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1810 मे बनी इस तस्वीर में कैद है बंगाल का दुर्गा विसर्जन, जो आज भी दिखाती है 200 साल पुरानी आस्था की झलक

गंगा के किनारे उमड़ा जनसमूह, नावों के बीच विसर्जित होती प्रतिमा, घाट की सीढ़ियां, संगीतकार और धार्मिक उत्सव का माहौल-ये सभी मिलकर इतिहास का एक ऐसा दृश्य बनाते हैं, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना मुश्किल है.

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आज जब बंगाल में दुर्गापूजा का नाम आते ही भव्य पंडाल, विशाल प्रतिमाएं, ढाक की गूंज और गंगा में विसर्जन के दृश्य आंखों के सामने आते हैं, तब शायद ही कोई कल्पना करें कि करीब दो शताब्दी पहले का यही उत्सव एक अंग्रेज चित्रकार ने अपनी कला में हमेशा के लिए दर्ज कर दिया था. वर्ष 1810 में प्रसिद्ध अंग्रेज चित्रकार थॉमस डेनियल द्वारा बनाया गया दुर्गा विसर्जन का ऐतिहासिक चित्र आज बंगाल के सांस्कृतिक और कलात्मक इतिहास की एक महत्वपूर्ण धरोहर माना जाता है. यह कलाकृति सिर्फ देवी दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन का दृश्य नहीं है, बल्कि करीब दो सौ वर्ष पहले के बंगाल के धार्मिक उत्सव, नदी किनारे के जीवन, घाटों की बनावट, नावों और उस समय के सामाजिक वातावरण की दुर्लभ झलक भी प्रस्तुत करती है.

भारत यात्रा ने बदल दी डेनियल बंधुओं की कला की दिशा

थॉमस डेनियल और उनके भतीजे विलियम डेनियल 1786 से 1794 के बीच भारत की यात्रा पर आए थे। इस दौरान दोनों ने भारत के अलग-अलग हिस्सों की यात्रा की और यहां के प्राकृतिक दृश्यों, ऐतिहासिक इमारतों, स्थापत्य, धार्मिक स्थलों और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन को चित्रों के माध्यम से दर्ज किया. उस दौर में फोटोग्राफी का अस्तित्व नहीं था. ऐसे समय में कलाकारों द्वारा बनाए गए चित्र ही किसी स्थान, उत्सव या सामाजिक जीवन के दृश्य प्रमाण के तौर पर बेहद महत्वपूर्ण बन जाते थे. डेनियल बंधुओं के कार्य इसी वजह से आज ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं. भारत में बिताए वर्षों के दौरान उन्होंने यहां के अनेक दृश्यों को अपनी विशिष्ट शैली में चित्रित किया. बाद में इन्हीं कार्यों को लेकर उनकी प्रसिद्ध श्रृंखला ‘Oriental Scenery’ सामने आई, जिसने ब्रिटेन और यूरोप में भारत के दृश्यों को लोकप्रिय बनाने में बड़ी भूमिका निभाई.

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गंगा में दुर्गा प्रतिमा के विसर्जन का जीवंत दृश्य

थॉमस डेनियल की 1810 की इस प्रसिद्ध कलाकृति में गंगा नदी में देवी दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन का दृश्य दिखाई देता है. माना जाता है कि यह दृश्य संभवतः कलकत्ता यानी तत्कालीन कोलकाता का है. चित्र के केंद्र में दो नावों के बीच एक विशाल दुर्गा प्रतिमा दिखाई देती है. प्रतिमा को नदी में विसर्जित किया जा रहा है. यह दृश्य अपने आप में उस समय की विसर्जन परंपरा और नदी के साथ बंगाल के गहरे संबंध को दर्शाता है. चित्र को ध्यान से देखने पर पृष्ठभूमि में एक अन्य दुर्गा प्रतिमा भी नजर आती है, जो पहले ही नदी में डूबती हुई दिखाई गई है. वहीं तीसरी प्रतिमा को घाट की सीढ़ियों से नदी की ओर ले जाते हुए दिखाया गया है. इस तरह एक ही चित्र में विसर्जन की प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों को दिखाया गया है.

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घाट पर उमड़ा जनसैलाब, संगीत और उत्सव का माहौल

कलाकृति की सबसे खास बात सिर्फ दुर्गा प्रतिमाएं नहीं हैं, बल्कि उसके आसपास दिखाई देने वाला पूरा वातावरण है. घाट पर बड़ी संख्या में लोग एकत्र दिखाई देते हैं. सामने संगीतकार वाद्ययंत्र बजाते हुए नजर आते हैं. नावों पर मौजूद लोग विसर्जन की प्रक्रिया में शामिल दिखाई देते हैं. घाट की सीढ़ियां, नदी में खड़ी नावें और किनारे पर जमा भीड़ मिलकर उस समय के दुर्गा विसर्जन समारोह की जीवंत तस्वीर सामने रखते हैं. चित्र को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस समय भी दुर्गापूजा बंगाल के सामाजिक और धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा थी. आज की तरह उस दौर में भी विसर्जन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि सामुदायिक उत्सव का स्वरूप रखता था.

‘Oriental Scenery’ ने दुनिया को दिखाया भारत

थॉमस और विलियम डेनियल की ‘Oriental Scenery’ श्रृंखला को भारत के चित्रात्मक दस्तावेजों की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है. इस श्रृंखला के माध्यम से भारत के प्राकृतिक और सांस्कृतिक दृश्यों को ब्रिटेन के दर्शकों तक पहुंचाया गया. डेनियल बंधुओं ने भारत की नदियों, पहाड़ों, मंदिरों, महलों, ऐतिहासिक इमारतों और शहरों के दृश्यों को बेहद बारीकी से चित्रित किया. इन चित्रों में भारत को कई बार एक रोमांटिक और विदेशी दृष्टि से प्रस्तुत किया गया. फिर भी, उनके कार्यों का ऐतिहासिक महत्व कम नहीं होता. उनके बनाए चित्रों में 18वीं और 19वीं शताब्दी के भारत के अनेक ऐसे दृश्य दर्ज हो गए, जिनसे उस समय के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को समझने में मदद मिलती है.

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एक तस्वीर, इतिहास के कई पहलू

1810 का यह दुर्गा विसर्जन चित्र कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है. पहला, यह बंगाल में दुर्गापूजा की पुरानी परंपरा की झलक देता है. दूसरा, यह बताता है कि उस दौर में धार्मिक उत्सवों में नदी और घाटों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण थी. तीसरा, चित्र में दिखाई देने वाली नावें और नदी किनारे का जीवन उस समय की परिवहन व्यवस्था और सामाजिक गतिविधियों के बारे में भी संकेत देते हैं. घाट की वास्तुकला और वहां मौजूद लोगों की गतिविधियां भी इस कलाकृति को केवल धार्मिक चित्र से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना देती हैं. यानी यह एक ऐसा दृश्य दस्तावेज है, जिसमें धर्म, संस्कृति, समाज, नदी, स्थापत्य और लोकजीवन-सभी एक साथ दिखाई देते हैं.

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विक्टोरिया मेमोरियल में सुरक्षित है ऐतिहासिक विरासत

थॉमस डेनियल की इस ऐतिहासिक कृति का संबंध आज कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल से है. विक्टोरिया मेमोरियल में डेनियल बंधुओं के कार्यों का भारत में सबसे बड़ा संग्रह मौजूद है. यही वजह है कि यह कलाकृति आज केवल कला प्रेमियों के लिए ही नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और बंगाल की परंपराओं में रुचि रखने वाले लोगों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है. करीब दो शताब्दी पुराना यह चित्र उस समय की एक ऐसी झलक हमारे सामने रखता है, जब कैमरा नहीं था, लेकिन कलाकारों की नजर इतिहास को अपने कैनवास पर दर्ज कर रही थी.

आज के विसर्जन और 1810 के दृश्य में क्या समानता

समय बदल गया, शहर बदल गया और दुर्गापूजा के आयोजन का स्वरूप भी काफी बदल चुका है. आज विशाल प्रतिमाएं, बड़े जुलूस, आधुनिक संगीत, रोशनी और प्रशासनिक व्यवस्थाएं विसर्जन का हिस्सा हैं. लेकिन करीब 200 साल पुराने इस चित्र में दिखाई देने वाला उत्साह और सामूहिक भागीदारी आज भी बंगाल के दुर्गा विसर्जन की परंपरा से जुड़ी हुई दिखाई देती है. आज भी विजयादशमी के बाद घाटों पर लोगों की भीड़ उमड़ती है. ढाक की आवाज के बीच मां दुर्गा को विदाई दी जाती है और प्रतिमा को नदी में विसर्जित किया जाता है. यही निरंतरता इस ऐतिहासिक चित्र को और भी खास बनाती है.

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सिर्फ कलाकृति नहीं, बंगाल के अतीत की खिड़की

थॉमस डेनियल का 1810 का दुर्गा विसर्जन चित्र आज हमें उस बंगाल की झलक दिखाता है, जो करीब दो शताब्दी पहले मौजूद था. गंगा के किनारे उमड़ा जनसमूह, नावों के बीच विसर्जित होती प्रतिमा, घाट की सीढ़ियां, संगीतकार और धार्मिक उत्सव का माहौल-ये सभी मिलकर इतिहास का एक ऐसा दृश्य बनाते हैं, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना मुश्किल है. यह चित्र याद दिलाता है कि दुर्गापूजा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बंगाल की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का सदियों पुराना हिस्सा है. 1810 में थॉमस डेनियल ने जिस दृश्य को अपनी कला में कैद किया था, वह आज भी यह बताता है कि मां दुर्गा की विदाई का भाव, आस्था और सामूहिक उत्सव समय के साथ भले बदलते रहे हों, लेकिन बंगाल की सांस्कृतिक स्मृति में उनकी जगह आज भी उतनी ही गहरी है.

First published on: Sep 02, 2026 11:32 PM

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