7 सितंबर से बंद कर दें ये काम, वरना उठाना पड़ेगा नुकसान

Pitru Paksha 2025: साल 2025 में 7 सितंबर से पितृपक्ष की शुरुआत होने वाली है। मान्यता है कि इन दिनों में पितृ अपने परिवार के लोगों को आशीर्वाद देने के लिए धरती पर आते हैं। मान्यता है कि जितने दिन पितृपक्ष चलते हैं, उन दिनों कुछ कार्यों को करने से बचना चाहिए। माना जाता है कि इन कार्यों को करने से व्यक्ति को लाइफ में कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

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Pitru Paksha 2025: पितृपक्ष हिंदू धर्म में एक पवित्र और महत्वपूर्ण अवधि है, जो भाद्रपद मास की पूर्णिमा से शुरू होकर अश्विन मास की अमावस्या तक 16 दिनों तक चलती है। यह समय पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनकी मुक्ति के लिए समर्पित है, जिसमें श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म किए जाते हैं। शास्त्रों में इसे अशुभ काल माना गया है, क्योंकि यह मृत्यु से जुड़े संस्कारों से संबंधित है। गरुड़ पुराण के अनुसार पितृपक्ष में श्राद्ध और तर्पण से तीन पीढ़ियों के पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

महाभारत में कर्ण की कथा भी इसका प्रमाण है। इस कथा के अनुसार कर्ण को स्वर्ग में भोजन नहीं मिला था। इसके लिए उन्हें 15 दिन के लिए पृथ्वी पर भेजा गया ताकि वे अन्न दान करें। मान्यता है कि पितृपक्ष में कुछ कार्यों को करने की मनाही होती है। आइए जानते हैं कि वे कौन से कार्य हैं, जो पितृपक्ष के दौरान नहीं करने चाहिए?

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मत करें ये काम

पितृपक्ष में विवाह, गृह प्रवेश, दुकान उद्घाटन, नया व्यवसाय शुरू करना, जन्मोत्सव मनाना या नई वस्तुएं जैसे वाहन, घर और कपड़े खरीदना शास्त्रों में निषिद्ध है। इसका कारण यह है कि यह अवधि पितरों की स्मृति और उनकी आत्मा की शांति के लिए समर्पित है, जो शोक और अशुभता से जुड़ी है। गरुड़ पुराण में मृत्यु सूतक के दौरान शुभ कार्य न करने का निर्देश है और पितृपक्ष का स्वरूप भी इससे मिलता-जुलता है। शुभ कार्यों के दौरान सात्विक ऊर्जा का होना आवश्यक माना जाता है। जबकि पितृपक्ष में तमस और राजस गुणों का प्रभाव रहता है। ऐसे में नए कार्य शुरू करने से पितृ दोष का भय रहता है, जो परिवार में अशांति या बाधाएं ला सकता है।

तामसिक भोजन और मांस-मदिरा का सेवन

पितृपक्ष में तामसिक भोजन जैसे मांस, मछली, अंडा, शराब, लहसुन, प्याज, बैंगन, मसूर दाल, काली उड़द, चना, काला जीरा, काला नमक, सरसों का साग, सत्तू, गाजर, मूली, और लौकी का सेवन वर्जित है। गरुड़ पुराण के अनुसार तामसिक भोजन पितरों की शांति में बाधक हो सकता है, क्योंकि ये तमोगुणी होते हैं।

सात्विक भोजन ही इस दौरान उपयुक्त माना जाता है, जो शुद्धता और पवित्रता को बनाए रखता है। इस समय के दौरान चावल और बाहर का भोजन भी नहीं करना चाहिए। इसका कारण यह है कि पितृपक्ष में पितरों की आत्मा पृथ्वी पर विचरण करती है, और तामसिक भोजन उनकी संतुष्टि और मोक्ष में रुकावट डाल सकता है। मनुस्मृति में भी अहिंसा और शुद्ध आहार पर बल दिया गया है, जो इस अवधि में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। सात्विक भोजन पितरों को प्रसन्न करता है, जिससे परिवार में शांति आती है।

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मेकअप आदि करना

पितृपक्ष में नाखून काटना, बाल कटवाना, दाढ़ी बनवाना या गंदे कपड़े पहनना वर्जित है। यह अवधि शोक और शुद्धता से जुड़ी है और बाहरी शारीरिक परिवर्तन या सज्जा पितरों की ऊर्जा को प्रभावित कर सकती है। इस दौरान नए रंगीन कपड़े खरीदना या पहनना भी नहीं चाहिए। इस दौरान चमड़े के उत्पादों के उपयोग करने से बचना चाहिए। इस दौरान सादगी और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

लोहे के बर्तनों का न करें उपयोग

श्राद्ध के भोजन को तैयार करने या परोसने में लोहे या स्टील के बर्तनों का उपयोग वर्जित है। इसके बजाय, पीतल या तांबे के बर्तनों का उपयोग करना चाहिए। शास्त्रों में लोहे को तमोगुणी माना गया है, जबकि पीतल और तांबा सात्विक गुणों वाले हैं।

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झूठ, कटु वचन और अपमान से बचें

पितृपक्ष में झूठ बोलना, अपशब्द कहना, धोखा देना, या किसी का अपमान करना सख्त मना है। विशेष रूप से वृद्धों, गाय, ब्राह्मण, कुत्ते, या भिखारी जैसे जीवों का अनादर नहीं करना चाहिए। मान्यता है कि पितृपक्ष में पितर पृथ्वी पर विचरण करते हैं और आपका नकारात्मक व्यवहार उन्हें अप्रसन्न कर सकता है, जिससे पितृ दोष का खतरा बढ़ता है।

डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है।

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