जर्मनी में क्यों कम होता है AC का इस्तेमाल, जबकि यूरोप में लगातार बढ़ रहा गर्मी का कहर?

Why Less Air Conditioners In Germany: क्लाइमेट चेंज की वजह से यूरोप में हर साल तापमान बढ़ रहा है, यहां ऐसी गर्मी पहले कभी नहीं महसूस होती थी. हालांकि इसके बावजूद जर्मनी में एयर कंडीशनिंग का यूज इतना कम क्यों होता है? इसके पीछे कई कारण हैं जो आज हम आपको बताने जा रहे हैं.

Germany AC

AI Image

मुख्य बिंदु

विज्ञापन
  • अमेरिका और जापान जैसे देशों की तुलना में जर्मनी में एयर कंडीशनिंग का इस्तेमाल बहुत कम है.
  • इतिहास में गर्मियां ज्यादा तेज नहीं होती थीं, इसलिए कूलिंग सिस्टम की जरूरत कम पड़ती थी.
  • पुरानी इमारतों में एयर कंडीशनर लगाना मुश्किल और महंगा होता है.
  • एनर्जी की ऊंची कीमतें और किराये से जुड़ी पाबंदियां एसी के इस्तेमाल को सीमित करती हैं.
  • जलवायु परिवर्तन के कारण पूरे यूरोप में कूलिंग की डिमांड बढ़ रही है.

Why Air Conditioners Remain Uncommon in Germany: अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देशों में एयर कंडीशनिंग एक आम बात है, लेकिन यूरोप के ज्यादातर हिस्सों, खासकर जर्मनी में यह अभी भी कम ही देखने को मिलती है. दशकों से, यूरोपीय लोग गर्मियों में शटर बंद करने, हवा आने-जाने की बेहतर इंतेजाम करने और पंखों का इस्तेमाल करने जैसे कुदरती तरीकों से ठंडक बनाए रखते थे.

विज्ञापन

क्लाइमेंट चेंज का दिख रहा असर

इतिहास में, उत्तरी यूरोप के देशों में गर्मियां ज्यादा तेज नहीं होती थीं, इसलिए ज्यादातर घरों में एयर कंडीशनिंग की जरूरत नहीं पड़ती थी. लेकिन, जलवायु परिवर्तन से मौसम का मिजाज बदल रहा है और लंबे समय तक चलने वाली लू कॉमन और ज्यादा तेज हो रही हैं. हाल की स्टडीज से पता चलता है कि यूरोप के कुछ हिस्सों में तापमान पहले के औसत से काफी ज्यादा है, जिससे ठंडक देने वाले तरीकों की मांग बढ़ रही है.

जर्मनी में एसी का यूज कम क्यों?

बढ़ती दिलचस्पी के बावजूद, जर्मनी में एयर कंडीशनर का इस्तेमाल अभी भी कम है. कई रिहायशी इमारतों को इस तरह से बनाया गया था कि वो सर्दियों में गर्मी बनाए रखें, न कि गर्मियों में ठंडी रहें. पुरानी इमारतों में मॉडर्न कूलिंग सिस्टम लगाना महंगा और तकनीकी रूप से मुश्किल हो सकता है, खासकर ऐतिहासिक शहरों में जहां रेनोवेशन के नियम सख्त हैं.

विज्ञापन

रेंट वाले मकान में परेशानी

किराये के घरों का मामला भी एक वजह है. जर्मनी में बहुत से लोग किराये के घरों में रहते हैं, और किरायेदारों को अक्सर परमानेंट कूलिंग सिस्टम लगाने पर पाबंदियों का सामना करना पड़ता है. बिजली की बढ़ती कीमतें भी कई परिवारों को एयर कंडीशनर खरीदने और चलाने से रोकती हैं.

एनवायरनमेंट की फिक्र

पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं ने भी इसके इस्तेमाल की रफ्तार को धीमा कर दिया है. एयर कंडीशनिंग से बिजली की खपत बढ़ती है, और एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर बिजली जीवाश्म ईंधन से आती है, तो इसके बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से एनर्जी की डिमांड और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ सकता है.

विज्ञापन

अब बदल रही है सोच

हालांकि, जैसे-जैसे तापमान बढ़ रहा है, लोगों की सोच धीरे-धीरे बदल रही है. कई घर के मालिक कूलिंग टेक्नोलॉजी के बारे में जानकारी ले रहे हैं, जबकि आर्किटेक्ट और पॉलिसी मेकर्स पारंपरिक एयर कंडीशनिंग के सस्टेनेबल विकल्पों के तौर पर ऊर्जा-कुशल बिल्डिंग डिजाइन, बेहतर इंसुलेशन, शेडिंग सिस्टम और हीट पंप को बढ़ावा दे रहे हैं.

विज्ञापन

निष्कर्ष

जर्मनी में एयर कंडीशनिंग का कम इस्तेमाल खास तौर से वहां की जलवायु, घरों के डिजाइन और ऊर्जा के प्रति जागरूक संस्कृति की वजह से है. हालांकि, बढ़ता तापमान और बार-बार पड़ने वाली लू लोगों का कूलिंग टेक्नोलॉजी के प्रति नजरिया बदल रही हैं. पर्यावरण से जुड़ी चिंताएं और इंस्टॉलेशन की चुनौतियां अभी भी बड़ी रुकावटें बनी हुई हैं, लेकिन एयर कंडीशनर और कूलिंग के ऑप्शनल तरीकों की मांग लगातार बढ़ रही है. भविष्य में यूरोप में बढ़ती गर्मी के दौरान लोगों को आरामदायक माहौल देने के लिए कुशल कूलिंग टेक्नोलॉजी, एनवायरनमेंट फ्रेंडली बिल्डिंग डिजाइन और रिन्यूएबल एनर्जी सोर्सेज का मिला-जुला इस्तेमाल होने की संभावना है.

न्यूज 24 पर पढ़ें देश,राष्ट्रीय समाचार (National News),खेल,मनोरंजन,धर्म,लाइफ़स्टाइल,हेल्थ,शिक्षा से जुड़ी हर खबर। ब्रेकिंग न्यूज और लेटेस्ट अपडेट के लिए News 24 App डाउनलोड कर अपना अनुभव शानदार बनाएं।

First published on:

और पढ़ें: हमारे संपादकीय दिशानिर्देश और मानक यहाँ देखें।

लेख समाप्त

लेखक के बारे में

Shariqul Hoda

Shariqul Hoda

न्यूज़ 24 डिजिटल में शारिकुल होदा सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. मुख्य तौर पर वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरें लिखते हैं. शारिकुल ने 2008 में दूरदर्शन में बतौर इंटर्न अपनी शुरुआत की, इसके बाद वह दैनिक जागरण, टीवी टुडे नेटवर्क, जनसंदेश, श्री न्यूज़, भारत खबर, स्पोर्ट्सकीड़ा, WION और ज़ी न्यूज़ में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उन्होंने 3 लोकसभा चुनाव और कई विधानसभा चुनाव से लेकर देश की बड़ी घटनाओं को कवर किया है. अपने डेढ़ दशक के मीडिया करियर में शारिकुल ने देश की राजनीति, इंटरनेशनल डिप्लोमेसी, खेलकूद से जुड़ी घटनाओं की अच्छी समझ हासिल की है. कितने साल का तजुर्बा: 16 साल शिक्षा: शारिकुल ने बैंगलोर यूनिवर्सिटी (आचार्य इंस्टीट्यूट) से बीए जर्नलिज्म और गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी (एपीजे इंस्टीट्यूट) से मास्टर्स इन जर्नलिज्म और मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई की है.
... और पढ़ें
विज्ञापन
होम पेज पर वापस जाएँ