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भारत में करीब 100 साल पहले करीब तीन महीने के अंतर पर Right wing (दक्षिणपंथी) और Left आइडोलॉजी के विस्तार की शुरुआत हुई. लेकिन, 100 साल बाद Right wing (दक्षिणपंथी) विचारधारा से जुड़े लोगों की 22 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में हुकूमत है . दूसरी ओर, लेफ्ट की राजनीतिक जमीन बुरी तरह से सिकुड़ चुकी है . ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर दक्षिणपंथी लगातार मजबूत कैसे होते जा रहे हैं? दक्षिणपंथियों को कहां से ताकत मिल रही है ? भारत में Right wing (दक्षिणपंथी) पॉलिटिक्स अपने चरम पर है या अभी और उफान बाकी है? लेफ्ट के मैदान से आउट होने के बाद Right wing (दक्षिणपंथी) को Centrist किस तक चुनौती देंगे ? क्या वो कांग्रेस होगी या आज की बीजेपी के भीतर से Centrist Thought वाले नेता निकलेंगे? मध्यमार्गी कांग्रेस को Right wing (दक्षिणपंथी) से टक्कर लेने के लिए रणनीति में कहां-कहां बदलाव करने की जरूरत है? आज भारतीय राजनीति से जुड़े कुछ ऐसे ही गंभीर सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे–अपने खास कार्यक्रम में भारत में राइट, लेफ्ट, सेंटर !

पश्चिम बंगाल में बीजेपी प्रचंड बहुमत से सत्ता में आईं. ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी से बीजेपी के रथ पर सवार हुए सुवेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली… ये सभी को खुली आंखों से दिखाई दे रहा है . ये भी दिख रहा है कि भारत के 22 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में बीजेपी और NDA की सरकार है. लेकिन, इसमें जो नहीं दिखाई दे रहा है – वो ये कि क्या Right wing (दक्षिणपंथी) पॉलिटिक्स हमेशा के लिए है? क्या इसे भविष्य में कभी चुनौती नहीं मिलेगी ? लेफ्ट विचारधारा के दम तोड़ने के बाद आखिर Centrist विचारधारा का झंडाबरदार कौन होगा ? इन सवालों पर मंथन से पहले ये समझना जरूरी है कि पूरी दुनिया में Right wing (दक्षिणपंथी) पॉलिटिक्स करने वाले सत्ता समीकरण बनाने में किस तरह कामयाब हो रहे हैं .

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पश्चिम बंगाल में पहली बार बीजेपी की सरकार बनी…ये कोई साल-दो साल…पांच या दस साल की मेहनत का नतीजा नहीं.. आजादी के पहले से ही बंगाल में हिंदुत्ववादी ब्रिगेड काम कर रही थी … शुरुआती दौर में कांग्रेस की मध्यमार्गी और बाद में वामपंथी विचारधारा के प्रचंड प्रवाह में दक्षिणपंथी विचारधारा बंगाल की जमीन पर खास जगह नहीं बना पायी..लेकिन, साल 2014 में केंद्र में प्रचंड बहुमत से बीजेपी की सरकार बनने के बाद नरेंद्र मोदी और अमित शाह की प्राथमिकता सूची में बंगाल एकाएक ऊपर आ गया . उसके बाद चुनाव-दर-चुनाव बंगाल में बीजेपी अपना पैर जमाती गयी .

अब सवाल उठता है कि दक्षिणपंथी विचारधारा में बंगाल की सियासी जमीन पर अल्टा लेफ्ट मानी जानेवाली ममता बनर्जी को पटखनी कैसे दी? Right wing (दक्षिणपंथी) बीजेपी ने हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, बंगाली अस्मिता, आर्थिक विकास, घुसपैठियों को बाहर निकलना, बदलाव का ऐसा नैरेटिव आगे बढ़ाया…जिससे बंगाल में पहली बार सत्ता समीकरण बन गया .

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दुनिया भर में दक्षिणपंथ की लहर

आज की तारीख में भारत के 72% हिस्से पर बीजेपी या NDA का शासन है…आबादी के हिसाब से करीब 76% लोग बीजेपी या NDA शासित राज्यों में रहते हैं … साल 2014 नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने…तब BJP या NDA की सिर्फ 7 राज्यों में सरकार थी … तब देश की करीब 26 प्रतिशत आबादी पर ही बीजेपी या उसके गठबंधन का शासन था . ये विस्तार Right wing (दक्षिणपंथी) आइडोलॉजी का है-जो देश, काल, परिस्थिति के हिसाब से बदलती रहती है . सिर्फ भारत ही नहीं पूरी दुनिया में Right wing (दक्षिणपंथी) आइडोलॉजी तेजी से सत्ता में काबिज होती जा रही है .

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप हों…
इटली में जियोर्जिया मेलोनी हों…
अर्जेंटीना में जेवियर माइली हों…
अल साल्वाडोर के नायिब बुकेले हों
इजरायल के बेंजामिन नेतन्याहू हों
तुर्की के रेसेप तैयप एर्दोआन हों
पुर्तगान के लुइस मोंटेनेग्रो हों या
चिली के जोस एंटोनियो कास्ट

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सभी अपने-अपने तरीके से Right wing (दक्षिणपंथी) आइडोलॉजी के सहारे सत्ता में आए या बने हुए हैं . यूरोप में दक्षिणपंथी और Far Right पार्टियों का प्रभाव बड़ा है . इस लिस्ट में इटली, फ्रांस, नीदरलैंड, ऑस्ट्रिया जैसे देश शामिल हैं .

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप ने Make America Great Again, अमेरिका फर्स्ट, अवैध प्रवास और मेक्सिको सीमा को बड़ा मुद्दा बनाया…तो इटली में जियोर्जिया मेलोनी ने अवैध प्रवास रोकने,राष्ट्रीय पहचान और कड़ी बॉडर पॉलिसी का वादा किया.
अल साल्वाडोर में नायिब बुकेले ने संगठित अपराध और गैंप हिंसा पर कड़ी कार्रवाई कर लोगों के दिल में जगह बनायी…तो अर्जेंटीना में जेवियर माइली ने Minimum Government, कम टैक्स और मुक्त बाजार यानी Free Market की बात कर लोगों को जोड़ा . रेसेप तैयप एर्दोआन तुर्की राष्ट्रवाद, तुर्की गर्व और इस्लामिक पहचान के नाम पर सत्ता में बने हुए हैं… वहीं, इजरायल में बेंजामिन नेतन्याहू सुरक्षा और यहूदी राष्ट्रवाद का एजेंडा लगातार आगे बढ़ा रहे हैं…ये भी देखा गया कि दुनिया के कई हिस्सों में लोगों ने पारंपरिक या मध्यमार्गी विचारधारा वाली पार्टियों को नकारा मानते हुए हमेशा एक्शन में दिखने वाली दक्षिणपंथी पार्टियों और उनके मुखर नेताओं को सत्ता संभालने के लिए चुना .

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Right wing (दक्षिणपंथी) आइडोलॉजी से जुड़ी राजनीतिक पार्टियां और नेता परंपरा और संस्कृति को अहमियत देते हैं . राष्ट्रवाद को ड्राइविंग सीट पर रखते हैं. Nation First के नाम पर आक्रामक राष्ट्रवाद की सुनामी तैयार करते हैं . Free Market की बात करते हैं. Minimum government maximum governance की बात करते हैं . Right wing (दक्षिणपंथी) की तुलना में left कहीं उदार दिखते हैं. भारत में कम्युनिस्टों को सबसे ज्यादा चुनौती सोशलिस्ट विचारधारा से मिली . भारत के कम्युनिस्ट नेता शायद रूस-चीन और भारत के सामाजिक ताने-बाने में फर्क नहीं कर पाए. भारतीय समाज को Class के चश्मे से देखते रहे … जबकी सोशलिस्टों ने जहां की जाति व्यवस्था को समझा और उसके आधार पर राजनीतिक विकल्प देने की कोशिश की . इसमें उन्हें कामयाबी भी मिली. दूसरे तरीके से कहा जाए तो कम्युनिस्ट विचारधारा में सोशलिस्ट एक तरह से Centrist की भूमिका में रहे . ये भी एक सच है कि 1990 के दशक में मध्यमार्गी कांग्रेस को कमजोर करने में डॉक्टर राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण की सोशलिस्ट धारा से निकले नेताओं बड़ी भूमिका निभाई . भले ही सत्ता के लिए राजनीतिक विचारधारा की लकीर मिटती गईं…लेकिन, राजनीतिक विकल्प बनने के लिए भारत की राजनीति में Right wing (दक्षिणपंथी) अपने तरीके से काम करता रहा .

ये राजनीति का बदला स्टाइल

ये राजनीति का बदला स्टाइल है . लोकतंत्र की नई परिभाषा और व्याख्या है… जिसमें लोगों को बदलाव और विकास की नई सुबह की शुरुआत बताई जा रही है . बताया जा रहा है कि लोगों ने पुरानी सत्ता को बदल दिया है . अंधेरा छंट चुका है…अब सिर्फ और सिर्फ लोगों की बेहतरी और विकास के लिए काम होगा .

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Right wing (दक्षिणपंथी)-Left Wing की बहुत बातें होती हैं . आखिर ये है क्या ? इसे जानना- समझना भी बहुत जरूरी है . बात करीब 237 साल पुरानी है. 1789 में फ्रांस में क्रांति के दौरान…संसद में प्रतिनिधि विचारों के आधार पर बंटे थे. जो लोग राजा, चर्च,पुरानी व्यवस्था का समर्थन करते थे – वो सभापति के दाहिनी ओर यानी Right Side बैठते थे..वहीं, लोगों के हक-हुकूक, समानता और बदलाव की बात करने वाले बाईं ओर यानी Left Side बैठते थे. वहीं है दुनिया के राजनीतिक शब्दकोष में Right यानी दक्षिणपंथ और Left यानी वामपंथ जुड़ गया .

दक्षिणपंथी विचारधारा से जुड़ी पार्टियों की सोच है कि समाज धीरे-धीरे विकसित हुआ है . इसलिए पुरानी परंपराओं के साथ नवीनता को स्वीकार किया जाना चाहिए . पूरी दुनिया में जिस तरह की राजनीति चल रही है – उसमें Right wing (दक्षिणपंथी) पॉलिटिक्स में एक ट्रेंड दिख रहा है…जिसमें एक करिश्माई नेता उभरता है. उसके आसपास लोकलुभान राजनीति को आगे बढ़ाया जाता है . हर देश और क्षेत्र के हिसाब से मुद्दा और नेता बदलते रहते हैं…भारत में भी दक्षिणपंथ विचारधारा वाली पार्टियों ने लोक- कल्याणकारी नीतियों को अपनी ड्राइविंग सीट पर बैठा रखा है.दक्षिणपंथी पार्टियां धर्म और विकास की बात साथ-साथ कर रही हैं .

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री सीधे मिशन 2047 की बात कर रहे हैं. विकास के साथ वैश्विक समन्यव की बात हो रही है… एक ओर 2047 तक भारत को विकसित देशों की कतार में खड़ा करने का सपना है-जो दूसरी ओर देश की 80 करोड़ से अधिक आबादी को हर महीने मुफ्त अनाज दिया जा रहा है . कैश ट्रांसफर स्कीम के जरिए किसान और महिलाओं को साथ जोड़े रखने की रणनीति को लगातार आगे बढ़ाया जा रहा है .

बीजेपी के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी बीजेपी के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खड़ा है – जहां सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, संस्थागत पहचान और एक मजबूत नेतृत्व के सहारे दूसरी विचारधाराओं को कमजोर करने का काम जारी है…एक सच ये भी है कि वक्त के साथ वामपंथी, समाजवादी और मध्यमार्गी विचारधाओं ने खुद को उतनी तेजी से अपडेट नहीं किया … जितनी तेजी से दक्षिणपंथी विचारधारा से जुड़ी पार्टियों ने किया .

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैचारिक धारा से भारतीय जनसंघ का जन्म हुआ. साल 1967 में दक्षिणपंथियों ने पहली बार सत्ता का स्वाद चखा…1977 में केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी तो उसमें Right wing (दक्षिणपंथी) आइडोलॉजी से जुड़े लोगों को सत्ता में अहम जिम्मेदारी मिली . Right wing (दक्षिणपंथी) आइडोलॉजी वाले लोग सिर्फ RSS या जनसंघ से ही जुड़े नहीं थे . आजादी के बाद कांग्रेस के भीतर भी दक्षिणपंथी सोच वाले लोग थे – जिसमें सरदार पटेल, डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद और गोविंद बल्लभ पंत जैसे नेता थे. हिंदू महासभा और रामराज्य परिषद जैसी राजनीतिक पार्टियां थी . तब Right wing (दक्षिणपंथी) में Ultra Right wing (दक्षिणपंथी) बनने की होड़ थी . साल 1980 में बीजेपी अस्तिव में आईं तो सत्ता में आने के लिए कई प्रयोग किए . लेकिन, राम मंदिर आंदोलन से बीजेपी को भारतीय राजनीति में बड़ा राजनीतिक आसमान मिला. बीजेपी हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के एजेंडा को आगे बढ़ाते हुए..आज की तारीख में दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनी हुई है. अब सवाल उठता है कि क्या मौजूदा विचारधारा के आधार पर बीजेपी देश के बाकी राज्यों में भी सत्ता में काबिज होने में कामयाब रहेगी या Centrist कांग्रेस से कड़ी चुनौती मिलेगी ? क्या ये भी संभव है कि बीजेपी के भीतर से ही Centrist धारा निकले ?

भारत के नक्शे पर उत्तर में जम्मू-कश्मीर, पंजाब और हिमाचल में बीजेपी की सरकार नहीं है..दक्षिण में तमाम कोशिशों के बाद भी तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना में कमल नहीं खिल पाया . पिछले विधानसभा चुनाव में झारखंड में हेमंत सोरेन ने अपने आक्रमक अंदाज से बीजेपी को रोक दिया…तो नॉर्थ ईस्ट के मिजोरम में ज़ोरम पीपुल्स मूवमेंट की सरकार है . दक्षिणपंथी बीजेपी को उत्तर और दक्षिण दोनों हिस्सों में मध्यमार्गी पाटियों से कड़ी चुनौती मिल रही है. ये भी कहा जा रहा है कि बीजेपी अपने विस्तार के चरम बिंदु पर है…दूसरी ओर, Right wing (दक्षिणपंथी) आइडोलॉजी से जुड़े लोग उत्तर और दक्षिण भारत के उन राज्यों का जिक्र करते हैं – जहां अभी विरोधी पार्टियों की सरकार है . मतलब, भारत में दक्षिणपंथी विचारधारा के विस्तार का चरम बिंदु आना अभी बाकी है .

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केरल में वामपंथी सरकार का विकल्प दक्षिणपंथी विचारधारा वाली बीजेपी नहीं बनी..बल्कि मध्यमार्गी कांग्रेस विकल्प बनी. इसी तरह तेलंगाना में के. चंद्रशेखर राव के विकल्प के रूप में लोगों ने दक्षिणपंथी विचारधारा की जगह मध्यमार्गी कांग्रेस को चुना..कर्नाटक में भी कांग्रेस की सरकार है. तमिलनाडु में लोगों ने वहां की पारंपरिक पार्टियों की जगह फिल्म अभिनेता विजय थलापति की TVK को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में चुना..ऐसे में वामपंथी विचारधारा के दम तोड़ने के बाद भारत में दक्षिणपंथी विचारधारा के विकल्प के तौर पर मध्यमार्गी विचारधारा वाली राजनीतिक पार्टियां ही टक्कर देती दिख रही है .

सत्ता का एक मिजाज ये भी होता है कि राजनेता अपने नफा-नुकसान के हिसाब से विचारधारा का लवादा बदलते रहते हैं. तमिलनाडु में DMK और AIADMK का रिश्ता केंद्र में NDA और UPA दोनों से रहा…पश्चिम बंगाल की सत्ता से आउट हो चुकीं ममता बनर्जी कभी केंद्र में NDA सरकार का हिस्सा रहीं और कभी UPA का

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इतिहास गवाह है कि जब केंद्र और ज्यादातर राज्यों में कांग्रेस का सरकार हुआ करती थी. तब मध्यमार्गी कांग्रेस में से भी कई धाराएं फूंटी – कई राजनीतिक दल बने . कांग्रेस की मध्यमार्गी विचारधारा के विरोध में खड़े सियासी दलों ने अपनी सहूलियत और नफा-नुकसान के हिसाब से विचारधारा का जो भी लवादा ओढ़ा…लेकिन, आज की तारीख में कभी कांग्रेस विरोध में बनी पार्टियां कई सूबों में गठबंधन कर दक्षिणपंथी बीजेपी को रोकने की कोशिश करती दिख रही हैं .

सत्ता के प्रवाह में दूसरी पार्टियों के नेता भी तेजी से दक्षिणपंथी विचारधारा वाली बीजेपी के साथ जुड़ रहे हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जिस तरह बीजेपी का विस्तार हो रहा है-वैसे में क्या बीजेपी के भीतर से भी मध्यमार्गी विचारधारा फूट सकती है ? क्या ऐसे नेता निकल सकते हैं – जो दक्षिणपंथ में कट्टरपंथ की जगह उदार विचारधारा के पैरोकार हों…लोकतंत्र की परंपराओं में विपक्ष को मिटाने वाली सोच की जगह संसदीय लोकतंत्र को आगे बढ़ाने वाली गाड़ी के दूसरे पहिए की तरह देखते हों…जो एक पार्टी, एक नेता, एक सोच से आगे का मिजाज रखते हों .

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अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप को कहां से चुनौती?

दुनिया के नक्शे पर देखिए अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप को कहां से चुनौती मिल रही है . उनकी पार्टी के भीतर से . मध्यमार्गी मानी जानेवाली रिपब्लिकन पार्टी से..पिछले 25 वर्षों से रूस की कमान व्लादिमीर पुतिन के हाथों में है…जहां विपक्ष नाम की कोई चीज ही नहीं है . ऐसे में पुतिन के शासन को भी Ultra Right wing (दक्षिणपंथी) कैटगरी में रखा जा सकता है . ऐसे में भविष्य में पुतिन के शासन को भी उनकी पार्टी के भीतर से निकली Centrist आइडोलॉजी से भी चुनौती मिल सकती है . इसी तरह का हाल कम्युनिस्ट चाइना का भी है . हाल में हुए विधानसभा चुनाव में केरलम से भी लेफ्ट सत्ता से आउट हो गया…इससे पहले त्रिपुरा हाथ से निकला…उससे पहले पश्चिम बंगाला.ऐसे में ये समझना भी जरूरी है कि भारत के सामाजिक ताने-बाने में लेफ्ट से ऐसी कौन सी गलतियां हुईं – जिससे वो सत्ता की धारा में किनारे लगते गए .

20वीं शताब्दी में धरती के ज्यादातर हिस्सों में क्रांतिकारियों को सम्मोहित करने वाली वामपंथी विचारधारा अब दुनिया के हर हिस्से में दम तोड़ रही है … केरलम में अगर कुछ समय को किनारे रख दिया जाए तो 1957 से सत्ता लेफ्ट और कांग्रेस के बीच आती-जाती रही . साल 2016 से केरलम में CPI (M) की सरकार थी-जिसके मुखिया पिनाराई विजयन थे. केरलम जैसा मजबूत किला भी 4 मई को लेफ्ट के हाथों से निकल गया .

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साल 1957 में चुनाव जीतकर कम्युनिस्टों ने पहली बार केरल में सरकार बनाई…संभवत:, दुनिया के इतिहास में पहला ऐसा मौका था–जब कम्युनिस्टों ने कहीं लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव जीतकर सरकार बनाई. केरल से पहले त्रिपुरा की सत्ता से लेफ्ट आउट हुआ..वहां में करीब 35 साल वामपंथी विचारधारा सत्ता में रही-जिसे BJP ने सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया. पश्चिम बंगाल में वामपंथियों का शासन करीब 34 साल रहा… जिसमें दो मुख्यमंत्री रहे एक ज्योति बासु और दूसरे बुद्धदेव भट्टाचार्य . साल 1996-1998 के बीच गठबंधन राजनीति का ऐसा उफान आया..जिसमें वामपंथी प्रधानमंत्री की संभावना देखी जाने लग.हालांकि, वामपंथियों ने उस मौके को गंवा दिया…उस दौर को भारत में वामपंथी विचारधारा का स्वर्णिम युग कहा जा सकता है.नेशनल पॉलिटिक्स में वामपंथियों की हनक महसूस की गयी.

भारतीय राजनीति में अक्सर वामपंथी और दक्षिणपंथी विचारधाराएं टकराती रही हैं . समय-समय पर वामपंथ के भीतर भी कई धाराएं निकली..जिसे भारत के वामपंथी नेताओं ने जमीन पर उतारने की कोशिश की..भारत के सामाजिक ताने-बाने से इतर रूस और चीन के वामपंथी मॉडल को लागू करने की कोशिश की..जो शायद देश की बड़ी आबादी को हजम नहीं हुआ और वोट की जमीन पर किसान और गरीब बहुसंख्यक भारत में कम्युनिस्टों को बड़ी कामयाबी नहीं मिल पायी .

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वामपंथियों की ऐतिहासिक भूल और कांग्रेस के लिए चुनौती

भारतीय कम्युनिस्टों की बड़ी कमजोरी ये रही कि वो देश के सामाजिक ताने-बाने में जाति और धर्म की भूमिका को गंभीरता से नहीं समझ पाए . दूसरी कमजोरी ये रही कि पूरी दुनिया का आर्थिक मिजाज बदल रहा था – जिसमें बदलाव के लिए तैयार नहीं थे. दुनिया में होने बदलावों को देखते हुए कम्युनिस्ट चीन ने भी अपनी अर्थव्यवस्था में उदारीकरण का इंजन लगा दिया .वहीं, भारत के वामपंथी Free Market का विरोध करते रहे… कम्युनिस्ट विचारधारा के पारंपरिक आर्थिक सूत्रों को लोगों की बेहतरी के लिए आदर्श सिद्धांत मानतो रहो… लेकिन, जब वक्त बदला तो भारत के ज्यादातर कामरेड खुद को बदलने में सफल नहीं रहे और धीरे-धीरे सत्ता से दूर होते गए .

भारतीय वामपंथियों की कमियों को यहां के सोशलिस्टों से समझा . जाति के आधार पर गोलबंदी की और सत्ता में जगह बनाई . ऐसे में वामपंथी विचारधारा के झंडाबरदारों की जमीन सबसे पहले सोशलिस्टों ने खिसकाई…उसके बाद मध्यमार्गी कांग्रेस की आर्थिक नीतियों ने उन्हें हाशिया पर पहुंचा दिया . बाद में दक्षिणपंथी बीजेपी ने राष्ट्रवाद, पूंजीवाद, सांस्कृतिक पहचान, हिंदुत्व और मजबूत राष्ट्र के विचार को इतनी मुखर तरीके से बढ़ाया – जिसमें वामपंथी पूरी तरह सत्ता से बाहर हो चुके हैं . अगर किसी भी विचारधारा में समय के प्रवाह के साथ बदलाव नहीं होता…तो लोग भी उसे खारिज कर देते हैं .

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हमारे देश की आबादी में बड़ा हिस्सा किसानों और गरीब मजदूरों का है. मतलब, वामपंथी विचारधारा के विस्तार के लिए भारत हर तरह की पूरी संभावना मौजूद थी . वामपंथी शायद भारत के सामाजिक ताने-बाने में जाति और धर्म की भूमिका को नहीं समझ जाए . कम्युनिस्ट कास्ट की जगह क्लास की बातें करते रहे. ऐसे में देश के बड़े वर्ग को अपने साथ जोड़ने में कामयाब नहीं हो पाए. संभवत:, बदलावों के हिसाब से वामपंथी नेता अपनी विचारधारा में संशोधन नहीं कर पाए..ऐसे में दुनिया के हर हिस्से में कम्युनिस्ट विचारधारा कमजोर पड़ती गयी. मध्यमार्गी कांग्रेस को जब उससे निकले क्षत्रपों से चुनौती मिलने लगी… तो Right wing (दक्षिणपंथी) बीजेपी ने अयोध्या आंदोलन, हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और विकास के नाम पर लोगों को अपने साथ जोड़ना शुरू कर दिया…ये Right wing (दक्षिणपंथी) आइडोलॉजी का Updated Version है–जिसमें विकास की बात भी है और वोटों के ध्रुवीकरण के लिए हर दांव भी. ये Right wing (दक्षिणपंथी) पॉलिटिक्स का बदला मिजाज है- जिसमें कभी टीएमसी का झंडा उठाने वाले सुवेंदु अधिकारी अब बंगाल में बीजेपी का चेहरा है. कभी कांग्रेस से निकले हिमंता बिस्वा शर्मा असम में बीजेपी का सबसे चमकदार चेहरा हैं…आरजेडी और जेडीयू से निकले सम्राट चौधरी को बीजेपी ने बिहार का मुख्यमंत्री बनाया. बदले सियासी माहौल में विचारधारा में अंतर दिनों-दिन मिटता जा रहा है .

हर चुनाव को युद्ध की तरह लड़ा जा रहा है-जिसमें राजनीतिक विरोधियों को इतना कमजोर करने वाली सोच हावी है– जिससे भविष्य में प्रतिस्पर्धा की गुंजाइश ही खत्म हो जाए…मध्यमार्गी पार्टियों की दिक्कत ये भी है कि वो राजनीति को पार्ट टाइम जॉब की तरह लेती हैं. Right wing (दक्षिणपंथी) पार्टियों की तरह चौतरफा विस्तार की रणनीति पर काम नहीं करतीं..यही, वजह है कि उत्तर से दक्षिण तक मध्यमार्गी क्षेत्रीय पार्टियां भी धीरे-धीरे सत्ता से दूर होती जा रही हैं . लेकिन, ये भी सच है कि वाम विचारधारा के आईसीयू में पहुंचने के बाद Right wing (दक्षिणपंथी) आइडोलॉजी को सिर्फ और सिर्फ Centrist आइडोलॉजी वाली पार्टियों में चुनौती मिल सकती है . भारत ये देखना होगा कि ये Centrist धारा कांग्रेस से निकलती है या खुद Right wing (दक्षिणपंथी) BJP के भीतर से…आज की तारीख में भारत में लोकतंत्र की मजबूती के लिए एक मुखर, समावेशी, गतिशील और नई राजनीतिक विचारधारा की जरूरत है–जो पारंपरिक खाचों को तोड़ते हुए एक नई राजनीतिक संस्कृति और विकल्प की जननी बने. आज के इस एपिसोड में बस इतना हीं. फिर मिलेंगे किसी ऐसे मुद्दे के साथ, जिसे जानना- समझना हम सबके लिए जरूरी होगा .

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First published on: May 09, 2026 09:51 PM

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Anurradha Prasad

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