Varun Stotra Benefits: भीषण गर्मी से मिलेगा छुटकारा, पढ़ें वरुण स्तोत्र, देखें Complete Lyrics

Tips to Save Yourself from Summer’s Deadly Heat Waves: वरुण देव को जल का देवता माना जाता है, जिनकी पूजा करने से मन को शांति और ठंडक मिलती है. साथ ही गर्मी नहीं लगती है. यदि आप भी वरुण देव को खुश करना चाहते हैं तो गर्मियों में वरुण स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं. यहां पर वरुण स्तोत्र के लिरिक्स, महत्व और लाभ आदि के बारे में विस्तार से बताया गया है.

Varun Stotra

Credit- News24 Graphics

Varun Stotra Lyrics & Benefits: जैसे-जैसे नौतपा पास आ रहा है, वैसे-वैसे गर्मी बढ़ती जा रही है. इसलिए अब लोग घर से बाहर निकलने से कतरा रहे हैं. हालांकि, भीषण गर्मी से बचने के लिए धार्मिक शास्त्रों में कई उपायों के बारे में भी बताया गया है, जिसमें से एक वरुण स्तोत्र है. वरुण स्तोत्र को वरुण सूक्त के नाम से भी जाना जाता है, जो कि वरुण देव को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली व प्रभावशाली वैदिक स्तुति है. आमतौर पर वरुण देव की पूजा तब की जाती है, जब भीषण गर्मी, सूखा या जल संकट बढ़ने लगता है.

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दरअसल, वरुण देव को जल, समुद्र और वर्षा का स्वामी माना जाता है, जिनकी कृपा से भीषण गर्मी से राहत मिलती है. ऐसे में भीषण गर्मी में खासकर नौतपा के 9 दिनों में वरुण स्तोत्र का पाठ करने की सलाह दी जाती है. साथ ही इससे मन को शांति व ठंडक मिलती है. यहां पर वरुण स्तोत्र के Complete Lyrics दिए गए हैं, जिनका नियमित पाठ करके आपको भी वरुण देव की कृपा से ठंडक मिल सकती है.

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वरुण स्तोत्र के लिरिक्स

यच्चिद्धि ते विशो यथा प्र देव वरुण व्रतम्।
मिनीमसि द्यविद्यवि॥
मा नो वधाय हलवे जिहीळानस्य रीरधः।
मा हृणानस्य मन्यवे॥
विमृळीकाय ते मनो रथीरश्वं न संदितम्।
गीर्भिर्वरुण सीमहि॥
परा हि मे विमन्यवः पतन्ति वस्यइष्टये।
वयो न वसतीरुप॥
कदा क्षत्रश्रियं नरमा वरुणं करामहे।
मृळीकायोरुचक्षसम्॥
तदित्समानमाशाते वेनन्ता न प्र युच्छतः।
धृतव्रताय दाशुषे॥
वेदा यो वीनां पदमन्तरिक्षेण पतताम्।
वेद नावः समुद्रियः॥
वेद मासो धृतव्रतो द्वादश प्रजावतः।
वेदा य उपजायते॥
वेद वातस्य वर्तनिमुरोरृष्वस्य बृहतः।
वेदा ये अध्यासते॥
नि षसाद धृतव्रतो वरुणः पस्त्यास्वा।
साम्राज्याय सुऋतु॥
अतो विश्वान्यद्भुता चिकित्वाँ अभि पश्यति।
कृतानि या च कर्त्वा॥
स नो विश्वाहा सुऋतुरादित्यः सुपथा करत्।
प्रण आयूंषि तारिषत्॥
बिभ्रद्रापिं हिरण्ययं वरुणो वस्त निर्णिजम्।
परि स्पशो नि षेदिरे॥
न य दिप्सन्ति दिप्सवो न द्रुहाणो जनानाम्।
न देवमभिमातयः॥
उत यो मानुषेष्वा यशश्चक्रे असाम्या।
अस्माकमुदरेष्वा॥
परा मे यन्ति धीतयो गावो न गव्यूतीरनु।
इच्छन्तीरुरुचक्षसम्॥
मं नु वोचावहै पुनर्यतो मे मध्वाभृतम्।
होतेव क्षदसे प्रियम्॥
दर्श नु विश्वदर्शतं दर्श रथमधि क्षमि।
एता जुषत मे गिरः॥
इमं में वरुण श्रुधी हवमद्या च मृळय।
त्वामवस्युरा चके॥
त्वं विश्वस्य मेधिर दिवश्च ग्मश्च राजसि।
स यामनि प्रति श्रुधि॥
उदुत्तमं मुमुग्धि नो वि पाशं मध्यमं चूत।
अवाधमानि जीवसे॥

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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