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Opinion

देश की पहली फेमिनिस्ट, जड़ परंपराओं से टकराईं, स्त्री की गरिमा को बनाया सार्वजनिक प्रश्न

आज के दौर में जब महिला सशक्तिकरण पर व्यापक चर्चा हो रही है तो यह आवश्यक है कि हम उन ऐतिहासिक प्रयासों को समझें, जिन्होंने इस विमर्श की नींव रखी। इसमें पंडिता रमाबाई का नाम भारत की पहली फेमिनिस्ट के तौर पर लिया जाता है।

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Edited By : Khushbu Goyal Updated: Apr 23, 2026 09:46
Pandita Ramabai
Credit- News 24 GFX

प्रियदर्शी रंजन
निदेशक, पब्लिक ऑडिट एंड रिफॉर्म सेंटर

आज के दौर में जब महिला सशक्तिकरण पर व्यापक चर्चा हो रही है तो यह आवश्यक है कि हम उन ऐतिहासिक प्रयासों को समझें, जिन्होंने इस विमर्श की नींव रखी। पंडिता रमाबाई को भारत की पहली फेमिनिस्ट हैं। जिन्होंने महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और गरिमा को एक साथ जोड़कर देखा। विशेषकर महिला स्वास्थ्य से जुड़े मासिक धर्म जैसे मुद्दे लंबे समय तक सार्वजनिक विमर्श बनाया। वह भी उन्नीसवीं सदी के दौर में जब स्त्री को सिर्फ समाज की सुविधा का विषय माना जाता था।

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महिलाओं की चुप्पी को तोड़ने के लिए आगे आईं

उन्नीसवीं सदी का भारत, जहां औपनिवेशिक शासन बाहरी सत्ता था, लेकिन असली जकड़न भीतर थी। जाति, धर्म और पितृसत्ता का गठजोड़ इतना मजबूत था कि उसने स्त्री को न केवल सामाजिक रूप से सीमित किया, बल्कि उसके शरीर, स्वास्थ्य और गरिमा पर भी नियंत्रण स्थापित कर लिया। यह वह समय था, जब मासिक धर्म, स्वच्छता और महिला स्वास्थ्य जैसे विषय ‘वर्जित’ थे, चुप्पी ही उनकी भाषा थी। इसी चुप्पी को तोड़ने के लिए एक स्त्री सामने आती है पंडिता रमाबाई। उनका जीवन केवल एक सुधारक की कहानी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ एक वैचारिक मुकदमा है, जो स्त्री को ‘धर्म’ के नाम पर नियंत्रित करती थी और संस्कृति के नाम पर उसकी पीड़ा को छिपा देती थी।

पिता के एक फैसले की कीमत परिवार ने चुकाई

रमाबाई का जन्म 1858 में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ एक ऐसा वर्ग, जो ज्ञान और धर्म का संरक्षक माना जाता था। लेकिन यही वर्ग स्त्रियों के लिए ज्ञान के द्वार बंद रखता था। उनके पिता अनंत शास्त्री डोंगरे ने इस परंपरा को तोड़ा और अपनी पुत्री को संस्कृत पढ़ाई। यह कदम केवल शैक्षणिक नहीं, बल्कि राजनीतिक था क्योंकि इसने ज्ञान पर एकाधिकार को चुनौती दी। इस निर्णय की कीमत पूरे परिवार को चुकानी पड़ी। सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक कठिनाइयां और लगातार संघर्ष करना पड़ा । यह सब रमाबाई के प्रारंभिक जीवन का हिस्सा रहा। लेकिन यही संघर्ष उनके भीतर प्रश्न करने की क्षमता और विरोध की ऊर्जा पैदा करता है।

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1878 में पंडिता और सरस्वती की उपाधि मिली

1878 में जब वे कोलकाता पहुंचीं, तो वहां के विद्वानों ने उनकी परीक्षा ली। उनकी अद्वितीय विद्वता से प्रभावित होकर कलकत्ता विश्वविद्यालय से जुड़े पंडितों ने उन्हें पंडिता और सरस्वती की उपाधि दी। यह केवल सम्मान नहीं था यह उस पितृसत्तात्मक ज्ञान-व्यवस्था पर एक व्यंग्य भी था, जो एक स्त्री को स्वीकार तो करती है, लेकिन बराबरी नहीं देती। रमाबाई ने इस विरोधाभास को गहराई से समझा। उन्होंने देखा कि समस्या केवल शिक्षा की नहीं है; समस्या उस सोच की है, जो स्त्री को ‘अधिकार’ नहीं, ‘कर्तव्य’ मानती है।

पति की मौत के बाद दर-दर की ठोकरे खाईं

उनका विवाह एक गैर-ब्राह्मण से हुआ यह निर्णय उस समय के सामाजिक ढांचे के लिए असहनीय था। यह ब्राह्मणवाद की उस जड़ता पर सीधा प्रहार था, जो जाति को मनुष्य से ऊपर रखती थी। लेकिन यह विद्रोह अल्पकालिक सुख नहीं ला सका। पति की मृत्यु के बाद, वे एक नवजात पुत्री के साथ अकेली रह गईं एक ऐसे समाज में, जहां विधवा होना सामाजिक सजा के बराबर था। यहीं से उनकी जीवन यात्रा सबसे कठिन मोड़ लेती है। अकाल, भूख, माता-पिता की मृत्यु, और दर-दर की ठोकरें उन्होंने सब कुछ सहा। दक्षिण भारत के जंगलों से होते हुए, पैदल यात्राएं करते हुए, वे बंगाल तक पहुंचीं। यह यात्रा केवल भौगोलिक नहीं थी; यह उस भारत की परतें खोलती थी, जहां स्त्री का जीवन हर स्तर पर असुरक्षित था।

1882 में करने लगीं महिला शिक्षा की वकालत

लेकिन इस पीड़ा ने उन्हें तोड़ा नहीं इसने उन्हें स्पष्ट किया। उन्होंने देखा कि महिलाओं की स्थिति केवल सामाजिक उत्पीड़न का परिणाम नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य और स्वच्छता की उपेक्षा भी इसका एक बड़ा कारण है। यहीं से पंडिता रमाबाई का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अक्सर उपेक्षित पक्ष सामने आता है, महिला स्वास्थ्य और स्वच्छता की वकालत। 1882 में, जब हंटर शिक्षा आयोग के सामने उन्हें गवाही देने का अवसर मिला, तो उन्होंने केवल शिक्षा की बात नहीं की। उन्होंने महिला स्वास्थ्य को केंद्र में रखा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत में महिलाओं के लिए चिकित्सा सुविधाओं का अभाव है, और पुरुष डॉक्टरों के सामने जाने में महिलाओं को सामाजिक और सांस्कृतिक असहजता होती है।

1889 में महिलाओं के लिए शारदा सदन बनाया

उन्होंने मांग की कि महिला डॉक्टरों को प्रशिक्षित किया जाए और उनकी नियुक्ति की जाए। यह मांग उस समय के लिए क्रांतिकारी थी क्योंकि यह पहली बार था जब किसी ने महिला स्वास्थ्य को एक सार्वजनिक और नीतिगत मुद्दे के रूप में उठाया। उनकी इस गवाही का असर केवल कागजों तक सीमित नहीं रहा। यह आवाज ब्रिटिश सत्ता तक पहुंची, यहां तक कि रानी विक्टोरिया तक। इसके बाद ‘डफरिन फंड’ की स्थापना हुई, जिसका उद्देश्य भारत में महिला डॉक्टरों को तैयार करना और महिलाओं के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाना था। यह एक महत्वपूर्ण मोड़ था क्योंकि यहां से महिला स्वास्थ्य, स्वच्छता और चिकित्सा सुविधा को पहली बार संस्थागत मान्यता मिली। रमाबाई ने केवल नीतिगत बदलाव की वकालत नहीं की, उन्होंने इसे जमीन पर उतारा। 1889 में मुंबई में उन्होंने शारदा सदन की स्थापना की। यह संस्थान बाल विधवाओं के लिए था लेकिन यह केवल आश्रय स्थल नहीं था। यहां महिलाओं को शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और सबसे महत्वपूर्ण स्वच्छता और स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता दी जाती थी।

पुणे के एक गांव में मुक्ति मिशन की स्थापना

यह उस समय के लिए एक क्रांतिकारी कदम था, जब मासिक धर्म और महिला स्वास्थ्य जैसे विषयों पर बात करना भी वर्जित था। रमाबाई ने इस चुप्पी को तोड़ा और महिलाओं को उनके शरीर के बारे में जानकारी दी यह केवल स्वास्थ्य नहीं, बल्कि गरिमा का प्रश्न था। इसके बाद, पुणे के निकट केडगांव में उन्होंने मुक्ति मिशन की स्थापना की। यह संस्थान हजारों महिलाओं के लिए आश्रय बना विधवाएं, अनाथ, परित्यक्त और शोषित महिलाएं। यहां उन्हें केवल छत नहीं मिली, बल्कि एक नया जीवन मिला। शिक्षा, प्रशिक्षण, स्वच्छता और चिकित्सा सहायता के साथ। रमाबाई का यह काम केवल सामाजिक सेवा नहीं था; यह उस सोच के खिलाफ एक सीधा प्रतिरोध था, जो स्त्री के शरीर और जीवन को नियंत्रित करना चाहती थी।

21वीं सदी में भी अशुद्ध मानी जाती महिलाएं

उन्होंने अपनी पुस्तक The High-Caste Hindu Woman में उस समाज की परतें खोल दीं, जो बाहर से ‘संस्कारी’ दिखता था, लेकिन भीतर से स्त्री के अधिकारों को कुचलता था। उन्होंने दिखाया कि कैसे उच्च जाति की महिलाएं भी स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वतंत्रता से वंचित थीं। आज, जब हम इक्कीसवीं सदी में खड़े हैं, तो यह मान लेना आसान है कि हम उस दौर से बहुत आगे आ चुके हैं। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? आज भी, भारत में मासिक धर्म को लेकर चुप्पी है। आज भी, कई जगहों पर महिलाओं को ‘अशुद्ध’ मानकर अलग रखा जाता है। आज भी, स्वच्छता और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी महिलाओं के जीवन को प्रभावित करती है और सबसे महत्वपूर्ण कि आज भी जब कोई महिला इन मुद्दों पर खुलकर बात करती है, तो उसे ‘संस्कृति के खिलाफ’ कहा जाता है। यह वही समाज है, जिसने कभी रमाबाई को भी अस्वीकार किया था।

स्त्री के अधिकार को मुद्दा नहीं अधिकार बनाया

यही कारण है कि पंडिता रमाबाई आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने केवल अपने समय की समस्याओं को उजागर नहीं किया; उन्होंने उनके समाधान भी प्रस्तुत किए। उन्होंने दिखाया कि स्त्री सशक्तिकरण केवल शिक्षा या रोजगार का प्रश्न नहीं है । यह स्वास्थ्य, स्वच्छता और गरिमा का भी प्रश्न है। उनकी विरासत हमें यह सिखाती है कि सामाजिक परिवर्तन केवल कानूनों से नहीं आता; वह तब आता है, जब समाज अपनी चुप्पी तोड़ता है और असहज प्रश्न पूछने की हिम्मत करता है। और शायद यही पंडिता रमाबाई की सबसे बड़ी देन है कि उन्होंने स्त्री के अधिकार को ‘मुद्दा’ नहीं, ‘अधिकार’ बनाया। आज, जब हम महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, तो यह जरूरी है कि हम उस आवाज को याद रखें, जिसने पहली बार यह कहा था कि स्त्री का शरीर भी उसका अपना है और उसकी गरिमा भी।

नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं, न्यूज 24 किसी तथ्य की पुष्टि नहीं करता.

First published on: Apr 23, 2026 08:42 AM

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