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Opinion

क्यों दक्षिण का अभिनेता बन जाता है CM और भोजपुरी का स्टार भीड़ तक रह जाता है सीमित

दक्षिण भारतीय सिनेमा में अभिनेता का प्रभाव केवल बॉक्स ऑफिस तक सीमित नहीं रहता. एम. जी. रामचंद्रन और जे. जयललिता के उदाहरण इस बात को रेखांकित करते हैं कि वहां स्टारडम एक संगठित सामाजिक-राजनीतिक संरचना में विकसित होता है.

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Written By: Priyadarshi Ranjan Updated: May 5, 2026 17:27

दक्षिण भारत का सिनेमा और भोजपुरी का सिनेमा दोनों क्षेत्रीय सिनेमा हैं. इसके अलावा दोनों में एक सामान्य बात यह है कि दोनों के कलाकार बेहद लोकप्रिय होते हैं और समाज का अंतिम पंक्ति में बैठा व्यक्ति भी उनकी लोकप्रियता से अवगत रहता है. लेकिन बात जब दक्षिण के सिनेमाई कलाकार और भोजपुरी के सिनेमा कलाकार का राजनीति में प्रवेश और दखल की आती है तो दृश्य बदल जाता है. दोनों इंडस्ट्री के कलाकार राजनीति में आने को बेहद लालायित रहते हैं. लेकिन दक्षिण भारत में जब विजय (Thalapathy Vijay) जैसे अभिनेता राजनीति में प्रवेश करते हैं, तो बहस केवल एक नए राजनीतिक विकल्प की नहीं होती; वह एक ऐसे सामाजिक पूंजी के रूपांतरण की कहानी होती है, जो वर्षों से सिनेमा के माध्यम से निर्मित हुई है. इसके उलट, भोजपुरी सिनेमा का परिदृश्य एक अलग तरह की विडंबना प्रस्तुत करता है. जहां लोकप्रियता तो है, पर वह राजनीतिक विश्वसनीयता में तब्दील नहीं हो पाती. यह अंतर आकस्मिक नहीं है. यह सिनेमा और समाज के रिश्ते की गुणवत्ता पर निर्भर करता है.

साउथ का मॉडल: संस्थागत स्टारडम


दक्षिण भारतीय सिनेमा में अभिनेता का प्रभाव केवल बॉक्स ऑफिस तक सीमित नहीं रहता. एम. जी. रामचंद्रन और जे. जयललिता के उदाहरण इस बात को रेखांकित करते हैं कि वहां स्टारडम एक संगठित सामाजिक-राजनीतिक संरचना में विकसित होता है. फैन क्लब इस संरचना की धुरी हैं. वे केवल प्रशंसक समूह नहीं, बल्कि स्थायी नेटवर्क होते हैं. जो सामाजिक कार्यों से लेकर राजनीतिक लामबंदी तक सक्रिय रहते हैं. इसीलिए, जब कोई अभिनेता राजनीति में प्रवेश करता है, तो वह एक तैयार कैडर के साथ आता है. और ये कैडर सिर्फ पोस्टर लगाने वाले नहीं होते. ये लोग समाज में काम करते हैं. लोगों की मदद करते हैं. और धीरे-धीरे एक मजबूत टीम बन जाते हैं. इसलिए जब कोई स्टार चुनाव लड़ता है, तो उसके पास पहले से तैयार टीम होती है.

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भोजपुरी कलाकारों की लोकप्रियता का असंगठित विस्तार


इसके विपरीत, भोजपुरी सिनेमा में स्टारडम बिखरा हुआ है. यहां प्रशंसक हैं लेकिन वे किसी संगठित ढांचे का हिस्सा नहीं हैं. कोई संस्थागत फैन क्लब संस्कृति नहीं, कोई दीर्घकालिक सामाजिक उपस्थिति नहीं और न ही कोई ऐसा नेटवर्क जो चुनावी राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा सके. इसका परिणाम यह होता है कि भोजपुरी कलाकारों की लोकप्रियता इवेंट-आधारित रह जाती है, न कि संरचनात्मक शक्ति में परिवर्तित हो पाती है.

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भोजपुरी कलाकारों की राजनीतिक उपयोगिता बनाम नेतृत्व की कमी


भोजपुरी कलाकारों की राजनीतिक उपस्थिति को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता. मनोज तिवारी, रवि किशन और दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ जैसे उदाहरण यह दिखाते हैं कि वे चुनाव जीतने में सक्षम हैं. लेकिन यह सफलता किसी दल विशेष की कृपा पर निर्भर है ना कि उनके कैडर पर या उनके अपनी सिर्फ लोकप्रियता पर. यही कारण है कि इनके माध्यम से कोई व्यापक राजनीतिक विमर्श या वैकल्पिक नेतृत्व उभरता नहीं दिखता. कोई ऐसा कलाकार नहीं दिखता जो पॉलिटिकल एजेंडा सेट करता हो.

पवन सिंह: प्रभाव और उसकी सीमा


पवन सिंह का उदाहरण इस प्रवृत्ति को और स्पष्ट करता है. बिहार के चुनावी परिदृश्य में उनकी उपस्थिति भीड़ जुटाने में प्रभावी रही है. उनकी लोकप्रियता का उपयोग भारतीय जनता पार्टी सहित विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए किया. काराकाट लोकसभा क्षेत्र से उनके चुनाव लड़ने और उल्लेखनीय मत प्राप्त करने से यह संकेत मिलता है कि उनका प्रभाव केवल सांस्कृतिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है. फिर भी, यह प्रभाव निर्णायक राजनीतिक पूंजी में तब्दील नहीं हो पाया. भीड़ और मत के बीच का अंतर यहां स्पष्ट रूप से दिखाई देता है.

मूल प्रश्न: भोजपुरी सिनेमा की कहानी समाज से कोसो दूर

भोजपुरी सिनेमा की सीमाओं को समझने के लिए उसके सामाजिक चरित्र की ओर देखना आवश्यक है. आज भोजपुरी फिल्मों और संगीत में जो कथा और प्रस्तुति दिखाई देती है, वह बड़े पैमाने पर उस समाज से विच्छिन्न है. कथाएं स्थानीय यथार्थ से असंबद्ध हैं. चरित्र सामाजिक संदर्भों से कटे हुए हैं और सांस्कृतिक प्रस्तुति में प्रामाणिकता का अभाव है. जो कहानी भोजपुरी फिल्मों के माध्यम से दिखाई जाती है वह समाज से कोसो दूर होता है. वहीं साउथ की फिल्मों में समाज से जुड़े यथार्थ को दिखाया जाता है. दक्षिण के सिनेमा कथाकारों ने ऐसी ऐसी कहानी लिखें जिसने साउथ के सिनेमा की तस्वीर और तकदीर को बदल दिया. भोजपुरी सिनेमा में ऐसे कहानी लिखने वालों का भारी अकल है.

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फर्जी भोजपुरिया समाज को दिखाया जाना


भोजपुरी सिनेमा में प्रदर्शित सांस्कृतिक ‘कलर’ अक्सर वास्तविक सामाजिक विविधता को प्रतिबिंबित नहीं करता. उदाहरण के लिए, भोजपुरी मुस्लिम समाज की अपनी विशिष्ट परंपराएं और पहनावे हैं, लेकिन फिल्मों में जो भोजपुरी समाज का रहन-सहन और पहनावा दिखाया जाता है वह वास्तविक नहीं है. राजस्थान का, महाराष्ट्र का, मध्य प्रदेश का या किसी अन्य प्रदेश के पहनावे को भोजपुरी समाज के पहनावे के तौर पर पेश कर दिया जाता है. जो गांव_गलियारा दिखाया जाता है वह भी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से मैच नहीं करता.

भोजपुरी सिनेमा में न तो भाषा का प्रामाणिक लहजा स्थिर है, न ही भौगोलिक और सामाजिक परिवेश का सटीक चित्रण.
परिणामस्वरूप, यह सिनेमा एक जनरलाइज्ड सांस्कृतिक स्पेस में बदल जाता है, जो किसी विशिष्ट समाज का प्रतिनिधित्व करने में असफल रहता है. के साथ ही भोजपुरी सिनेमा में जो कुछ दिखाया जाता है उसमें गर्व करने लायक भोजपुरी समाज को कुछ भी नहीं होता. जबकि साउथ का सिनेमा अपने समाज पर गर्व करता है और वैसी कहानी प्रस्तुत करता है जिससे आप अपने समाज पर गर्व करने को विवश हों जाएं.

लोक से बाजार तक: संगीत का रूपांतरण


भोजपुरी संगीत जो कभी लोक परंपराओं से जुड़ा था, अब बाजार-उन्मुख उत्पाद में बदल चुका है. इस बदलाव ने उसकी लोकप्रियता तो बढ़ाई है, लेकिन सामाजिक स्वीकृति को कमजोर किया है. आज भोजपुरी गाने बहुत चलते हैं लेकिन उनमें शोर ज्यादा है, दिखावा ज्यादा है, और कई बार अश्लीलता भी ज्यादा है. लोकगीतों की जगह अब ‘ट्रेंड’ ने ले ली है. नतीजा क्या हुआ? लोग गाने सुनते हैं, स्टार को जानते हैं, लेकिन दिल से नहीं जोड़ते. और जब दिल से जुड़ाव नहीं होता, तो भरोसा नहीं बनता. रंगदारी और अश्लील गानों की वजह से भोजपुरी समाज भी अपने गायको से बहुत खफा रहता है.

आखिरी और सीधी बात


दक्षिण भारत में अभिनेता का राजनीतिक उदय उस सामाजिक पूंजी का परिणाम है, जो सिनेमा के माध्यम से निर्मित और संरक्षित होती है. साउथ में स्टार इसलिए बड़ा नेता बनता है क्योंकि वह लोगों की जिंदगी से जुड़ा होता है. भोजपुरी सिनेमा में यह प्रक्रिया अधूरी है. यहां लोकप्रियता है, लेकिन वह सामाजिक विश्वास और संगठनात्मक शक्ति में परिवर्तित नहीं हो पाती. जब तक भोजपुरी सिनेमा अपने सामाजिक यथार्थ से पुनः नहीं जुड़ता, अपनी सांस्कृतिक प्रामाणिकता को पुनर्स्थापित नहीं करता और एक संगठित सामाजिक आधार विकसित नहीं करता तब तक उसके सितारे भीड़ तो जुटा सकेंगे लेकिन सत्ता की निर्णायक संरचना में केंद्रीय भूमिका निभाना उनके लिए कठिन बना रहेगा. जब तक भोजपुरी सिनेमा अपनी असली कहानी नहीं दिखाएगा अपने समाज का सही चेहरा नहीं दिखाएगा तब तक भीड़ मिलेगी, तालियां मिलेंगी लेकिन सत्ता नहीं मिलेगी.

नोट: लेखक एक सामाजिक और राजनीतिक विश्लेषक हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं, जिनके तथ्यों की पुष्टि News24 नहीं करता है.

First published on: May 05, 2026 05:15 PM

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