाडा है. पांचवें नंबर पर 145 बिलियन बैरल के साथ ईराक है. उसके बाद 101 बिलियन बैरल के साथ कुवैत खड़ा है. UAE के पास 99 बिलियन बैरल तेल भंडार होने का अनुमान लगाया गया है. उसके बाद रूस, लीबिया और अमेरिका का नंबर आता है.

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आज की तारीख में अमेरिका दुनिया में सबसे अधिक कच्चे तेल का उत्पादन करता है. लेकिन, ऑयल सप्लाई चेन और मार्केट पर OPEC का पलड़ा भारी है. ईरान को अमेरिका तबाह करने पर आमादा है. साल की शुरुआत में अमेरिका ने एक ऑपरेशन में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार कर लिया. एक स्टडी के मुताबिक, दुनिया में तेल का सबसे बड़ा भंडार वेनेजुएला के पास है. मौजूदा समय में अघोषित रूप से वेनेजुएला के तेल भंडारों का इस्तेमाल उसी तरह हो रहा है – जैसा राष्ट्रपति ट्रंप चाहते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या निकोलस मादुरो को इसलिए सत्ता से बेदखल किया गया. जिससे वेनेजुएला के तेल भंडारों पर नियंत्रण किया जा सके? राष्ट्रपति ट्रंप जानते हैं कि भारत और चीन कच्चे तेल के बड़े खरीदारों में से एक हैं. ऐसे में अमेरिका ने एक ओर वेनेजुएला के सस्ते तेल का विकल्प खोल दिया. दूसरी ओर UAE के सस्ते तेल का. दरअसल, अमेरिकी थिंक टैंक ये भी अच्छी तरह समझ रहे हैं कि चाइना लंबे समय से तेल उत्पादक देशों के बीच दखल बढ़ाने की कोशिश कर रहा है – जिससे पेट्रोल डॉलर कम हुआ है. दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की पूरी कोशिश ऑयल प्रोडेक्शन, ऑयल सप्लाई और ऑयल मार्केट तीनों को कंट्रोल करने की है.

दुनिया की तरक्की में तेल ने अहम भूमिका निभाई है. खाड़ी देशों में एक ऐसी साझी व्यवस्था बनी. जिसमें खाड़ी देशों ने सबको तेल बेचा. इसका सबको फायदा हुआ. कभी ब्रिटेन की नौसेना ने समुद्री रास्तों की रक्षा की. फिर इस क्षेत्र में अमेरिका की एंट्री हुई. अमेरिका ने खाड़ी देशों में अपने सैन्य अड्डे बनाए. सुरक्षा का भरोसा दिया. ये सिस्टम करीब 5 दशकों तक चला. पिछले कुछ दशकों में ईरान जिस रास्ते बढ़ा-उसमें अमेरिका को अपना सिस्टम हिलता दिखा. अमेरिका की खाड़ी देशों में पकड़ धीरे -धीरे कमजोर पड़ रही थी. वहीं, ईरान लगातार अमेरिका को चुनौती दे रहा था.

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अमेरिका ने ईरान के खिलाफ ऑपरेशन एपिक फ्यूरी का बटन दबाकर पूरे मिडिल-ईस्ट के सिस्टम को इधर-उधर कर दिया. ईरान की मिसाइल और ड्रोन अरब वर्ल्ड के उन देशों में भी गिरे–जिनके बीच रिश्ते सुधरने लगे थे. दुनिया में तेल उत्पादन में अमेरिका टॉप पर है. लेकिन, तेल की कीमत और बाजार तय करने में ओपेक की बड़ी भूमिका है.

सऊदी अरब के साथ अमेरिका की साझेदारी बहुत पुरानी है. लेकिन, पिछले कुछ वर्षों से यूएई और सऊदी के बीच तल्खी बढ़ी है. ऐसे में सऊदी के वर्चस्व वाले OPEC से निकलकर UAE ने तेल के खेल और बाजार में बड़ी हलचल पैदा कर दी है. यूक्रेन युद्ध के बाद तेल का खेल और बाजार बनाने-बिगाड़ने में रूस बड़ी भूमिका निभा रहा है. ऐसे में तेल का बाजार कई हिस्सों में बंट चुका है.

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राष्ट्रपति ट्रंप इस तरह गोटियां चल रहे हैं–जिससे दुनिया के तेल संसाधनों पर उनके मुल्क का कब्जा हो जाए. आज की तारीख में तेल भंडारों से भरपूर वेनेजुएला में अमेरिका के इशारे पर हुकूमत चल रही है. सऊदी हुक्मरान अमेरिकी राष्ट्रपतियों के आंख की पुतलियों के इशारे पर चलते रहे हैं. राष्ट्रपति ट्रंप का मिशन ईरान जारी है. कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने का मंसूबा जता चुके हैं. तेल भंडार से भरपूर इराक और कुवैत अमेरिका की हां में हां मिलाते हैं. तेल की दुनिया का एक अहम खिलाड़ी UAE ओपेक से बाहर निकल चुका है.

मतलब, राष्ट्रपति ट्रंप ने एक ऐसा दांव चला – जिसमें दुनिया में एनर्जी सप्लाई का पूरा समीकरण बदलता दिख रहा है. संभवत: राष्ट्रपति ट्रंप की रणनीति है कि तेल उत्पादक देश आपस में बंट जाए और इसके साथ तेल का बाजार भी बंट जाए. इससे भविष्य में तेल की मांग बनी रहेगी और बढ़ती भी रहेगी. राष्ट्रपति ट्रंप पारंपरिक ऊर्जा यानी तेल-गैस के प्रोडक्शन, सप्लाई सिस्टम और मार्केट तीनों को इस तरह चलाना चाहते हैं, जिससे USA को अधिक से अधिक फायदा हो.

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इतिहास गवाह रहा है कि दुनिया को बदलने में तेल ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. जिस देश ने तेल की अहमियत को जितनी जल्दी समझा, उसने उतनी ही तेजी से तरक्की की. वैसे तो तेल का इतिहास करीब 200 साल पुराना है. साल 1829 में रूस के बाकू में तेल मिला. वहां कारखाना लगा. लेकिन, रूसियों को तेल की अहमियत समझ में नहीं आई. दूसरी ओर, अमेरिकियों ने इसे सोने की तरह बेशकीमती माना. भारत में साल 1857 में जब कंपनी राज से आजादी के लिए संग्राम चल रहा था, उस दौर में अमेरिका में तेल क्रांति आकार ले रही थी. वहां के पेंसिल्वेनिया में प्रांत में तेल के लिए ड्रिलिंग हुई. तेल कारोबार में कई दिग्गजों ने हाथ आजमाया – लेकिन, जॉन विलियम डी. रॉकफेलर ने इस धंधे में सबको पछाड़ दिया. रूस को तेल की वैल्यू बाद में समझ आई. साल 1917 की रूस की क्रांति की बड़ी वजहों में से एक तेल भी था . क्योंकि, बाकू-बाटुम के तेल कुओं में काम करने वाले मजदूरों के शोषण के खिलाफ आवाज व्लादिमीर लेनिन ने बुलंद की. स्टालिन का भी तेल युद्ध से गहरा नाता रहा. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद महाशक्तियों ने उन क्षेत्रों की ओर खासतौर से फोकस किया. जहां की जमीन के नीचे तेल का अकूत भंडार दबा पड़ा था. प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिकी हुक्मरानों की समझ में एक बात अच्छी तरह आ गई कि भविष्य में वहीं ताकतवर होगा – जिसका तेल पर कब्जा होगा. वो दशक 1930 का था. अमेरिका के राष्ट्रपति की कुर्सी पर थे फ्रेंकलिन डी रूजवेल्ट. साल 1933 में स्टैंडर्ड ऑयल ऑफ कैलिफोर्निया नाम से एक कंपनी बनी. जिसने सऊदी अरब के साथ तेल रियायत को लेकर समझौते पर दस्तखत किए. जिससे तेल की खोज की छूट मिली. इसके बाद अरेबियन अमेरिकन ऑयल कंपनी यानी अरामको का जन्म हुआ. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद तेल पर कब्जे के लिए नए सिरे से बिसात बिछाई जाने लगी.

साल 1923 में सऊदी अरब, बहरीन में तेल के भंडारों का पता चला. जिस पर ब्रिटिश पेट्रोलियम की नजर थीं. अमेरिका इस क्षेत्र को अपने हाथ से निकलने नहीं देना चाहता था. अमेरिका अपने मुल्क की कंपनी के साथ मजबूती से खड़ा हो गया. साल 1933 में सऊदी अरब और कैलिफोर्नियां की स्टैंडर्ड ऑयल कंपनी के बीच एक करार पर दस्तखत हुआ. और शुरू हुई तेल की खोज. शुरुआती कई कोशिशें नाकाम रहीं. लेकिन, 1938 में दम्माम नंबर 7 से जब कमर्शियल ऑयल प्रोडेक्शन शुरू हुआ. इसके बाद कंपनी की किस्मत चमकने लगी. 1944 में कंपनी का नाम बदल कर अरामको कर दिया गया. जिसने सऊदी अरब को ग्लोबल एनर्जी मैप पर एक बड़ी ताकत के रूप में स्थापित करना शुरू कर दिया.

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अरब देशों की मजबूरी ये थी कि उनके पास तेल के भंडार तो थे. लेकिन, तेल निकालने की तकनीक नहीं थी. तेल बेचने के लिए बाजार नहीं थे. जिसका फायदा अमेरिका समेत दूसरे पश्चिमी देशों ने जमकर उठाया. 1950 के दशक में ईरान ने अपनी तेल कंपनी का राष्ट्रीयकरण किया तो अमेरिका – ब्रिटेन ने ईरान में तख्तापलट की साजिश रची और शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी को ईरान का शासन बना दिया. ईरान वॉशिंगटन के करीब पहुंच गया. अरब वर्ल्ड के शहरी इलाकों में डॉलर की चमक साफ-साफ महसूस होने लगी.

1970 के दशक में अमेरिका ने सऊदी अरब को डॉलर में तेल का कारोबार करने के लिए तैयार कर लिया और धीरे-धीरे इस क्षेत्र के दूसरे देशों में घुसने लगा. डॉलर में कारोबार के बदले में अमेरिका ने अरब देशों को सुरक्षा की गारंटी दी. लेकिन, ईरान के सामाजिक तानेबाने में नई हलचल आकार ले रही थीं. तेल और डॉलर की चमक की वजह से वहां गरीब-अमीर के बीच चौड़ी खाई पैदा हो गई. जिससे ईरान में 1979 में इस्लामिक क्रांति हुई. इसका असर पड़ोसी देशों पर भी पड़ा.

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ये तेल के कुओं से तरक्की का ईंधन निकालने वाली सोच ही थी, जिसमें अमेरिका ने मुस्लिम देशों में सैन्य तानाशाहों को खड़ा किया. ये तेल और प्राकृतिक गैस भंडारों पर कब्जे की सोच ही थी, जिसमें तानाशाहों को मिट्टी में मिलाने की साजिश रची गई. ये तेल कुओं की मदद से दुनिया पर राज करने वाली सोच ही थी. जिसमें ISIS ने कभी इराक और सीरिया के बड़े हिस्से में आतंक का साम्राज्य खड़ा किया.

इतिहास गवाह है कि तेल कुओं पर कब्जे के लिए इराक और कुवैत के बीच जंग हुई. ईरान पिछले कई दशकों से अमेरिका और पश्चिमी देशों को चुनौती देता रहा है. ये तेल से कमाई दौलत थी-जिससे हमास, हिजबुल्ला और हूती जैसे हथियारबंद संगठनों की ईरान मदद कर रहा था. ये ऑयल सप्लाई चेन को कंट्रोल करने की कोशिश हो सकती है – जिसमें अमेरिका ने ईरान के खिलाफ जंग छेड़ दी. आज की तारीख में वैश्विक संबंध और आर्थिक तरक्की की रफ्तार तय करने में तेल और प्राकृतिक गैस बहुत अहम भूमिका निभा रहा है.

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दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस ह्यूमनॉइड रोबोट इंसानों की जगह लेते जा रहे हैं. कूटनीति भी अब आर्थिक नफा-नुकसान की परिक्रमा करती दिख रही है. ऐसे में कारखाना हो या युद्ध का मैदान, असली ताकत उसी के पास होगी – जिसका एनर्जी पर कंट्रोल होगा. दुनिया की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में गैस, कोयला और प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी 80 फीसदी से अधिक है. इसकी सप्लाई चेन में मिडिल ईस्ट के देश अहम भूमिका निभाते हैं. ऐसे में राष्ट्रपति ट्रंप ने मिडिल ईस्ट में एक ऐसा खेल खेला है – जिसमें वो वर्ल्ड एनर्जी ऑर्डर को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे अमेरिका का अधिक से अधिक फायदा हो सके. तेल के लिए चल रहे नए तिकड़म के बीच दुनिया के ज्यादातर देश अपने नफा-नुकसान का हिसाब लगा रहे हैं. तो भारत का आम आदमी जोड़-घटाव कर रहा है कि अगर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग यूं ही भड़कती रही – तो उसकी जिंदगी की गाड़ी कैसे चलेगी? क्योंकि, तेल और गैस की कीमतों का असर जिंदगी के हर पहलू पर डायरेक्ट या इनडायरेक्ट रूप से पड़ता है.

First published on: May 02, 2026 08:41 PM

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Anurradha Prasad

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