kj.srivatsan
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Rajesh Pilot Death Anniversary: राजस्थान कांग्रेस के इतिहास में एक खास मोड़ आया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और लोकप्रिय नेता स्व. राजेश पायलट की 25वीं पुण्यतिथि का है। दौसा जिले के भडाना गांव में आयोजित इस श्रद्धांजलि कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री, सचिन पायलट समेत कई वरिष्ठ नेता एक ही मंच पर नजर आए। राजेश पायलट, जो साल 2000 में एक सड़क हादसे में दुनिया को अलविदा कह गए थे। वो न सिर्फ दौसा के लोकप्रिय सांसद रहे, बल्कि केंद्र सरकार में गृह राज्य मंत्री जैसे अहम पदों पर भी रहे। उनकी सादगी और “राम राम सा” जैसे संवाद आज भी लोगों की यादों में बसे हुए हैं। उनके बेटे सचिन पायलट ने इस मौके को न केवल श्रद्धांजलि देने के रूप में देखा, बल्कि इसे राजनीतिक खाई पाटने का अवसर भी बनाया।
करीब चार दिन पहले सचिन पायलट खुद जयपुर स्थित अशोक गहलोत के आवास पर जाकर उन्हें कार्यक्रम के लिए आमंत्रित करने पहुंचे। यह मुलाकात करीब पांच साल के लंबे अंतराल के बाद हुई। इन दोनों नेताओं के बीच 2 घंटे से भी अधिक समय तक बैठक चली। सचिन के निमंत्रण को स्वीकार करते हुए अशोक गहलोत आज दौसा पहुंचे और अपने समर्थक विधायकों और सांसदों के साथ इस कार्यक्रम में शामिल हुए।
यह मंच सिर्फ श्रद्धांजलि का नहीं, बल्कि सियासी मेल का भी प्रतीक बन गया। गहलोत और पायलट एक ही जाजम पर बैठे नजर आए, जिससे यह संदेश देने की कोशिश हुई कि राजस्थान कांग्रेस एकजुट है। मीडिया से बातचीत में गहलोत ने कहा कि मैं और सचिन पायलट कब अलग थे? हम तो हमेशा साथ हैं और हमारे बीच खूब मोहब्बत भी है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि केवल मीडिया में हमारे मतभेदों की कहानियां गढ़ी जाती हैं।
साल 2020 में हुए सियासी संकट में दोनों नेताओं के बीच खुलकर तनातनी हुई थी। सचिन पायलट अपने समर्थक विधायकों को लेकर दौसा से मानेसर चले गए थे, जिसके बाद गहलोत ने उन पर सरकार गिराने की कोशिश का आरोप लगाया था। इस दौरान गहलोत ने पायलट को “निकम्मा” और “नालायक” जैसे तीखे शब्द भी कहे थे। नतीजतन, पायलट को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर गोविंद सिंह डोटासरा को अध्यक्ष बनाया गया था।
हालांकि, कांग्रेस हाई कमान ने इन दोनों के बीच में कई बार सुलह कराने की कोशिश की है कि इसके बाद यह दोनों एक मंच पर तो आए लेकिन उनके हाथ कभी एक दूसरे से मिलते दिखाई नहीं दिए। दोनों के बीच दूरियां साफ नजर आईं। साल 2023 के विधानसभा चुनावों में दोनों नेता भले ही मंच पर साथ दिखे हों, लेकिन उनकी दूरी साफ नजर आती रही और इसका खामियाज़ा कांग्रेस को सत्ता गंवाकर भुगतना पड़ा। इसके बाद अशोक गहलोत लगातार मौके पर अपनी सरकार के साथ सचिन पायलट द्वारा लिए गए सरकार विरोधी फैसलों की लोगों को याद दिलाकर अपनी अदावत के बरकरार रहने का संकेत देते रहे।
राजनीति की बारीकियों को समझ चुके सचिन पायलट ने अपने पिता की पुण्यतिथि को मेल-मिलाप का माध्यम बनाया। शायद सचिन पायलट भी इस बात को अच्छी तरह समझ चुके हैं कि राजस्थान में अशोक गहलोत से अलग होकर राजनीति में आगे बढ़ना किसी भी कांग्रेस नेता के लिए संभव ही नहीं है। क्योंकि उनके पास राजनीति का लंबा अनुभव होने के साथ-साथ बड़ा जन समर्थन भी है। शादी से जुड़े हुए राजस्थान की राजनीति में जादूगर भी कहे जाते हैं। ऐसे में उनकी यह पहल सिर्फ अशोक गहलोत से दूरियों को कम करने की नहीं, बल्कि राजस्थान कांग्रेस में एक नई शुरुआत का संकेत भी बन सकती है। कई कांग्रेस नेताओं को आज भी यह कहते सुना गया कि आज का दिन न सिर्फ स्मृति का, बल्कि शायद सुलह का दिन भी बन गया।
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