Who Is Leaking Iran War Secrets To Media: मीडिया में सीक्रेट जानकारी लीक होने के शक की जांच के तहत यूएस जॉइंट स्टाफ के साथ काम करने वाले तकरीबन 50 मिलिट्री और सिविलियन कर्मचारियों का पॉलीग्राफ टेस्ट किया गया है. ये टेस्ट अगस्त 2026 में किए गए थे, जब कई रिपोर्टों में अमेरिका के जरूरी हथियारों, जैसे लंबी दूरी की मिसाइलें और पैट्रियट एयर-डिफेंस इंटरसेप्टर की घटती सप्लाई को लेकर चिंता जताई गई थी.
मुखबिर का पता लगाने की कोशिश
इस मामले की जानकारी रखने वाले अधिकारियों के मुताबिक, जांचकर्ता ये पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या ईरान जंग से जुड़े सेंसिटिव इंफॉरमेशन जर्नलिस्ट्स के साथ शेयर की गई थी. जॉइंट स्टाफ, जो यूएस मिलिट्री के सीनियर लीडर्स की मदद करता है, में तकरीबन 1500 से 2000 अधिकारी और सिविलियन अधिकारी होते हैं.
जांच का फोकस क्या रहा?
पूछताछ किए गए लोगों में मिलिट्री अधिकारी और सिविलियन कर्मचारी दोनों शामिल थे. जांचकर्ता यह पता लगाने की कोशिश कर रहे थे कि क्या किसी ने प्रेस के सदस्यों को गोपनीय जानकारी दी थी, खासकर US के गोला-बारूद और मिसाइल स्टॉक से जुड़ी जानकारी.
ये जांच ईरान के साथ संघर्ष के बाद जरूरी हथियारों की अवेलेबिलिटी पर बढ़ते फओकस के बीच हो रही है. मीडिया रिपोर्ट्स में संभावित कमी की ओर इशारा किया गया था, जिसके बाद अधिकारियों ने इंफॉर्मेशन के सोर्सेज की जांच करने का फैसला किया.
पेंटागन के प्रवक्ता शॉन पारनेल ने न्यूयॉर्क टाइम्स से बात करते हुए कहा कि विभाग इंटरनल कर्मचारियों या जांच के मामलों पर कोई कमेंट नहीं करता है. हालांकि उन्होंने जोर देकर कहा कि अधिकारी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी गोपनीय जानकारी के गलत तरीके सामने आने को गंभीरता से लेते हैं और ऐसे मामलों की जांच करते हैं.
शॉन पारनेल ने कहा, ‘गोपनीय जानकारी को सुरक्षित रखना अमेरिका और दुनिया भर में तैनात हमारे सैनिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बहुत जरूरी है.’ इस जांच का मकसद सेंसिटिव मिलिट्री इंफॉर्मेशन और ऑपरेशनल सिक्योरिटी की हिफाजत करते हुए लीक के सोर्स का पता लगाना है.
लाइ डिटेक्टर टेस्ट क्या है?
लाइ डिटेक्टर टेस्ट को पॉलीग्राफ टेस्ट भी कहा जाता है, एक ऐसा प्रोसीजर है जिसका इस्तेमाल ये पता लगाने के लिए किया जाता है कि कोई शख्स गुमराह करने वाले जवाब तो नहीं दे रहा है. टेस्ट के दौरान, शरीर पर सेंसर लगाए जाते हैं ताकि सवालों के जवाब देते समय दिल की धड़कन, ब्लड प्रेशर, सांस लेने की गति और पसीना आने जैसे शारीरिक बदलावों पर नजर रखी जा सके. इसके पीछे की सोच ये है कि झूठ बोलने पर तनाव या घबराहट के कारण मापने योग्य शारीरिक बदलाव हो सकते हैं.
हालांकि पॉलीग्राफ सीधे तौर पर झूठ का पता नहीं लगाता है और इसके नतीजे डर, घबराहट या दूसरे फैक्टर्स से अफेक्ट हो सकते हैं. इसलिए, इसे आम तौर पर जांच का एक जरिया माना जाता है, न कि इस बात का पक्का सबूत कि कोई इंसान झूठ बोल रहा है. यही वजह है कि ज्यादातर देशों में इसे सुराग हासिल करने के लिए यूज किया जाता है, लेकिन कोर्ट में ये एडमिसिबल नहीं होता.
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