Chaiti Chhath: 22 मार्च से नहाय-खाय के साथ शुरू होगी चैती छठ, जानें व्रत की पूरी डेट्स और खास नियम
Chaiti Chhath: इस वर्ष 22 मार्च, 2026 से नहाय-खाय के साथ चैती छठ का शुभारंभ हो रहा है, जो 4 दिवसीय कठिन सूर्य उपासना का पर्व है. आइए जानते हैं, हिंदू नववर्ष और चैत्र नवरात्रि के बीच इसका विशेष महत्व क्यों माना जाता है? यह पर्व श्रद्धा, अनुशासन और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक कैसे बनता है?
Written By: Shyamnandan|Updated: Mar 21, 2026 11:56
Edited By : Shyamnandan|Updated: Mar 21, 2026 11:56
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Chaiti Chhath: हिंदू नववर्ष और चैत्र नवरात्रि की आध्यात्मिक लहर के बीच अब लोक आस्था के महापर्व 'चैती छठ' की दस्तक सुनाई दे रही है. वैसे तो छठ का पर्व साल में दो बार मनाया जाता है, लेकिन चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में होने वाली चैती छठ का अपना एक अलग और दिव्य महत्व है. 22 मार्च से शुरू होने जा रहे इस चार दिवसीय कठिन अनुष्ठान के लिए देश भर के घाटों और घरों में तैयारियां तेज हो गई हैं. सूर्य उपासना का यह पर्व न केवल श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि यह हमें प्रकृति और अनुशासन से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम भी है.
चैती छठ का महत्व
चैती छठ मुख्य रूप से चैत्र मास की चतुर्थी तिथि से शुरू होकर सप्तमी तिथि तक चलता है. यह पर्व भगवान सूर्य और उनकी शक्ति 'छठी मैया' को समर्पित है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चैती छठ मनाने से आरोग्य की प्राप्ति होती है और संतान के जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं. सूर्य देव को प्रत्यक्ष देवता माना गया है, जिनकी ऊर्जा से पूरी सृष्टि संचालित होती है. इस व्रत को करने से घर में सुख-समृद्धि और शांति का वास होता है. कठिन नियमों के कारण इसे 'महापर्व' की संज्ञा दी गई है.
चैती छठ 2026 का 4 दिवसीय कार्यक्रम
इस वर्ष चैती छठ 22 मार्च से लेकर 25 मार्च तक मनाया जाएगा. आइए जानते हैं हर दिन के मुख्य अनुष्ठान:
नहाय-खाय - 22 मार्च, रविवार
यह महापर्व का पहला दिन है. इस दिन व्रती नदी या तालाब में स्नान करने के बाद पूरी तरह सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं. भोजन में विशेष रूप से कद्दू की सब्जी (कद्दू-भात) और चने की दाल बनाई जाती है. इसमें केवल सेंधा नमक का उपयोग होता है. व्रती के भोजन करने के बाद ही परिवार के अन्य सदस्य भोजन करते हैं. यह दिन तन और मन की शुद्धि के लिए होता है.
खरना - 23 मार्च, सोमवार
दूसरे दिन व्रती दिन भर निर्जला उपवास रखती हैं. शाम के समय मिट्टी के नए चूल्हे पर गुड़ और चावल की खीर तथा घी वाली रोटी का प्रसाद बनाया जाता है. रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रती इस प्रसाद को ग्रहण करती हैं. इसके बाद से ही 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत शुरू हो जाता है. खरना के प्रसाद को ग्रहण करने के बाद घर में पूरी शांति बनाए रखी जाती है.
तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. शाम को व्रती सूप और दौरा (बांस की टोकरी) में पूजा की सामग्री लेकर घाट पर पहुंचती हैं. पानी में खड़े होकर अस्त होते सूर्य को दूध और जल का अर्घ्य दिया जाता है. यह दृश्य बेहद मनोरम होता है, जहां हजारों लोग एक साथ प्रकृति की आराधना करते हैं.
उषा अर्घ्य - 25 मार्च, बुधवार
अंतिम दिन उगते हुए सूर्य की पूजा होती है. सुबह तड़के ही श्रद्धालु फिर से घाट पर जमा होते हैं. सूर्य की पहली किरण को अर्घ्य देने के बाद छठी मैया से सुख-शांति की प्रार्थना की जाती है. इसके बाद व्रती कच्चे दूध और गुड़ का शरबत पीकर अपना व्रत खोलती हैं, जिसे 'पारण' कहा जाता है.
छठ पूजन सामग्री की पूरी लिस्ट
छठ पूजा में चढ़ाई जाने वाली हर सामग्री का अपना महत्व है. पूजा के लिए इन चीजों को पहले से जुटा लेना चाहिए:
बांस के सामान: बांस की एक बड़ी टोकरी, जिसे दौरा कहते हैं और बांस के बने सूप. फल और सब्जियां: पानी वाला नारियल, गन्ना, डाभ नींबू (बड़ा नींबू), अनानास, केला (पूरी घौंद या पूरा हत्था) शरीफा, संतरा और मौसमी फल. पारंपरिक पकवान: शुद्ध घी और गेहूं के आटे से बना 'ठेकुआ' (छठ का मुख्य प्रसाद), चावल के लड्डू (केसौर). अन्य सामग्री: मखाना, भीगे हुए मटर (केराव), सुथनी, शकरकंद, मूली, अदरक और हल्दी का कच्चा पौधा. पूजन विधि के लिए: मिट्टी का दीया, धूप, अगरबत्ती, कपूर, चंदन, पान का पत्ता, आलता बाती, बुद्धि (लाल धागे की माला), अक्षत, सिंदूर और माचिस. अर्घ्य के लिए: तांबे का लोटा, नया वस्त्र (साड़ी या धोती), कच्चा दूध, गंगाजल और शहद.
ये हैं छठ के खास नियम
छठ का व्रत अपनी शुद्धता के लिए जाना जाता है. इस दौरान घर में पूरी तरह सात्विकता का पालन किया जाता है. लहसुन और प्याज का प्रयोग वर्जित होता है. पूजा का प्रसाद बनाने के लिए नए अनाज और नए चूल्हे का उपयोग किया जाता है. व्रती जमीन पर सोती हैं और अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखती हैं. मान्यता है कि यदि कोई गलती हो जाए, तो छठी मैया नाराज हो जाती हैं, इसलिए हर कदम पर सफाई और नियमों का ध्यान रखा जाता है.
डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.
Chaiti Chhath: हिंदू नववर्ष और चैत्र नवरात्रि की आध्यात्मिक लहर के बीच अब लोक आस्था के महापर्व ‘चैती छठ’ की दस्तक सुनाई दे रही है. वैसे तो छठ का पर्व साल में दो बार मनाया जाता है, लेकिन चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में होने वाली चैती छठ का अपना एक अलग और दिव्य महत्व है. 22 मार्च से शुरू होने जा रहे इस चार दिवसीय कठिन अनुष्ठान के लिए देश भर के घाटों और घरों में तैयारियां तेज हो गई हैं. सूर्य उपासना का यह पर्व न केवल श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि यह हमें प्रकृति और अनुशासन से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम भी है.
चैती छठ का महत्व
चैती छठ मुख्य रूप से चैत्र मास की चतुर्थी तिथि से शुरू होकर सप्तमी तिथि तक चलता है. यह पर्व भगवान सूर्य और उनकी शक्ति ‘छठी मैया’ को समर्पित है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चैती छठ मनाने से आरोग्य की प्राप्ति होती है और संतान के जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं. सूर्य देव को प्रत्यक्ष देवता माना गया है, जिनकी ऊर्जा से पूरी सृष्टि संचालित होती है. इस व्रत को करने से घर में सुख-समृद्धि और शांति का वास होता है. कठिन नियमों के कारण इसे ‘महापर्व’ की संज्ञा दी गई है.
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चैती छठ 2026 का 4 दिवसीय कार्यक्रम
इस वर्ष चैती छठ 22 मार्च से लेकर 25 मार्च तक मनाया जाएगा. आइए जानते हैं हर दिन के मुख्य अनुष्ठान:
नहाय-खाय – 22 मार्च, रविवार
यह महापर्व का पहला दिन है. इस दिन व्रती नदी या तालाब में स्नान करने के बाद पूरी तरह सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं. भोजन में विशेष रूप से कद्दू की सब्जी (कद्दू-भात) और चने की दाल बनाई जाती है. इसमें केवल सेंधा नमक का उपयोग होता है. व्रती के भोजन करने के बाद ही परिवार के अन्य सदस्य भोजन करते हैं. यह दिन तन और मन की शुद्धि के लिए होता है.
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खरना – 23 मार्च, सोमवार
दूसरे दिन व्रती दिन भर निर्जला उपवास रखती हैं. शाम के समय मिट्टी के नए चूल्हे पर गुड़ और चावल की खीर तथा घी वाली रोटी का प्रसाद बनाया जाता है. रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रती इस प्रसाद को ग्रहण करती हैं. इसके बाद से ही 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत शुरू हो जाता है. खरना के प्रसाद को ग्रहण करने के बाद घर में पूरी शांति बनाए रखी जाती है.
तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. शाम को व्रती सूप और दौरा (बांस की टोकरी) में पूजा की सामग्री लेकर घाट पर पहुंचती हैं. पानी में खड़े होकर अस्त होते सूर्य को दूध और जल का अर्घ्य दिया जाता है. यह दृश्य बेहद मनोरम होता है, जहां हजारों लोग एक साथ प्रकृति की आराधना करते हैं.
उषा अर्घ्य – 25 मार्च, बुधवार
अंतिम दिन उगते हुए सूर्य की पूजा होती है. सुबह तड़के ही श्रद्धालु फिर से घाट पर जमा होते हैं. सूर्य की पहली किरण को अर्घ्य देने के बाद छठी मैया से सुख-शांति की प्रार्थना की जाती है. इसके बाद व्रती कच्चे दूध और गुड़ का शरबत पीकर अपना व्रत खोलती हैं, जिसे ‘पारण’ कहा जाता है.
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छठ पूजन सामग्री की पूरी लिस्ट
छठ पूजा में चढ़ाई जाने वाली हर सामग्री का अपना महत्व है. पूजा के लिए इन चीजों को पहले से जुटा लेना चाहिए:
बांस के सामान: बांस की एक बड़ी टोकरी, जिसे दौरा कहते हैं और बांस के बने सूप. फल और सब्जियां: पानी वाला नारियल, गन्ना, डाभ नींबू (बड़ा नींबू), अनानास, केला (पूरी घौंद या पूरा हत्था) शरीफा, संतरा और मौसमी फल. पारंपरिक पकवान: शुद्ध घी और गेहूं के आटे से बना ‘ठेकुआ’ (छठ का मुख्य प्रसाद), चावल के लड्डू (केसौर). अन्य सामग्री: मखाना, भीगे हुए मटर (केराव), सुथनी, शकरकंद, मूली, अदरक और हल्दी का कच्चा पौधा. पूजन विधि के लिए: मिट्टी का दीया, धूप, अगरबत्ती, कपूर, चंदन, पान का पत्ता, आलता बाती, बुद्धि (लाल धागे की माला), अक्षत, सिंदूर और माचिस. अर्घ्य के लिए: तांबे का लोटा, नया वस्त्र (साड़ी या धोती), कच्चा दूध, गंगाजल और शहद.
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ये हैं छठ के खास नियम
छठ का व्रत अपनी शुद्धता के लिए जाना जाता है. इस दौरान घर में पूरी तरह सात्विकता का पालन किया जाता है. लहसुन और प्याज का प्रयोग वर्जित होता है. पूजा का प्रसाद बनाने के लिए नए अनाज और नए चूल्हे का उपयोग किया जाता है. व्रती जमीन पर सोती हैं और अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखती हैं. मान्यता है कि यदि कोई गलती हो जाए, तो छठी मैया नाराज हो जाती हैं, इसलिए हर कदम पर सफाई और नियमों का ध्यान रखा जाता है.