ईरान और अमेरिका के बीच जारी भीषण तनाव को शांत करने के लिए पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद एक बार फिर बड़ी कूटनीतिक हलचल का केंद्र बन गई है. अगले हफ्ते दोनों देशों के बीच दूसरे दौर की गुप्त वार्ता होने की संभावना है जिसके लिए जमीन पर तैयारियां तेज कर दी गई हैं. रावलपिंडी के नूर खान एयरबेस पर अमेरिकी सैन्य विमानों की लैंडिंग और रेड जोन की सड़कों को बंद करना इस बात का सबूत है कि कोई बहुत बड़ा मिशन चल रहा है. शहर के नामी होटलों को खाली करा लिया गया है और सुरक्षा के ऐसे इंतजाम किए गए हैं कि परिंदा भी पर न मार सके.
सीजफायर पर मंडरा रहा है खतरा?
दोनों देशों के बीच पिछले कई दिनों से लागू सीजफायर 21 अप्रैल को खत्म होने जा रही है जिससे दुनिया भर की चिंताएं बढ़ गई हैं. हालांकि पहले दौर की 21 घंटे लंबी बातचीत में कोई ठोस नतीजा नहीं निकला था लेकिन पाकिस्तान की कोशिश है कि युद्ध को दोबारा शुरू होने से रोका जाए. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि वे सीजफायर को आगे बढ़ाने के पक्ष में ज्यादा नहीं हैं लेकिन अगर कोई बड़ी डील होती है तो वे खुद इस्लामाबाद आ सकते हैं. 24 अप्रैल को पड़ने वाले शुक्रवार से पहले यह तय होना है कि बंदूकें शांत रहेंगी या फिर एक बार फिर धमाकों से धरती दहलेगी.
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पाकिस्तान और मध्यस्थों की भूमिका
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही है जिन्होंने हाल ही में ईरान का दौरा कर शांति की अपील की थी. अलजजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि लगातार संपर्क में हैं और एक आपसी समझ बनाने की कोशिश कर रहे हैं. ईरान ने भी माहौल को नरम करने के लिए होर्मुज स्ट्रेट को व्यापारिक जहाजों के लिए खोल दिया है जिसे बातचीत की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है. पाकिस्तान इस समय दुनिया के इन दो बड़े दुश्मनों को एक मेज पर लाने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है.
क्या ट्रंप खुद आएंगे पाकिस्तान?
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान की मध्यस्थता की तारीफ करते हुए एक बड़ा बयान दिया है कि अगर ईरान के साथ समझौता होता है तो वे खुद हस्ताक्षर करने के लिए इस्लामाबाद आएंगे. अमेरिकी और ईरानी प्रतिनिधिमंडलों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मीडिया के लिए भी पाकिस्तान में बड़े स्तर पर इंतजाम किए जा रहे हैं. दुनिया भर की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या सोमवार से शुरू होने वाली यह औपचारिक बातचीत किसी समझौते पर खत्म होगी या नहीं. अगर यह वार्ता नाकाम होती है तो मध्य पूर्व में जंग का खतरा फिर से बढ़ जाएगा जिसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.










