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दुनिया

Middle East War: मिडिल ईस्ट की जंग में ‘धृतराष्ट्र’ क्यों बना है संयुक्त राष्ट्र, BRICS और NATO ने क्यों बनाई दूरी?

Middle East War: मिडिल ईस्ट की जंग पर संयुक्त राष्ट्र संघ और ब्रिक्स का जॉइंट स्टेटमेंट नहीं आया है। नाटो देश भी अंदरखाते विरोध कर रहे। कोई खुलकर सामने नहीं आया है। भारत भी मामले में काफी सावधानी बरते हुए है, आखिर क्यों?

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Edited By : Khushbu Goyal Updated: Mar 10, 2026 14:36
Middle East War
मिडिल ईस्ट के करीब 15 देश युद्ध की आग में जल रहे हैं।

US Israel Iran War: अमेरिका-इजरायल और ईरान की जंग ने गल्फ देशों में तबाही मचाई हुई है। 28 फरवरी को इजरायल और अमेरिका ने ईरान पर हमला किया। बदले की कार्रवाई करते हुए ईरान ने इजरायल पर हमला किया। अमेरिका पर सीधा हमला तो ईरान कर नहीं सकता, लेकिन ईरान ने अरब देशों में उसके सैन्य ठिकाने तबाह कर दिए। इस चक्कर में करीब 15 देश युद्ध की आग में जल रहे हैं, तबाही का खौफनाक मंजर देख रहे हैं।

होर्मुज स्ट्रेट ब्लॉक होने से भारत-पाकिस्तान समेत कई देश तेल-गैस का संकट झेल रहे हैं। धरती के एक हिस्से में मची तबाही का देखकर पूरी दुनिया दुखी है। कई देशों ने जंग को लेकर प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय संगठन संयुक्त राष्ट्र संघ, ब्रिक्स और नाटो चुप क्यों हैं? लोगों के मन में सवाल है कि आखिर जंग को लेकर इन तीनों संगठनों का रूख क्या है? भारत भी इस मामले में कोई पहल करता नहीं दिख रहा, आखिर क्यों?

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संयुक्त राष्ट्र संघ की चुप्पी का ये है कारण

बता दें कि रूस-चीन समेत कई अरब देश चाहते हैं कि अमेरिका जंग खत्म कर दे। लेकिन अमेरिका टारगेट पूरे किए बिना पीछे हटने को तैयार नहीं है। अब ईरान ने भी कह दिया है कि अमेरिका के साथ बातचीत करने की गुंजाइश नहीं बची है। इसलिए अब ईरान तय करेगा कि अमेरिका के साथ युद्ध कब खत्म होगा?

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इस मामले में संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) इसलिए चुप है, क्योंकि जंग को लेकर इसके स्थायी सदस्य अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन बंटे हुए हैं। अमेरिका ने हमला किया है और चीन-रूस हमले के विरोधी हैं। ब्रिटेन-फ्रांस ने सिर्फ एयरबेस इस्तेमाल करने की परमिशन दी है, युद्ध में सैन्य मदद देने से इनकार किया है। इजरायल-ईरान के मामले में अमेरिका वीटो पॉवर का इस्तेमाल करता है, इसलिए संघ के सभी देश मिलकर कार्रवाई नहीं कर पाते।

क्योंकि संघ के पांचों स्थायी मेंबर संघ की महाशक्तियां हैं, जिनसे संघ का अस्तित्व है, इसलिए भी वह कुछ कर नहीं पा रहा। संघ के पास अपनी कोई सेना नहीं है, इसलिए भी वह किसी की मदद नहीं कर सकता। टेररिज्म बनाम सेल्फ डेफेंस भी चुप रहने की एक वजह है। क्योंकि अमेरिका ने सेल्फ डिफेंस का लॉजिक देते हुए ईरान पर हमला करने का स्पष्टीकरण दिया है। अमेरिका कहता है कि ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम देश के लिए खतरा है।

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ब्रिक्स देशों और भारत की चुप्पी का कारण

मिडिल ईस्ट की जंग पर BRCIS देश इसलिए चुप हैं, क्योंकि जिन पर हमला हुआ है, वे इसके मेंबर हैं जैसे ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात। इसलिए मामले में संगठन की ओर से जॉइंट स्टेटमेंट तो नहीं जारी किया गया, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर हर देश में प्रतिक्रिया व्यक्त की है। जैसे दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने युद्ध को रोकने की मांग की है, क्योंकि उनके अनुसार यह जंग गल्फ से बाहर निकलकर दुनिया के अन्य देशों में फैल सकती है।

रूस ने भी ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमलों और बदले में ईरान के अरब देशों पर हमले की निंदा की। रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन को भेजे संदेश में सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या की निंदा भी की थी। हमले को सोची-समझी और बिना उकसावे वाली कार्रवाई बताया। वहीं भारत भी मामले में सावधानी बरत रहा है, क्योंकि भारत को इस साल ब्रिक्स के सदस्या देशों के साथ एक टेबल पर बैठकर कई समझौते करने हैं।

इसलिए भारत की चुप्पी पर सवाल नहीं उठाए जा सकते और कोई उठा भी नहीं सकता। क्योंकि भारत ही अकेला ऐसा देश है, जिसने आज तक किसी देश की जमीन पर कब्जा नहीं किया। भारत हमेशा से शांति के पक्ष में खड़ा रहा है, रहता है और खड़ा रहेगा। जबकि रूस ने यूक्रेन पर हमला किया हुआ है। चीन ने ताइवान पर हमले की तैयारी की हुई है। ईरान आतंकी संगठनों के जरिए इजरायल, सऊदी अरब और UAE पर हमले कर रहा है। ऐसे में कोई दूध का धुला नहीं है।

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NATO और खाड़ी देश भी होने लगे विरोधी

बता दें कि अमेरिका को यूरोपीय देशों ने ईरान युद्ध में सहयोग नहीं किया है। फ्रांस औ ब्रिटेन सैन्य मदद देने से इनकार कर चुके हैं। दोनों का कहना है कि कूटनीति से विवाद सुलझाया जाना चाहिए। इटली ने भी लाल सागर में शुरू किए गए अमेरिका के मिशन में सहयोग करने से मना कर दिया है, क्योंकि वह युद्ध की आग को भड़काने के पक्ष में नहीं है। स्पेन ने भी किसी एक पक्ष का समर्थन करने या सैन्य हिस्सेदार बनने से साफ-साफ इनकार कर दिया है।

तुर्की जंग को लेकर तटस्थ है। उसने अमेरिकी की युद्ध नीतियों का खुलकर विरोध किया है। ईरान से आने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों को भी भूमध्य सागर में ही गिरा दिया। तुर्की ने ईरान को हद में रहने की चेतावनी दे रखी है। सऊदी अरब भी अमेरिका का सालों पुराना सहयोगी देश है, लेकिन सऊदी अरब ने इस बार अपनी सीमाओं और संप्रभुता की रक्षा करने का ऐलान किया है। यह फैसला मिडिल ईस्ट को लेकर अमेरिकी की रणनीति को झटका है।

First published on: Mar 10, 2026 01:41 PM

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