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छत्तीसगढ़

रेप केस में हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी, सिर्फ स्खलन काफी नहीं, 20 साल पुराना फैसला पलटा

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रेप के 20 साल पुराने केस में हुए फैसले को पलटते हुए स्पष्ट किया कि बिना प्रवेश के केवल स्खलन को रेप नहीं माना जा सकता. यह रेप के प्रयास की कैटागिरी में आएगा.

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Edited By : Vijay Jain Updated: Feb 19, 2026 07:47
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Chhattisgarh High Court Verdict: ‘रेप क्राइम के लिए अनिवार्य शर्त प्रवेश है, न कि वीर्यपात’. इस टिप्पणी के साथ, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दो दशक पुराने एक फैसले को पलट दिया है, जिसमें यह माना गया है कि प्रवेश के बिना पुरुष जननांग को योनि के ऊपर रखना और वीर्यपात करना IPC की धारा 375 के तहत रेप नहीं माना जाता है, जैसा कि घटना के समय लागू था. यह रेप का प्रयास है. जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकल पीठ ने यह फैसला 2004 के एक मामले की सुनवाई के बाद सुनाया. धमतरी जिले में आरोपी पर एक महिला के साथ रेप का आरोप लगा था. ट्रायल कोर्ट ने 2005 में आरोपी को IPC की धारा 376 के तहत दोषी ठहराते हुए 7 साल की सजा सुनाई थी.

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पीड़िता की गवाही और विरोधाभास

अपील का मुख्य आधार पीड़िता की स्वयं की गवाही थी. जिरह के दौरान पीड़िता ने कहा कि आरोपी ने अपना गुप्तांग उसकी योनि के ऊपर रखा था, लेकिन प्रवेश नहीं किया था. अपने बयान के दूसरे चरण में उसने कहा कि प्रवेश हुआ था. उच्च न्यायालय ने इस विरोधाभास को महत्वपूर्ण माना. बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायालय ने टिप्पणी की, पीड़िता के स्वयं के बयान से संदेह उत्पन्न होता है. यह स्पष्ट है कि वास्तविक रेप का कृत्य सिद्ध नहीं हुआ है. उसने एक समय कहा था कि आरोपी ने उसके साथ यौन संबंध बनाया था, लेकिन बाद में स्पष्ट किया कि उसने 10 मिनट तक अपना गुप्तांग उसकी योनि के ऊपर रखा और यौन संबंध नहीं बनाया.

मेडिकल सबूत भी नहीं मिले

मेडिकल जांच में डॉक्टर ने बताया कि हाइमन नहीं फटी थी, हालांकि योनि में उंगली की नोक डाली जा सकती थी, जिससे आंशिक पैठ की संभावना थी. योनि में लालिमा और सफेद तरल पाया गया, लेकिन डॉक्टर ने रेप पर निश्चित राय नहीं दी. कोर्ट ने कहा कि यह सबूत रेप के प्रयास को साबित करते हैं, लेकिन रेप को नहीं. कोर्ट ने दोहराया कि IPC की धारा 375 के तहत थोड़ी सी भी पैठ रेप के लिए काफी है, लेकिन इसके लिए ठोस सबूत जरूरी हैं कि इस मामले में ऐसा साबित नहीं हुआ.

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आरोपी की सजा में कमी

ट्रायल कोर्ट की 7 साल की सजा को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने घटाकर 3 साल 6 महीने की कठोर कारावास कर दिया. आरोपी को 200 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया. कोर्ट ने आरोपी को पहले से जेल में बिताए समय को सजा में समायोजित करने का निर्देश दिया. आरोपी को 2 महीने के अंदर सरेंडर करना होगा. कोर्ट ने पीड़िता की उम्र को लेकर स्कूल रिकॉर्ड को सही माना और सहमति का दावा खारिज किया.

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First published on: Feb 19, 2026 07:44 AM

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