'एक रुपये किलो में बिक रहा ग्वार! ', गुस्से से उबल पड़े किसान ने सड़क पर फेंकी पूरी फसल, हरियाली बनी बेबसी की तस्वीर

महाराष्ट्र के धुले जिले में एक किसान ने मंडी में केवल 100 रुपये प्रति क्विंटल कीमत मिलने पर ग्वार की फसल सड़क पर फेंक दी इस घटना के बाद किसानों में आक्रोश है और वे उचित दाम तथा MSP की मांग कर रहे हैं. पढ़िए पवन मराठे की खास रिपोर्ट

'एक रुपये किलो में बिक रहा ग्वार! ', गुस्से से उबल पड़े किसान ने सड़क पर फेंकी पूरी फसल, हरियाली बनी बेबसी की तस्वीर
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देश में बढ़ती महंगाई के बीच अन्नदाता की हालत बद से बदतर होती जा रही है. खेती में लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन किसानों को उनकी मेहनत का वाजिब दाम नहीं मिल रहा. हालात इतने खराब हो चुके हैं कि अब किसान अपनी उपज सड़क पर फेंककर विरोध जताने को मजबूर हैं. महाराष्ट्र के धुले जिले से ऐसी ही एक दर्दनाक तस्वीर सामने आई है, जहां ग्वार का भाव सिर्फ एक रुपये किलो मिलने पर किसान का सब्र टूट गया.

किसानों की टूटी उम्मीदें

धुले जिले के साकरी तालुका के काशीपुर गांव के किसान साहेबराव करांडे ने महीनों की मेहनत और हजारों रुपये खर्च कर ग्वार की खेती की थी. खेत से फसल काटने के लिए रोजाना 10 से 12 मजदूर लगाए गए. किसान को उम्मीद थी कि बाजार में उसकी मेहनत की कीमत मिलेगी, लेकिन मंडी में ग्वार का भाव सिर्फ 100 रुपये प्रति क्विंटल यानी करीब एक रुपये किलो बताया गया, तो किसान के पैरों तले जमीन खिसक गई. मजदूरी और ट्रांसपोर्ट का खर्च तक निकालना मुश्किल हो गया. गुस्से और बेबसी में किसान ने डेढ़ क्विंटल ग्वार पेरेजपुर फाटा इलाके की सड़क पर फेंक दिया. देखते ही देखते सड़क हरे ग्वार से ढक गई और यह दृश्य किसानों की बदहाली की जीती-जागती तस्वीर बन गया.

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खेती बनी घाटे का सौदा

किसानों का कहना है कि खेती अब घाटे का सौदा बनती जा रही है. बीज, खाद, दवाई, बिजली और मजदूरी पर हजारों रुपये खर्च करने के बाद भी फसलों के दाम मिट्टी में मिल रहे हैं. किसानों ने आरोप लगाया कि सरकार सिर्फ वादे कर रही है, लेकिन बाजार में किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल रहा.

किसानों ने की सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी

घटना के बाद इलाके के कई किसान एकत्र हुए और सरकार के खिलाफ जोरदार नाराजगी जताई. किसानों ने मांग की कि फसलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ मिले और बाजार में उनकी उपज का ऐसा अपमान बंद हो. किसानों का कहना है कि अगर यही हाल रहा, तो खेती करना नामुमकिन हो जाएगा.

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