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ये हमारे देश की चुनावी राजनीति में महिला वोट की ताकत का कमाल है कि देश का हर राजनीतिक दल संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण की वकालत कर रहा है. लेकिन, सत्ताधारी बीजेपी की मंशा पर सवाल उठा रहा है. देश के 1 अरब 45 करोड़ लोगों ने संसद में सियासतदानों की दलीलें सुनी, महिलाओं की भूमिका को लेकर बड़ी-बड़ी बातें कहीं-सुनी गईं. लेकिन, एक सच ये भी है कि जो राजनीतिक पार्टियां महिलाओं को संसद और विधानसभा के भीतर आरक्षण देने की इतनी वकालत कर रही हैं – वो आखिर चुनावों में महिलाओं को टिकट देने में कंजूसी क्यों करती हैं? पश्चिम बंगाल के चुनाव पर पूरे देश की नजर है. वहां पिछले 15 वर्षों से एक महिला मुख्यमंत्री की शासन है, जिनकी इमेज एक फाइटर की है, वो लोगों के बीच दीदी के नाम से जानी जाती है. ममता बनर्जी चौथी बार बंगाल की सत्ता में आने के लिए चुनावी अखाड़े में हैं – जहां उनकी TMC का सीधा मुकाबला BJP से है. ऐसे में ममता बनर्जी की नजर सूबे के महिला वोटरों पर है. ये एक ऐसा मजबूत और टिकाऊ वोट बैंक हैं – जिसके साथ खड़ा होता है उसे सत्ता के शीर्ष पर बैठाता है और जिसे चाहता है – सत्ता से बेदखल कर देता है. ममता बनर्जी पिछले 15 वर्षों से महिला वोट बैंक के दम पर ही बंगाल में राज कर रही हैं. लेकिन, बीजेपी ने भी उनके महिला वोट बैंक में सेंधमारी की स्क्रिप्ट तैयार कर रखी है. ऐसे में समझने की कोशिश करेंगे कि पश्चिम बंगाल में मां, माटी, मानुष के नारे के साथ सत्ता में आईं ममता बनर्जी ने महिलाओं को किस तरह अपना वोट बैंक बनाया? ममता के मुख्यमंत्री बनने के बाद बंगाल की महिलाओं की स्थिति में कितना सुधार हुआ? बंगाल विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ा या घटा? महिलाओं को टिकट देने के मामले में TMC दूसरी पार्टियों से आगे हैं या पीछे? ममता की महिला ब्रिगेड में कौन-कौन से चेहरे दमदाम भूमिका में हैं? आज कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे.

इसमें कोई शक नहीं कि हाल के वर्षों में महिला वोटर एक मजबूत और टिकाऊ पावर सेंटर के तौर पर उभरी हैं. ये एक ऐसा भरोसेमंद वोटबैंक हैं – जिससे सत्ता का ताला आसानी से खुल रहा है. पश्चिम बंगाल के 6 करोड़ 44 लाख वोटरों में से 3 करोड़ 16 लाख महिलाएं हैं. महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत पुरुषों की तुलना में अधिक है. ज्यादातर महिलाएं बिना किसी पारिवारिक दबाव या प्रभाव के मतदान कर रही हैं. साल 2021 के चुनाव में ममता बनर्जी की TMC को 2 करोड़ 89 लाख से अधिक वोट मिले, खाते में आईं 215 सीटें. उसी चुनाव में बीजेपी को मिले 2 करोड़ 29 लाख वोट और सीटें मिली 77. ऐसे में जरा हिसाब लगाइए कि अगर बंगाल की महिलाओं का बड़ा वोट ममता बनर्जी की TMC के खाते में चला जाता है या फिर उनके खाते से बीजेपी महिला वोटरों को खिसकाने में कामयाब रहती है – तो क्या होगा? बंगाल के महिला वोट बैंक पर लेफ्ट और कांग्रेस की भी नजर है. ऐसे में समझना जरूरी है कि बंगाल में महिला वोटरों को लुभाने के लिए राजनीतिक दल किस तरह का दांव आजमा रहे हैं?

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पश्चिम बंगाल के चुनावी अखाड़े में खड़े हर राजनीतिक दल को एक बात अच्छी तरह पता है कि अगर आधी आबादी का साथ मिल गया – तो सत्ता दूर नहीं. ऐसे में पश्चिम बंगाल के महिला वोट बैंक पर BJP की बाज की तरह नजर है. विरोधी पार्टियों की दलील है कि विधानसभा चुनाव में महिला वोटरों को अपने पाले में लाने के लिए मोदी सरकार संसद में महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन बिल लेकर आईं थी. लेकिन, लोकसभा में इस संविधान संशोधन बिल को दो तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया.

संसद और विधानसभा के भीतर महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण दिलाने का संविधान संशोधन प्रस्ताव भले ही गिर गया हो. लेकिन, इस मुद्दे के सहारे चुनावी अखाड़े में लहर बनाने की पूरजोर कोशिश दिखनी तय है. बंगाल के चुनावी अखाड़े में बीजेपी महारथी दलील देते दिख सकते हैं कि विपक्षी पार्टियां किस तरह संसद और विधानसभा को भीतर महिलाओं को उनका हक नहीं देना चाहती हैं.

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साल 2024 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में TMC को करीब 46% वोट मिला. वहीं, बीजेपी को करीब 39%. सिर्फ 7% वोटों के अंतर का नतीजा ये रहा कि TMC के निशान से 29 उम्मीदवार लोकसभा पहुंचने में कामयाब रहे. तो बंगाल की 12 लोकसभा सीटों पर कमल खिल पाया.

माना जा रहा है कि बंगाल में TMC का वोट बढ़ाने में M यानी महिला फैक्टर सबसे दमदार भूमिका निभाता रहा है. इसी तरह 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव में TMC को करीब 48 फीसदी वोट मिला, वहीं, बीजेपी को करीब 38% वोट मिले. 10% वोट शेयर में अंतर से जहां TMC के 215 उम्मीदवार विधानसभा पहुंचे. वहीं, बीजेपी के खाते से 77 उम्मीदवार.

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ऐसे में 5% भी वोट शेयर में हेरफेर बंगाल का पूरा सियासी समीकरण बदल सकता है. माना जाता है कि पश्चिम बंगाल में महिलाओं के वोट का बड़ा हिस्सा TMC के खाते में जाता रहा है. ऐसे में बीजेपी ने इस बार ममता बनर्जी के इस बड़े वोट बैंक में सेंधमारी की बड़ी तैयारी की है.

दरअसल, ममता सरकार की लक्ष्मीभंडार योजना के तहत आर्थिक रुप से कमजोर महिलाओं को हर महीने एक हजार रुपये और SC/ST वर्ग की महिलाओं को 1200 रुपये महीना मिलता है. इस योजना के लाभार्थियों की संख्या 2 करोड़ से अधिक है.

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टीएमसी ने इसमें 500 रुपया महीना बढ़ाने का वादा किया है. तो बीजेपी ने सरकार बनने पर महिलाओं को हर महीना 3000 रुपये देने का वादा किया है. वहीं, कांग्रेस ने भी सरकार बनने पर महिलाओं के लिए 2000 रुपये महीना आर्थिक मदद का ऐलान किया है.

पश्चिम बंगाल सरकार की कन्याश्री योजना ने लड़कियों की पढ़ाई को नई परवाज दी है. इस योजना के तहत एक करोड़ छात्राओं को पढ़ाई के लिए आर्थिक मदद दी जा चुकी है. तो बीजेपी महिलाओं के सरकारी नौकरियों में 33 फीसदी आरक्षण का वादा कर रही है. कांग्रेस ग्रेजुएशन तक मुफ्त पढ़ाई और कौशल विकास का मौका दिलाने की बात कर रही है.

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ममता सरकार कई ऐसी योजनाएं चला रही है-जिसमें महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी थोड़ी आसान हुई है. बेहतर इलाज से लेकर गरीब लड़कियों की शादी में आर्थिक मदद जैसी सरकारी योजनाएं चल रही हैं. ऐसे में ममता बनर्जी ने सूबे की महिलाओं के बीच मुख्यमंत्री से अधिक अपनी दीदी वाली छवि को मजबूत किया है, जिससे महिला वोटरों का झुकाव TMC की ओर रहा.

लेकिन, अब बीजेपी महिला वोटरों को अपने पाले में लाने के लिए बड़े-बड़े लुभावने वादों के साथ बैटल ऑफ बंगाल में पूरी ताकत झोंके हुए हैं.

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ममता बनर्जी की लक्ष्मी भंडार योजना ने सूबे की महिलाओं को TMC से जोड़ने में मदद की. अब बीजेपी हर महीने तीन हजार रुपये देने का वादा कर TMC के महिला वोट बैंक को अपने पाले में खींचने की कोशिश कर रही है. पिछले कुछ वर्षों का वोटिंग पैटर्न बताता है कि महिलाओं ने उसी राजनीतिक दल को वोट दिया है – जो उनकी रोजमर्रा की मुश्किलों को आसान बनाने में मददगार की भूमिका में हो. बिहार हो या झारखंड, महाराष्ट्र हो या मध्य प्रदेश चुनाव के नतीजे इस ट्रेंड के मजबूत होने का संकेत दे रहे हैं. महिलाओं को टिकट देने के मामले में भी ममता बनर्जी की TMC बहुत आगे है. टीएमसी ने 291 उम्मीदवार उतारे – जिसमें 52 महिला उम्मीदवार हैं. बीजेपी ने 294 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए, जिसमें सिर्फ 33 महिलाओं को मैदान में उतारा. अगर CPM की बात की जाए तो 253 उम्मीदवार चुनाव में हैं – जिसमें 34 महिलाएं हैं. बंगाल में कांग्रेस सूबे की सभी सीटों पर चुनाव लड़ रही है, लेकिन 35 महिलाओं को ही टिकट दिया है. मतलब, संसद और विधानसभा में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण की जोर-शोर से बात करने वाले राजनीतिक दल खुद महिलाओं को टिकट देने से पहले बहुत गुना-भाग करते हैं. पश्चिम बंगाल की मौजूदा विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या 41 है. मतलब कुल विधायकों में 13.8% महिलाएं हैं, जो राष्ट्रीय औसत 8 फीसदी से अधिक है.

आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में बंगाल विधानसभा में गिनती की महिलाएं ही पहुंचने में कामयाब रहीं. आजादी की लड़ाई में भले ही बंगाल की महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. लेकिन, चुनावी अखाड़े में बहुत कम उतरीं.

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एक स्टडी के मुताबिक, 1957 के पश्चिम बंगाल चुनाव में 17 महिला उम्मीदवार उतरी, जिसमें से 6 विधानसभा पहुंचने में कामयाब रहीं. साल 1977 तक बंगाल पॉलिटिक्स पूरी तरह बदल चुकी थी. वामपंथी सत्ता में आ चुके थे. तब विधानसभा चुनाव में 27 महिला उम्मीदवार उतरीं, जिसमें सिर्फ 3 ही विधानसभा पहुंचने में कामयाब रहीं. साल 1996 के बंगाल चुनाव में महिला उम्मीदवारों का आंकड़ा ट्रिपल डिजिट में पहुंचा-ये संख्या थी 114, जिसमें 20 महिलाएं चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचीं. 2011 के चुनाव में बंगाल में बड़ा बदलाव हुआ. बंगाल में वामपंथी किले को ध्वस्त कर ममता बनर्जी सत्ता में आईं. 2011 में महिला उम्मीदवारों की संख्या 174 थी. जिसमें 34 चुनाव जीतने में कामयाब रहीं. साल 2016 के चुनाव में 200 महिलाएं मैदान में रहीं – जिसमें 39 विधानसभा पहुंचने में कामयाब रहीं. ममता बनर्जी के दौर में टिकटों के बंटवारे में महिलाओं को प्राथमिकता मिलने लगी.

साल 2021 के चुनाव में करीब 240 महिला उम्मीदवार उतरीं, जिसमें 41 चुनाव जीतने में कामयाब रहीं. भले ही महिलाओं को संसद और विधानसभा में 33 फीसदी आरक्षण देने की बात दशकों से हो रही हो. लेकिन, टिकट देने में राजनीति दल हिचकते रहे हैं. इस बार के बंगाल चुनाव में टीएमसी के कुल उम्मीदवारों में 17.86% महिलाएं हैं. बीजेपी ने 11.22% महिला उम्मीदवारों पर दांव लगाया है. तो कांग्रेस के उम्मीदवारों में 12.33% महिला उम्मीदवार हैं. लेफ्ट फ्रंट की बात की जाए तो 13.83% टिकट महिलाओं को दिया है.

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ममता बनर्जी ने अपनी सरकार लोक-कल्याणकारी योजनाओं के जरिए महिलाओं के दिल में जगह बनाई हैं. पिछले 15 वर्षों में उन्होंने महिला लाभार्थियों का एक बड़ा वर्ग तैयार कर दिया है. ममता बनर्जी न सिर्फ अपने मजबूत और टिकाऊ महिला वोट बैंक पर निर्भर हैं. बल्कि, उनकी राजनीतिक ताकत का बड़ा आधार महिला लीडरशिप है. उनकी पार्टी और सरकार दोनों में महिलाएं प्रभावशाली भूमिका में हैं. पंचायत से लेकर नगर निगम तक और विधानसभा से संसद तक में टीएमसी से जुड़े कई प्रभावशाली महिला चेहरे मजबूत स्तंभ की भूमिका में हैं.

इसमें चाहे चंडीमा भट्टाचार्य हों या शशि पांजा, काकोली घोष दस्तीदार हों या डोला सेन, बिरबाहा हांसदा हों या फिर कृष्णा चक्रवर्ती, महुआ मोइत्रा हों या सागरिका घोष. ममता बनर्जी की महिला ब्रिगेड हर मोर्चे पर पूरी तरह एक्टिव है. ये मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राह है- महिलाओं को लेकर उनकी मुखर सोच का नतीजा है कि बंगाल महिलाओं को स्वामित्व वाले MSME में टॉप पर खड़ा है. देश के कुल महिला स्वामित्व वाले MSME में बंगाल का हिस्सा 23 फीसदी से अधिक है.

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ममता बनर्जी के दौर में प्रशासन में महिला IAS अफसरों को अहम जिम्मेदारियां सौंपी गईं. सूबे में 84 महिला IAS अफसर अहम पदों पर जिम्मेदारियां संभाल रही थीं. बंगाल में महिलाएं तेजी से हर तरह के लीडरशिप रोल में बढ़ रही हैं. इन दिनों संसद और विधानसभा में महिलाओं के लिए आरक्षण पर देश के हर कोने में चर्चा हो रही है. ऐसे में एक कम्युनिस्ट नेता का जिक्र करना बहुत जरूरी है. गीता मुखर्जी ने बंगाल पांसकुड़ा लोकसभा क्षेत्र की सात बार संसद में नुमाइंदगी की. सियासी गलियारों में वो गीता दी के नाम से जानी जाती थीं. दरअसल, गीता दी ने सितंबर 1996 में संसद में एक निजी प्रस्ताव लाकर संसदीय और विधायी सीटों पर सबसे पहले महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग उठाई थी. अब गीता दी इस दुनिया में नहीं हैं. लेकिन, तीन दशक पहले संसद में जो मांग गीता मुखर्जी ने उठाई थी – वो कानून तो बन चुका है. पंचायत में महिलाओं के लिए आरक्षण का रास्ता 73वें संविधान संशोधन के जरिए खुला. बंगाल में लेफ्ट फ्रंट और तृणमूल कांग्रेस के शासन में महिला उम्मीदवारों की संख्या बढ़ाने के रास्ते निकाले गए. वहां, ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद में 50% आरक्षण का सिस्टम लागू है.

पश्चिम बंगाल की 63,229 ग्राम पंचायत सीटों, 9,730 पंचायत समिति सीटों और 928 जिला परिषद सीटों में से ज्यादातर पर टीएमसी का कब्जा है. माना जाता है कि बंगाल में जिसका पंचायत और जिला परिषद में वर्चस्व होता है. उसी का विधानसभा चुनाव में पलड़ा भारी होता है. पश्चिम बंगाल में त्रिस्तरीय पंचायत प्रणाली में महिलाओं के लिए आधी सीटें रिजर्व हैं. ऐसे में ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद में महिलाएं चुनाव जीत कर पहुंच तो जाती हैं. लेकिन, अभी भी फैसलों में उनकी बहुत नहीं चलती है.

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पंचायत और जिला परिषद चुनाव में रोटेशन सिस्टम के तहत जो सीटें महिलाओं के लिए रिजर्व होती हैं – उसमें से ज्यादातर सीटों पर पुरुष की जगह परिवार की कोई महिला उम्मीदवार मैदान में दिखती है. स्थानीय निकायों में महिलाओं की भूमिका ममता बनर्जी का दौर में हो या फिर वामपंथी सरकारों के दौर में खास अंतर नहीं आया.

एक सच ये भी है कि पंचायत व्यवस्था के विस्तार के साथ महिलाओं को लोकल पॉलिटिक्स में जगह मिली. बंगाल में वामपंथी शासन के दौर में महिला संगठनों और ट्रेड यूनियनों के जरिए उनकी आवाज बुलंद और मजबूत हुई. महिलाओं को संगठित करने के लिए अलग-अलग मंच बनाए गए. इससे 34 वर्षों तक बंगाल में लेफ्ट की हुकूमत रही. लेकिन, ममता बनर्जी ने जब मां, माटी और मानुष के नाम पर बंगाल में पोरिवर्तन का नारा दिया तो महिलाओं को ममता बनर्जी में नई उम्मीद दिखी. ममता ने जो राजनीतिक रास्ता पकड़ा उसमें महिलाएं लेफ्ट से TMC की ओर शिफ्ट होने लगीं. आज की तारीख में पंचायत से लेकर जिला परिषद तक की ज्यादातर सीटों पर TMC का झंडा थामे महिलाएं जमी हुई हैं. इनके पीछे खड़ी महिलाओं के बड़े वोटबैंक से ममता बनर्जी की TMC को ताकत मिलती रही है.

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बंगाल की सत्ता से लेफ्ट फ्रंट पिछले 15 वर्षों से बाहर है. वामपंथी शासन के दौर में पंचायत में कौन उम्मीदवार होगा – ये जिला समिति द्वारा तय किया जाता था. वामपंथी सिस्टम में व्यक्ति पसंद या नापसंद के लिए बहुत जगह नहीं थी. आरक्षित सीटों के मामले में जिला समिति तय करती थी कि मौजूदा उम्मीदवार की जगह किसे मैदान में उतारा जाएगा? टीएमसी के दौर में ये दिक्कत नहीं रही. बंगाल में महिला सशक्तिकरण की बातें बहुत हुईं. लेकिन, एक सच्चाई ये भी है राजनीति जिस ढर्रे पर आगे बढ़ी – उसमें महिला पंचायत सदस्य विधानसभा या संसद तक. उस रफ्तार से नहीं पहुंच पाईं. जितनी पहुंचनी चाहिए थीं. आजादी की लड़ाई में भी बंगाल की महिलाओं का बड़ा योगदान रहा. बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यास आनंद मठ में महिला क्रांतिकारियों की भूमिका का चित्रण किया. जो साल 1882 में दुनिया के सामने आया. इसके 3 साल बाद यानी 1885 में कांग्रेस पार्टी की स्थापना हुई. कांग्रेस के पहले अधिवेशन में शामिल होने वाले 72 प्रतिनिधियों में एक भी महिला नहीं थीं. कांग्रेस में महिला प्रतिनिधियों को शामिल कराने में चार साल लग गए. जिसमें पहली दो महिलाएं बंगाल से थीं. एक कादंबिनी गांगुली और दूसरी स्वर्ण कुमारी देवी. कादंबिनी गांगुली देश की पहली महिला डॉक्टरों में से एक थीं. साल 1905 में बड़े पैमाने पर बंगाल विभाजन के विरोध में महिलाएं उतरी और विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया. महात्मा गांधी के अगुवाई में बंगाल की सामान्य परिवारों की महिलाओं ने भी आजादी की लड़ाई में मोर्चा संभाला. आजाद भारत का आईन बनाने के लिए बनी संविधान सभा पहुंचने वाली 15 महिलाओं में से 3 का ताल्लुक तब के बंगाल से था – जिसमें पूर्णिमा बनर्जी, लीला रॉय और रेणुका रे शामिल थीं. आजादी के बाद के शुरुआती 10-15 वर्षों में बंगाल विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व नाम मात्र का रहा. लेफ्ट शासन में महिला संगठनों और ट्रेड यूनियनों के जरिए उनकी आवाज मजबूत हुई. वहीं, ममता बनर्जी के दौर में बंगाल पॉलिटिक्स में महिलाओं की मौजूदगी और प्रभाव दोनों बढ़ा. ऐसे में बंगाल पॉलिटिक्स में एक बहुत सामान्य पृष्ठभूमि की लड़की ममता बनर्जी ने किस तरह कम्युनिस्टों से लड़ते हुए जगह बनाई. ये समझना भी जरूरी है.

किसी को ममता बनर्जी का तेवर पसंद आता है. तो किसी को उनकी आंदोलनकारी छवि. किसी को सादगी तो किसी को ममता सरकार की योजनाएं. अपने खास अंदाज के साथ पिछले 15 वर्षों से बंगाल की सत्ता में हैं. करीब 6 दशक की सियासी यात्रा में हर रंग देखते ममता बनर्जी अब 72 साल की हो चुकी हैं. स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही उनका राजनीति से रिश्ता जुड़ गया और धीरे-धीरे बंगाल कांग्रेस में पहचान चटकदार बनने लगी. 1984 में जाधवपुर लोकसभा सीट पर दिग्गज कम्युनिस्ट नेता सोमनाथ चटर्जी को चुनाव में हरा कर ममता बनर्जी ने सबको हैरान कर दिया.

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सांसद बनकर ममता दिल्ली आईं. लेकिन, यहां की राजनीति का मिजाज रास नहीं आया. साल 1989 में कांग्रेस विरोधी लहर में चुनाव हारने के बाद वापस बंगाल लौटकर कम्युनिस्टों को फिर ललकारने लगीं

दक्षिणी कलकत्ता के हाजरा मोड़ पर ममता कांग्रेस के बंगाल बंद की अगुवाई कर रही थीं. अचानक उनके ऊपर CPM से जुड़े एक शख्स ने जानलेवा हमला किया, सिर फट गया. पूरे सोलह टांके लगे. महीने भर अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा. अगले चुनाव में दक्षिणी कलकत्ता लोकसभा सीट पर CPM उम्मीदवार बिप्लव दासगुप्ता को हरा कर कम्युनिस्टों को बता दिया कि संसदीय लोकतंत्र में विरोधियों को जवाब कैसे दिया जाता है? ममता अपने तेवरों के साथ फिर दिल्ली आईं. यहां बैठे कांग्रेसी नेताओं से उनका मिजाज मेल नहीं खा रहा था. ऐसे में सार्वजनिक मंचों पर ममता की अपनी ही पार्टी से बड़े नेताओं से नाराजगी खुलकर सामने आने लगी.

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वो साल 1993 का था. 7 जनवरी को ममता नादिया जिले की एक रेप पीड़िता के साथ कलकत्ता में मुख्यमंत्री दफ्तर पहुंचीं. वो मुख्यमंत्री ज्योति बसु से मुलाकात पर अड़ी थी और उनके चेंबर के सामने हीं धरने पर बैठ गयीं. महिला पुलिसकर्मियों ने ममता और पीड़िता को घसीटते हुए सीढ़ियों से उतारा और पुलिस हेडक्वार्टर लाल बाजार ले गए. अपमान से तिलमिलाई ममता ने उसी दिन कसम खाई कि अब वो मुख्यमंत्री बनकर ही राइटर्स बिल्डिंग में कदम रखेंगी.

ममता बनर्जी 1996 का लोकसभा चुनाव जीतकर एक बार फिर दिल्ली के सियासी मिजाज से दो-चार हो रहीं थी. दिल्ली में अपनी ही पार्टी के नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था. ऐसे में उन्हें 6 साल के लिए कांग्रेस से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. ममता बनर्जी ने एक जनवरी 1998 को तृणमूल कांग्रेस के गठन का ऐलान किया. अब उन्हें अपने हिसाब से राजनीति करने और फैसला लेने की आजादी थी.

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ममता ने चुनावों में हाथ आजमाने के साथ अपनी सहूलियत के हिसाब से कभी NDA तो कभी UPA के साथ गठबंधन किया. वो देश की पहली महिला रेल मंत्री बनीं. NDA-UPA दोनों हीं सरकारों में रेल मंत्री रहीं. बंगाल को कई नई ट्रेनों की सौगात दी. सरकार में मंत्री रहते भी उनके आंदोलनकारी तेवर ज्यों के त्यों बने रहे.

मां, माटी और मानुष के नारे के साथ बंगाल के लोगों को TMC से जोड़ने के मिशन में जुटी रहीं. बंगाल में बदलाव के लिए बुद्धदेव भट्टाचार्य ने जब नई राह चुनी. तो सिंगूर और नंदीग्राम में ममता बनर्जी ने प्रचंड आंदोलन छेड़ दिया और खुद को Ultra Left साबित करने की कोशिश की. ममता बनर्जी को बंगाल की सियासी जमीन पर TMC के लिए अच्छे संकेत मिलने लगे.

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जैसे ही 2011 में विधानसभा चुनाव की घंटी बजी. रेल मंत्री पद से इस्तीफा देकर ममता ने कोलकाता की फ्लाइट पकड़ ली. बंगाल के लोगों को 34 साल से लगातार सत्ता में रहे लेफ्ट फ्रंट का विकल्प ममता में दिखा.

टीएमसी को 184 सीटों पर जीत मिली. गठबंधन साझीदार कांग्रेस के खाते में भी 42 सीटें आ गयीं. बंगाल पर 34 साल तक हुकूमत करनेवाली सीपीएम सिर्फ 40 सीटों पर सिमट कर रह गयी. बदलाव की लहर पर सवार प्रचंड बहुमत से लैस ममता बनर्जी ने 20 मई,2011 को पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली.

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अपनी खास स्टाइल, अपने आक्रामक तेवर और विवादों के साथ पिछले 15 वर्षों से लगातार बंगाल की सत्ता में बनी हुई हैं.

ये बहुत हद तक मुमकिन है कि 2031 में जब पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव होंगे – तब महिलाओं विधायकों का आंकड़ा डबल से ट्रिपल डिजिट में पहुंच जाए. ये भी मुमकिन है कि 2029 में बंगाल में लोकसभा से महिला सांसदों की संख्या आज की तुलना में डबल हो जाए. मौजूदा लोकसभा के भीतर सबसे अधिक महिला सांसद पश्चिम बंगाल से हैं. बंगाल के 11 लोकसभा क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व महिलाएं कर रही हैं. पंचायत और निकायों में आरक्षण की वजह से आधी आबादी की दमदार तरीके से सुनाई देती है. लेकिन, बड़ा सवाल ये है कि वो दिन कब आएगा – जब महिलाओं के सामने EVM पर बटन दबाते समय हर महीने कैश का प्रभाव नहीं होगा. हर महीने मिलने वाले मुफ्त राशन का प्रभाव नहीं होगा. सरकारी योजनाओं का लालच नहीं होगा. वो पढ़-लिख कर इतनी काबिल बन जाएं कि वर्कफोर्स में पुरुषों की बराबरी करें? Symbolic Empowerment की जगह सही मायनों में सशक्त बनें? पश्चिम बंगाल की तरक्की की कहानी लिखने में दमदार किरदार निभाएं. पुलिस से प्रशासन तक शिक्षा से स्वास्थ्य तक कारखानों से कॉरपोरेट तक हर जगह हर दूसरी कुर्सी पर महिला दिखे. क्या हमारा समाज, हमारी राजनीति, हमारे सियासतदां. महिलाओं के इस मुकाम तक पहुंचाने में ईमानदारी से पहल करेंगे?

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First published on: Apr 18, 2026 09:28 PM

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Anurradha Prasad

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